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रविवार, 15 जुलाई 2018

व्हाट्स-अप विश्वविद्यालय में भर्ती !

सुबह उठते ही जैसे मैंने मोबाइल ऑन किया,’व्हाट्स अप’ ने दन्न-से तीस संदेश उगल दिए।यह सोचकर बड़ा अपराध-बोध हुआ कि बेचारे संदेश न जाने कब से बाहर आने को छटपटा रहे थे।अनजाने में हमसे बड़ा भारी गुनाह हो गया।अब इसका प्रायश्चित्त तो करना ही था,सो सभी संदेशों को हमने एक-एक कर पहले मोबाइल में उतारा फिर अपने दिल में।इनमें इक्कीस संदेश तो ‘सुप्रभात’ के ही थे,वो भी एक-से-एक सुदर्शनाओं से लैस।हमें ऐसा लगा कि जैसे पृथ्वीलोक में हमारे लिए ‘अच्छे दिन’ लाने का टेंडर देवलोक की इन्हीं अप्सराओं को मिला हो ! उनकी शुभकामनाओं-सदिच्छाओं की बाढ़ में हम थोड़ी देर डूबते-उतराते रहे।जब होश संभाला तो उन सभी का आभार व्यक्त किया जो मेरी सुबह के लिए मुझसे अधिक फ़िक्रमंद थे।इसके बाद तो मेरा दिन वाक़ई ‘अच्छा’ हो गया।

थोड़ी ही देर बाद मेरा मोबाइल फिर से ‘बीप’ मारने लगा।किसी अच्छी ख़बर की ‘आशंका’ तो मुझे ‘गुड मॉर्निंग’ के थोक संदेशों से ही हो गई थी,ताज़ा संदेश से वह सच साबित हुई।शहर के इनामी साहित्यिक-गिरोह ‘लेखक उठाओ समिति’ ने मुझे अपने ‘व्हाट्स-अप’ ग्रुप में उठा लिया था।ऐड्मिन श्री साहित्य सवार जी ने मुझ पर अपना भरोसा जताते हुए बेहद महत्वपूर्ण काम सौंपा था।मुझे नियमित रूप से गिरोह में हो रही किसी भी गतिविधि में ‘बधाई’ और ‘शुभकामना’ उगलने का ‘पॉवर’ मिला था।उनके अनुसार चूँकि मैं उभरता हुआ लेखक हूँ,इसलिए उन्होंने मुझे सही समय पर ‘उठा’ लिया था।मैं तो केवल इसी बात से फूलकर मटका हो रहा था कि मेरे जीते जी ‘उठने’ की क्रिया सम्पन्न हो रही थी,वरना ज़्यादातर लेखक तो मरने के बाद ही साहित्य में उठते हैं।बिना किसी ‘पासपोर्टी-पड़ताल’ के मुझ जैसे साहित्य-विमुख को निरा साहित्यिक प्रयोजन में धर लिया गया,यह आसान उपलब्धि नहीं थी।मुझे लगा,हो न हो,यह साहित्य की ‘तत्काल-सेवा’ हो।मैं ख़ुद को बड़ा ख़ुशनसीब समझ रहा था कि मुझे इसका कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं देना होगा,सिवाय समय के।वैसे भी मैं दिन भर निठल्ला पड़ा रहता हूँ,सो समय की अपन के पास कभी कोई कमी नहीं रही।शायद साहित्य सवार जी को हमारी इसी प्रतिभा का सुराग़ मिला हो और इसीलिए उन्होंने मुझे ‘लेखक उठाओ’ मिशन में शामिल कर लिया।

अलस्सुबह हुए इस ‘साहित्याघात’ से उबरने की अभी कोशिश में ही था कि मेरी प्रगति का एक और रास्ता खुलता दिखा।‘जाति बचाओ दस्ता’ ने मुझे सजातीय समझकर अपने गैंग में तुरंत प्रभाव से जोड़ लिया था।मैं यह कभी सोच भी नहीं सकता था कि मेरी जातीय ‘उपलब्धि’ भी कभी कुछ कमाल दिखाएगी ।पर जब समय अच्छा चल रहा हो तो गुंडा भी वज़ीर बन जाता है।मैं तो फिर भी केवल निठल्ला था।ग्रुप में जोड़ने के साथ एडमिन ने मुझे काम भी दे दिया।ग्रुप में प्रसारित ताज़ा पर्चे को देखते ही दस लोगों को शेयर करना था।इसे पढ़ने में समय बर्बाद करना मतलब गैंग की निष्ठा पर सवाल उठाना माना जाता।मेरे पास न समय की कमी थी,न निष्ठा की,सो मैंने बिना पढ़े ही अपनी संपर्क-सूची में शामिल सभी मित्रों को एक ‘किक’ सॉरी क्लिक से पर्चा फ़ॉरवर्ड कर दिया।पहली बार मैंने कोई नेक काम किया था और इस ‘नेकी’ को दरिया में डाल भी दिया था।दिन की शुरुआत से ही इतना अच्छा रेस्पॉन्स मिल रहा था कि मैं सब-कुछ भूल-भालकर ‘व्हाट्स-अप विश्वविद्यालय’ में भर्ती होने के मज़े उठाने लगा।

तभी श्रीमती जी ने रसोई से आवाज़ लगाई-‘शालू के पापा,सुन रहे हो ? सूरज सर पर चढ़ आया है और तुम हो कि अभी मोबाइल में ही घुसे हो ! आज नित्य-क्रिया करने का मूड नहीं है क्या ?’एक साथ इतने ‘जिनुइन’ सवालों का कोई जवाब मेरे पास नहीं था।झट से मोबाइल का ‘डेटा’ बंद किया और बाथरूम में घुस गया।तक़रीबन आधे घंटे की अलौकिक-शांति महसूसने के  बाद बाथरूम से बाहर निकला।नाश्ते से पहले मोबाइल पर टूट पड़ा।डेटा ऑन करते ही ‘व्हाट्स-अप’ पर संदेशों की बरसात होने लगी।पंद्रह वीडियो और पचास ‘सुभाषित’ ग्रहण करने से मोबाइल का हाज़मा तो ठीक हुआ पर मेरा बिगड़ गया।पहले दो घंटे उन्हें पचाने में लगे,फिर तीन घंटे हटाने में।नाश्ता ‘लंच-टाइम’ में पहुँच गया और दिमाग़ फ़्रीज़र में।इस बीच पता नहीं कैसे ‘राष्ट्रीय निठल्ला समिति’ के सचिव को मेरे ‘व्हाट्स-अप’ में होने की ख़बर मिल गई।उन्होंने ‘हम सब एक हैं’ ग्रुप में मुझे अपनी संपत्ति समझकर घसीट लिया।ग्रुप में एक वायरल-ग्रस्त वीडियो पर गंभीर विमर्श मचा हुआ था।यह सब देखकर ख़ुद को ‘वायरल’ की आशंका होने लगी।मुझे ‘व्हाट्स-अप’ के ‘लच्छन’ ठीक नहीं लगे।’न रहेगा बाँस,न बजेगी बाँसुरी’ जैसे पुराने आइडिये पर अमल करते हुए मैंने मोबाइल से ‘व्हाट्स-अप’ ही हटा दिया और पार्क में आकर घंटों ‘निठल्ला चिंतन’ करता रहा।
शाम को जैसे ही घर में क़दम रखा,छोटे बेटे ने कोहराम मचा दिया।कहने लगा-पापा,मेरा होमवर्क अब आप ही करोगे।आपके मोबाइल में ‘व्हाट्स-अप’ तक नहीं है।मैं दोस्तों से होमवर्क कैसे लूँ ?’ मेरे लिए यह बड़ी आफ़त थी।छोटी-छोटी आफ़तों ने आख़िरकार बड़ी आफ़त के आगे ‘सरेंडर’ कर दिया।अब मोबाइल में ‘व्हाट्स-अप’ है,ग्रुप है,सनसनी है,संदेश है।मैं भी अब निठल्ला नहीं रहा।दिन-भर संदेशों को कूड़ेदान में फेंकता रहता हूँ।

संतोष त्रिवेदी

रविवार, 17 जून 2018

विरोधियों को टोंटी-तोड़ जवाब !

वे पहले बंगला पकड़े थे,फिर टोंटी पकड़ ली।बंगलाविहीन तो हुए पर टोंटी हाथ लग गई।भागे भूत की लँगोटी भली।कभी उनके दोनों हाथों में लड्डू थे,आज टोंटी है।इस पर विरोधी उखड़ गए।गड़े मुर्दे उखाड़ने लगे।वे चाहते हैं जैसे उन्होंने कुर्सी छोड़ी,बंगला छोड़ा,अब टोंटी भी छोड़ दें।मगर वे विरोधियों के बहकावे में नहीं आना चाहते।टोंटी उनके समाजवाद का प्रतीक है।इसे उन्होंने स्वयं अर्जित किया है।यह टोंटी उनकीमुँहलगीहै।सत्ता को सत्तू के घोल की तरह पिया और समाजवाद को घोटा है।ऐसी चमत्कारिक टोंटी को वे अपने से विलग कैसे कर सकते हैं ?

विरोधियों को भी शायद इस बात की भनक लग गई है कि सत्ता का मुख्य स्रोत टोंटी ही है।अगर वही उखड़ गई तो इनकी प्यास कैसे बुझेगी ! पहले राजा की जान तोते में होती थी,अब टोंटी में है।इसीलिए इस पर हल्ला मचा हुआ है।जिन पर इसे उखाड़ने का इल्ज़ाम है,वे ख़ुद उखड़ चुके हैं।उनके समर्थक भी नहीं मान रहे कि वे अब कुछ उखाड़ सकते हैं।फिर यह तोहमत कैसी ! वे समाजवाद के सच्चे पुजारी हैं।अगर ऐसा होता तो वे समूचा  जलाशय उठा लाते, निरीह टोंटी नहीं।लोकतंत्र में एक तरफ़ से समाजवाद डालो,दूसरी तरफ़ से सत्ता निकलती है।इसीलिए वे टोंटी लिए घूम रहे हैं।वह छूटी तो सत्ता मिलेगी, समाजवाद बचेगा।नादान विपक्ष चाहता है कि टोंटी में भी समाजवाद बचे।वह पहले राज्य से गया,फिर बंगले से।ऐसे में ख़ुशहाली कब तक रूकती ! वो तो समाजवाद की चेरी है,अनुचरी है।उसी के पीछे-पीछे जाएगी।वे इसीलिए समाजवाद को सबसे बचाकर टोंटी में लिए घूम रहे हैं।विपक्ष का यही रवैया रहा तो उसे अपने टेंट में बाँध लेंगे।फिर ढूँढ़ते रहना समाजवाद को किताबों में।

रही बात बंगले की, वह स्वयं उनके बिछोह में उजड़ गया।इस बात का ग़म उनको भी है।वे तभी से उखड़े हुए हैं।जब तक बंगले के अंदर थे,समाजवाद की तबियत ठीक थी।उसे खुली हवा में साँस लेने की आदत नहीं है।बाहर आने से समाजवाद छुट्टा हो जाता है।वह राज्य भर में पसर सकता है।इससे पारिवारिक संभावनाओं को विस्तार नहीं मिलता।यह विरोधियों कीकुटिलचाल है।वे यही चाहते हैं।विरोधियों को टोंटी-तोड़ जवाब देने के लिए देर से ही सही,वे सबके सामने आए।उनके पक्ष में बंगला भी गवाही देने को तैयार है पर विपक्ष है कि रोटी के बजाय टोंटी की रट लगाए हुए है।यह ज़्यादती है।उनके रहते जब सड़कें उखड़ीं,घर-बार उजड़े,दंगे भड़के तब किसी ने सवाल नहीं खड़ा किया।वे समाजवाद का बैनर टाँगे खड़े रहे।अब जब उनके पाँव उखड़ रहे हैं, उनके विरोधी फ़र्श उखड़ने पर चिंता जता रहे हैं।यह घोर ज़्यादती है।

इस हो-हल्ले के बीच हमें सारे झगड़े की जड़ टोंटी से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।वह इस प्रकरण से बेहद ख़ुश नज़र आई।हमने उसका पक्ष जानना चाहा तो वह चहक उठी।कहने लगी,‘मेरा भौतिक जीवन तो धन्य हो गया।मेरे स्वामी ने मुझे जो राजकीय सम्मान दिलाया,वह कभी नहीं भूल सकती।उन पर यह आरोप सरासर ग़लत है कि मुझे बंगले से उखाड़ लाए।मैं तो बिरहाना रोड के एक कबाड़ी के यहाँ चुपचाप एक कोने में पड़ी थी।अचानक मुझे वहाँ से उठा लिया गया।फिर कुछ सभ्य लोगों ने राजधानी लाकर मुझे ख़ूब माँजा।मुझ पर निखार आते ही कैमरों के फ़्लैश चमके और इस तरह मेरी क़िस्मत भी।मैं दिन-दहाड़े बाथरूम से निकलकर प्रेस-रूम में गई।इस छोटे से जीवन में मुझ जैसों को और क्या चाहिए भला !’

उसकी बातें सुनकर हम भावुक हो गए।फिर भी भावनाओं को क़ाबू में करते हुए पूछ बैठे,‘मगर विरोधियों का आरोप है कि तुम्हारा दुरूपयोग हुआ है।तुमने अपने स्वामी को आवश्यकता से अधिक आपूर्ति की।इसके बाद भी उनकी प्यास नहीं बुझी और तुम्हें उखाड़ लाए ?’ यह सुनते ही टोंटी का गला भर आया।टपकते हुए बोली-यह पूरा सच नहीं है।मैं टंकी भरती हूँ तो खाली भी करती हूँ।मैं स्रोत नहीं बस भरने और खाली करने का ज़रिया हूँ।अब तक यही करती आई हूँ पर अब मैं राजकीय गुनाह की गवाही भी हूँ।यही अफ़सोस है।

इसी बीचवे गए।कहने लगे कि जो कुछ भी पूछना हो,उन्हीं से पूछें।टोंटी का काम बयान देना नहीं है।इनके पास बड़ी ज़िम्मेदारी है।अब जब समाजवाद हर जगह सूख चुका है,अब केवल यहीं से लीक होने की उम्मीद बची है।हमारी योजना है कि किसी तरह सत्ता की नदी के मुहाने पर यह टोंटी फ़िट हो जाए तो बिना किसीचैलेंजके हमारीफ़िटनेसआजीवन बनी रहे।विरोधियों के पेट में इसीलिए मरोड़ हो रही है।

उनके मुँह सेफ़िटनेस-चैलेंजकी बात सुनकर हमारी माँसपेशियाँ भी धड़क उठीं।टोंटी को वहीं छोड़कर हमने जेब से चुनौटी निकाली और लोकतंत्र को फ़िट रखने की चुनौती देने बड़ी तेजी से स्टूडियो की ओर भागे।