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रविवार, 30 जून 2019

जनसेवा की नई तकनीक !

उधर जैसे ही विश्व-कप में हमारे खिलाड़ियों के उम्दा प्रदर्शन की ख़बर विलायत से आई,इधर देश के अंदर छुपे होनहारखिलाड़ीछटपटा उठे।उन्हें अपने हुनर को आजमाने का अच्छा अवसर दिखाई दिया।हमारे यहाँ राजनीति का क्षेत्र कभी भी प्रतिभा-शून्य नहीं रहा।जब भी लगा कि देशग़लतदिशा में आगे बढ़ रहा है,राजनीति हमेंसहीराह पर ले आती है।जनसेवक जी इस काम के लिए सबसे आगे आए।वेबल्लेबाज़ीके लिए इतना आतुर हुए कि एक राजसेवक के पैरों को ही स्टम्प समझकर उखाड़ने लगे।बुरा हो ऐसी व्यवस्था का,जिसने ऐसी प्रतिभा को सम्मानित करने के बजाय हवालात में डाल दिया।यह तो अच्छा हुआ किजनसेवाकरने के तुरंत बाद हवालात जाने से पहले वे हमसे बातचीत को तैयार हो गए।हवा में ही हुई उस दुर्लभ मुलाक़ात में पहला सवाल हमने यही पूछा कि आपको ऐसी बल्लेबाज़ी की प्रेरणा कैसे मिली ? सवाल सुनकर वे शून्य की ओर ताकने लगे।फिर धीरे-धीरे कहना शुरू किया-‘दरअसल,हम बचपन से ही बल्लेबाज़ बनना चाहते थे।स्कूल की टीम में हमने सिर्फ़ दो साथियों के सिर फोड़े थे फिर भी हमारा चयन नहीं हुआ था।चयनकर्ता चाहते थे कि जब तक हम टाँग-तोड़ने की कला विकसित नहीं कर लेते,कामयाब खिलाड़ी नहीं हो सकते।तब तो हम मन मसोसकर रह गए थे।अब जब जनता ने ही हमें अपनी सेवा करने का अवसर दिया है तो हम क्यों चूकते ! प्रतिभा भले कुछ दिन के लिए छुप जाय,कभी कभी बाहर आती ही है।हमें ख़ुशी है कि नई पीढ़ी के लिए हम प्रेरणास्रोत बने।हमारी इस उपलब्धि से अन्य खिलाड़ियों का मनोबल भी बढ़ेगा।

परलेग-स्टम्पउखाड़ने का काम तो क्रिकेट में गेंदबाज़ करता है,आपनेबल्लेबाज़ीसे यह अद्भुत कारनामा कैसे किया ?’हमने भीदूसराफेंकते हुए उन्हें चौंकाया।

वे क़तई नहीं चौंके।बड़ी सहजता से खेल गए।कहने लगे,‘हम हमेशा नए प्रयोग करने के हामी रहे हैं।गोली-बंदूक़ से मारने की परंपरा अब पुरानी हो चुकी है।हम इस तरह की हिंसा के ख़िलाफ़ हैं।यहाँ तक किजूतामारकला भी आउटडेटेड हो चुकी है।पुरानी तरकीबों से हनक बढ़ती है,टीआरपीले-दे के हमारे पास यही एक विकल्प बचा था।सामयिक होने के नाते भीबल्लाहमारी प्राथमिकता में था।इसलिए नई तकनीक का सहारा लिया।कलाई के बेहतर प्रयोग के कारणबैटमारएक उन्नत कला है।यह सबको ठीक से आती भी नहीं।उनका यह जवाब सुनकर हमारी उम्मीदें और बढ़ गईं।हमनेयार्करडालने की कोशिश की-‘पर कुछ लोगों का कहना है कि आपके इस तरहबल्लेबाज़ीकरने से विकास अवरुद्ध हो सकता है।उसके कदम रुक भी सकते हैं ?’

जनसेवक जी एकदम से संवेदनशील हो गए।भावुक होते हुए बोले-‘अगर विकास दो-चार टाँगें टूटना भीअफ़ोर्डनहीं कर सकता तो ख़ुद सोचिए,उसकी नींव कितनी खोखली है।हम ऐसाविकासनहीं चाहते।किसी देश का इतिहास यूँ ही नहीं बनता।वह प्रतिक्षण बलिदान माँगता है।इस बारे में हमारी कार्यप्रणाली एकदम स्पष्ट है।पहले आवेदन फिर निवेदन,इसके बाद दे-दनादन।कुछ लोग भीड़ का हिस्सा बनकरभारत-निर्माणमें लगे हैं,हम अकेले ही इस परियोजना को संपन्न कर रहे हैं।विरोधियों को यह नहीं सुहा रहा है।इतना कहकर वे अपना बल्ला सीधा करने लगे।आप पर क़ानून को हाथ में लेने का आरोप लगाया जा रहा है।क्या यह बात सही है ?’हमने इस बार गुगली आजमाई।

अब वे हँस पड़े।बोले-‘यह वाला आरोप तो एकदम निराधार है।क़ानून को हाथ में लेने का सवाल ही नहीं है।हम इसे ससम्मान अपनी जेब में रखते हैं।और हाँ,क़ानून को अपने हाथ में रखने वाले आजकल ख़ाली हाथ घूम रहे हैं।अब तो जनता भी उनके साथ नहीं है।सबने देखा है कि हमारे हाथ में केवलबल्लाथा।हम तो सिर्फ़आक्रामक बल्लेबाज़ीकर रहे थे।उनकी इस बाल-सुलभ मासूमियत देखकर हम भी अपनीऔक़ातभूल बैठे।उसी मासूमियत से पूछ बैठे-‘आपको इतना तो याद होगा किबैटिंगकरते हुए आपने कितनास्कोरबनाया था ?’ वे छूटते ही बोल पड़े-‘हमें बल्ले के अलावा कुछ भी याद नहीं।हमारास्कोरतो जनता चुनावों में बताएगी।एक और पते की बात बताता हूँ।किसी ग़रीब का दुःख हमसे देखा नहीं जाता।उसी दुःख को दूर करने की यह छोटी-सी कोशिश थी,बस।फिर मौक़ा मिलने पर हम जनसेवा से पीछे नहीं हटेंगे।

अच्छा आख़िरी बात।आपको हवालात जाने का कितना दुःख है ?’ हमने छोटी बॉल डालकर उन्हें ललचाया।वे जैसे इसी इंतज़ार में थे।बॉल को सीमापार भेजते हुए बोले-‘लगता है आपकी भी हिन्दी ख़राब है ! अरे भाई,चोर और उचक्केहवालातजाते हैं।जनसेवक हवालात नहीं कारागार जाते हैं।कारागार तो हमारी उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।हमारे कई महापुरुषों ने यहीं रहते हुए महत्वपूर्ण साहित्य रचा।हम यहीं से चुनाव लड़कर इतिहास रचेंगे।अतीत से हम यही सबक़ तो ले रहे हैं,परबिकाऊ-मीडियायह सब नहीं बताएगा।आप अपनी हिन्दी दुरुस्त कीजिए।हम देश को दुरुस्त कर रहे हैं।

ऐसा कहकर उन्होंने बल्ला उठा लिया।हम ख़ुद पर और अपनी हिन्दी पर तरस खाते हुए लौट आए।

संतोष त्रिवेदी