पृष्ठ

रविवार, 9 जून 2019

गठबंधन की गाँठ !

जैसे शादी के सारे गीत सच्चे नहीं होते,वैसे ही चुनाव-पूर्व लिए गए सारे संकल्प झूठे नहीं होते।चुनाव बाद एकाध संकल्प यदि सच्चा निकल जाए तो समझिए जनता की लॉटरी लग गई।चुनाव से पहले जिस मज़बूत निष्ठा से विरोधी को निपटाना होता है,परिणाम उलट होने पर श्रद्धापूर्वक वही सहयोगी निपट भी जाता है।निष्ठा और सिद्धांत राजनीतिक आत्मा की सगी संतानें हैं।चाहे कुछ भी हो जाए,ये दोनों सही समय पर आत्मा की पुकार सुन लेती हैं।यही कारण है कि निष्ठा और सिद्धांत अपनी जान देकर भी आत्मा की रक्षा करती हैं।शायद इसीलिए सनातन काल से आत्मा अजर-अमर है।लोकतंत्र में उसे तनिक भी खरोंच नहीं आती।विशेषज्ञों की सलाह पर उस पर महागठबंधन का लेप लगाया जाता है ताकि वह ‘अमर’ रहे।

इस बार भी यही हुआ।कुछ लोग बुरी तरह जीते।कुछ लोग अच्छी तरह से हारे।जो लोग ‘प्री-पोल’ में लड्डू बाँट रहे थे,’पोस्ट-पोल’ में ख़ुद बँट गए।मशीनों से अनायास फूल झरने लगे।जिनके ‘हाथ’ कट गए,उन्होंने यह सोचकर संतोष कर लिया कि ‘जो हुआ,सो हुआ’।लोकतंत्र के रण में निष्ठा और सिद्धांत खेत रहे।इतनी ज़ोर की हवा आई कि गठबंधन की गाँठ खुल गई।जन्म-जन्मांतर की क़समें पल भर में झूठी हो गईं।कल की ही बात है।शाम के धुँधलके में टहल रहा था कि अँधेरे में अचानक दो आकृतियाँ नज़र आईं।दूरदृष्टि का ‘चश्मा’ लगाने का यही फ़ायदा होता है।नज़दीक का भले न पढ़ सकें,दूर का साफ़ दिखता है।हमें देखकर बड़ी आकृति कसमसाने लगी।परिचय पूछा तो बुदबुदाहट सुनाई दी ‘हम गठबंधन की गाँठ हैं।अभी-अभी मिलावट से मुक्त हुए हैं।यह ख़बर हमारे लोगों को जल्द से जल्द दे दो।हमारा मिशन पूरा हुआ।’

‘लेकिन आपने तो इस बंधन के लिए ख़ूब क़समें खाई थीं।इतनी जल्दी सब भूल गईं?’ हमने ख़बर निकालने की कोशिश की।‘आपका बुनियादी सवाल ही ग़लत है।पहली बात तो यह कि हम क़सम नहीं वादे खाते हैं।दूसरी बात,हमारी क़समें जनता भूलती है,हम उससे किए वादे।और हाँ,राजनीति में जल्दी कुछ नहीं होता।सब मौक़े से होता है।जब मौक़ा हो,बरसों पुरानी रंजिश भूल जाओ।जब मौक़ा हो,ताज़ी दोस्ती में आग लगा दो।राजनीति हर पल बलिदान चाहती है।हम वही कर रहे हैं।’आकृति पहले से अधिक आश्वस्त होती हुई बोली।

‘आपने तो मिलन का संकल्प लिया था फिर गठबंधन की नश्वरता पर कब यक़ीन हुआ ? इसे तोड़ने का ख़याल कैसे आया ?’हम अभी भी ख़बर खोदने की कोशिश में लगे थे।

गाँठ हमारे सामने खुल चुकी थी इसलिए खुलकर बोलने लगी,‘राजनीति में जब हम कोई संकल्प लेते है तो दरअसल वह हमारे लिए विकल्प होता है।जनता को भी हर समय विकल्प की तलब लगी रहती है।हम तो उसके सेवादार हैं।इसीलिए विकल्प को अपना सार्वकालिक सखा बना रखा है।रही बात नश्वरता की,हमारे अलावा सब नश्वर है,यह हमें शुरू से मालूम था।सहयोगियों को इतनी सीधी बात समझ में नहीं आई।इसके लिए हम ज़िम्मेदार नहीं।रही बात इसे तोड़ने की,यह सरासर ग़लत आरोप है।हमने इसे केवल ‘ब्रेक’ दिया है।आगे फिर से हम समझेंगे ,गाँठ जोड़ लेंगे।तब तक हम इसे ‘होल्ड’ पर रखेंगे।’

हमें बीज-वक्तव्य की तलाश थी,सो पूछ लिया,’लेकिन इतनी मज़बूत मिलावट को आपने बड़ी ख़ूबसूरती से ज़मीन पर ला दिया।इससे आपकी मूर्ति खंडित नहीं हुई ?’

‘देखिए,हम जो भी काम करते हैं,बिलकुल ज़मीनी-स्तर पर करते हैं।इस मिलावट को मिट्टी में मिलाने का काम दूसरों ने किया है।हम तो वह करते हैं जो कहते नहीं।उनके लोगों ने तो कहकर भी नहीं किया।चुनाव में हमारे साथ धोखा हुआ है।हमें ‘गणित’ समझाई गई थी कि देश की ज़िम्मेदारी हमें मिलेगी पर ‘वो’ अपना परिवार भी नहीं बचा पाए।ऐसे लोग हमें क्या बचाएँगे ?’ आकृति अब साफ़ होने लगी थी।

इसी बीच बग़ल वाली आकृति में हरकत हुई।उसके हाव-भाव से लगा कि वह भी कुछ कहना चाह रही है।हम उसके क़रीब गए।अरे,यह तो ‘बंधन’ था,जो ताज़ा-ताज़ा ‘गाँठ’ से अलग हुआ था।हमने अपने कान उसकी ओर मोड़ दिए।‘बंधन’ निराश था पर हताश नहीं।कहने लगा-‘हम विज्ञान के पालक हैं।एक प्रयोग किया,जो विफल रहा।हम लगातार प्रयोग कर रहे हैं।आगे भी करते रहेंगे।वास्तव में इस हार में हमारी जीत हुई है।’इतना सुनते ही हमारे मुड़े हुए कान खड़े हो गए।हम सहसा पूछ बैठे-‘वह कैसे ?’

‘हमारा काम राजनीति में भले हो पर हम रिश्तों को प्राथमिकता देते हैं।गठबंधन में भी हमने रिश्ता निभाया पर दूसरों ने राजनीति की।सत्ता हमारे हाथ नहीं आई,कोई बात नहीं।हार के बहाने हमारा परिवार एक होने जा रहा है,यह बड़ी उपलब्धि है।आख़िर,हम जो करते हैं,परिवार के लिए ही तो.....!’ऐसा कहकर ‘बंधन’ ने लंबी साँस ली।’मगर आपने कई मौक़ों पर कहा है कि आप समाज के लिए राजनीति में हैं ?’ हमने अपना सवाल उछाल दिया।

‘हाँ,हमने कई मौक़ों पर कहा है,आगे भी कहेंगे।यहाँ तक कि हमारी पार्टी ही ‘समाज’ को समर्पित है।पर अभी मौक़ा दूसरा है।वैसे हमें इस चुनाव ने कई सबक़ दिए हैं।एक तो यह कि हमेशा दो प्लान तैयार रखो।प्लान ‘ए’ फ़ेल हो जाए तो झट से प्लान ‘बी’ आगे बढ़ा दो।लड्डू की तरह दोनों हाथों में विकल्प रखो।वास्तव में हम मतों से नहीं प्लान ‘बी’ से मात खा गए।’ऐसा कहकर बंधन ने गाँठ की ओर देखा,लेकिन वहाँ कोई नहीं दिखा।

अँधेरा गहराने लगा था।हम भी घर की ओर भागे।

संतोष त्रिवेदी

रविवार, 19 मई 2019

सियासत से साहित्य की ओर !

एक निरा राजनैतिक समय में मेरा मन अचानक साहित्यिक होने के लिए मचल उठा।राजनीति में रहते हुए भी अपन हमेशाअराजकरहे।कभी खुलकर नहीं आए।खुलने के अपने ख़तरे होते हैं।राजनीति में भी,साहित्य में भी।एकदम से खुलना कइयों को खलने लगता है।सत्ता और राजनीति में चुप रहकर ही रसपान किया जा सकता है।इससे किसी प्रकार का विघ्न नहीं पड़ता।मुखरता मूर्खता की पर्याय है।इधर आप मुखर हुए नहीं कि राजनीति और साहित्य दोनों आपसे मुकरने लगते हैं।जबकि चुप्पी साधकर दोनों हाथों से लड्डू खाए जा सकते हैं।एक स्थापित बुद्धिजीवी होने के नाते मैं उखड़ने का ख़तरा कभी नहीं मोल लेता।आज भी नहीं लूँगा।जब भी दुविधा में होता हूँ,अंतर्मन की सुनता हूँ।वह सदैव हमारी आत्मा का भला सोचता है।आज भी वह पुकार-पुकार कर कह रहा है कि मौक़ा है,साहित्यिक हो जाओ।हमनेमन की बातसुन ली और साहित्य के सबसे बड़े पथ-प्रदर्शक से मिलने निकल पड़े।जब भी साहित्य मुख्य-धारा से भटकने लगता है,वे उसे सही दिशा पकड़ा देते हैं।कहते हैं उनके पास ऐसादिशासूचक यंत्रहै जिससे वह अगली-पिछली सारी दिशाएं जान लेते हैं।

उनसे आपको मिलाऊँ,उससे पहले उनके परिचय से मिलना ज़रूरी है।जीवन ही जिसका परिचयइस कहावत को भी उन्होंने उलट दिया है।वे पूरी तरह मौलिकता के पक्षधर हैं।अपनी तरह के इकलौते।यह बात उनकेपरिचयसे खुलती है।सोशल मीडिया की उनकी प्रोफ़ाइल में साफ़-साफ़ दर्ज़ है कि पचासी पुस्तकों के एकमात्र लेखक वही हैं।यह संख्या उनके संकोच का नतीजा है।अन्यथा सूत्रों के हवाले से ख़बर यह भी है कि इससे कहीं अधिक उनकी किताबें प्रकाशकों के यहाँ पड़ी हैं।किताबें इतनी परतों में दबी हैं कि छह की छह एक साथ विमोचित हो जाती हैं।कृपया इसे उनका रचना-कर्म ही समझें,कार्बाइन से निकली गोलियाँ नहीं।उनकी किताबों को पढ़कर अभी तक किसी तरह की दुर्घटना की ख़बर भी नहीं आई है।साहित्य में उनका ज़बर्दस्त आतंक है।सभी सम्मान उनके चरणों में गिरते हैं।वे उन सम्मानों कोसम्मानदेने के लिए स्वयं गिर लेते हैं।इसे ही साहित्य में कला की संज्ञा दी गई है।वे हर हाल में साहित्य के साथ हैं।लोग नाहक आरोप लगाते हैं कि वे राजनीति से बचते हैं।सच तो यह है कि वे साहित्य में अब तक इसीलिए बचे हुए हैं।

शायद वे हमारा ही इंतज़ार कर रहे थे।ऐसा उनके हावभाव देखकर लगा।हम उनके चरणों को श्रद्धापूर्वक ताक ही रहे थे कि वे हमारी मंशा भाँप गए।हमें गिरने से बचा लिया।हो सकता है, वे साहित्य में किसी तरह की प्रतियोगिता को बढ़ावा नहीं देना चाह रहे हों।हमने उनसे गले लिपट कर क्षतिपूर्ति कर ली।हम कुछ बोलते इससे पहले ही वे शुरू हो गए।

वत्स,साहित्य को तुम जैसे युवाओं की सख़्त ज़रूरत है।हम अकेले कब तक इसे चरते रहेंगे ! कहाँ राजनीति में फँसे हो,इधर जाओ।वहाँ बहुत कीचड़ है।साहित्य को हम उससे आगे ले जाना चाहते हैं।कुछ लोग घटिया क्वॉलिटी का कीचड़ वहाँ से ले आए हैं।हम राजनीति से क्यों उधार लें जब उच्च क्वॉलिटी का कीचड़ साहित्य में हम स्वयं उपलब्ध करा रहे हैं।तुम राजनीति में क्या हासिल कर पाए अब तक ? साहित्य में रहोगे तो आजीवनसंभावनाशीलतो बने रहोगे।इतना कहकर वे हमारी ओर ताकने लगे।

नहीं गुरुदेव,हमें तो साहित्य काकखगभी नहीं आता।हम यहाँ आकर क्या करेंगे ? राजनीति में चाहे कुछ करना आता हो या नहीं,बस अतीत पर कीचड़ उछाल देने भर से उसमें उबाल जाता है।एक बयान देकर रातोंरात चर्चित हो सकते हैं।साहित्य में तो पूरा ग्रंथ लिखना पड़ता है।अब आप को ही देखिए,किताबों का शतक मारने के क़रीब हैं।यह हमसे हो पाएगा प्रभो !’ हम एकदम से विचलित हो उठे।

साहित्य-प्रवर ने तुरंत हमारे कंधे पर बायाँ हाथ रखा और बोले-‘बेटा,वाक़ई तुम्हें साहित्य की कुछ भी समझ नहीं है।तुम क्या जानते हो कि इतना लिखकर मैं टिका हुआ हूँ ! लिखना और बने रहना दोनों अलग बातें हैं।साहित्य में वही जीवित नहीं है जो लिखता है।यहाँ जो दिखता है,वही टिकता है।लिखने का क्या है,वह भी हो जाएगा।वसंत,फागुन,होली,चमेली जाने कितने विषय भरे पड़े हैं।एक-दो किताबें घसीट दो बस।बाद में उन्हीं कोरीसाइकिलकरते रहना।एक बार साहित्य में तुम घुस गए तो मेरे सिवा तुम्हें कोई नहीं रोक पाएगा।दस प्रतियों के संस्करण को भीबेस्टसेलरबनवा दूँगा।तुम्हें बस साहित्य में ऐसा कीचड़ मचाना है कि हमारे आसपास भी आने की कोई हिम्मत कर सके।मुझे तुम पर अधिक भरोसा है क्योंकि राजनीति में तुम्हारीडिलीवरीदेख चुका हूँ।तुम अच्छी तरह दीक्षित हो।साहित्य में ऐसेपीसआजकल मिलते कहाँ हैं ! मंच,समारोह,विमोचन,विमर्श सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं।एक साथ इतनी संभावनाएँ राजनीति में भी नहीं हैं।गिरने की कला में तुम हमसे भी निपुण हो।हमारे बाद साहित्य के असली वारिस तुम्हीं हो।तुम्हारा साहित्य में आनाछायावादके बाद की सबसे बड़ी घटना होगी।साहित्य में इसेवंशवादके नाम से जाना जाएगा।यहाँ रहोगे तो तुम पर शोध होंगे।राजनीति में रहोगे तो पचास साल बाद भीप्रतिशोधके पात्र बनोगे।इसलिए आओ,अंधकार से उजाले की ओर चलें।

हमारे चक्षु खुल चुके थे।सामने साहित्य की सत्ता हमारा आलिंगन करने को बेक़रार हो रही थी।

संतोष त्रिवेदी