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शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

अक्ल पर बर्फ़ पड़ना !

दुनिया भर के लोगों द्वारा खुद के ऊपर बाल्टी भर बर्फ उड़ेलने की खबरें आ रही हैं।यह काम छोटे-मोटे लोग करते तो हाशिये की खबर भी न बन पाती पर जब पहले और तीसरे पेज के लोगों ने इस काम को अपने हाथ में ले लिया तो आज की सबसे बड़ी खबर यही है।कई अभिनेता और नेता इस पुनीत कार्य में बाल्टी उड़ेल के पीछे पड़ गए हैं।कहा जा रहा है कि अपने ऊपर बाल्टी भर बर्फ उड़ेल लेने से अनाम-सी बीमारी से निपटने में भरपूर मदद मिल रही है । जो सेलेब्रिटी अपने ऊपर बर्फ़ उड़ेलता है,वह अपने जैसे ही कद और पद वाले सेलेब्रिटी को चैलेन्ज पास कर देता है।इस अनुष्ठान में वह या तो बाल्टी भर बर्फ का जुगाड़ कर अपने सर के ऊपर डालने की जहमत करे,नहीं तो उस बीमारी के नाम दान कर दे।अब सीधे-सीधे दान करने की बात होती तो उस बीमारी से लड़ने को पैसे तो दूर पब्लिसिटी का एक कोना तक नसीब न होता ।इसलिए यह जिसका भी आईडिया है,बड़ा झकास है।

दुनिया से ,खासकर अमेरिका से हम भारतीय अकसर प्रेरणा लेते रहते हैं।इस मामले में हमारे खिलाड़ियों और बॉलीवुड कलाकारों का जवाब नहीं।देखते ही देखते ,बर्फ़ से नहाई उनकी तस्वीरों से टीवी और अख़बार पटने लगे हैं।जिन लोगों को साल दो साल से घर में ठीक से नहाने का टाइम नहीं मिला होगा ,उन्होंने भी बड़ी तबियत से इस काम को अपने हाथ में ले लिया है ।नहाने में भले कुछ समय लगता हो,पर मीडिया को न्योतने में तनिक भी देरी नहीं होती ।आखिर सोशल-कॉज का मसला जो ठहरा।हमारे सेलेब्रिटीज दूसरे कामों में भले पीछे हो जाँय,सोशल-कॉज में कभी नहीं पिछड़ते। उनके सामाजिक योगदान फेसबुक और ट्विटर पर धमाल मचा देते हैं।देखिए, सोशल कॉज की खातिर ही हमारे प्यारे अभिनेता पिछले दिनों वस्त्रहीन हो गए थे।वह तो मुए ट्रांजिस्टर ने बीच में अड़ंगा डाल दिया था नहीं तो वे समाज-सुधार का अंतिम चरण पूरा करके ही दम लेते।

इधर सुनते हैं कि हमारे कुछ नेताओं ने भी चुपचाप बाल्टी भर बर्फ़ से स्नान कर लिया है।इसका पता तब चला जब एक योग्य मंत्री ने बयान दिया कि हमारे देश में बलात्कार की एक ‘छोटी घटना’ से देश का पर्यटन प्रभावित हुआ है।उनके इस आत्म-ज्ञान से जब हल्ला मचने लगा तो जानकारों ने निष्कर्ष निकाला कि हो सकता है बाल्टी में बर्फ की मात्रा अधिक रही हो,जिसका सीधा असर उनके दिमाग पर पड़ गया हो।अब ऐसे ठंडे हो चुके दिमाग से इतना कुछ निकल आना क्या कम है ?

अभिनेताओं,खिलाड़ियों और नेताओं के इस अभियान में शामिल हो जाने के बाद आम आदमी भी पीछे नहीं है।उसने आइस बकेट का जवाब राइस बकेट से देना शुरू कर दिया है।यह पश्चिमी देशों को दिया गया देशी मुँहतोड़ जवाब है।उसने राइस का आइस के साथ पूरी तरह रिदम मिला लिया है।बॉलीवुड ने पहले ही धुनों का हूबहू मिलान करने में ख़ास शोहरत पाई है।आइस के बदले राइस की प्रेरणा वहीँ से आई हो सकती है।राइस बकेट शुरू करने का दूसरा कारण यह भी है कि आम आदमी अभी पानी की ही जुगाड़ में लगा है, बर्फ कहाँ से लाए ?ऐसे में बर्फ का आइडिया उसे व्यावहारिक नहीं लगा क्योंकि उसे लगता है कि अक्ल पर बर्फ नहीं सिर्फ पत्थर पड़ते हैं.

फ़िलहाल,उस बीमारी का क्या हाल है,कुछ पता नहीं चल पा रहा है। हाँ,आये दिन बर्फ से नहाते हुए सेलेब्रिटीज की फोटू देखकर कलेजे को ठंडक ज़रूर मिल जाती है।उनकी फ़िल्में भी सिनेमाघरों में एक-दो दिन और घिसट जाती हैं।आम आदमी ‘राइस बकेट’ से स्नान तो नहीं कर सकता है पर ‘दान-पुन्न‘ करते हुए उसकी तस्वीरें ज़रूर खिंचाई जा सकती हैं।ऐसे में फोटू का जवाब फोटू से देने का पवित्र कर्म भी पूरा हो जाता है।इससे साबित होता है कि मूर्खता या नकलबाज़ी करने में किसी एक का कॉपीराइट नहीं है ।

   

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

अंग्रेजों का फिर से अत्याचार !

और अंग्रेजों ने एक बार फिर से हमारे साथ छल किया है।ऐन आज़ादी के ज़श्न के वक्त हमें जीत का तोहफा देने के बजाय अंदर तक तोड़ दिया।ठीक 1947 में आज़ादी से ठीक पहले उन्होंने हमारे दो टुकड़े कर दिए थे,हम उसी से अभी तक उबर नहीं पाए हैं।अबकी बार की चोट उससे भी गहरी है।तब तो हम उनके गुलाम थे,पर इस वक्त तो अच्छी-खासी रेटिंग में थे।जानबूझकर अंग्रेजों ने आखिरी समय में गच्चा दे दिया।जिस समय पूरा देश आज़ादी के ज़श्न में डूबा हुआ था,उन्होंने रंग में भंग कर दिया।हमारे खिलाड़ी भाई अपने विज्ञापनों की कमाई का पूरी तरह से लुत्फ़ भी नहीं उठा पाए थे कि उनको कोहनी मारकर गिरा दिया गया।अब वे खाली बटुए और इकलौती गर्लफ्रेंड लिए शॉपिंग मॉल में घूमने को मजबूर हैं।इस तरह से अंग्रेजों ने खेलप्रेमियों और खिलाड़ियों दोनों से भरपूर बदला लिया है।


भारतीय टीम की हार का विश्लेषण करने पर सनसनीखेज तथ्य सामने आये हैं।भारतीय कप्तान को यह गुमान था कि अँगरेज़ 1947 की तरह इस बार भी उन्हें जीत उपहार में दे डालेंगे।नासपीटों ने मेजबानी का भी थोड़ा-सा लिहाज़ नहीं किया।इसके साथ ही अंग्रेजों ने अपने पूर्वजों का भी अपमान किया है।मैदान छोड़कर भाग जाने की उनकी ऐतिहासिक परम्परा के प्रति हमारे कप्तान आश्वस्त थे,पर उनके पेट में सरेआम छुरा भोंका गया है।दो-चार मैच हारने का गम एक मज़बूत कप्तान तो सहन कर सकता है पर विज्ञापनों का टोटा होने से पेट पर जो आसन्न संकट खड़ा हो गया है,बोर्ड उसकी कितनी भरपाई कर पायेगा ?
भारतीय टीम स्वयं हारने के कारणों पर गंभीरता से विचार करने में जुटी है।क्रिकेट टीम के कोच का कहना है कि उन्हें अंग्रेजों से ऐसी उम्मीद बिलकुल नहीं थी।उन्होंने खुद तो शतक और अर्धशतक बनाये,विकेट लूटे,कैच लपके ,स्टम्प बिखेरे पर हमारे करने के लिए कुछ नहीं छोड़ा।हम मेहमानी के लिहाज़ में ही पड़े रहे।ऐसी विकट परिस्थितियों में हमारे लड़कों ने जिस बहादुरी और साहस का परिचय दिया है,उससे दो-तीन खिलाड़ी पद्मश्री के निश्चित दावेदार बन गए हैं ।कोच ने चुनौती दी है कि बिना रन और बिना विकेट लिए दुनिया की कोई भी टीम नहीं जीत सकती,फिर हमसे यह उम्मीद क्यों ? यह हमारी हार नहीं बल्कि विपक्षी टीम का असहयोगीपूर्ण रवैया रहा।इस पर सभी खिलाड़ियों में आम सहमति बन गई है।खबर है कि इंग्लैंड में भारतीय टीम के साथ हुए इस अमानवीय और शिष्टाचार विरुद्ध व्यवहार के लिए क्रिकेट बोर्ड  आईसीसी के समक्ष मुद्दा उठाएगा।इससे कप्तान और कोच ने राहत की भारी साँस ली है।
सभी खेलप्रेमियों से भी आग्रह है कि संकट की इस घड़ी में वह टीम का मजबूती से साथ दें।खिलाड़ियों की परफॉरमेंस को देखते हुए यदि कोई विज्ञापन कम्पनी किसी खिलाड़ी के पेट पर लात मारती है तो उसका घोर विरोध होना चाहिए।  

दैनिक भास्कर,डीबीस्टार में 22/08/2014 को प्रकाशित   

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

लालकिले से पकड़े गए कबूतर !


 अंततः वे लालकिले में चढ़ाई करने में सफल हो गए।पिछली बार वाला लालकिला नकली था पर लोगों को दहाड़ असली सुनाई दी थी।उसी उम्मीद में इस बार कई लोग यह देखने बैठे थे कि नकली लालकिले से जो सीना छप्पन इंच फूल सकता है,असली लालकिला पाकर कहीं वह वह फूल कर कुप्पा न हो जाय ;पर हुआ इसके उलट।लालकिले से क्रांति की ज्वाला धधकने के बजाय आध्यात्मिक प्रवचन की गंगा बह निकली।अब बारी थी आलोचकों की,कुछ ने एकदम से पलटी मारी।उनने एक सुर से कहा,ऐसा पहली बार हुआ है।यानी उन्होंने फिर से इतिहास रच दिया है ।
लालकिले में पहुँचकर उनके अचानक इस तरह शान्तिप्रेमी बन जाने से विरोधी सदमे में पहुँच गए ।वो लालकिले से उनकी ललकार सुनने की प्रतीक्षा में थे,पर निराश हुए।ख़ुशी की बात यह रही कि देश के कुछ मान्यताप्राप्त बुद्धिजीवियों और धर्मनिरपेक्ष खेमे को भी यह भाषण बहुत सुहाया है।अब इस बात पर उनकी आलोचनाएँ शुरू हो गई हैं कि उन्होंने मौके की नज़ाक़त देखते हुए अपने खेमे और खूँटे बदल लिए हैं।पर इस बात पर किसी का ध्यान नहीं कि आखिर यह सब हुआ कैसे,जबकि मंहगाई और भ्रष्टाचार की रेटिंग पहले की ही तरह मेनटेन है ! ऐसे में उन्हें प्रशंसा-पत्र बाँटने के क्या  कारण हो सकते हैं ?
सच पूछिए तो भाषण वाकई में कमाल का था,जिससे बेचारे बुद्धिजीवी भी उसकी लपेट में आ गए।उन्हें बहुत दिनों बाद लालकिले से दम्भपूर्ण और रोबोटनुमा भाषण सुनने से राहत मिली।वस्तुतः काम के दो ही स्तर होते हैं,कहना और करना।अब पिछले कई सालों से काम करने को लेकर इतनी ज्यादा चिल्लाहट हो चुकी है कि उस ओर कोई सोचना भी नहीं चाहता।यहाँ तक कि मंहगाई और भ्रष्टाचार पर जनता ने समझौता कर लिया है,फिर वे उस पर क्यों और क्या बोलें ? हाँ,बड़े दिनों बाद जनता को कुछ मीठे बोल जरूर सुनाई दिए हैं।बुद्धिजीवियों को भी वह मिठास भा गई तो उसमें उनकी क्या गलती ? इस जादूगर ने कबूतर छोड़े नहीं बल्कि पकड़े हैं ! शांति कहाँ तक अपने को बचा पायेगी !
वे लोग बड़ी ग़लतफ़हमी में हैं जिन्हें लगता है कि भाषण से राशन नहीं मिलता।आम आदमी की बात छोडिये,अबकी बार तो कवि,लेखक और प्रमाणित चिन्तक भी तृप्त हो गए हैं।यदि आपको इस भाषण की कला पर तुलसीदास की पंक्तियाँ इंद्रजालि कहुं कहिय न बीरा।निज कर काटइ सकल सरीराकी याद आ रही है तो आप गलत हैं।जादूगर ही जानता है कि वह जो दिखा रहा है,असली नहीं है,पर देखने वाले को तो असली लगता है और यही सबसे ज़रूरी है।


शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

हमें चाहिए ऐसी आज़ादी !

हर साल हमें आज़ादी के दिन की बेसब्री से प्रतीक्षा रहती है।क्या है ना कि आज़ादी शब्द सुनकर ही हमें झुरझुरी होने लगती है।दरअसल,हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति ही आज़ाद और बिंदास रहने की है।हम कतई नहीं चाहते कि हमारे कहने या करने पर किसी प्रकार की कोई बंदिश हो।हम आज़ादी को लेकर पूरी पारदर्शिता चाहते हैं।घर हो या बाहर,हम बस अपने मन से सब कुछ करना चाहते हैं।हमको लगता है कि आज़ादी दिलाने वाले शूरवीरों ने हमारी इस ज़रूरत को सही ढंग से समझा था,तभी उन्होंने हमारी सुख-सुविधा के लिए अपनी जान लगा दी थी।इसलिए आज़ादी का पर्व हमें सबसे अच्छा लगता है।


हमारी मान्यता है कि आज़ादी बिना किसी टर्म्स एंड कंडीशंस अप्लाई के हमें सुलभ होनी चाहिए।हम अपनी खटारा कार भी लेकर सड़क पर निकलें तो उसकी पों-पों से दस-बीस कोस तक जाहिर हो जाय कि हम आ रहे हैं।इससे दूसरे लोग सतर्क होकर हमें खुला रास्ता दे दें।हमें बड़ा खराब लगता है ,जब अस्सी की गति से चलती हमारी फर्राटा अचानक लाल बत्ती पर रुक जाती है।हम कम से कम आज़ादी के दिन बिना किसी सिग्नल के सारे फाटक क्रॉस कर जाँय,भले ही रेलवे का फाटक क्यों न हो ! ऐसे में कोई भी ट्रैफिक वाला यदि हमें रोकता है तो हमारी ‘आज़ादी-सेलेब्रेशन’ को बड़ा धक्का लगेगा।हमें तुरत अहसास हो जायेगा कि हम रस्मी तौर पर ही आजाद हैं।ऐसी आज़ादी की कल्पना हमारे सपने  को भंग करती है।अपनी गाड़ी और सड़क पर हमारा समान रूप से अधिकार होना चाहिए ताकि हम सड़क में कहीं भी पार्किंग बना लें।
हमें सच्ची आज़ादी तभी मिलेगी,जब ऑफिस में हमारी टेबल फालतू की फाइलों से रहित होगी।हम घूमने वाली कुर्सी पर विराजमान हों और हमारी जिस दिशा में नज़र जाए,केवल सेकेट्री ही दिखाई दे।हम केवल उसी से डिस्कस करें और सारे समाधान खोजें।थोड़ी-थोड़ी देर के अन्तराल पर चाय-समोसे आते रहें;इससे हमारे काम की गुणवत्ता बढ़ेगी,साथ ही हमारे घरेलू खर्च में अप्रत्याशित रूप से बचत होगी।हम शुगर से भी आज़ादी चाहते हैं ताकि होली-दीवाली के अलावा भी मिठाइयों के डब्बे शालीनता से उदरस्थ कर सकें।ऐसा न होने पर हमें केवल नमकीन काजू और ड्रिंक पर ही निर्भर रहना पड़ेगा।
हमें फाइलों पर दस्तखत करने से भी आज़ादी चाहिए।अगर हमें मजबूरन किसी फाइल पर दस्तखत करने ही पड़ें तो उसके लिए बनी बनाई मुहर को ही मान्यता प्रदान की जाए।इससे हमें ऑफिस से निकलने की भी आज़ादी हासिल हो जाएगी।हम गंगा में डुबकी लगायें या धन की मटकी में,इसकी आज़ादी हमें होनी चाहिए।धन हमारी अपनी गाढ़ी कमाई का है,सो उसे देश के लोकल बैंक में रखने के बजाय स्विस बैंक में सुरक्षित रखने की आज़ादी तो ज़रूर मिलनी चाहिए।साल में दो-चार विदेश यात्राओं की भी व्यवस्था हो ताकि सपरिवार हमें इस नरक से कुछ समय के लिए आज़ादी मिल सके।
अगर इस तरह की कोई आज़ादी नहीं मिलती,आज़ादी का पर्व मनाने का कोई मतलब नहीं बनता।हर वर्ष आज़ादी को बरक़रार रखने का संकल्प लेना केवल पाखंड ही है,जब तक यह देश हमें इस तरह की आज़ादी नहीं मुहैया करा सकता।अगर नेता चुनाव के पहले घोषणाएँ करने को आजाद हैं,चुनाव जीतकर उन्हें भुला देने के लिए आज़ाद हैं तो,फिर हमारी आज़ादी पर प्रतिबन्ध क्यों ?

नईदुनिया में 15/08/2014 को प्रकाशित

बुधवार, 13 अगस्त 2014

डिग्री न पूछो मंत्री की !

जिस प्रकार साधु से उसकी जात नहीं पूछी जाती,उसी तरह सामर्थ्यवान से उसकी योग्यता पूछना घोर अज्ञानता है।नाहक ही,कुछ अज्ञानी तत्व मंत्री जी की डिग्री-डिप्लोमा तलाशने में लगे हैं।उन्होंने भी ईंट का जवाब पत्थर से दिया है ।योग्यता के पैमाने का टंटा हमेशा के लिए निपट जाए इसलिए उन्होंने कूढ़मगजों के आगे अपनी विदेशी डिग्री लहरा दी है।उनके विरोधी भी खुर्राट निकले।उन्होंने छानबीन कर पता किया तो मालूम हुआ कि विश्वविद्यालय में मिलने-मिलाने का कार्यक्रम था,जिसमें शामिल होने वालों को सर्टिफिकेट बाँटे गए थे,वे ही अपने देश में आकर डिग्री में बदल गए.कुछ नासपीटे तो यहाँ तक कह रहे हैं कि कार्यक्रम में समोसा खाने के लिए जो कागज दिया गया था,यह वही है. वास्तव में इस बात पर हल्ला होना ही निरर्थक है।
हमारे शास्त्रों के जानकार मूर्ख नहीं थे।उन्होंने व्यक्ति के लिए क्या उचित है और क्या अनुचित;क्या करणीय है और क्या वर्जित;इसकी जगह-जगह खुलकर व्याख्या की है।साथ ही यह भी लिख दिया है ‘समरथ को नहिं दोस गुसाईं ‘,फिर भी अल्पज्ञ अपना माथा पीटने पर आमादा हैं ! ज़रुरत तो इस बात की है कि ऐसे सभी लोग पहले अपने ज्ञान को सम्पूर्ण व अपडेट करें।कागद का लिखा तो फिर भी मेटा जा सकता है पर सामर्थ्यवान के हाथ में लिखी रेख को मिटाने की कल्पना अज्ञानियों के सिवा कौन कर सकता है ?
सबसे बड़ी समस्या सोच की है।बात-बात पर सवाल और बवाल करने वाले पूरी तरह से राष्ट्रीय-स्तर के हैं और उनकी सोच भी उनकी तरह क्षुद्र है।जबकि दूसरी ओर माननीय मंत्री जी की सोच व्यापक और अंतरराष्ट्रीय-स्तर की है।इस तरह योग्यता में विदेशी लेबल लगने का फायदा यह भी है कि उनके समक्ष जो भी समस्याएँ संज्ञान में लाई जाएँ,कम से कम उनका लेवल तो उस स्तर का हो ! रही बात पढाई की,सो उसका पैमाना कार्यशैली से जाना जा सकता है।इसलिए पढ़ने और समझने की असल ज़रूरत उन्हें नहीं,नासमझों को है।
उम्मीद की जाती है कि इस मामले में इंटरनेशनल टच आ जाने के बाद से योग्यता और कार्यकुशलता पर उठ रहे सवाल गौण और दरकिनार हो जायेंगे।उस विदेशी विश्विद्यालय को हमें सम्मानित करना चाहिए,जिसने हमारे देश के नव-निर्माण में अपनी तरह से अमूल्य योगदान दिया।सरकार को भी चाहिए कि हमारे देश में अज्ञानियों की संख्या में वृद्धि हो,उसके पहले ही उस विश्वविद्यालय की कुछ शाखाएं अपने ही देश में खुल जाँय।इसके लिए शिक्षा में एफडीआई लानी पड़े तो भी हमें सहर्ष तैयार रहना चाहिए।
'डेली न्यूज़,जयपुर में 13/08/2014 को प्रकाशित
  

गुरुवार, 7 अगस्त 2014

रूठे हुओं का मिलना !


रूठे हुओं का मिल जाना हमेशा सुखद होता है।जब सार्वजनिक जीवन में हम अपने मित्र या प्रियजन से किसी छोटी या बड़ी बात पर नाराज हो जाते हैं तो कई बार इस तरह का आपसी खिंचाव बहुत लम्बा हो जाता है।जितनी गाढ़ी दोस्ती होती है,उतनी ही गहरी दुश्मनी होने का अंदेशा हमेशा बना रहता है।सामान्य समझ वाले लोग जल्द अपनी गलतफहमी को दूर कर लेते हैं पर अधिक समझदार लोग रिश्तों से ज्यादा अपनी प्रतिष्ठा को तरजीह देते हैं।इससे समाज को सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि कई तरह की रहस्य-कथाएं उजागर हो जाती हैं।कुछ जलकुक्कड़ इसी ताक में रहते हैं।उन्हें केवल हल्का-सा सूत्र मिलने की देरी होती है,फिर तो इस पर चटखारे लगाकर गल्प-कथाओं का एक लम्बा दौर चल पड़ता है।

इससे इतर राजनीति में जब कभी दो कट्टर विरोधी या बहुत दिनों के बिछुड़े आपस में मिलते हैं तो वह क्षण ऐतिहासिक मिलन के माफ़िक होता है।कितनी भी गाढ़ी दुश्मनी हो,पर जनहित के आगे सारे गिले-शिकवे घुटने टेक देते हैं।दोनों पक्ष जनता के व्यापक हितों को देखते हुए अपने पिछले वक्तव्यों को खारिज़ करके  जनहित के लिए नया मसौदा बनाते हैं,भले ही कुछ लोग इसे सौदा कहकर दुष्प्रचारित करते हों।ख़ास बात है कि इस मिलन में केवल दो लोगों का ही मेल नहीं होता,धुर-विरोधी विचार और मान्यताएं भी धूल-धूसरित हो जाती हैं और बदले में सामने होती है,सुरक्षित भविष्य की गारंटी।ऐसा दुर्लभ उदाहरण अभी कुछ दिनों पहले सुशासन लाने वालों और जंगलराज चलाने वालों के बीच देखने को मिला है।अब वे औरों को भी इसी राह पर चलने को प्रेरित करने में जुटे हैं जिसके स्पष्ट संकेत उत्तम प्रदेश से मिलने शुरू हो चुके हैं।

ताज़ा खबर है कि अपने हनुमान जैसे भक्त से रूठे हुए नेताजी पिघल गए हैं और बड़े लम्बे अन्तराल के बाद एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उनसे गले मिले हैं।ज़ाहिर सी बात है कि इस मुलाक़ात से पहले दोनों ने अपनी हार्ड-डिस्क की मेमोरी से सब कुछ डिलीट कर दिया होगा।हालाँकि कोई भी इस डिस्क को कभी फार्मेट नहीं करता,पता नहीं कब पिछली सीडी या बयान जनहित में ‘रिसाइकल बिन’ से लौटकर साइकल पर सरपट दौड़ने लगे।कहने वालों का तो कहना है कि आने वाले रक्षाबंधन तक नेताजी और बहिन जी भी रक्षासूत्र में बंध जायेंगे और यह सब काम जनता की बेहद माँग और समय की ज़रूरत पर होगा।

बिछुड़े और रूठे हुओं का मिलना सदैव उन्नति और समृद्धि का प्रतीक रहा है।जहाँ सद्भाव होता है,विकास की बयार अपने आप बहने लगती है।सार्वजनिक जीवन में ऐसी घटनाएँ कभी भी घट सकती हैं पर राजनीति में चुनावों के आगे या पीछे इनकी आवृत्ति अचानक बढ़ जाती है।फ़िलहाल,चुनाव दूर हैं पर दूरदर्शी वही है जो समय से दो कदम आगे चले।इसलिए आने वाले समय में ‘दो कदम तुम भी चलो,दो कदम हम भी चले’ टाइप के तराने हवा में गूँजने की खूब गुंजाइश है।इन्हें सुनकर समझ जाइएगा कि आपके हित के लिए बेचारे नेताओं ने अपनी कटुता खूँटी पर टाँग दी है।यह कम बड़ा त्याग है ?
प्रजातंत्र लाइव में 07/08/2014 को !