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शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

सेल्फ़ी विद सूखा

सूखा चर्चा में है।ज़मीन पर भी इसका असर दिख रहा है और आँखों पर भी।सूखा किसी के प्राण हरता है तो किसी की इमेज भी बनाता है।सूखा मौक़ा है,उपलब्धि भी।किसान के लिए सूखा अभिशाप है तो नेताजी के लिए वरदान।सुख से वंचित होने और सुख को पाने का संयोग सूखा ही देता है।यह उसकी किस्मत है कि वह सूखे से क्या ले पाता है !
नेताजी सूखे के दौरे पर गए।अधिकारियों ने आश्वस्त किया कि ज़नाब अबकी बार वाला सूखा भयंकर है।भूकम्प नापने वाले रिक्टर पैमाने की मदद ली जाए तो इसकी भयावहता मापी जा सकती है।बिना आधिकारिक माप के समस्या में वजनता नहीं आती।काम को प्राथमिकता इसी वजन से मिलती है।नेताजी इसी उम्मीद से दौरे पर थे।पर यह क्या ! भीषण सूखे के बीच पानी का एक पोखर कैसे मिल गया !यह तो भविष्य की योजनाओं पर पानी फेरने वाली घटना हो गई।
नेताजी ने फिर भी आस नहीं छोड़ी।उन्हें अपने नायक का चेहरा याद आ गया।झट से फोन निकाला और सूखे के बैकग्राउंड में अपने चेहरे को चस्पाकर चमकदार सेल्फ़ी खींच ली।उनकी आँखों की कोरों में जमा पानी उसी पोखर वाले पानी में मिल गया।अब सीन ज़ोरदार था।नेता था,पानी था और इन सबको निहारता असहाय सूखा।
नेताजी ने फ़टाक से 'सेल्फ़ी विद सूखा' प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया।सोशल मीडिया नेताजी के इस सुकर्म-प्रवाह से पानी-पानी हो गया।बाढ़ आ गई।इस तरह सूखे के निपटान की प्रारम्भिक तैयारी हुई।अफ़सर खुश।सरकार खुश।और जनता,वह तो चुनाव के बाद से ही खुश है।
कुछ लोग सूखे को भूखे के साथ जोड़ने पर आमादा हैं।उन्हें समझ नहीं कि सूखे का सामना करना कविताई तुकबन्दी नहीं है।सूखा और भूखा सुनने में एक जैसे भले लगते हैं पर महसूसते अलग-अलग हैं।असली भूखे तो उसके इंतज़ार में ही रहते हैं।नकली भूखे सूखा आते ही निकल लेते हैं।उनको सद्गति मिलती है और इनको अद्भुत छवि।
भूखे और कमज़ोर लोग किसी समाज के लिए उपयोगी नहीं हैं।सरकार का फ़ोकस 'मेक इन इंडिया' पर है।उसमें जगह-जगह से पिचके और दरिद्र-छवि वाले पुतलों की ज़रूरत नहीं है।इससे देश की ग्लोबल इमेज और विदेशी निवेश को धक्का पहुँच सकता है।कम से कम हमारी सरकार इतनी सचेत तो है।
देश में पानी की कमी का रोना रोने वालों को पानी वाली सेल्फ़ी देखनी चाहिए।इससे भी हमारे रहनुमाओं पर भरोसा न हो तो वे दृश्य देखें,जब मंत्री जी के आगमन पर हेलीपैड या कई किलोमीटर दूर सड़क को पानी-पानी किया जाता है।और कुछ न हो तो टीवी खोलकर आईपीएल का अभिजात्य खेल ही देख लें,जिसमें पिच को तरबतर किया जाता है।
नेताजी,मंत्रीजी सब लोग सूखे को लेकर चिंतित हैं।जल्द ही 'सेल्फ़ी विद पानी' की छवि देश के सामने होगी, जिससे हमें उनकी आँखों में पानी होने की गवाही मिल जाएगी।भीषण सूखे में इतना पानी तो बचा ही है !

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

शांति स्थगित है !

हमारे पड़ोसी ने हमें चेतावनी दी है कि शांति स्थगित है।इससे मामला और उलझ गया है।दोनों तरफ अजीब-सी शांति पसर गई है।हमारी फ़िक्र परिंदों को लेकर है।उन्हें इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम की जानकारी कैसे पहुँचाई जाय ? क्या वे शांति के स्थगन को हवा में ही भांपकर अपने डैने विपरीत दिशा में मोड़ लेंगे ?चाहे जैसे भी हो,परिंदों को खबरदार किया जाना ज़रूरी है।ऐसा न हो कि वे स्थगित हुई शांति को अपनी चीं-चीं से भंग कर दें ! शांति इत्ती ही छुई-मुई सी हो गई है आजकल।

शांति अब योजनाबद्ध तरीके से आती है।उसके लिए बाकायदा कार्यक्रम और एजेंडा तैयार किया जाता है।बिंदु तैयार किए जाते हैं।इस बात का ख्याल रखा जाता है कि शांति स्थापित करने के तमाम बिंदु हों पर समझदार वही होता है जो उसमें भी सेंध लगाने का रास्ता खोज ले।शांति का मंत्रोच्चार करते हुए युद्ध का पूजन करने वाले ही असल कूटनीतिक होते हैं।वे शांति-स्थापना के लिए कृतसंकल्प होते हैं भले ही युद्ध को स्थगित करना पड़े।युद्ध स्थगित करते रहने की इसी आदत के चलते फ़िलहाल उन्हें शांति को स्थगित करना पड़ा है।

शांति को किसी से शिकायत नहीं है।परिंदों को भी इससे बहुत फ़िक्र नहीं है।बस कबूतर अपनी उड़ान को लेकर ज़रा-सा व्याकुल हैं।उनको लगता है कहीं स्थगित हुई शांति के समय उनके उड़ने से आपसी सौहार्द बुरा मानकर पिघल न जाय।बड़ी मुश्किल से तो वह अभी जमा है।हाल में ही सौहार्द ने जन्मदिन पर केक काटे,क्रिकेट खेली और पठानकोट किया।बाद में पता चला कि वे कबूतर नहीं कौए थे,बीट कर चले गए।कबूतरों को यही चिंता है।एक बार शांति कायदे से स्थापित हो जाए,खम्भे-सी अविचल खड़ी हो जाए, तो वे भी इत्मिनान से बीट कर सकें।


कौए खुश हैं।शीतयुद्ध खत्म हो चुका है और गिद्ध भी।अब नोचने के लिए कौओं को पर्याप्त माल मिल रहा है।शांति स्थगित है ताकि उनका पेट भर सके।युद्ध स्थगित हो जायेगा तो वे क्या खाकर जियेंगे ?

इधर हमारा पड़ोसी शांति स्थगित कर रहा है और हम नेवता दे रहे हैं।दोनों का प्रयास यही है कि शांति एक दफ़ा क़ायदे से स्थापित हो जाए,बाद में जब चाहे उसे दफा कर देंगे।पड़ोसी का तरीक़ा व्यावहारिक लगता है।न्योतने से देवी-देवता आ सकते हैं,शांति नहीं।हम फिर भी चाहते हैं कि जैसे हमने उन्हें न्योता,वह हमें भी न्योते।पड़ोसी ने अधिक समझदारी दिखाते हुए बता दिया कि यह आपसी लेन-देन का मामला नहीं है।मजे की बात यह रही कि इसका खुलासा तब हुआ,जब उसने अपने घर पहुँचकर डकार ली।हमको पता ही नहीं चला कि उसने कब दोस्ती के घूँट शांति के साथ हलक के नीचे उतार गया।हम शांति को आवाज़ ही देते रह गए जबकि पड़ोसी ने उसे उदरस्थ कर लिया।अब हम सौहार्द को अकेले ही लिए सहला रहे हैं।हमें इतना भी ज्ञान नहीं कि सौहार्द कभी अकेले नहीं होता।

अब जब शांति के आने का मुहूर्त निकलेगा,विधिवत आयोजन किया जाएगा, तभी तो वह स्थापित हो पाएगी।फ़िलहाल,हमें उन कबूतरों की चिन्ता है जो शांति की आवाजाही से अनभिज्ञ हैं।

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

राष्ट्रभक्ति के लीक होने का गौरव !

वो लोग पिछड़े जमाने के थे,जो लीक बनाते थे।फिर उस पर दूसरे लोग चलते थे।अब लीक होने का समय है।इस पर लोग रश्क करते हैं।वे फ़ोर्ब्स-500 की लिस्ट से चूके तो पनामा-500 में लीक यानी प्रकट हो गए।लीक बनाने और हो जाने में बुनियादी अंतर है।लीक बनाने के लिए जहाँ लम्बे वक्त और श्रम की ज़रूरत होती है,वहीँ लीक होने के लिए केवल पैसा बनाना होता है।खासकर जब पैसा पानी की तरह बह रहा हो तो उसके लिए ‘पनामा नहर’ से उपयुक्त जलाशय दूसरा नहीं है।

बूँद-बूँद से समुद्र भरने की बात भले की गई हो पर पनामा जैसी नहरें दोनों हाथों से उलीचने के बाद भी अधभरी रह जाती हैं। देश-दुनिया के जो लोग इस नहर में डुबकी नहीं लगा पाए हैं,वे सदमे में हैं ।इस वाली सूची में उनका नाम तो होना ही चाहिए था।अंतर्राष्ट्रीय स्तर के किसी खेल में हम स्थान भले नहीं बना पाए हों,पर इसमें हम बाकी दुनिया को करारी टक्कर दे रहे हैं ।ऐसे माहौल में भी इंडिया ‘स्टैंड अप’ नहीं होगा तो कब होगा ?

लीकने का अपना इतिहास है। लीक बनाने वाले तो अहम माने जाते हैं पर लीक पर चलने वालों का कोई इतिहास नहीं होता।कहा भी गया है-लीक छाँड़ि तीनों चलैं,शायर,सिंह,सपूत।वे भारत-माता के सपूत हैं ,इसीलिए लीक छोड़ रहे हैं ।आधुनिक युग में नेता,अभिनेता और व्यापारी सभी लीकातुर हैं।अलग-अलग देश के लीकुओं ने एक साथ लीक कर वैश्विक एकता का प्रदर्शन किया है।

इस लीक के बहाने सरकार को गरीबी रेखा नापने का एक बड़ा सरल उपाय मिल गया है।अब से सरकारी सब्सिडी पाने के लिए पजामा-लीक वालों को ही योग्य माना जाएगा जबकि सरकारी लोन केवल पनामा-लीक वालों को ही उपलब्ध होगा।इससे बैंकिंग सेक्टर की दुविधा भी खत्म होगी।पजामा-लीक वाले खाते अपने यहाँ और पनामा-लीक वाले विदेशी बैंकों में सुरक्षित बने रहेंगे।

आज लीक बनाने वालों की अपेक्षा लीक होने वालों की माँग ज्यादा है।वे लीक से हट भी रहे हैं और लीक-समर्थ भी हैं।पहले लोगों के दिलों में राष्ट्रभक्ति बहती थी,अब उनके खातों से लीक हो रही है।ऐसे दुर्लभ ‘लीकुओं’ से प्रेरणा पाकर आप भी लीक होने के लिए सज्ज रहें।

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

राष्ट्रभक्ति के बीच में लीक हो जाने का गौरव !

आख़िरकार बड़े दिनों बाद लीकेज की खबर आई।ऐसा लगने लगा था कि दुनिया ‘लीक’ होना ही भूल गई हो।पर तभी ‘पनामा लीक’ ने हमारे निकम्मेपन को गलत साबित कर दिया।शुरू शुरू में हमें यही लगा कि ‘पनामा’ नहर लीक हुई है।हम तो बचपन से इसी पनामा को जानते थे।जानकर चिंता हुई कि पता नहीं कितने निर्दोष लोग इसकी चपेट में आकर बह गए होंगे पर बाद में पता चला कि इसमें देश-दुनिया के कई धनी-मानी शौक से बह गए हैं।वे बहे ही नहीं अपनी-अपनी गठरी लेकर इसमें डूब गए।राहत की बात यह रही कि इसमें ‘डूबना’ उतराने से अधिक हितकर है।इस दुर्लभ लीकेज में हमारे देश के गिने-चुने नायक ही क्वालीफाई कर पाए हैं।इनमें से एक लीकनायक  से हमारे संवाददाता ने एक लीक-प्रूफ इंटरव्यू लिया है जो पाठकों के लिए यहाँ प्रस्तुत है :

संवाददाता:सबसे पहले तो आपको लीक होने की बधाई।आपको कब लगा कि आप लीक के पीक लेवल तक पहुँच सकते हैं ?

लीकनायक : धन्यवाद,शुक्रिया,आभार।मुझे लग रहा था कि मीडिया ऐसी उपलब्धियों को प्राइम-टाइम पर दिखाना ही भूल चुका है,पर हम अपने दायित्व से नहीं चूके।हमें खुद पर और अपने राष्ट्र-प्रेम पर पूरा भरोसा था।अन्ततः यह सब पर भारी पड़ा।दुनिया के शीर्ष लीकुओं में हमने अपने राष्ट्र का प्रतिनिधित्व किया,यह गर्व की बात है।

संवाददाता :आपने इस स्तर पर आने की तैयारी कैसे की ? क्या इसके लिए आपको अपने अभिनय से भी समझौता करना पड़ा ?

लीकनायक :कुछ नहीं बस इसके लिए ‘जज्बा’ होना चाहिए।ऊपरवाले का शुक्र है कि हमें उसका भरपूर साथ मिला।राष्ट्र के लिए कुछ करने का जज्बा आपके अंदर हो तो आपके पास ऐश्वर्य की कमी नहीं रहती।वह ‘कजरारे-कजरारे’ वक्त से उठाकर आपको सीधे ‘जन-गण-मन’ की पीठ पर सवार कर सकता है।इस मामले में राष्ट्र सदा हमारे साथ रहा।अब बात आपके दूसरे सवाल की;निश्चित ही हमने अभिनय को हमेशा प्राथमिकता दी है।वह इतना सटीक होता है कि वास्तविक ज़िन्दगी में भी हम इसकी गुणवत्ता से समझौता नहीं करते।इस लीकेज से आपको और सबको इसका उत्तर मिल गया होगा।

संवाददाता:इस दुर्लभ उपलब्धि का श्रेय आप किसे देना चाहेंगे ?

लीकनायक :लीक का श्रेय तो निश्चित रूप से हमें ही है।यदि हम इस काबिल ही न होते तो आज कोई और ही लीक हो रहा होता।हाँ,इस उपलब्धि में हमारा ‘किसान’ होना बड़ा काम आया।कई लोगों को तभी मुझमें अपार संभावनाएं दिखने लगी थीं।हमने भी निराश नहीं किया।इधर हम तेल-मालिश और चूरन की पुड़िया बेचते रहे,उधर समर्पित भाव से लीकातुर हो गुल्लक भरते रहे।

संवाददाता:पर कुछ लोग आप पर आरोप लगा रहे हैं कि आपने टैक्स की चोरी की है ?

लीकनायक :देखिए,जिनकी हैसियत लीक होने लायक भी नहीं है,वही इस काम में आगे हैं।आपके पास कुछ होगा तभी न आप लीकोगे ? और स्पष्ट कर दूँ कि चोर तो किसी एंगल से हूँ नहीं।ऐसे लोग ज़रूर ‘डॉन’ से प्रभावित लगते हैं।हमारा अभिनय ही ऐसा है।

संवाददाता : लेकिन टैक्स तो फिर भी बनता है आपके ऊपर ?

लीकनायक : लगता है आपने ‘देशप्रेमी’ नहीं देखी है।अगर ऐसा होता तो यह सवाल न करते।फिर भी अगर आपका सवाल अभी उबाल मार रहा है तो उसे अभी ठंडा किए देता हूँ।

संवाददाता:वह कैसे ?

लीकनायक : ‘भारत माता की जय’ बोलकर ! इसमें ऐसी जादुई-शक्ति छिपी है कि कुछ भी खा-पी लो,डकार तक नहीं आती।पहले लीद होने की आशंका होती थी,अब लीक होकर भी नाम होता है।

   

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

हल्ला देशहित में ज़रूरी !

हल्ले के शोर में कई धतकरम धड़ल्ले से निपट जाते हैं।इसके लिए अब सड़कों पर उतरने की ज़रूरत नहीं पड़ती।पड़ोसी देश जब हमारे यहाँ मुंबई या पठानकोट करता है,टीवी स्टूडियों में हल्ले का आतंक छा जाता है।क्रिकेट वाला हल्ला सबसे ज़ोरदार होता है।हाल ही में जब चैनलों में क्रिकेट को लेकर विराट हल्लाहो रहा था,तब कुछ लोग कुर्सी पर टकटकी लगाए हुए थे।घोड़े की टांग टूट चुकी थी पर कुर्सी सलामत थी।उनका लक्ष्य घोड़ा नहीं कुर्सी है।घोड़ा तो गड्ढे में गिर सकता है पर कुर्सी पर गिरकर ही बैठा जा सकता है।इसलिए वे गिर गए।

आड़े वक्त में क्रिकेट ने साथ दिया।ऐसे हल्ले के बीच घोड़े और लोकतंत्र की टांग कितनी देर टिकती ! सो,दोनों निपट गईं।कुछ ने हल्ला मचाया कि लोकतंत्र की हत्या हुई है।कुछ यह भी मान रहे हैं कि इससे पहले कई बार लोकतंत्र की हत्या हो चुकी है।ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हम बार-बार मरे को मार रहे हैं ?

सच तो यह है कि लोकतंत्र अमरौती खाकर आया है।यह बार-बार मरता है,फिर भी मरने के लिए कुछ बचा रहता है।इसे ही लोकतंत्र की खूबी कहते हैं।जिन्हें लगता है कि लोकतंत्र की हत्या हुई है,वे भी हल्ला मचा रहे हैं।जो लोग आज लोकतंत्र को सुरक्षित बचाने का दावा कर रहे हैं,वे पहले कई बार उसकी हत्या होना स्वीकार कर चुके हैं।ऐसा चमत्कार हमारे देश में ही हो सकता है।
हल्ले ने और कई समस्याओं को निपटाया है।किसी ने इसके जरियेदेशद्रोहीजेएनयू को तो किसी ने गर्दन पर छुरी धरकर भारत माताको।कुछ का मानना है कि क्रिकेट के इस हल्ले से लाहौर भी निपट गया।वहाँ हुए आतंकी हमले पर बुद्धिजीवियों को हल्ला करने का मौक़ा ही नहीं मिला।समाचार चैनलों पर तब भांगड़ा की बजाय रुदनोत्सव होता।

असल हल्ला समाजवादी होता है।हल्ला-बोलकर ही सत्ता हथियायी जा सकती है।इसमें लाठी-डंडे से लैस होकर लोक और तन्त्र को ठोंका जाता है।कुछ चीजें ठुककर ही सही रास्ते पर आती हैं।थानों में इसीलिए इसका जमकर अभ्यास होता है।समाजवाद एक परिवार हो जाता है पर इस पर कोई हल्ला नहीं होता।

कुछ लोग कश्मीर में बन रही राष्ट्रवादी सरकार को भी भारत माता की जयसे निपटाना चाहते हैं।उनके अनुसार सरकार बनाने वाले अगर पहले ऐसा जयकारा लगा दें तभी देशभक्त माने जायेंगे।ठीक वैसे ही जैसे हर बार संविधान की शपथ लेकर सांसद या मंत्री बनने वाले संविधान-पालन का आदर्श प्रस्तुत करते हैं ।सड़क पर होने वाला हल्ला अब संसद तक पहुँच चुका है।वहाँ काम में हल्ला नहीं हल्ले में काम होता है।वह घर के ड्राइंग रूम से लेकर सड़क और संसद तक पसर चुका है।पहले जय श्रीरामका हल्ला था,अब भारत माता की जयका है।बड़ी बात यह कि हर हल्ला देशहित में है।