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गुरुवार, 5 जनवरी 2017

पलटता हुआ साल और हमारे संकल्प !

पुराना साल जा रहा है,नया आ रहा है।साल पलटने पर कोई दस या पचास दिन की मियाद नहीं गिनता।नया साल हमारी झोली में एकदम से पूरे तीन सौ पैसठ दिन डाल देता है।इस तरह नए संकल्पों के लिए हमें एक्स्ट्रा स्पेस मिल जाता है।

ऐसा ही अनुभव कल शाम मिला।वे हमारे पुराने मित्र हैं।इससे भी बड़ी बात कि वे बड़े लेखक हैं।साल की तरह खुद भी पलट लेते हैं।कल मिले तो पिछले दिनों की गई उस स्थापना से पलटने लगे जिसके लिए कभी उन्होंने जबर्दस्त जंग लड़ी थी।मैंने टोका तो कहने लगे,लेखक को हमेशा  जल की तरह बहना चाहिए।वह एक जगह टिक जाएगा तो काई लग जाएगी।और तुम तो जानते ही हो कि काई लगा जल न पीने के काम आ सकता है न अभिषेक के।ऐसी व्यर्थता किस काम की।इसलिए अपने कहे और लिखे से जितनी जल्दी हो सके ,पलट लो।इससे संभावनाओं के नए द्वार खुलते हैं।विकल्पों की गुंजाइश बढ़ जाती है।

मैंने कहा-पर आपने अपनी पिछली पुस्तक में इस बात पर ज़ोर दिया था कि व्यक्ति को अपने कहे पर टिकना चाहिए।शास्त्रों में भी लिखा है कि नीति और सिद्धांत पर हमें अडिग रहना चाहिए।हम नीति पर टिकें या नीयत पर ? अचानक ऐसे हम पलटेंगे तो दस सवाल उठेंगे ?

मित्र एकदम से सोशल मीडिया के रंगमंच पर उतर आए।लेखकीय-ढाल पहनकर हम पर भड़क उठे-तुम सरकार से ऊपर हो क्या ? देख नहीं रहे हो देशहित में सरकार रोज पलट रही है।नीति तो फ़िक्स होती है।उसके खिसकने या बदलने को लेकर तुम चिंतित न हो।इसीलिए नीति-आयोग बनाया गया है,नीयत का नहीं।नीयत लचकदार यानी फ़्लेक्सिबल होनी चाहिए।साहित्य का नुक़सान तुम्हारे जैसे जड़ लोगों ने ही अधिक किया है।प्रगतिवादी लेखक मौक़ा सूँघकर पलट लेते हैं।तुम सरोकारों की कंठी बनाकर गले में लटकाए घूमते रहो।गली-मोहल्ले की लेखक सभाएँ भी तुम्हें भाव नहीं देंगी।लेखक वही है जो समय,सरकार और सरोकार के साथ घलमेल कर ले।एक भूखा और राजपथ से भटका लेखक न अपना भला कर सकता है न समाज का।इसलिए उसे कभी भी पलटने से परहेज नहीं करना चाहिए।इस काम को केवल नेताओं के भरोसे छोड़ना ठीक नहीं है।देखते नहीं हो,इसी विशिष्ट गुण के कारण वे जननायक बने हुए हैं !

मैंने पुनःप्रतिवाद किया-अपने साहित्यिक और व्यक्तिगत जीवन में कभी ऐसा प्रयोग नहीं किया।इस आशंका के चलते हमने कभी रात में करवट तक नहीं बदली।पता नहीं कब कोई पलटने का इल्ज़ाम लगा दे ! वे पूरे आत्मविश्वास से बोले-अव्वल तो कोई बोलेगा ही नहीं क्योंकि जो वरिष्ठ हैं,नीति-आयोग के संस्थापक-सदस्य हैं।और छोटों की बात पर बड़े नोटिस नहीं लेते।फिर भी कुछ शोर हुआ तो पत्रिका के सम्पादकीय या पुस्तकीय-समीक्षा में ध्वस्त कर देंगे।फ़िलहाल,नए साल का संबल तो है ही।नए संकल्पों के कंबल में पुराने पाप यूँ ही ढक जाते हैं।मौसम है,मौक़ा भी है, दस्तूर भी।पलटने के लिए कोहरे का मौसम सबसे मुफ़ीद होता है।आँखों में धूल झोंकने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती।इसलिए सरकार और कलेंडर की तरह अपने सरोकार पलट लो,समाज में सम्मान भी मिलेगा और स्पेस भी।

अब हम निश्चिन्त होकर पलट सकते हैं।दिन में भी रात में भी।गोष्ठी में भी,बिस्तर में भी।नए साल में पलटने वाले नए संकल्पों की सूची बना रहा हूँ।इस बीच कंबल पहले से अधिक गर्म हो गया है।

2 टिप्‍पणियां:

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति
आपको जन्मदिन के साथ ही नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं!

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

शुक्रिया कविता जी ।