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शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

लोकतंत्र का मंदिर

यह अच्छा ही हुआ कि हमारे यहाँलोकतंत्र के मंदिरके निर्माण की इजाज़त मिल गई।देश में लोकतंत्र का निबाह हो और उसका मंदिर हो,यह निहायत बचकानी बात है।ऐसा नहीं है कि हमारे यहाँ पहलेलोकतंत्र का मंदिरथा ही नहीं, पर लोकतंत्र की तरह वह भी बहुत पुराना हो गया है।कई बार ठीक सेमरम्मतभी की गई,पर आए दिन हो रहीलोकतंत्र की हत्याकी घोषणाओं के बाद यह तय किया गया कि इसका नए सिरे से निर्माण किया जाएगा।जो लोग इसमें आने वाली लागत को लेकर हलकान हैं,उन्हें पता होना चाहिए कि लोकतंत्र बनाए रखने के लिए कोई भी क़ीमत अधिक नहीं होती है।मंदिर में घुसने को लेकर जिस तरह मारामारी होती है,इसी से पता चलता है कि इसका पुख़्ता होना कितना ज़रूरी है


न्यू इंडियामें वैसे भी हर चीज़ नई होने को आतुर है।नोटबंदीकी अपार सफलता के बाद जिस तरह फ़र्ज़ी नोट छपने बंद हो गए औरकाला धनअथाह समंदर में विलीन हो गया ,उसी प्रकार नएलोकतंत्र के मंदिरबनने से लोक का भला हो जाएगा,यह अभी से निश्चित है।सरकारों का कोई भी काम बिना सोचे-समझे नहीं होता।भीषण चिंतन और गहन विमर्श के बाद ही कोई योजना या क़ानून बनता है।आन्दोलनथोड़ी है कि ट्रैक्टर में बैठे और दन्न से राजपथ पर गए ! यहाँ आने के लिए जनसेवकों को कितना ख़ून बहाना पड़ता है,यह पसीना बहाने वाले नहीं समझ पाएँगे।


सिर्फ़ हमारे ही देश में लोकतंत्र की इतनी तगड़ी रक्षा नहीं की जाती है।दुनिया के सबसे समृद्ध देश में भीड़लोकतंत्र के मंदिरमें बेखटके घुस रही है।लोकतंत्र की रक्षा के लिए किसी भी क़ीमत पर हार नहीं मानने वाले ट्रंप चचा इसकी असलीपिच्चरदिखा रहे हैं।आने वाले दिनों में और भी लोकतांत्रिक देश इसका अनुसरण कर सकते हैं।लोकतंत्र तभी मज़बूत होता है जबलोकभी जनसेवकों जैसा आचरण करने लगें।


ऐसा नहीं है कि लोकतंत्र ही सारी मज़बूती क़ायम किए हुए है।हमारे पड़ोसी देश मेंसाम्यवादकी इतनी ज़ोर की लहर चल रही है कि वहाँ चोर तो छोड़िए,‘अलीबाबातक ग़ायब हो जाते हैं।इसलिएमंदिरका मज़बूत बनना बहुत ज़रूरी है,नहीं तो किसी दिन वहाँ आम आदमी भी घुस सकता है !


संतोष त्रिवेदी 

 

रविवार, 2 दिसंबर 2018

आश्वासन आख़िरी दौर का !

चुनाव-प्रचार अंतिम चरण में कूद चुका था।नेताजी जनता के बिलकुल निकट थे।वे उसके चरणों में कूदने ही वाले थे कि क़रीबी कार्यकर्ता ने आचार-संहिता के हवाले से उन्हें रोक दिया।यह रुकावट उन्हें बहुत अखरी।वे अपनी पर उतर आए।जनता के लिए जो बहुरंगी-पिटारी उनके पास थी,उसे खोल दिया।पिटारी से साँप और बिच्छू के बजाय अचानक हरे और खरे वादे निकलने लगे।घोषणाएँ तो इतनी रफ़्तार से भागने लगीं कि उन्हें पकड़ना जोखिम भरा हो सकता था।मगर जनता ख़ाली हाथ थी।उसके पास कोई विकल्प नहीं था।कुछ न कुछ पकड़ना ज़रूरी था।ऐसा न करने पर लोकतंत्र ख़तरे में पड़ सकता था।जनता ने पहले नेताजी को देखा,फिर अपने चरणों की ओर।वे अब तक सुरक्षित थे।स्थिति पूरी तरह नेताजी के नियंत्रण में थी।वे थोड़ा और निकट आए।जनता के चरण लगातार उनका आह्वान कर रहे थे।आख़िर नेताजी गिर पड़े।

जनता हतप्रभ थी।लोकतंत्र के पुजारी उसके चरणों में थे।यह तो घोर अनर्थ हुआ।उसने उनको उठाकर गले से लगा लिया।नेताजी के मुखारविंद से बोल फूटा-‘हम हमेशा की तरह तुम्हारे ही हैं।तुम भी रहो।हम वह भी करेंगे,जो कभी नहीं कहा।हमारे पास इरादा है और तुम्हारे पास हमारा वादा।उसे मज़बूती से पकड़ लो।हम भले गिर जाएँ,तुम मत गिरना।वादे अनंत-काल तक सुरक्षित  रहने चाहिए।तुम हमें मत दो,हम तुम्हें ठीक कर देंगे।’

जनता की समझ में यह वाली बात नहीं आई।उसने अपना गला छुड़ाते हुए पूछा-‘क्या मतलब ? कम से कम चुनाव की तो लाज रखो स्वामी ! इस संवेदनशील समय में भी हमारा ‘मेकओवर’ करोगे ? जो भी आता है,चपत लगाकर चला जाता है।क्या आप भी यही करेंगे ?’ नेताजी तुरंत संभल गए।यू-टर्न लेते हुए बोले-‘अजी बिलकुल नहीं।हम तुम्हें क्यों ठोंकेंगे ! हम तो तुम्हें ठीक करने की बात कर रहे थे।कुछ लोग भ्रम फैला रहे हैं कि जनता की हालत ठीक नहीं।वे तुम्हें बीमार बताते हैं।कहते हैं तुम्हें लोकतंत्र की बीमारी लगी है।सच तो यह है कि तुम अभिव्यक्ति की आज़ादी की चपेट में हो।हम इसी बीमारी का निवारण करना चाहते हैं।हमने प्रण लिया है कि तुम्हारे पास वोट और प्राण दोनों बने रहें।उसे किसी और को नहीं लेने देंगे।तुम हमें मत का इनाम दो,हम तुम्हें नाम देंगे।’

‘नाम तो हम आपका ही बरसों से जप रहे हैं सरकार।बस मँहगाई और भ्रष्टाचार की तरह हमें भी रोज़गार दे दो।अब तो आपकी सेवा का साइड-इफ़ेक्ट भी होने लगा है।हमारी तबियत इसीलिए ख़राब हुई है।शायद सेवा का ओवरडोज़ हो गया है।कृपया अब आप आराम करें और हमें काम दें।’ जनता ने आख़िरकार नेताजी से कुछ माँग ही लिया।

‘अरे,यह क्या माँग लिया ? यह तो हमारा काम है।तुमने हमें काम करने के लिए ही तो जिताया है।हम वही कर रहे हैं।हमें अपना काम करने दो,इसमें बाधक मत बनो।हम तुम्हें ‘नाम’ देते हैं।हफ़्ते के बजाय अब हम हर दिन देंगे।हमारे पास वादों की तरह नाम का भी एकदम फ़्रेश स्टॉक है।हम रोज़ नया नाम निकालते रहेंगे।अब से तुम्हें प्रजा के बजाय राजा के नाम से जाना जाएगा।यहाँ तक कि तुम्हारे लिए हम ‘नामकरण मंत्रालय’ भी बना देंगे।और हाँ,फिर भी अगर तुम पर काम करने का भूत चढ़ा तो उसे हम सोशल-मीडिया पे झाड़ देंगे।बैंक के बजाय तुम अपना खाता वहीं खोल लो।डरो नहीं दूसरों को डराओ।कुछ फ़ोटो-शोटो खींचो।उन्हें वहाँ डालो।कम पड़ें तो कुछ फ़ोटो ‘शॉप’ कर लो।भुगतान हम कर देंगे।देश की चिंता मत करिए,उसे हम संभाल लेंगे।तुम ख़ुद  को संभालो।तुम हमसे नाम लो,हम तुम्हारा काम तमाम करेंगे।लेकिन ऐसा करने के लिए तुम पहले हमें वोट तो दो !’ नेताजी ने बिलकुल ताजे संकल्प जनता के चरणों में पटक दिए।

अब जनता को बेचैनी महसूस होने लगी।वह एक क़दम पीछे हटी।उसके चरण कुछ सुरक्षित हुए पर ख़तरा अभी पूरी तरह टला नहीं था।एकदम सामने था।मुश्किल यह कि आगे ख़तरा था तो पीछे कचरा।जनता को थोड़ी दुविधा हुई।नेताजी ताड़ गए।आनन-फ़ानन उसके आगे एक बड़ी मूरत खड़ी कर दी।जनता के सामने कोई चारा भी नहीं था कि वह उसे चबा सके।आख़िर बेबस होकर बोली- ‘वोट तो हम तुम्हें ही देते रहे हैं और फिर देंगे।बस काम करने की कसक दिल में बनी रहेगी।आप हमारे लिए इतना सोचते और करते हैं तो हम भी यू-टर्न ले लेते हैं।नए ज़माने में क्रांति बजरिए यू-टर्न भी आती है।आम आदमी का यह अचूक हथियार है।आगे से ‘कर्म ही पूजा’ हमारे लिए ‘पूजा ही कर्म’ होगी।इसलिए कर्म की नहीं तो कम से कम हमारे लिए धर्म की व्यवस्था अवश्य कर दें।सुना है आपका जन्म हमारी सेवा करने के लिए ही हुआ है।’

जनता के इस आर्तनाद का असर तुरंत हुआ।नेताजी की बाँछे खिल गईं।वह बोले-‘हम दूरदर्शी हैं।तुम्हारी चाहत का अंदेशा हमें पहले से ही था।हमने इसीलिए इसकी अग्रिम तैयारी कर रखी है।हर पंचवर्षीय योजना में तुम्हें हमारे दर्शन होंगे।तुम निर्विघ्न पूजा कर सको इसका भी प्रबंध होगा।तुम हमें मत दो,हम तुम्हें मंदिर देंगे’।

यह सुनकर जनता मारे ख़ुशी के बेहोश हो गई।चुनाव का यह आख़िरी आश्वासन था।


©संतोष त्रिवेदी

बुधवार, 6 मार्च 2013

मिशन,कमीशन और आम आदमी !



०६/०३/२०१३ को नैशनल दुनिया व जनसंदेश में !







सुबह-सुबह मंदिर के चबूतरे पर जैसे ही कदम रखा कि वहाँ पर पहले से ही खड़े दो लोगों ने मुझे आगे बढ़ने से रोक दिया।मैंने इसका कारण जानना चाहा तो दोनों ने एक साथ जवाब दिया कि उनके रहते मंदिर का प्रसाद कोई और उड़ा ले जाए,यह संभव नहीं है।मैंने कहा ,भई,मैं तो आम आदमी हूँ और मंदिर के प्रसाद पर मेरा भी हक है पर वे दोनों अपनी बात पर अड़ गए । मुझे जबरन रुकना पड़ा तो सोचा कि अब इस बात का पता लगना ज़रूरी है कि मुझे मंदिर का प्रसाद न मिलने के पीछे इनका क्या उद्देश्य है ?
मंदिर के बाहर ही एक बेंच पर हम उन दोनों के साथ बैठ गए।एक मेरे दायें बैठा और दूसरा मेरे मध्य में ;मैं बिलकुल किनारे था।मुझे गुस्सा आ रहा था कि उन दोनों ने मुझे मौलिक अधिकार से वंचित किया है।सबसे पहले मैंने दायीं तरफ़ वाले बंदे से पूछा कि वह  कौन है और मंदिर में प्रसाद लेने से उसका क्या नुकसान हो जायेगा ?

अपने भगवे पट्टे को लहराते हुए वह बन्दा बोला,’मैं मिशन हूँ और मेरा एकमात्र मिशन यही है कि इस बार मंदिर का ताला जब खुले तो सारा प्रसाद मैं ही चखूँ।इसके लिए मैंने लंबा इंतज़ार किया है और राम की कृपा से वह दिन अब आ गया है।तुम जैसे आम आदमी बीच में अड़ंगा न डालें,तो मेरा बहुप्रतीक्षित मिशन जल्द पूरा हो जायेगाऔर तुम कौन हो,क्या चाहते हो ?’ अब मैंने मध्य में बैठे हुए बंदे से भी यही सवाल किया।

वह बंदा बोला ,’मुझे सब लोग कमीशन के नाम से जानते हैं,इसलिए मैंने भी अब यही नाम धर लिया है।दरअसल यह हमारा पुश्तैनी धंधा है और हम इस काम में माहिर हैं।पिछले साठ-पैंसठ सालों से हम मंदिर की सेवा करते चले आ रहे हैं इसलिए प्रसाद पर बुनियादी हक हमारा ही बनता है।ये मिशन वाले नासमझ हैं।हर बार सुबह की आरती के वक्त मंदिर के चक्कर लगाने लगते हैं पर मंदिर के भक्तगण इन्हें कोई भाव नहीं देते।ये भगवान का नाम तो लेते हैं पर नज़र केवल प्रसाद पर रहती है,इसलिए अब तक इनका मिशन अधूरा है।

अब वार्ताकार की मेरी हैसियत छिन गई थी।मिशन और कमीशन दोनों आपस में ही उलझने लगे थे।मैं आम आदमी की तरह केवल श्रोता भर रह गया था।मिशन जी ने कमीशन जी की पोल खोलते हुए कहा,’तुमने सारा प्रसाद अपने परिवार में ही बाँट लिया है।काफ़ी मात्रा में तुमने इस प्रसाद की सप्लाई बाहर भी की है।अगर हमने इस मंदिर को ही बचाने के लिए इसका एक खम्भा गिराया है तो तुम तो दीमक की तरह सारे मंदिर में चिपट गए हो।अब हम प्रसाद बंटने का इंतज़ार नहीं करने वाले हैं,बल्कि पूरा हड़प लेंगे,यही हमारा मिशन है।

कमीशन जी बिलकुल शांत बैठे रहे।मिशन जी की बातों से बिना उत्तेजित हुए कहने लगे,’बेटा,यह बहुत बड़ा मंदिर है।किसी छोटे-मोटे मंदिर के पुजारी बनकर यह दंभ पाले बैठे हो कि बड़े मंदिर को भी संभाल लोगे,तो ये तुम्हारी भूल है।तुम्हारा जो भी मिशन है,कमीशन से ही बना है।हमने हमेशा कमीशन खाया और बिठाया है,इसलिए इस क्षेत्र के सबसे बड़े तजुर्बेकार हमीं है।अबकी बार तुम्हारे इस मिशन पर ही कमीशन बिठा दूंगा,फ़िर मंदिर के प्रांगण में नहीं,कच्छ के रण में ही नज़र आओगे।

बहस बढ़ती देखकर मैंने प्रसाद खाने का जोखिम लेना उचित नहीं समझा और वहाँ से चला आया।


 

मिर्ची-पाउडर का मंदिर के प्रसाद में बदलना !

जनता की आँखों में धूल झोंकने के अभ्यस्त रहे लोग यदि अपने लोगों की आँखों में मिर्च झोंकते हैं तो यह महज तकनीकी मसला भर है। इस पर नैतिकता का मुलम्मा चढ़ाकर बड़े-बड़े अश्रु बहाना निहायत पारंपरिक और स्थायी कर्म है,जो अब बंद होना चाहिए। पिछले कई वर्षों से ऐसे कर्णधार,जो धूल और कोयला झोंकने में निपुण हैं ,निरंतर अपनी उपयोगिता सिद्ध कर चुके हैं ।साथ ही,वे दल-बल सहित सदन में स्थायी आसन जमाकर बैठ गए हैं। ऐसे में अगर एकाध मिर्ची झोंकने वाला भी सदन में एंट्री मार लेता है तो हमारे दिल में अचानक नैतिकता की घंटियाँ क्यों बजने लगती हैं ? यह तो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का एक छोटा-सा अंग है ,जिसमें एक पाकेटमार या चेन-स्नैचर की तरह एक मिर्चीमार और चक्कूबाज को अपना हुनर दिखाने का मौका मिल जाता है। इसको सकारात्मक नजरिये से देखा जाये तो यह बाहुबलियों और माफिया डॉन के बीच अदने से लफंगे की हल्की-सी घुसपैठ भर है।

हमारी संसद एक पवित्र मंदिर की तरह है और इसमें पुजारी बनकर प्रवेश करने वाले देवताओं की जगह विराजमान हैं। यह सब कुछ नितांत लोकतान्त्रिक तरीके से हुआ है,इसलिए इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मंदिर में देवताओं और पुजारियों के विशेषाधिकार होते हैं,भक्तों के नहीं। इसलिए वे वहाँ भरतनाट्यम करें,मल्ल-युद्ध करें या माइक उखाड़ें,सब उनकी नित्यलीलाओं में शुमार माना जाता है। भक्ति से ओत-प्रोत भोली जनता को क्या चाहिए ?। बस,उसे समय-समय पर सब्सिडी के रूप में प्रसाद मिल जाता है और वह फिर से अगली लीला देखने की आतुरता से प्रतीक्षा करने लगती है। इसलिए मंदिर में होने वाले  पूजा-पाठ पर सड़क से उँगली उठाना अनैतिक तो है ही,बेहद असंवैधानिक भी है। मन्दिर के अंदर के विषय पर अंदर के लोग ही अंतिम निर्णय ले सकते हैं। यह उन पर निर्भर है कि मन्दिर के अंदर वे गुलाब-जल का छिड़काव चाहते हैं या मिर्ची-पाउड
हमें अपने युग के प्रभुओं और परमेश्वरों पर पूर्ण आस्था है। हम किसी आम आदमी को पूरी व्यवस्था पर उँगली उठाने और सनातन काल से चली आ रही परम्परा को ठेंगा दिखाने नहीं दे सकते। आम आदमी हमेशा से भक्त रहा है और बाय डिफॉल्ट बना रहेगा। मन्दिर में किया गया स्प्रे हमें आगामी भविष्य के प्रति पूरी तरह आश्वस्त करता है कि इसके इर्द-गिर्द मक्खी-मच्छरों को टिकने नहीं दिया जायेगा। सदन की पवित्रता बरकरार रहे इसके लिए जल्द ही देवता बने पुजारियों की एक समिति गठित की जाएगी,जिससे दिक्-भ्रमित भक्तों में पुनः विश्वास का संचार किया जा सके ! अब इसके बाद
संतोष त्रिवेदी

 

जे 3/78 ,पहली मंजिल,

खिड़की एक्स.,मालवीयनगर

नई दिल्ली-110017

 



9818010808

 



 

मिर्ची-पाउडर का मंदिर के प्रसाद में बदलना !

जनता की आँखों में धूल झोंकने के अभ्यस्त रहे लोग यदि अपने लोगों की आँखों में मिर्च झोंकते हैं तो यह महज तकनीकी मसला भर है। इस पर नैतिकता का मुलम्मा चढ़ाकर बड़े-बड़े अश्रु बहाना निहायत पारंपरिक और स्थायी कर्म है,जो अब बंद होना चाहिए। पिछले कई वर्षों से ऐसे कर्णधार,जो धूल और कोयला झोंकने में निपुण हैं ,निरंतर अपनी उपयोगिता सिद्ध कर चुके हैं ।साथ ही,वे दल-बल सहित सदन में स्थायी आसन जमाकर बैठ गए हैं। ऐसे में अगर एकाध मिर्ची झोंकने वाला भी सदन में एंट्री मार लेता है तो हमारे दिल में अचानक नैतिकता की घंटियाँ क्यों बजने लगती हैं ? यह तो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का एक छोटा-सा अंग है ,जिसमें एक पाकेटमार या चेन-स्नैचर की तरह एक मिर्चीमार और चक्कूबाज को अपना हुनर दिखाने का मौका मिल जाता है। इसको सकारात्मक नजरिये से देखा जाये तो यह बाहुबलियों और माफिया डॉन के बीच अदने से लफंगे की हल्की-सी घुसपैठ भर है।

हमारी संसद एक पवित्र मंदिर की तरह है और इसमें पुजारी बनकर प्रवेश करने वाले देवताओं की जगह विराजमान हैं। यह सब कुछ नितांत लोकतान्त्रिक तरीके से हुआ है,इसलिए इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मंदिर में देवताओं और पुजारियों के विशेषाधिकार होते हैं,भक्तों के नहीं। इसलिए वे वहाँ भरतनाट्यम करें,मल्ल-युद्ध करें या माइक उखाड़ें,सब उनकी नित्यलीलाओं में शुमार माना जाता है। भक्ति से ओत-प्रोत भोली जनता को क्या चाहिए ?। बस,उसे समय-समय पर सब्सिडी के रूप में प्रसाद मिल जाता है और वह फिर से अगली लीला देखने की आतुरता से प्रतीक्षा करने लगती है। इसलिए मंदिर में होने वाले  पूजा-पाठ पर सड़क से उँगली उठाना अनैतिक तो है ही,बेहद असंवैधानिक भी है। मन्दिर के अंदर के विषय पर अंदर के लोग ही अंतिम निर्णय ले सकते हैं। यह उन पर निर्भर है कि मन्दिर के अंदर वे गुलाब-जल का छिड़काव चाहते हैं या मिर्ची-पाउडर का !

हमें अपने युग के प्रभुओं और परमेश्वरों पर पूर्ण आस्था है। हम किसी आम आदमी को पूरी व्यवस्था पर उँगली उठाने और सनातन काल से चली आ रही परम्परा को ठेंगा दिखाने नहीं दे सकते। आम आदमी हमेशा से भक्त रहा है और बाय डिफॉल्ट बना रहेगा। मन्दिर में किया गया स्प्रे हमें आगामी भविष्य के प्रति पूरी तरह आश्वस्त करता है कि इसके इर्द-गिर्द मक्खी-मच्छरों को टिकने नहीं दिया जायेगा। सदन की पवित्रता बरकरार रहे इसके लिए जल्द ही देवता बने पुजारियों की एक समिति गठित की जाएगी,जिससे दिक्-भ्रमित भक्तों में पुनः विश्वास का संचार किया जा सके ! अब इसके बाद भी किसी को मिर्ची लगे तो कोई क्या करे ?

 

संतोष त्रिवेदी

 

जे 3/78 ,पहली मंजिल,

खिड़की एक्स.,मालवीयनगर

नई दिल्ली-110017

 



9818010808

 




 

मिर्ची-पाउडर का मंदिर के प्रसाद में बदलना !

जनता की आँखों में धूल झोंकने के अभ्यस्त रहे लोग यदि अपने लोगों की आँखों में मिर्च झोंकते हैं तो यह महज तकनीकी मसला भर है। इस पर नैतिकता का मुलम्मा चढ़ाकर बड़े-बड़े अश्रु बहाना निहायत पारंपरिक और स्थायी कर्म है,जो अब बंद होना चाहिए। पिछले कई वर्षों से ऐसे कर्णधार,जो धूल और कोयला झोंकने में निपुण हैं ,निरंतर अपनी उपयोगिता सिद्ध कर चुके हैं ।साथ ही,वे दल-बल सहित सदन में स्थायी आसन जमाकर बैठ गए हैं। ऐसे में अगर एकाध मिर्ची झोंकने वाला भी सदन में एंट्री मार लेता है तो हमारे दिल में अचानक नैतिकता की घंटियाँ क्यों बजने लगती हैं ? यह तो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का एक छोटा-सा अंग है ,जिसमें एक पाकेटमार या चेन-स्नैचर की तरह एक मिर्चीमार और चक्कूबाज को अपना हुनर दिखाने का मौका मिल जाता है। इसको सकारात्मक नजरिये से देखा जाये तो यह बाहुबलियों और माफिया डॉन के बीच अदने से लफंगे की हल्की-सी घुसपैठ भर है।

हमारी संसद एक पवित्र मंदिर की तरह है और इसमें पुजारी बनकर प्रवेश करने वाले देवताओं की जगह विराजमान हैं। यह सब कुछ नितांत लोकतान्त्रिक तरीके से हुआ है,इसलिए इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मंदिर में देवताओं और पुजारियों के विशेषाधिकार होते हैं,भक्तों के नहीं। इसलिए वे वहाँ भरतनाट्यम करें,मल्ल-युद्ध करें या माइक उखाड़ें,सब उनकी नित्यलीलाओं में शुमार माना जाता है। भक्ति से ओत-प्रोत भोली जनता को क्या चाहिए ?। बस,उसे समय-समय पर सब्सिडी के रूप में प्रसाद मिल जाता है और वह फिर से अगली लीला देखने की आतुरता से प्रतीक्षा करने लगती है। इसलिए मंदिर में होने वाले  पूजा-पाठ पर सड़क से उँगली उठाना अनैतिक तो है ही,बेहद असंवैधानिक भी है। मन्दिर के अंदर के विषय पर अंदर के लोग ही अंतिम निर्णय ले सकते हैं। यह उन पर निर्भर है कि मन्दिर के अंदर वे गुलाब-जल का छिड़काव चाहते हैं या मिर्ची-पाउडर का !

हमें अपने युग के प्रभुओं और परमेश्वरों पर पूर्ण आस्था है। हम किसी आम आदमी को पूरी व्यवस्था पर उँगली उठाने और सनातन काल से चली आ रही परम्परा को ठेंगा दिखाने नहीं दे सकते। आम आदमी हमेशा से भक्त रहा है और बाय डिफॉल्ट बना रहेगा। मन्दिर में किया गया स्प्रे हमें आगामी भविष्य के प्रति पूरी तरह आश्वस्त करता है कि इसके इर्द-गिर्द मक्खी-मच्छरों को टिकने नहीं दिया जायेगा। सदन की पवित्रता बरकरार रहे इसके लिए जल्द ही देवता बने पुजारियों की एक समिति गठित की जाएगी,जिससे दिक्-भ्रमित भक्तों में पुनः विश्वास का संचार किया जा सके ! अब इसके बाद भी किसी को मिर्ची लगे तो कोई क्या करे ?

 

संतोष त्रिवेदी

 

जे 3/78 ,पहली मंजिल,

खिड़की एक्स.,मालवीयनगर

नई दिल्ली-110017

 



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अपने करम जाँहिं अपकारी

कई दिनों बाद ककुआ कल शाम को दिखाई दिए।मैं पान की दुकान के पास खड़ा था कि अचानक उन पर नज़र पड़ी।वह बचकर निकलने ही वा...