रविवार, 21 दिसंबर 2025

मशहूर न होने के फ़ायदे

यहाँ हर कोई मशहूर होना चाहता है।मशहूरी का अपना आकर्षण है।समय बदलने के साथ मशहूर होने के तरीकों में ज़बरदस्त बदलाव हुए हैं।पहले लोग सहज और स्वाभाविक रूप से मशहूर होते थे।अब दिन-दहाड़ेवायरलहोते हैं।तब आदमी पढ़-लिख कर, खेलकूद कर या किसी और कला में कौशल दिखाकर प्रसिद्धि पाता था।इसके लिए प्रतिभा होनी ज़रूरी थी, पर अबवायरलहोने के लिए ज़्यादा सनकपन और थोड़ी उछलकूद चाहिए।इसमें लंबे समय या कठिन श्रम की ज़रूरत नहीं पड़ती।अचानक कोई मूर्खता से भरा कृत्य करके इंटरनेट पर परोस दीजिए,फटाफट मशहूरी मिल जाएगी।यह जितनी जल्दी मिलती है,उससे भी जल्दी गुम होती है।मशहूर होना है तो हमारे ज़माने जैसा होइए।यह क्या कि पल भर में वायरल हुए और पलक झपकते ही गड्ढे में समा गए ! अब सबका मिशन एक है, ‘ट्रेंडहोना।एक बार हो गए,तो ज़िंदगी सँवर गई समझो।



मशहूर होने का फ़ायदा एक है पर होने के अनेक।प्रसिद्धि पाने पर वह आम आदमी नहीं रहता।इस एक वजह से उसे किसी लाइन में नहीं लगना पड़ता।उसके सारे काम पलक झपकते होते हैं।इसके उलट मशहूर होने के नुक़सान बहुत हैं।वह सड़क पर खड़े ठेले पर गोलगप्पे नहीं खा सकता।गुमटी में बैठकर कटिंग चाय नहीं पी सकता और ही सब्जी वाले से मोल-तोल कर सकता है।जो मशहूर नहीं है,वह बिंदास घूमता है।प्लेटफॉर्म की बेंच पर बैठकर अचार के साथ आलू-पराठे खा सकता है।खुलकर डकार ले सकता है और रिक्शेवाले से दो रुपए के लिए हील-हुज्जत भी कर सकता है।हाँ,मशहूर होने का एक नुक़सान भी है।कुछ ग़लत होने पर पुलिस का सिपाही कभी भी और कहीं से भी उसे घसीटते हुए ले जा सकता है।सरकारी कार्यालय में ज़रूरी काम के लिए वह ग़ैर-ज़रूरी धक्के खा सकता है।उसकी कही बात का कोई वज़न नहीं होता और मर जाने पर कोई ख़बर नहीं बनता।कुल मिलाकर मशहूर होना आम आदमी के लिए कहीं बेहतर है।उसे नींद अच्छी आती है।बिना सलीक़े से कटा अमरूद समूचा ही खा सकता है।बीमार हो जाए तो बड़े अस्पताल का खर्चा बचता है क्योंकि बिना बेड पाए वह सरकारी अस्पताल में स्ट्रेचर पर आराम से पड़ा रह सकता है।



मशहूर होने के इतने फ़ायदे हैं फिर भी साहित्य और सियासत में आए दिन लोग मशहूर होना चाहते हैं।सियासत में मशहूर होना ज़्यादा मुश्किल नहीं है।इसके लिए बस इतना एहतियात ज़रूरी है कि काम करके केवल उसका शोर मचाया जाए।एक-दो उल्टे-सीधे बयान देकर तुरंत मशहूर हुआ जा सकता है।हज़ार-पाँच सौ साल से गड़ा मुर्दा उखाड़कर उसे ज़िंदा किया जा सकता है।साहित्य में इतनी अधिक सुविधा नहीं है।वहाँ लिख-लिखकर मशहूर होना बहुत दूर की कौड़ी है।इसके लिए एक नया उपाय किया जा सकता है।अपनी दो कौड़ी की किताब की क़ीमत पंद्रह करोड़ रख दीजिए।हर तरफ़ इसके चर्चे होंगे।किताब तो कोई नहीं लेगा,हाँ,आपमशहूरज़रूर हो जाएँगे।हमारे ज़माने के एक लेखक थे,सुरेंद्र मोहन पाठक।एक उपन्यास लिखा था, ‘ पैंसठ लाख की डकैती उपन्यास खूब बिका था।लेखक पहले से मशहूर था,और भी हो गया।पाठक जी अभी भी लिख रहे हैं पर इतने मशहूर नहीं हो पाए कि पंद्रह करोड़ की किताब लिख लें।ऐसा साहस वर्तमान साहित्यकारों में ही हो सकता है।संभव है,ऐसे लेखक सरकार के तौर-तरीकों से प्रेरित हो रहे हों।


ऐसी प्रसिद्धि पाना उनके लिए सरल है जो अधिक चतुर हैं।एक सामान्य बुद्धि वाला ऐसे में क्या करे ! इसके लिएरीलहै ना ! जितनी ऊटपटांग हरक़त होगी,उतनी ही रील वायरल होगी।अब तो मनौतियाँ तक हो रही हैं कि काश, एक रील ऐसी निकल आए ! मशहूरी पा जाने पर फिर वह और भी मूर्खतापूर्ण रील बनाने लगता है।इससे निठल्ले लोगों का मनोरंजन होता है औररीलररोज़ डॉलर गिनता है।जबसे रुपए को मशहूरी मिली है,वह कहीं का नहीं रहा।जल्द ही वह बेरोजगारी और मँहगाई की तरह नगण्य हो जाएगा।विशेषज्ञ उसकी कमज़ोरी को उसका बल बताने लगेंगे।


इसलिए ज़्यादा मशहूर होना ख़तरे से ख़ाली नहीं है।लोगों की निगाहें उसी पर लगी रहती हैं।मुद्दा हो या आदमी, सामान्य होने में ही भलाई है।ऐसे में सरकार अपना काम करती रहती है।देखिए , धुंध और प्रदूषण मशहूर होने की सज़ा भुगत रहे हैं।ऐसे मौसम में नेताओं कोआई क्यूऔर क्यू आई में कन्फ़्यूज़न पैदा हो जाता है।अच्छी बात यह है कि जब नेता विपक्ष में होते हैं तो उन्हें गहरी धुंध भी साफ़ नज़र आती है।सत्ता में आते ही यही धुंध उनकी आँखों में चढ़ जाती है।सियासत की यह सबसे बड़ी मशहूरी है।



रविवार, 23 नवंबर 2025

हवा को ख़त लिखना है !

राजधानी फिर से धुंध की गिरफ़्त में है।बीसियों दिन हो गए, साफ़ हवा रूठी हुई है।शायद उसे भी किसी के ख़त का इंतज़ार है।फ़िलहाल, सरकार और बुद्धिजीवी इससे भी ज़रूरी मसलों पर व्यस्त हैं।वैसे राजधानी में प्रदूषण होना या बढ़ना कोई ख़बर भी नहीं रही।इस मौसम में हर साल हवा का मूड बिगड़ता है।पहले पराली,दीवाली के हवाले ठीकरा फूटता था।अब उसकी भी ज़रूरत नहीं रही।आम आदमी (पार्टी नहीं असली वाला आम आदमी) ने इसे अपनी नियति मान ली है और सरकार ने बेहतरी दिखाते हुए दीग़र मसलों की तरह प्रदूषण को भीन्यू नॉर्मलकी श्रेणी में डाल दिया है।उसकी प्राथमिकता में सरकार बनाकर और एक सरकार बनाना भर है।उसे भरोसा है कि सारे देश में जब एक सी हवा बहेगी,राजधानी की हवा अपने आप साफ़ हो जाएगी या आम आदमी ही।इसमें पहले कौन साफ़ होता है,देखने वाली बात यही है।


एक पुराने गाने के बोल याद रहे हैं; ‘ देखो,देखो,देखो ! दिल्ली का कुतुबमीनार देखो !’ और अब सारी दुनिया दिल्ली के प्रदूषण पर शोध कर रही है।कूड़े का पहाड़पहले ही इसकी शान में चार चाँद लगा रहा था,अब ज़हर भरी हवा और धूल के महीन कण दिल्ली के मुकुट में स्थायी रूप से टाँक दिए गए हैं।घर से बाहर निकलते ही आँखें बाहर निकलने लगती हैं।पहले ऋषि-मुनि लंबी तपस्या करके आँखों से अग्नि प्रज्ज्वलित करते थे।सामने वाला देखते-देखते राख हो जाता था।अब यह प्रताप आम आदमी को हासिल हो गया है।फ़र्क़ सिर्फ़ इतना भर हुआ है कि उसने उसी आग को आत्मसात कर लिया है।फेफड़े ठीक से फड़फड़ा भी नहीं पा रहे।अभी तक मुई सिगरेट अकेले यह काम करती थी, लेकिन जबसे सरकार ने इस पर तबियत से टैक्स ठोंका है,लोग बिजली और पानी के बाद फ्री में धुंआ ले रहे हैं।विकास के लिए और कोई कितना हासिल कर लेगा ?


एक तो यह कोई समस्या नहीं है।अगर है भी तो साफ़ हवा देने की जिम्मेदारी सीधे जनता पर है।अव्वल तो वह सड़कों पर निकले नहीं।अगर निकलती भी है तो रैली,जुलूस और शोभायात्रा संग निकले।बिना डीज़ल और पेट्रोल की गाड़ी में निकले।सम-विषम सोचकर घर से निकले।मंत्री, सांसद, विधायक और पार्षद चुनाव जीतने के बाद से आराम फ़रमा रहे हैं।उनसे मिलने में कृपया मारामारी करें।यह पक्की बात है कि यदि उन्हें धुँध का तनिक भी संज्ञान होता तो अब तक ज़रूर इस गंदी हवा का मान-मर्दन कर देते ! चुनाव में उड़ा गर्दा कुछ दिन तो आसमान में छाएगा ही।आख़िर सब कुछ सरकार ही क्यों करे !


कुछ लोगों के शौक अलग ही लेवल के हैं।उन्हें मंहगाई,भ्रष्टाचार,बेरोजगारी और आतंक से मुक्ति के बाद हवा भी साफ़ चाहिए।सरकार और ज़रूरी कामों से साँस ले सके तो आम आदमी की साँस की भी ख़ैर ले।हालाँकि शहर में हर आदमी परेशान है,ऐसा भी नहीं है।कुछ ने शुद्ध हवा को अपने-अपने कमरों में पैदा कर लिया है।वह दिन भी जल्द आएगा,जब समृद्ध लोग अपनी नाक घर पर ही रखकर आयेंगे।यदि नाक के साथ निकलना ज़रूरी हुआ तो नाक में कुप्पी लगाकर निकला करेंगे।उस कुप्पी में दिन भर के लिए पर्याप्त हवा भरी होगी।देर-सबेर आम आदमी भी ईएमआई पर साफ़ हवा की कुप्पी ले सकेगा।बैंक वाले उसकी जान बचाने के लिए इतना क्रेडिट उसे दे ही देंगे।


अभी की बात करें तो हम बीस दिन पहले आख़िरी बार सैर पर निकले थे।डॉक्टर ने कहा है कि गाँठें और टाँगे फिर कभी देख लेना,पहले अपनी साँसें बचाओ।ज़िंदा रहोगे तो घुटने भी बदलवा लेना।अच्छी बात है कि इसी बहाने घर को भी कुछटाइमदे पाओगे।घर पर रहने के अपने ख़तरे हैं पर जीवन बचाने के लिए कुछ ख़तरे उठाने पड़ेंगे।बस वाद-विवाद से दूर रहना।अब डॉक्टर साहब को कौन समझाए ! झगड़े से दूर रहने से खतरा नहीं टलता।अकसर झगड़ा ख़ुद सिर पर आकर बैठ जाता है।


बहरहाल बाहर ज़हरीली हवा लेने से बेहतर है घर पर ही ज़हर के घूँट पिए जाएँ।मैं कोई बुद्धिजीवी या लेखक भी नहीं हूँ ,वरना उस हवा को ख़त लिख देता,जिसने ज़िंदगी में ज़हर पीना आसान कर दिया है ! देखता हूँ, खिड़की के बाहर किसी ने रेडियो चला दिया है जिसमें हमारी पीढ़ी का गाना बज रहा है,‘ तुम अपना रंजो-ग़म,अपनी परेशानी मुझे दे दो’ ! तभी श्रीमती जी की आवाज़ आती है, ‘खिड़की बंद कर लो जी।धुंध अंदर रही है और मैं खिड़की बंद करके कमरे में ही टहलने लगता हूँ।

मित्रता का आधुनिक काल

मित्रता एक ऐसा रिश्ता है , जो सबसे ज़्यादा अबूझ रहा है।यह देशकाल , परिस्थिति और सुविधा के अनुसार परिवर्तित होता रहता है।मि...