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रविवार, 9 सितंबर 2018

गिरकर उठने का सुख !

वे फिर से गिर गए।अबकी बार गहरे गड्ढे में गिरे।सड़क पर चलते हुए वे देश के प्रति चिंतन कर रहे थे।इस बीच बरसाती पानी से लबालब छोटे-मोटे गड्ढों ने कई बार उन्हें अपनी गोद में बैठाना चाहा पर वे सफल नहीं हो पाए।वे ज़रा गहरे मिज़ाज के आदमी ठहरे,इसलिए गहराई में चले गए।दृढ़-निश्चयी इतने कि बारिश की तरह उनका चिंतन भी मूसलाधार बरस रहा था।वह बंद नहीं हुआ।वे सोचने लगे,उनके गिरने के पीछे भी कोई उद्देश्य है।ईश्वर ने कुछ सोचकर ही गिराया होगा।सरकार तो उनकी अपनी है।वह उन्हें कैसे गिरा सकती है।हाँ,भले ही कुछ देश-विरोधी ताक़तें सरकार गिराने की साज़िश रचें।उनके गिरने में तो कोई साज़िश भी नहीं है।यह संयोग है।सहमति से ‘गिरना’ वैसे भी कोई अपराध नहीं है।यहाँ तो वे सड़क,सरकार और ईश्वर सब उनके साथ हैं।वे गिरे हैं तो इसमें भी देश का ही भला है।गिरने में काहे की लाज और शर्म ! वे तो फिर भी खुलेआम गिरे हैं।अब वे खुलकर चिंतन करने लगे।

बाज़ार में रुपया गिर रहा है।रोज़ गिर रहा है।पहले जब कभी-कभी गिरता था,ख़ूब चिल्ल-पों होती थी।अब रोज़ गिरता है,कोई नोटिस नहीं लेता।रुपया भी चल रहा है,बाज़ार भी और सरकार भी।कोई दिक़्क़त ही नहीं।सब अपने-अपने ट्रैक पर सरपट हैं।जिसको लगता है कि गिरने से गति बाधित होती है,वे किताबी-दुनिया के जीव हैं।बाहरी दुनिया विज्ञान के भरोसे नहीं चलती।यहाँ सबके अपने-अपने ज्ञान हैं।सोशल मीडिया में ख़ूब चलते भी हैं।गिरावट तो आदमी की मूल प्रकृति है।वह गिरकर ही उठता है।ऐसे में कोई समझदार आदमी गिरने का नोटिस नहीं करता।वह कितना उठा है,यह देखा जाता है।वे भले आज गड्ढे में हैं पर गिरकर उठने के मामले में काफ़ी वरिष्ठ हो चुके हैं।

और ज़्यादा दूर क्यों जाएँ ! पिछली बार साहित्य में गिरे थे।क्या गिरे थे ! पूरे साहित्य-जगत में हाहाकर मच गया था।सारे सम्मान उन्हीं के सिर पर आकर गिरे थे।उनके कलापक्ष की ख़ूब तारीफ़ हुई थी।उन्होंने एक इंटरव्यू में ही एक स्थापित लेखक को उखाड़ फेंका था।ऐसी कलाबाज़ी एक दिन के कमाल से नहीं आती।इसके लिए निरंतर गिरना होता है।गिरना एक कला है,इसे उन्होंने ही स्थापित किया है।जब कलाबाज़ी विकसित हो जाती है,बुद्धिजीवी इसे कलावाद कहते हैं।

‘वाद’ से उन्हें याद आया कि गिरावट का यही प्राणतत्व है।यह ‘वाद’ सेफ़्टी-वॉल्व का काम करता है।हमारी अर्थव्यवस्था बाज़ार के भरोसे रहती तो कब की बर्बाद हो जाती।जब से बाज़ारवाद आया,पीछे मुड़कर देखने का समय ही नहीं मिला।गिरता हुआ रुपया बाज़ारवाद की गोद में उसी तरह सुरक्षित है जैसे वे गड्ढे में।जब तक वे गड्ढे में हैं,साहित्य भी पूरी तरह सुरक्षित है।उनके बाहर आते ही सड़क की तरह साहित्य की भी पोल खुल जाएगी।वे साहित्यप्रेमी हैं।उसके सम्मान के लिए अपना सम्मान दाँव पर लगा देंगे।इस बार का गड्ढा गहरा है तो सम्मान भी गहरा होना चाहिए।सरकार ने अबकी बार ‘पद्म’ सम्मान के लिए खुलेआम आमंत्रण दिया है।कोई किसी का नाम भेज सकता है।सम्मान का हरण ,माफ़ कीजिएगा ,वरण वे ही करेंगे।साहित्य में उनसे ज़्यादा गिरा हुआ कोई दूसरा नहीं।यहीं रहकर वे प्रगतिशील और सहिष्णु बने हैं ।गिरने को लेकर कभी उनके मन में दुविधा नहीं रही।जब मौक़ा मिलता है,गिर लेते हैं।संयोग देखिए कि वे आलरेडी कीचड़ से भरे गड्ढे में हैं।उनसे अधिक सुपात्र कोई और कैसे हो सकता है ! कीचड़वाद के वे ही अगुआ हैं।इस बात की तस्दीक़ वहाँ उपस्थित सभी केंचुओं से की जा सकती है।कुछ केंचुओं ने तो उनके कीचड़ में गिरने को एक क्रांतिकारी क़दम बताया है।अब इससे बाहर वे तभी निकलेंगे,जब उनके कीचड़-सने हाथों में ‘पद्म’ होगा।

अचानक गड्ढे के बाहर हलचल सुनाई देने लगी।उन्हें लगा कि उनके सम्मान में साहित्यिक-बिरादरी भी उनके साथ आ गई है।वे गड्ढे में थे,इसलिए दूर का दिख नहीं रहा था।आँखों में लगे चश्मे को उन्होंने ललाट पर चढ़ा लिया।उन्हें दूरदृष्टि की प्राप्ति हुई।गिद्धदृष्टि से वे मामले को समझने की कोशिश करने लगे।पता चला कि उन्हें उठाने के लिए क्रेन आई हुई है।वे साहित्य में अचानक इतना उठ जाएँगे,नहीं सोचा था।काश और पहले गड्ढे में गिरे होते।वे कुछ और चिंतन करते कि क्रेन के लंबे-लंबे हाथों ने उन्हें बाहर ला पटका।मगर यह क्या ! यहाँ तो साँड़ और गायों का जमघट लगा था।वे इस बात के लिए आंदोलन कर रहे थे कि गड्ढे में आदमी ने कैसे घुसपैठ कर ली।कुछ वरिष्ठ साँड़ तो उन्हें सींग मारने वाले थे,तभी एक बूढ़ी गाय उनके सामने आ गई।उस समय उनकी दशा उससे भी जर्जर थी।आख़िरकार गाय को ही उन पर दया आ गई।बोली,’बेटा तुमने हमें घर से,जंगल से सब जगह से निकाल दिया है।अब सड़क के गड्ढे ही हमारा आसरा हैं।यहाँ भी तुमने क़ब्ज़ा कर लिया तो हम कहाँ जाएँगे ? पर तुम्हारी हालत देखकर तो मुझे तरस आ रहा है।तुम भले हमें भूल जाओ,माँ कभी अपने बेटों को नहीं भूल सकती।उन्हें गड्ढे में गिरा हुआ नहीं देख सकती।’

यह सब सुनकर उनका सारा चिंतन कीचड़ में मिल गया।वे घर की ओर भागे।इस समय उनको अपनी बूढ़ी माँ की बहुत याद आ रही थी।

संतोष त्रिवेदी

रविवार, 12 अगस्त 2018

भीख माँगने की आज़ादी !

तमाम बुरी ख़बरों के बीच बड़े दिनों बाद आख़िरकार एक अच्छी ख़बर आई है।देश की राजधानी में भीख माँगना अब अपराध नहीं है।इसके शुरुआती संकेत बड़ी उम्मीद पैदा कर रहे हैं।भीख माँगने वाले अब अपने पात्र रुपयों से ही नहीं सम्मान से भी भर पाएँगे।कोई भी कहीं भीख माँगने बैठ सकता है।हवलदार साहब अब हर ‘हफ़्ता’ उसे परेशान नहीं कर सकते।अगर इस फ़ैसले से उनका हाथ तंग होने लगे तो वह ख़ुद भी चौराहों पर,बाज़ारों में हाथ पसार कर आत्म-निर्भर हो सकते हैं।बशर्ते पकड़े जाने पर उन्हें यह बताना ज़रूरी होगा कि यह विशुद्ध भीख है।इसके सिवा कुछ नहीं।कुछ लोग बक़ायदा प्लान करके सपरिवार भिक्षाटन पर भी जा सकते हैं।इससे देश की अर्थव्यवस्था तो मज़बूत होगी ही,सरकार का सरदर्द भी कम होगा।

इस सेक्टर में अचानक नयी सम्भावनाएँ दिखने लगी हैं।पारंपरिक भिखारी भीख माँगने के नए ‘फ़्रंट’ खोल सकते हैं।वे ‘डिजिटल-भीख’,’पॉलिटिकल-भीख’और ‘इंटरनेशनल भीख’ के ज़रिए देश की तक़दीर बदल सकते हैं।डिजिटल-भीख के ज़रिए जहाँ ऑनलाइन ठगी को वैधता मिलेगी,वहीं ‘इंटरनेशनल-भीख’ बड़े-बड़े क़र्ज़दाताओं और डिफ़ॉल्टरों को कर्जमुक्ति के साथ-साथ संपूर्ण सुरक्षा भी देगी ।सबसे क्रान्तिकारी परिवर्तन तो ‘पॉलिटिकल-भीख’ के ज़रिए आने वाला है।पहले नेताओं को वोट के बदले कुछ वादे देने की ज़हमत करनी पड़ती थी,इस ‘स्कीम’ के लागू हो जाने के बाद अपनी झोली में वोट लेना उनका बुनियादी हक़ होगा।वे इसे अब भीख के रूप में ही स्वीकार करेंगे ताकि आश्वासन चुकाने का भी कोई झंझट न हो।और हाँ,वसूली की आस तो ‘जीवित’ प्राणियों से होती है।मुर्दे किसी भी तरह की देनदारी से बरी होते हैं।भिखारियों के बारे में रहीम जी बहुत पहले कह गए हैं;’रहिमन वे नर मर चुके जो कछु माँगन जाँहि’।माँगते समय नेता बिलकुल ‘नर’ जैसा होता है।ऐसे में ‘पॉलिटिकल-भीख’ सेक्टर में अपनी सम्भावनाएँ तलाश रहे एक घुटे हुए नेता से भेंट हुई।उन्होंने हमें बताया कि भीख माँगने का एक स्टार्ट-अप भी खोल दिया है।इससे भिखारियों की ’मैनपॉवर’ बढ़ जाएगी।नेताजी ने आगे बताया,’हम ज़मीनी स्तर पर तो भीख माँग ही रहे हैं,डिजिटल-भीख को भी प्रोत्साहित करने जा रहे हैं।जो भी हमें डिजिटल-भीख देगा,हम उसे इनाम में  ‘भीखबैक’ देंगे।यानी ठीक ढंग से भीख देने लायक बनाएँगे।यह हमारी ऐसी योजना है जिसमें भीख देने वाला लालच से मुक्त होगा।जनता को भिखारी बनाने का टारगेट हम समय से पहले पूरा करके दिखाएँगे।’

‘तो क्या अब आप संकल्प-पत्र भी नहीं पेश करेंगे ?’ हमने बहुत झिझकते हुए उनकी ओर सवाल फेंका।नेताजी अनुभवी थे।इतने वज़नदार सवाल को हवा में ही लपक लिया।कहने लगे-आज़ादी के सत्तर साल बीत गए हैं।आज तक हमारे मतदाता भाई आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं।हर चुनाव से पहले उन्हें नामुराद वोट के बदले कुछ पाने की तलब मचने लगती है।यह बात न लोकतंत्र के लिए ठीक है न भारतीयता के लिए।हमारे यहाँ पेड़ फल के बदले कुछ नहीं लेते,नदियाँ निःस्वार्थ भाव से जल देती हैं।हम तो फिर भी आदमी ठहरे।पाँच साल तक शांति से क्यूँ नहीं ठहर सकते ? हम संकल्प लेते हैं कि अपने वोटर को चुनावों से पहले अपना मुँह नहीं दिखाएँगे।क्या यह कम त्याग है इस ज़माने में ? उनके कहने के अंदाज़ से हम बिलकुल लाजवाब हो गए।

तभी एक आर्थिक भिखारी न जाने कहाँ से प्रकट हो गए ! कहने लगे,‘देश की आज़ादी सेलिब्रेट करने के लिए लंदन के ठंडे मौसम को छोड़कर यहाँ आया हूँ।देश हमसे और उम्मीद न करे।हमें ज़रूर देश से उम्मीद है।राजधानी में भीख माँगने की आज़ादी हमारी आर्थिक आज़ादी की ओर महत्वपूर्ण क़दम है।हम चाहते हैं कि इसे पूरे देश में लागू किया जाय।इससे सरकार की बेरोज़गारी की एक बड़ी समस्या बैठे-ठाले हल हो सकेगी।पढ़े-लिखों के लिए इस क्षेत्र में कई मौक़े आने वाले हैं।वे अपने इलाक़े की सीमा के पार भी जाकर ‘भीखबारी’ कर सकते हैं।इस कार्रवाई से बेरोज़गारी के कई अड्डे तो तबाह होंगे ही भीख की क्वॉलिटी सुधरेगी सो अलग।सरकार चाहे तो हमें ‘इंटरनेशनल भीख’ का ब्रांड एंबेसडर घोषित कर सकती है।देशी-विदेशी फ़ंड हड़पने का हमें व्यापक अनुभव है।’ हम देश और आज़ादी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के आगे नतमस्तक हो गए।

हमारी यह एक्सक्लूसिव बातचीत साथ बैठे बुज़ुर्ग ने सुन ली।उन्होंने कुछ बोलने की आज़ादी माँगी।हम आज़ादी के फ़ुल मूड में थे,दे दी।बुज़ुर्ग कहने लगे,‘भाई,आज हम सब हर तरह से आज़ाद हैं।जिसे देखो वही ‘हम लेके रहेंगे आज़ादी’ के मिशन में लगा हुआ है।सब अपनी-अपनी आज़ादी चाहते हैं।भीड़ को इंसाफ़ करने की आज़ादी चाहिए,बलात्कारी को पशु से भी अपनी हवस पूरी करने की आज़ादी हो।सड़कों पर पूजा-पाठ और हुड़दंग करने की आज़ादी हो।भ्रष्ट आचरण को देश-भक्ति समझने की आज़ादी हो।जब इतनी सारी आज़ादियाँ हमारे इर्द-गिर्द नाच रही हों,ऐसे में भीख माँगने की आज़ादी मिलना कम बड़ी उपलब्धि नहीं है।’

इतना कहकर बुज़ुर्ग अंतर्धान हो गए।शायद मारे ख़ुशी के वे अपना चश्मा ले जाना भूल गए।तभी से हम उनको ढूँढ़ रहे हैं ताकि वे आज़ादी के जश्न को अपने चश्मे से भलीभाँति देख सकें।

संतोष त्रिवेदी

मंगलवार, 24 जुलाई 2018

गले लगने और आँख मारने से हुई राष्ट्रीय क्षति !

वे सामने खड़े थे।बिलकुल धुले हुए।हम गले लगना चाहते थे पर उन्होंने साफ़ मना कर दिया।मैंने सोचा,हो हो,ताज़ा-ताज़ा धुल के आए हैं इसलिए बच रहे हों।पर उनकी तरह उनके इरादे भी साफ़ थे।हमसे गले मिलने की तमाम वजहें उनके झोले में मौजूद थीं।एक-एक करके उन्हें निकालने लगे।पहली तो यही कि वेविश्वाससे धुले हैं।अविश्वासके गले मिलकर वे कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते।इससे अविश्वास को बल मिलेगा और विश्वास निर्बल होगा।दूसरी ख़ास वजह यह कि गले मिलना इतना आसान नहीं होता।इसके लिए आदमी को झुकना भी पड़ता है।और झुकना कमज़ोरी की निशानी है।एक वजह यह भी कि गले मिलने वाला भी यदि हिसाबी हुआ तो गला फँस भी सकता है।इसलिए किससे गले मिलना है यह वे ही तय करेंगे।

हमने उन्हें अविश्वास भरी नज़रों से देखा।वे आँख में आँख नहीं डाल रहे थे।उन्हें डर था कि तकनीक के नए ज़माने में हमारी आँखों में भरा लबालबअविश्वासउनकी आँखों में कहीं ट्रांसफ़र हो जाय।उन्होंने अविश्वास से नज़रें फेर लीं।हमने फिर भी हिम्मत नहीं हारी।कुर्ता-फाड़ जोश के साथ उन्हें ललकारा।नए-नए चीनी झूले में झुलाना चाहा पर वे अपनी जगह पर खड़े रहे।हम भी अड़ गए।अचानकडीलपर उतर आए।वे अट्टहास करने लगे।हमें उनकी हँसी पर विश्वास नहीं हुआ।हमने दन्न-से आँख दे मारी।वे आहत हो उठे।कहने लगे-‘यह मुझ पर नहीं देश पर हमला है।आँख भी कोई मारने की चीज़ है ! यह बच्चों का काम है।मारो तो जूते-चप्पल मारो,माइक उठाकर मारो।मारने में भी मौलिकता होनी चाहिए।बचकानापन छोड़ो,समझदार बनो।सद्भाव और विश्वास मारो।जिस दिन तुम इस लायक हो जाओगे,हमारा गला पकड़ लेना।फ़िलहाल,गले मिलने की अर्हता तुममें नहीं है।

हमारी आँखों में अभी भी अविश्वास भरा था।गले मिलने के सभी हथकंडे विफल हो रहे थे।उनकी गर्दन पर पूरी तरह विश्वास सवार था।वे झुकते तो विश्वास गिर सकता था।हमारे लिए मौक़ा भी तभी बनता।इसलिए हमने अब उनके दिल पर वार किया।उनके और क़रीब पहुँच गए।उनकोदिल्लगीलगी।तभी उनके झोले से अचानक हम पर सर्जिकल स्ट्राइक होने लगी-तुमने बहुत बड़ा अपराध किया है।देश की गरिमा गिराई है।मैं घबराकर उनके झोले में झाँकने लगा।मुझे वहाँ रोज़गार पाने के एक हज़ार एक तरीक़े वाली जादुई किताब और दो हज़ार उन्नीस के बोर्ड एग्ज़ाम का पेपर दिखा।मुझे तलाश इसी की थी।गले मिलने के बहाने अगर वो पेपरहाथलग जाता तो अपन जैसापप्पूभी पास हो जाता ! पर वे कुर्सी के इर्द-गिर्द भरतनाट्यम करने लगे।मेरा ध्यान भंग हो गया।कुर्सी मुझसे और दूर चली गई।

तभी बग़ल से शोर उठने लगा।आँख मारने के ख़िलाफ़ देश-व्यापी आंदोलन फैल चुका था।मीडिया ने स्थिति अपने हाथ में ले ली।सर्वत्र विमर्शचालूहो गया।जगह-जगह कैमरे तैनात हो गए।आँख मारने से हुई व्यापक क्षति का आकलन किया जाने लगा।सबसे उत्साही रिपोर्टर ने तो मेरा गला ही पकड़ लिया।उसने मेरी निजी आँखों में अपनी आँखें डालकर पूछा,‘आपने आँख मारकर अशालीन कृत्य किया है।इससे सवा सौ करोड़ देशवासी शर्मसार हुए हैं।सरकार अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अब क्या मुँह दिखाएगी ?’ 

मेरे पास पहले ही समुचित मात्रा में विश्वास नहीं था,इस प्रहार से मैं अंदर तक हिल गया।भावी भूकंप की आशंका को देखते हुए मैंने आत्म-समर्पण कर दिया-यह मेरा पहला प्रयोग था,जो असफल रहा।मैं चाहता हूँ कि दो हज़ार उन्नीस जल्दी निपट जाए ताकि वो मेरी आँखों में आँखें डाल सकें और मैं उनसे गले मिल सकूँ।यह सुनकर रिपोर्टर सन्न रह गया पर वे भावुक हो उठे।
उनकी आँखों में अविश्वास की थोड़ी-सी झलक दिखी।खड़े-खड़े ही पूरेविश्वासके साथराष्ट्रवादचरने लगे।मुझे दो हज़ार चौबीस ज़्यादा दूर नहीं लगा।मैं ख़ाली हाथ पूरे अविश्वास के साथ घर लौट आया !

संतोष त्रिवेदी