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रविवार, 18 मार्च 2018

आरत काह न करइ कुकरमू !

बचपन से सुनते आये हैं कि सेवा में ही मेवा होती है।अब उसका प्रत्यक्ष दर्शन भी हो रहा है।लोग सेवा करने के लिए टूटे पड़ रहे हैं।उन्हें ही देखिए,लंबी छलाँग लगाई है।प्रादेशिक दलदल से सीधे राष्ट्रीय कीचड़ में कूद गए।वे पक्के जनसेवक ठहरे,इसीलिए एक जगह नहीं ठहरते।न किसी खूँटे से बँधे हैं,न विचार से।जनसेवा का ज्वार जब भी आता है, सारे बंधन तोड़ देते हैं।उनके इसी हुनर को अब जाकर राष्ट्रीय पहचान मिली है।क्षेत्रीय-करतब करते-करते वे ऊब गए थे।जैसे ही राष्ट्रीय-फलक पर खिलने का मौक़ा मिला,वे खिलखिला उठे।ज़िंदगी बहुत छोटी है और उनके सेवा-संकल्प बहुत बड़े।इसलिए एक पल भी बिना सेवा के नहीं रह सकते।

सच्चा जनसेवक दूरदर्शी होता है।सर्वदल-समभाव में उसका पक्का यक़ीन ही उसे यायावर बनाता है।वह टिकट-वितरण से समझ लेता है कि उसकी वैतरणी-यात्रा संकट में है।‘अंतर-आत्मा’ की आवाज़ उसे ज़ोर-ज़ोर से पुकारने लगती है।उसके सामने सारे विकल्प खुल जाते हैं और वह नए खोल में आ जाता है।जनसेवा के एक अदद लाइसेंस के लिए पुराने बयान बिना पानी के और बिना पलक झपकाए निगल जाता है।सेवा की ऐसी सुनामी पहले कभी नहीं आई।‘गुन के गाहक सहस नर’ अतीत की बात हो गई।अब तो ऐसे ‘गुणियों’ को चाहने वाला एक ही केंद्रीय भंडार है।ऐसे ‘अमूल्य’ जनसेवक फ़िलहाल यहीं ‘स्टोर’ किए जा रहे हैं।इनको लपकने वाले नेताजी सौभाग्य से हमें गोदाम में ही मिल गए।हम उनसे संवाद करने लगे।

सर,आपने अचानक ‘मास्टर-स्ट्रोक’ मार दिया।यह कैसे किया,कुछ प्रकाश डालेंगे इस पर ?

‘देखिए,’स्ट्रोक’ अचानक ही होता है।इसकी चपेट में कोई भी आ सकता है।हम विरोधियों को अपनों से ज़्यादा सम्मान देते रहे हैं।यह हमारी पार्टी की उदारता का जीवंत प्रमाण है।इनके दल ने इनका तिरस्कार किया और हमने स्वीकारा।शरणागत को हमारी संस्कृति में सम्मान देने की बात कही गई है।अपने अहित की क़ीमत पर शरण आए ‘सेवातुर’ को पकड़ से बाहर नहीं जाने देना चाहिए।

पर आपकी इस ‘पकड़’ पर चौतरफ़ा आलोचना हो रही है।इस पर आप क्या कहेंगे ?

हमारी जितनी भी आलोचना होती है,हम आगे बढ़ते जाते हैं।इसका मतलब यह नहीं कि हमें कुछ सुनाई नहीं देता।दरअसल राजनीति में सुनने से अधिक दिखाई देना अधिक महत्वपूर्ण होता है।रही बात फ़ैसले पर हल्ला मचने की, तो यह भी हमारे फ़ायदे में है ! उधर विरोधी हल्ले में गुल हो जाते हैं और इधर हम रसगुल्ले पर हाथ साफ़ कर जाते हैं।ऐसे लोग हमसे बहुत पीछे खड़े हैं क्योंकि वे हमारे पीछे पड़े हैं।

लेकिन आप यह तो मानेंगे कि इससे आपकी छवि पर असर पड़ा है ?

बिलकुल ठीक कहा।इससे हमारी छवि को लेकर आशंका के बादल छँट गए हैं।जिन लोगों को हमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी,वे भी अब हमारी नई छवि से अभिभूत हैं।जनता को सेवा चाहिए और हमें सेवक।हमारी ताज़ा ‘पकड़’ से दूसरे दल के और जनसेवक भी उत्साहित होंगे।‘सबका साथ,सबका विकास’ की हमारी संकल्पना मज़बूत होगी और इधर-उधर फैली गंदगी एक जगह इकट्ठी हो जाएगी।इसका सबसे बड़ा फ़ायदा ‘स्वच्छ अभियान’ को मिलेगा।लोग गंगा-स्नान के बजाय हमारे दल में डुबकी लगाकर पवित्र हो लेंगे।गंगा जी भी साफ़ रहेंगी।इससे हमारी छवि अपने-आप निखर उठेगी।

सुनते हैं कि अतीत में उन्होंने ऐसा बहुत कुछ कहा है जिससे आपको भी कष्ट हुआ।इसे कैसे भूलेंगे ?

अरे कुछ नहीं भाई।राजनीति में भावुक होने की कोई जगह नहीं है।‘डिजिटल’ ज़माने में बस एक ‘डिलीट’ से अपनी और उनकी ‘मेमोरी’ बिलकुल नई हो जाती है।इतनी ‘स्किल’ तो बरखुरदार हमने सीख ली है।दूसरी बात हमारा मानना है कि यदि कोई व्यक्ति बिगड़ा हुआ है तो उसे सुधरने का मौक़ा तब तक देना चाहिए,जब तक वह हमको बिगाड़ न दे।

आप यह सब कैसे कर लेते हैं ? इसके पीछे कौन-सा ‘विज़न’ काम करता है ?

हाँ,पहली बार आपने महत्वपूर्ण सवाल पूछा है।वैसे तो हम किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं पर हमारे दल का लोकतंत्र में पूरा  विश्वास है।हम उसका सम्मान करते हैं।अब आपके सवाल पर आते हैं।देखिए,इस समय निवेश का मुख्य क्षेत्र जनसेवा है।इसी में अकूत सम्भावनाएँ हैं।इसके लिए टेंडर उठते हैं,बोलियाँ लगती हैं।लम्बी ज़ुबान और लम्बी जेब के मालिक जनसेवक बनने के लिए सबसे फ़िट होते हैं।हम तो चाहते हैं कि ‘आईपीएल’ की तरह इसमें भी पारदर्शी-प्रक्रिया हो।बिकने वाले जनसेवक अपने गले में अपनी क़ीमत का टैग लटका लें।जनता भी इसे खुलेआम देखे और गर्व महसूस करे।सारा ‘क्रेडिट’ हमें ही क्यों मिले ? लोकतंत्र में आख़िर जनता ही तो जनार्दन है और ज़िम्मेदार भी।

तभी ‘सेवातुर’ जनसेवक जी आ गए।हमने उनका पक्ष जानना चाहा।उनका सीधा और सपाट उत्तर था-‘हम बोलते नहीं बयान देते हैं।यही हमारी ख़ूबी है।हमारी जनसेवा के जज़्बे से कुछ लोगों को क़ब्ज़ हो गया है।वे नैतिकता जी और संस्कृति जी को बिलावजह  बीच में घसीट रहे हैं।हम दोनों की इज़्ज़त करते हैं इसलिए उनसे कोसों दूर हैं।हम पर कोई आरोप नहीं लगा सकता।हमने कोई अजूबा काम नहीं किया है।बचपन में ग़लती से पढ़ा था ‘आरत काह न करइ कुकरमू’।तब से जब हम कभी भी तकलीफ़ में होते हैं तो स्वतः ‘आर्तनाद’ हो उठता है।‘आरत’ की पुकार सुनकर भगवान को तो आना ही पड़ता है।आप देख रहे हैं,हम उन्हीं की शरण में हैं।’

तभी ‘जनसेवक केंद्र’ का फ़ोन घनघना उठा।कोई और जनसेवक ‘आर्तनाद’ कर रहा था।


©संतोष त्रिवेदी

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

मूर्तियों का मुक्तिकाल और सभ्यता-परिवर्तन !

मूर्तियाँ ख़ुश हैं।वे यकायक सजीव हो उठी हैं।बरसों से घाम और बारिश में जो एक ही मुद्रा में खड़ी थीं, ‘सभ्य-समाज’ के प्रयासों से वे हरकत में आ गई हैं।जीवितों की तरह ही वे टूट रही हैं,गिर रही हैं और एक-दूसरे से ईर्ष्या भी कर रही हैं।आदमी भौंचक है।उसे इतनी जल्दी ‘मानव-विकास क्रम’ के पाषाण-युग में जाने का भरोसा नहीं था।पत्थरबाज़ी से चलकर वह मूर्तिबाजी तक आ गया।मूर्तियाँ आपस में खुसर-पुसर कर रही हैं।वे एकदम से संवेदनशील हो उठी हैं।एक ने दूसरी से पूछा-तू गिरी क्यों ? अच्छी-ख़ासी तो टिकी हुई थी।रोज़ फूल भी चढ़ रहे थे।इतनी भी क्या नाज़ुक हो गई कि फूलों का भार भी नहीं झेल सकी ?

उसने जवाब दिया-मैं तेरी तरह बोझ से नहीं गिरी।बक़ायदा शहीद हुई हूँ।अब मेरा स्मारक बनेगा।फिर से प्राण-प्रतिष्ठा होगी।आदमी अपने जीने के लिए मुझे कभी मरने नहीं देगा।तू अपनी बता,तू कैसे ज़मींदोज़ हुई ? तुझे तो सरकार ने आदमियों से सुरक्षा भी दे रखी थी।दूध से नहाती थी।रोज़ाना अभिषेक होता था।फिर मिट्टी में कैसे मिल गई ?

पहली वाली ने टूटे हुए मुँह से उत्तर दिया-मैं तो सभ्यता के प्रति सदा समर्पित रही हूँ।जब तक टँगी रही,सभ्यता को टाँगे रही।आदमी अब स्वयं सभ्य हो गया है।उसने ख़ुद को टाँग लिया है।वह आत्म-निर्भर होकर स्वयं पत्थर बन गया है।यह मेरी गिरावट नहीं बल्कि मुक्ति का प्रतीक है।कबूतर और कौओं के लिए ज़रूर अफ़सोस है।बीट करने के लिए उन्हें आदमी पर निर्भर होना पड़ेगा।यह नई स्थापनाओं का समय है।मूर्तियाँ खंडित हो रही हैं,मूर्खताएँ स्थापित हो रही हैं।बुत अब बोलने लगे हैं।वैसे भी टूटे हुए मुँह से स्वस्थ विचार कहाँ निकल सकते है ! आदमी के पास अब विचार हैं।वह अब सोचता भी है,भविष्य के प्रति चिंतित भी है।हम भले गिर रहे हैं पर वह उठ रहा है।हम इसी में ख़ुश हैं।

अचानक दोनों मूर्तियाँ ख़ामोश हो गईं।उन्हें आदमियों की पदचाप सुनाई दी।वे नई मूर्तियाँ ला रहे थे।दोनों मूर्तियाँ अब आश्वस्त थीं कि सरकार सक्रिय हो चुकी है।