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गुरुवार, 5 मार्च 2015

उनकी कैंटीन और हमारी कटिंग वाली चाय !

शाम को ढाबे के पास पंचम काका मिल गए।तरकारी और पूड़ी दाब चुके थे,हमें देखकर पास आ गए।कहने लगे-बच्चा,भूख लगी होय तो थोड़ा खा लियो।हियाँ खाना बहुतै सस्ता है।तीस रुपय्या में दू ठो पूरी और आलू-टमाटर की सब्जी मिलत है,साथ मा अचार फिरी है।हमने मना करते हुए कहा-नहीं काका,मैं तो कैंटीन से खाकर आ रहा हूँ।आप बहुत दिन बाद मिले हैं,बताइए क्या चल रहा है ?
काका कैंटीन का नाम सुनकर ही चौंक पड़े।कहने लगे-हाँ बच्चा,ई कैंटीन का मसला का हवै ? रेडियो मा खबर सुनी रहै कि हमरे परधानमंतरी जी उहाँ जीमत रहे।सुनत हैं कि टोटल उनतीस रुपय्या मा पूरी थाली मिली रहै।वहिमा दू तरह की दाल,तीन तरह कै तरकारी,मिठाई,खूब सारा सलाद और पापड़ भी।’ हमने उनकी जिज्ञासा को शांत करते हुए कहा-काका,हम उस कैंटीन से खाकर नहीं आए हैं।हमारी कैंटीन में वही थाली एक सौ पचास रूपये की है।आप जिस कैंटीन की बात कर रहे हैं,वह आम आदमी के लिए नहीं है।वैसी थाली पाने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं।ऐसी भरी-पूरी थाली पाने के लिए नोट नहीं वोट बटोरने की ज़रूरत होती है।’
काका फिर भी बात को समझ नहीं पा रहे थे,बोलने लगे-जो फसल हम उगावत हैं,वो थाली मा पककर इतनी मँहगी कइसे होइ जात हवै ? फिर ऐसी कैंटीन तो हम लोगन के लिए भी खुला चाही।काम-काज के बाद अगर भूख लागे तो हम भी पेट भर खा सकें।हम परिवार सहित ढाबे मा खाएं तो एक दिन भी गुजारा न होए।ई पेसल   वाली कैंटीन सबके लिए काहे नहीं खोली जाती बच्चा ?’
हमने उनके कंधे पर हाथ धरते हुए समझाने की कोशिश की-आप नाहक परेशान हो रहे हैं।हमारे देश में राजा और प्रजा के लिए अलग-अलग नियम हैं।वो सड़क किनारे,झोपडी में या कैंटीन में शौक के लिए आते हैं,खाने के लिए नहीं।वो हमारी तरह भूखे भी नहीं होते।उनके पेट का दायरा हमारे-आपके खेत-खलिहान-रसोई से कहीं बड़ा होता है काका।फ़िर उनकी यह मजबूरी है।वो अपने लिए नहीं देश के लिए खाते हैं,इसीलिए देश भर में खाते हैं।’

पता नहीं,काका हमारी बात समझे कि नहीं पर इतना सुनकर उन्होंने कटिंग वाली चाय का ऑर्डर दिया और हम दोनों चाय सुड़कने लगे।

गुरुवार, 24 जुलाई 2014

सांसदों के लिए नया मेन्यू !

बड़े दिनों बाद एक अच्छी खबर आई है।चुनाव बाद थके-हारे,भूखे-प्यासे लोगों पर आखिरकार संसद की कैंटीन मेहरबान हुई है।कैंटीन में वर्षों से रोटी-दाल या कढ़ी-चावल जैसा देसी और उबाऊ खाना परोसा जाता रहा है।मेनू में शामिल ऐसी चीज़ें व्यंजन की श्रेणी में भी नहीं आतीं ।नेताजी को असली तृप्ति तो अब जाकर मिलेगी,जब वे चिकन-करी,ग्रिल्ड-फिश,कश्मीरी राजमा और छोले-भठूरे खाकर पूर्ण-तुष्टि की डकार भरेंगे।इस तरह मंहगाई से निपटने में संसद की कैंटीन एक मिसाल बन सकती है।जो भी अच्छी शुरुआत होनी है,तो क्यों न देश के गर्भ-गृहसे हो,यही सोचकर यह सराहनीय फैसला लिया गया है।

अब जब नए और शाही व्यंजन कैंटीन में आ गए हैं तो उनका जमकर लुत्फ़ उठाया जा सकेगा।भरे-पेट होने के अपने अलग फायदे हैं।जुबान और पेट के तुष्ट होने के बाद इनकी कार्य-प्रणाली वैसे भी सुस्त हो जाती है।इसका सीधा फायदा संसदीय कार्यवाही पर पड़ता है।ऐसे में सदन में न ज्यादा शोर-शराबा होगा,न कड़वाहट और न ही ज्यादा उछल-कूद।लोग अपनीअपनी सीटों में मस्त होकर पड़े रहेंगे।इस बीच सही मौका देखकर सत्ताधारी-दल अपने आवश्यक बिल पास करवा लेगा।ऐसे में कैंटीन के छोटे-मोटे बिल यदि सरकार के बड़े बिलों में अपना योगदान करते हैं तो इसमें बुरा क्या है ?

इसका एक उजला पक्ष यह भी है कि संसद की कैंटीन से तरह-तरह के सुस्वादु भोजन करने के पश्चात संसद-सदस्य सदन में बढ़ती मंहगाई और बढ़ते बिजली-बिल पर धारदार चर्चा कर सकेंगे।कैंटीन के मेनू में दक्षिण का इडली-सांभर-डोसा और इतालियन पिज्जा-बर्गर को भी शीघ्र समाविष्ट करना चाहिए।यदि गुजराती ढोकला-खांडवी,इन्दौरी-पोहा और पंजाबी-पराठा भी मेनू में आ जाँय तो संसद में उपस्थिति का प्रतिशत अपने-आप बढ़ जायेगा।देश के अधिकतर खाने वाले यदि कैंटीन में ही भर-पेट हो लेंगे,तो देश के अन्य भागों में,खासकर संसद के बाहरी इलाकों में खाने की डिमांड कम होगी।इससे मंहगाई में स्वतः कमी दर्ज हो सकती है।

फ़िलहाल,संसद की कैंटीन गुलजार है और माननीय वहीँ जीम रहे हैं।वैसे भी सदन के अंदर छत टपकने से उधर जाने और नहाने का कोई प्रोग्राम नहीं है।सही समय पर कैंटीन के मेनू में बदलाव किया गया है।सदन के अंदर कुरता-फाड़ने और भीगने के अंदेशे से अच्छा है कि मामूली रकम में भर-पेट भोजन किया जाय।सोने के लिए सदन में वैसे ही मनाही नहीं है इसलिए बिना घोड़े बेचे मंहगाई पर ज़रूरी चिंतन भी हो सकेगा और कैंटीन के व्यंजनों पर ढेर सारा विमर्श भी।



अपने करम जाँहिं अपकारी

कई दिनों बाद ककुआ कल शाम को दिखाई दिए।मैं पान की दुकान के पास खड़ा था कि अचानक उन पर नज़र पड़ी।वह बचकर निकलने ही वा...