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रविवार, 18 अगस्त 2019

होश में आने के बाद !

इधर लगातार बुरी ख़बरें आ रही थीं।वे बड़ी उम्मीद से बैठे थे पर उनका दिल बैठा जा रहा था।बार-बार वे घटनास्थल की ओर ताक रहे थे,पर उनके सिवा कुछ भी ‘घट’ नहीं रहा था।वे हर चैनल से जुड़े हुए थे।रिमोट को लगातार घुमा रहे थे,पर उनका सिर घूमने लगा।‘अनार-बाग़’ से एक ‘अनार’ तक फूटने की आवाज़ नहीं आ रही थी।वे कुछ भी ‘इच्छित’ देख-सुन नहीं पा रहे थे।मन बड़ा बेचैन हो रहा था मगर वहाँ अजीब-सी शांति पसरी थी।इसी नामुराद शांति को वे मन ही मन कोसने लगे-‘अजी,शांति तो मरघट में भी होती है।यह भी कोई उपलब्धि हुईं ! शांति तो उनके ‘टैम’ में थी।और क्या ख़ूब थी ! केवल गोलियों और पत्थरों की आवाज़ें आती थीं।मजाल थी कि किसी का सुकून भंग हो ! महीनों स्कूल बंद रहते थे पर कभी लोकतंत्र पर रत्ती भर आँच नहीं आई।बम और बारूद के बाद भी ‘स्वर्गिक-सुख’ मिल रहा था।सभी काम बड़ी सहजता से संपन्न हो रहे थे।हर तरह की आज़ादी थी।’

ऐसा बुदबुदाते हुए वे अचानक चुप हो गए।उन्हें कुछ ‘रोशनी’ दिखाई दी।अग़ल-बग़ल देखने लगे।हम बिलकुल पास थे,लपेटे में आ गए।लिपटना तो हम भी चाहते थे,पर शुरूआत उन्होंने की।कहने लगे-‘तुम अब भी कुछ नहीं बोलोगे ? दिनदहाड़े लोकतंत्र की हत्या हुई है।कम से कम तरीक़ा तो लोकतांत्रिक होता ! लोग बंद हैं।ख़बरें बंद हैं।यहाँ तक कि हमारी राजनीति भी बंद है।अब तुम्हीं बताओ,ऐसे में कोई करे तो क्या करे ? ठीक से भड़क तक नहीं पा रहे हैं।’

मामला गंभीर था।मैंने भी गंभीरता ओढ़ ली।विचार आने से पहले वैचारिक दिखना भी पड़ता है।मैंने कहा-‘भई,मैं तो लेखक हूँ।बयान नहीं विचार देता हूँ।आप पार्टी से जुड़े हैं,हम विचारधारा से।इसे ‘राजनीति’ न समझें।वह एक हल्का शब्द है।चीज़ें मेरी भी कुछ समझ में नहीं आ रहीं।भूत तो ख़राब हो लिया,भविष्य भी होने वाला है।मुश्किल यह है कि अब वह दिखाई भी नहीं दे रहा।वर्तमान ही संकट में फँस गया है।यह मैं आपके लिए कह रहा हूँ।बड़ा कठिन समय है।‘धाराएँ’ टूट रही हैं पर ‘विचार’ बचाना है।आप पार्टी बचाओ तभी राजनीति बचेगी।देश कहीं नहीं जा रहा,उसे हम बचा लेंगे।देश बचे इसके लिए पहले ‘लोकतंत्र’ को बचाना है।इसीलिए हम अपनी ‘लाइन’ से टस-से-मस नहीं हुए।आपकी ‘राजनीति’ की तरह हम ‘छुट्टा’ नहीं हैं।खूँटे से बँधे हैं।सूखा हो ,बाढ़ हो या बदलाव की बयार हो,हम प्रतिबद्ध हैं,परंपरावादी हैं।अपनी नाँद में ही मुँह मारते हैं।अब वैचारिक बने रहना इतना आसान नहीं रहा।कई बार ‘भूखा’ रहना पड़ता है।विचारशून्य होकर भी हम अपना अस्तित्व बचा रहे हैं।जैसे आप जो भी करते हो,‘राजनीति’ होती है,वैसे ही हम जो भी लिखते हैं,‘विचार’ होता है।सोचिए मत रणनीतिए।’ यह कहकर हमने उनमें संजीवनी भरी।

वे बड़ी देर से कसमसा रहे थे।हमने उनके ‘हिस्से’ का समय भी ले लिया था।हमारे चुप होते ही बोल पड़े-‘भई,मैं यह सब कैसे देख सकता हूँ।मैं तो ‘नज़रबंद’ हूँ।पहले ‘उनका’ आतंक नहीं देख पाया,अब इनकी ‘शांति’ नहीं देख पा रहा हूँ।राजनीति क्या ख़ाक करें ! क्या खाकर करें ? क़ानून भी तो कुछ नहीं बोल रहा।उसका भी तो कोई पहलू होगा ?’

‘सबके अपने ‘पहलू’ हैं।तुम्हारा अलग है,हमारा अलग।क़ानून का भी है।सब अपनी रोशनी में देखते हैं।‘पहलू’ तो बस फ़ुट्बॉल की तरह इधर-उधर होता रहेगा।हमें भी उसी का आसरा है।ज़रूरत इस बात की है कि हम दोनों एक रहें।’ हमने बिलकुल मौलिक और नेक सलाह दी।

यह सुनते ही उनकी हालत सुधरने की बजाय और बिगड़ गई।मेरी समझ में कुछ नहीं आया।वे फिर बोलने लगे-‘सारी समस्या की जड़ यही ‘एक’ है।वे सब कुछ ‘एक’ करने में तुले हैं।उनके ऊपर ‘एक देश,एक क़ानून’,एक देश,एक चुनाव’,‘एक देश,एक पार्टी’ की रट सवार है।अगर ऐसे ही चलता रहा तो बात ‘एक देश,एक नेता’ तक पहुँच जाएगी।फिर न हम बचेंगे न हमारी बची हुई पार्टी।हमारे सामने मुश्किल है कि इन सबके बीच ‘देश’ घुसा है।हमारी टाँग घुसेड़ने की गुंजाइश तक नहीं।यह सरासर ज़्यादती नहीं तो और क्या है ?’

तभी एक चैनल से चीख़ने की आवाज़ सुनाई देने लगी।लग रहा था कि बेचारा एंकर भी कुछ समय से ठीक से चिल्ला नहीं पाया था।उनकी आँखें चमक उठीं।हमने भी अपनी निग़ाह गड़ा दी।पड़ोसी देश से ख़बर आ रही थी।वहाँ का नेता माइक के आगे इक़बालिया बयान दे रहा था,’वे कुछ भी कर सकते हैं।पहले से भी ‘बड़ा’ हो सकता है।वे हमारे यहाँ घुस सकते हैं।अब जेहाद के लिए तैयार रहो।’यह सुनकर उनका सारा जोश ठंडा पड़ गया।स्थिति को हमने भी ताड़ लिया।’संदेह’ अब ‘सबूत’ बन गया था।कुछ देर तक वे सन्नाटे में रहे।उनके होश में आने से पहले हमें होश आ गया।हमने तुरंत चैनल बदल दिया।वहाँ ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ थी।जिस ‘गुप्त-बैठक’ से पड़ोसी देश को उम्मीद थी,वह गुप्त ही रही।आख़िरकार उसने अपनी सड़कों और गलियों को ‘जन्नत’ का नाम दे दिया।इधर होश में आते ही वे बोल उठे-‘एक हो जाओ,इसी में भलाई है।’

संतोष त्रिवेदी

शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

विशुद्ध-टाइप का धार्मिक !

मैं ‘नए भारत’ का ‘नया धार्मिक’ हूँ।अपने धर्म को लेकर मेरी धारणा इतनी मज़बूत है कि धर्म भले ढह जाए,धारणा को रत्ती-भर खरोंच नहीं आ सकती।वैचारिक होना अब एक दक़ियानूसी मामला है।इसमें समय-समय पर व्यक्ति के फिसलने का ख़तरा बना रहता है।जबसे मैंने नई तरह का धर्म धारण किया है,अहर्निश प्रसन्न रहता हूँ।न भूख लगती है न ही प्यास।किंतु अपने धर्म को पुष्ट करने और दूसरों के मुक़ाबले ऊँचा उठाने के लिए मजबूरन खाना पड़ता है।धर्म के प्रति यह मेरा त्याग है।

मैं चाहूँ तो अपने घर में शांतिपूर्वक खा सकता हूँ।पर मैं इतना स्वार्थी नहीं।बिना क्रांति किए मेरा पेट नहीं भरता।खाना बाहर से मँगाता हूँ ताकि विधर्मियों को तो पता चले कि धर्म के प्रति मेरी दृढ़ता कितनी है ! लाने वाला यदि दूसरे मज़हब का हुआ तो अपना ऑर्डर तुरंत कैंसिल कर देता हूँ।इस तरह अपने धर्म की स्थापना करता हूँ।

पैदा होने से पहले ही मैं धर्म-परायण हूँ।यहाँ तक कि ‘डेलीवरी’ के समय भी मैंने अस्पताल वालों को चेता दिया था कि मेरा नाड़ा कोई ‘विधर्मी’ नर्स न काटे।तभी से नाड़ा पकड़े घूम रहा हूँ ताकि मेरे धर्म की ध्वजा फहराती रहे।

मैं अपने धर्म के प्रति सदैव संवेदनशील रहता हूँ।कई बार ‘समानता’ और ‘इंसानियत’ ने मेरी राह में बाधा बनने की कोशिश की,पर मैंने सिरे से अस्वीकार कर दिया।मज़हब को लेकर मेरी धारणा इतनी मज़बूत है कि कोई क़ानून तक उसे हिला तक नहीं सकता।कुछ भी हो जाए,मैं अपने पथ से डिगने वाला नहीं।

धर्म के प्रति मेरी दृढ़ता उल्लेखनीय रूप से बलिष्ठ है।एक बार हवाई सफ़र के दौरान जब मुझे पता चला कि जहाज का पायलट दूसरे धर्म का है तो मैं झट से कूद पड़ा।इस घटना से मेरी दोनों टाँगे भले टूट गई हों,पर अपने धर्म को बचाने की ख़ुशी कहीं ज़्यादा है।

अपने धर्म की रक्षा के लिए मैं बराबर प्रयत्नशील रहता हूँ।यहाँ तक कि अब ‘चिकन’ भी खाता हूँ तो निश्चित कर लेता हूँ कि अपने ही धर्म के रसोइए के हाथों बना हो।इस तरह मेरा धर्म मेरे हाथों बिलकुल सुरक्षित है !

संतोष त्रिवेदी

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