पृष्ठ

रविवार, 29 मार्च 2015

गालियों में नैतिकता!

हमारी क्रिकेट टीम ऑस्ट्रेलिया से वापस आकर जैसे ही एयरपोर्ट पर उतरी,कोहली ने डरते हुए इधर-उधर निगाह घुमाई।कहीं कोई नहीं था।उन्होंने रन-वे पर अपने साथ लाए एक बहुमूल्य और ऐतिहासिक रन की सुरक्षित लैंडिंग की और राहत की साँस ली।हालाँकि उन्हें ऑस्ट्रेलिया में ही खबर मिल गई थी कि देश में टमाटर फ़िर से मँहगे हो गए हैं फिर भी पत्थरों और जूतों पर उन्हें भरोसा नहीं था।वे तो कभी भी चल सकते थे पर एयरपोर्ट का शांत दृश्य देखकर उनकी जान में जान आई।

तभी उनकी नज़रें अखबार के पन्नों पर पड़ीं।हेडलाइन में ही ‘साले,कमीने’ देखकर वो थरथराने लगे।उन्होंने अन्य अख़बारों पर भी निगाह दौडाई पर सर्वत्र यही हाल था।अब तो उन्हें पसीना छूटने लगा।चरण ऐसे काँपने लगे जैसे वे पुनः ऑस्ट्रेलियाई पिचों पर धर दिए गए हों।उन्हें घबराते देखकर रैना ने कोहली से पूछ ही लिया,’क्या सोशल मीडिया वाले यहाँ भी आ गए ?’ कोहली ने अख़बारों की ओर इशारा भर किया।रैना ने यह देखते ही कहा,’अरे भाई ! यह हमारे लिए नहीं है।अपना काम तो हमारे क्रांतिकारी जी ने कर दिया है।उन्होंने अपने एक ही वार से राजनीति ही नहीं खेल को भी बचा लिया है।जो उपाधियाँ तुम अपने लिए समझ रहे थे,वे उन्होंने अपने साथियों में ही बाँटी हैं,इसलिए हमको तुमको परेशान होने की ज़रूरत नहीं है।’

‘पर तुम्हें यह सब कैसे पता चला ? कोहली ने फ़िर भी आशंका जताते हुए पूछा।रैना ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया,’स्साले,तेरी होने वाली भाभी ने मुझे रात में ही मैसेज कर दिया था कि अब तुम लोग बेखटके अपने देश लौट सकते हो।मीडिया और सोशल मीडिया अब नए ‘कमीनेपन’ पर चर्चारत है।’

इतना सुनते ही कोहली ने रैना की पीठ पर एक जोरदार धौल जमाते हुए कहा,’ तू तो बड़ा कमीना निकला।इतनी बड़ी खबर अब तक मुझसे छुपाई।चलो अच्छा हुआ कि इस बार हमारी जान सस्ते में छूटी।पहले ही सोशल मीडिया ने हार का ठीकरा हमारी ‘जान’ के सर फोड़ दिया था।’

अभी तक इन दोनों की बातचीत सुन रहे धोनी से रहा नहीं गया।वे बोल पड़े,’तुम दोनों इस मामले को बहुत हल्के में ले रहे हो।नैतिक रूप से यह बहुत गलत हुआ है।अब हम अपनों को गाली भी नहीं दे सकते ?हम तो कहते हैं कि सबसे बड़ा कमीना तो ससुरा वो है,जिसने स्टिंग किया।ऐसा थोड़ी ना होता है कि मरीज ही डॉक्टर के इंजेक्शन भोंक दे !’

कप्तान की बात सुनकर दोनों सहम गए और नैतिकता की नई गालियों का मन ही मन पाठ करते हुए चुपचाप एयरपोर्ट से बाहर निकल आए।

गुरुवार, 26 मार्च 2015

अब किसकी भैंस खुलेगी ?

अभी तक सरकार बहादुर ही हमसे अपने मन की बात करते थे और हम चाहकर भी अपनी बात नहीं कर पा रहे थे।अब माननीय न्यायालय ने कह दिया है कि सोशल मीडिया पर हम जमकर अपनी भड़ास निकाल सकते हैं।इससे सब अपने मन की बात कह सकेंगे।सरकार के कुछ लोग इस कदम को लोकतंत्र के लिए उचित नहीं मानते।उनका मानना है कि इससे उनकी जो थोड़ी-बहुत पर्दादारी है,खुलकर बाहर आ जायेगी।लोग बेख़ौफ़ होकर लिखेंगे तो कुछ भी लिख डालेंगे।उनके भी बाल-बच्चे हैं और सारे कारनामे यदि सोशल मीडिया पर ऐसे ही आते रहे तो किसी दिन वे भी डिसलाइक का बटन दबा सकते हैं।इससे उनकी बड़ी थू-थू होगी।पर अपुन की सोच ज़रा हटके है.इससे निकट भविष्य में रोजगार की बड़ी सम्भावनाएं है.कुछ लोग सुपारी लेखन में भी सक्रिय हो जायेंगे.
कुछ समय पहले नवाब साहब की भैंसें खो गई थीं,तो राज्य का पूरा अमला उनकी सुरक्षा के प्रति चिंतित हो उठा था।जब तक उनका खूँटा बहाल नहीं हुआ,पूरी व्यवस्था तबेले में आ गई थी अब उनके या सरकार के खिलाफ लिखकर हम कौन-सी भैंस खोल लेंगे ?अगर खोल भी ली तो उनको ऐसी आपदाओं से निपटने का पूरा अनुभव है।सरकारें जब किसी दैवीय आपदा से नहीं घबरातीं,फ़िर कुछ निठल्ले लोग यदि सोशल मीडिया पर दो-चार कमेन्ट या दस-पाँच लाइक ठोंक भी देंगे तो क्या होगा ?खोई हुई भैंसें यदि पकड़ में आकर फ़िर से पगुराने लगती हैं तो ऐसे लोगों को सुधारने के लिए भी चारा डाल दिया जायेगा।बस,अब चारे का ही एक्स्ट्रा खर्च होगा।भैंस और सरकार तो अपनी जगह पर ही कायम रहेगी।
सोशल मीडिया पर लिखने को लेकर भी कुछ लोग चकराए हुए हैं।उन्हें लगता है कि उनके हाथ में लट्ठ पकड़ा दिया गया है कि वे चाहें जिस दिशा में उसे भांज सकते हैं।यह सरासर गलत है।एक धारा खत्म हुई है,पुलिसिया विचारधारा नहीं।कोई कितने ही लट्ठ घुमा ले,आखिरी लट्ठ उसी का बजेगा।व्यवस्था को बिगाड़ने का काम आम आदमी के हाथ में कभी नहीं आएगा।इसके लिए पहले से ही कई लोग जुटे हुए हैं।नए नियम से उनके इस पुश्तैनी धंधे पर किसी तरह की कोई आँच नहीं आई है।फ़िर भी अगर आप इंटरनेट की आज़ादी के नाम पर ज़श्न मनाना चाहते हैं तो मनाएं,हमारे पारंपरिक लोकतंत्र को इससे क्या फर्क पड़ने वाला !


मंगलवार, 24 मार्च 2015

तुम मन की बात सुनो !

तुम किसी भ्रम या भुलावे में न रहो।तुम्हारे असली हमदर्द हमीं हैं।हम ‘मन की बात’ करते हैं और वो तुम्हारे तन की।मन हमेशा अच्छा सोचता है।भूखे पेट होने पर तन भले ही अकड़ जाए पर लड्डू मन में ही फूटते हैं।इसलिए मन की सुनो।जो मन से सुखी है,उसको तन और धन की चिंता सताती भी नहीं।हम तो चाहते हैं कि तुम सब कुछ हमें सौंपकर चिंतामुक्त हो जाओ।यही हमारा संदेश है।एक-एक कर सबको समझा रहे हैं,धीरे-धीरे तुम भी समझ जाओगे।दूसरों के बहकावे में न आओ।हमने वर्षों पुरानी उनकी ज़मीन छीन ली है,इसलिए उनको तकलीफ हो रही है।थोड़े दिन बाद तुम्हारी तरह वो भी एडजस्ट कर लेंगे।

विरोधियों को आधार चाहिए,वे इसके लिए जूझ रहे हैं।हम तुम्हें भी ‘आधार’ देंगे पर उनकी लड़ाई में तुम मत जूझो।जल्द ही इससे तुम्हारी पहचान पुख्ता हो जाएगी।ज़मीन का क्या है,आज इसकी कल उसकी।ज़मीन रहेगी तो फ़सल की सुरक्षा हर समय खतरे में रहेगी।सूखा,बाढ़ या ओलावृष्टि होने पर तुम्हें फिर हमारी ही शरण में आना पड़ेगा।तो पहले ही क्यों न समर्पित हो जाओ ? तुम्हें वह सब सुख मिलेगा,जो इस सोंधी मिटटी ने तुम्हें नहीं दिया है।माटी-कचरे में डूबने के तुम्हारे दिन गए।देखो मैंने तुम्हारे लिए ‘मेक इन इंडिया’ से नया खिलौना बनवाया है।तुम इस घोड़े पर सवारी करो,पर लगाम हमारे हाथ में रहेगी।तुम अपनी बैलगाड़ी को हमारी बुलेट ट्रेन से रिप्लेस कर लो।यह रास्ते में बिना थके-ठिठके अपने गंतव्य तक पहुँचेगी।हाँ,बैलों की चारा-सानी के लिए जैसे नांद की ज़रूरत होती है,वैसे ही हमें तुम्हारी ज़मीन का रकबा चाहिए।हम इसमें तुम्हें मुँह मारने से तब तक नहीं रोकेंगे,जब तक तुम ‘मन की बात’ सुनते रहोगे।
हम अपने लिए कुछ भी नहीं कर रहे हैं।हमें तुम्हारे लिए सब करना है पर चूंकि तुम नादान हो,इसलिए तुम्हारा हित वही है,जो हम समझते हैं।तुम हल जोतना,बीज रोपना और खेत सींचने जैसे झंझटों से ऊपर उठ जाओ।सोशल मीडिया पर आओ और देखो,हमने कैसी दीवार खड़ी कर दी है।’विकास’ को अब खेत-खलिहानों में मत निहारो,यहाँ देखो।हमारे लाखों फ़ॉलोवर्स हैं,जो सोशल मीडिया को लगातार सींच रहे हैं।नई फसलें यहीं उगा करेंगी और यहाँ की बातों से ही तुम्हारा पेट भरेगा।इसलिए हल,कुदाल,खुरपी ज़मीन सब कुछ छोड़-छाड़कर हमारे पीछे आ जाओ,फ़ॉलोवर बन जाओ,खुश रहोगे।

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

प्रेम का हुक शॉट !

उन्होंने ‘माय लव’ को हुक करते हुए ज़ोरदार शॉट मारा और वह सीधा बाउंड्री-लाइन के बाहर पहुँच गया।यह शॉट जिसे भेजा गया था,उसने उसे बाद में पकड़ा,संसार की दर्शक-दीर्घा में बैठे निठल्ले लोगों ने पहले लपका।दनादन ट्वीट पर ट्वीट निछावर हुए और मीडिया को एक बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ मिल गई।दूसरी ओर से भी ‘थैंक यू’ का ट्वीट लहराता हुआ चला और खिलाड़ी की झोली में समा गया।इसे भी साँस साधे लोगों ने देखा और उनकी जान में जान आई।इस तरह एक प्रेम-कथा का सार्वजनिक-अभिनन्दन किया गया और प्रेम सेलेबल होकर धन्य हुआ।प्रेम अब मॉडर्न सेलेब्रिटी है।


एक बार बचपन में हमने भी प्रेम करने की गुस्ताखी की थी।ज्यादा कुछ नहीं ,बस क्लास में साथ पढ़ने वाली एक लड़की के बस्ते में एक छोटी-सी पर्ची डाल दी थी।हमारे ही कुछ ख़ास साथियों की मेहरबानी से मास्टरजी तक बात पहुंची और हमारे प्रेम को सरेआम छड़ी से नवाज़ा गया।यह प्रक्रिया दसियों बार रि-ट्वीट की तर्ज़ पर रिपीट की गई थी।इस तरह मेरा बिना रेटिंग वाला लो-ग्रेड का प्रेम थर्ड-ग्रेड की पिटाई तक पहुँच लिया।खानदान और जान-पहचान के लोग मुझे ऐसी नज़रों से देखते,जैसे मैंने गौ-हत्या जैसा पाप कर लिया हो।

आज प्रेम को ‘माय लव’ से ‘थैंक यू’ तक का ऐतिहासिक सफ़र करते देखकर मन बहुत उल्लसित है।कहीं तो है जो प्रेम को बिना कबूतर के पंख मिल गए हैं।कभी हमारे फ़िल्मी नायकों ने भी प्रेम के लिए कबूतरों को अनुबंधित कर लिया था।अब तो बस ट्विटर पर एक खाता खोलो और प्रेम को दनादन ट्वीट-रि-ट्वीट करते रहो।ना किसी लुका-छिपी का डर है और ना ही संदेश के बैकफायर करने का।प्रेम जब ऐसी उच्चता प्राप्त कर लेता है तो वह पार्कों में पिटता नहीं है बल्कि हमारे आपके ड्राइंग रूम से टीवी की लम्बी बहसों में पसर कर हिट हो जाता है।यह प्रेम का ग्लोबलीकरण है।जिस चीज़ के पीछे बाज़ार हो जाता है,वैसे भी वह सभ्य और सामाजिक ट्रेडमार्क बन जाता है।इस मायने में अब बाजार ही हमारा सच्चा समाज है,खेल,सिनेमा और मीडिया तो महज अदने-से औजार।

किसी को ‘माय लव’ मिला और किसी को ‘थैंक यू’,पर हमें घर बैठे बाराती बनने का जो असीम सुख मिला है,हम तो उसी से लहालोट हैं।

बुधवार, 18 मार्च 2015

यू-टर्न का मौसम !

अभी तक मौसम को देखकर नेता ही रंग बदलते रहे हैं पर अब इधर मौसम ने भी पलटवार कर दिया है।वसंत ऋतु में ओलों के साथ जमकर बारिश हो रही है।उसने भी नेताओं की तरह यू-टर्न ले लिया है।नेताओं के ‘अच्छे दिन’ यदि जुमले में बदल सकते हैं और 'इंसान का इंसान से भाईचारा’ गहरी साजिश में कन्वर्ट हो सकता है तो गुनगुनाहट भरे इस मौसम में ओले क्यों नहीं बरस सकते ?नेता जहाँ अपनी सेहत सुधारने के लिए योगासन कर रहे हैं,वहीँ यह मौसम  किसानों को शीर्षासन करा रहा है ।इसमें भी ख़ास बात यह है कि यह इलज़ाम किसी नेता के सर नहीं रहा।

अपने ‘नसीब’ को जनता अभी ठीक से कैश भी नहीं कर पाई थी कि उसके मुकद्दर ने अचानक पलटा खाया है।कुछ समय पहले पेट्रोल-डीज़ल पानी के भाव हो गया था,अब वही पानी आफ़त बनकर उसकी फसलों पर टूट पड़ा है।यह कुछ नहीं बस बेचारे ’नसीब’ का यू-टर्न भर है जो अब ‘बदनसीब’ बन चुका है।इसके लिए कोई दोषी है तो सिर्फ ऊपरवाला।हमारे नेता तो अपना काम पारंपरिक ढंग से पिछले सड़सठ सालों से बखूबी कर ही कर रहे हैं।यह तो मौसम है,जो पलटकर बेईमान हुआ जा रहा है,जबकि पलटी मारने पर अभी तक नेताओं का ही एकाधिकार रहा है।

किसानों की फ़सल बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से चौपट हो गई है पर यह देश के लिए चिंता की बात नहीं है।उसकी खाल इतनी सूख चुकी है कि अब उसमें सर्दी-गर्मी-बारिश का कोई असर नहीं होता।दूसरी तरफ नेताओं की अपनी फसल पर कभी कोई गाज भी नहीं गिरती।वे आपदा-प्रूफ होते हैं।ऐसी घटनाएँ उनके लिए ‘अवसर’ की तरह होती हैं।अगर कभी उन पर किसी आफत की आशंका हुई भी तो वे उससे बचने के लिए ज़रूरी अनुलोम-विलोम कर लेते हैं।प्रकृति उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है क्योंकि वे प्राकृतिक-चिकित्सा करवाने में माहिर होते हैं।किसान नादान है।उसे एकदम से पलटना नहीं आता।कभी उसने यू-टर्न लिया भी तो उसकी किस्मत में ऐसा सिक्का है,जो दोनों तरफ से यक-सा होता है।उसके लिए नेता और भगवान सिक्के के ऐसे पहलू हैं,जिनके गुणधर्म समान हैं।अबकी बार राजनीति और मौसम ने कम से कम यही संकेत दिया है।

पिछले कुछ समय से देश की राजनीति बदल रही है।हमें भी मौसम के बदल जाने के लिए तैयार रहना चाहिए।शांतिकाल में हथगोले और बेमौसम के ओले अब हमारी दिनचर्या में शामिल हो चुके हैं।मौसम और राजनीति की इस जुगलबंदी ने जहाँ नेताओं को फुल-प्रूफ़ बना दिया है,वहीँ किसान अभी भी 'फूल' बना हुआ है। उसकी पहचान के लिए अभी भी एक अदद ‘आधार’ की ज़रूरत है।वह जिस आधार पर खड़ा है,उसकी ज़मीन बहुत कमजोर है।इसलिए उसके बचने के लिए कई तरह के ‘बिल’ तलाशे जा रहे हैं।कोशिश की जा रही है कि किसान जमींदोज़ होने से पहले सुरक्षित ‘बिल’ में घुस जाय।खुले में रहना न उसकी और ना ही नेताओं की सेहत के लिए ठीक है।आजकल जो भी हो रहा है,उसमें  जनता की 'किस्मत' का दोष है,राजनीति और मौसम तो अपनी प्रकृति के अनुरूप ही कार्य कर रहे हैं।

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

हमारा गठबंधन राष्ट्र-हित में है !

हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि जो लोग काश्मीर में हमारे गठबंधन की पवित्रता पर प्रश्न उठा रहे हैं,उनमें राष्ट्र-हित की रत्ती-भर भी समझ नहीं है।हमारे लिए राष्ट्र-हित सबसे बढ़कर है,इसीलिए हमने इसे लपक कर पकड़ा है।हम गठबंधन-धर्म की महत्ता और उसकी शुचिता को बचाए रखने के लिए सदैव प्रतिबद्ध रहे हैं।हम यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह गठबंधन कोई सात फेरों या सात जन्मों वाला नहीं है।हम तो डल झील की सैर पर नौका-विहार कर रहे हैं.इस नौका से कभी-भी,किसी को भी छलाँग लगाकर कूद जाने का विकल्प उपलब्ध है,इसलिए नैतिक बन्धनों के खूँटे से बँधने का प्रश्न ही नहीं है।हम खुले दिल से,गले लग-लग कर मिले हैं,ऐसे में उनका हमारे गले पड़ना नितांत मिथ्या प्रचार है।

काश्मीर में हमने अपने लिए सरकार बनाई ही नहीं है इसलिए यह हमारी सरकार है ही नहीं ।वहाँ की जनता ने ‘बाप-बेटी’ के बजाय मौसेरे भाइयों की सरकार बनने का स्पष्ट जनादेश दिया है ।हम उसका पूर्ण सम्मान करते हैं।हमने जनता की इसी भावना को ध्यान में रखते हुए वर्षों पुरानी अपनी धारा को डल झील में समाहित कर दिया तथा राष्ट्रवाद को डूबने से बचाने के लिए उसे किनारे धर दिया है।हमारे दिल भले न मिल रहे हों पर सत्ता के लिए दलों को आपस में मिलाने में हमने कोई परहेज नहीं किया है।राष्ट्र के प्रति यह हमारी पूर्ण निष्ठा का परिचायक है।इससे कम में हम कभी कोई समझौता नहीं कर सकते हैं,यह हम आपको पूर्ण आश्वस्त करते हैं।

कुछ लोग यह आरोप लगा रहे हैं कि हम मुफ़्ती साहब से मिले हुए हैं तो हम यह भी स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि पिछले तीन वर्षों से हम आपस में कभी मिले ही नहीं।इस तथ्य को कोई भी एजेंसी सत्यापित कर सकती है।हम बिना किसी से मिले हुए भी किस तरह उसमें मिल सकते हैं,यह हमने एक अनुकरणीय दृष्टान्त प्रस्तुत किया है।हमारा गठबंधन पूर्णतः वाई-फाई है,इसे हवा-हवाई बनाने के किसी भी प्रयास का हम विरोध करते हैं।हम कार्य करने वाले लोग हैं।बहुत दिनों से खाली बैठे थे,इसे पूरा करके ही दम लेंगे।यह हमारा राष्ट्रीय-निश्चय है।हमारे और मुफ़्ती साहब के दरम्यान मुफ्त में कोई न पड़े।हमने काश्मीर से परिवारवाद समाप्त कर दिया है,अब वहां आतंकवादियों को मुक्त करके आतंकवाद का समूल नाश करने में जुटे हैं।कृपया राष्ट्र-हित में धैर्य बनाए रखें।

रविवार, 8 मार्च 2015

मुफ्तखोरी बनाम बाजीगरी

लो जी,हमने अपना वादा पूरा किया.

क्या ख़ाक पूरा किया है ? वादा वही जो पूरा न किया जाय.

लेकिन हमने तो वह किया जो कहा.यही तो ईमानदारी है.

जी नहीं यह ईमानदारी नहीं बाजीगरी है.बात तो तब है कि जो कहा जाये उसके उलट किया जाय और किया वही जाय,जिसके उलट कभी कहा हो.

पर यह तो जनता के साथ धोखा है.जनमत का सरासर अपमान है.

नहीं,बिलकुल नहीं.370 हो या 70 में 3 कम,हम अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करते.चाहे महाराष्ट्र हो या जम्मू-कश्मीर,हम बड़े लचीले हैं और हमारे पार्टनर बहुत मज़बूत.एक ‘आप’ हैं जो ‘मुफ्तखोरी’ से टांका भिड़ाये हैं.

हम तो जनता को बिजली-पानी मुफ्त में दे रहे हैं पर तुम तो सबका पेट भरने वाली ज़मीन ही हथियाने में लगे हो ?

देखिए,विकास-विरोधी नजरिया है यह.हम किसी दामाद को ज़मीन देने के खिलाफ़ हैं इसीलिए हम चाहते हैं कि बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ इसे ले जाँय और विकास पैदा करें.

मगर चुनाव से पहले तो आप किसानों के हमदर्द थे.अब ऐसा क्या हो गया ?

हमदर्द तो हम अब भी हैं पर धनिया-पुदीना उगाने वालों के सहारे देश आगे नहीं बढेगा.उसके लिए तो तेल निकालने वाली कम्पनियाँ ही सक्षम हैं.वे कायदे से सबका तेल निकालेंगी.बहुमत हमारे साथ है.

हमारे पल-पल का हिसाब लेने वाले अब नौ महीने का हिसाब क्यों नहीं देते ?

लिखो...देश की सबसे बड़ी समस्या ‘काला-धन’ जुमला बन गई,किसानों के बिना कहे उनका हित किया जा रहा है,राम-मंदिर के साथ धारा 370 को गंगा-स्नान करा दिया गया है.इससे गंगा भी शुद्ध होगी.भूखे पेट में कुछ जाए,इसके लिए ‘मन की बात’ का नियमित संचार किया जा रहा है.भूले-भटकों की घर-वापसी कराई जा रही है.साथ ही कई अध्यादेश लाये गए हैं जो देश का नक्शा बदल देंगे.

पर यह सब तो घोषणा-पत्र में कहीं नहीं था ?

हमने पहले ही कहा है कि हम जो करते हैं,वही हमारा घोषणा-पत्र होता है.घोषणा-पत्र में किये गए वादे चुनावी होते हैं जो चुनाव के साथ ही हवा हो जाते हैं.आप ने गलत मिसाल पेश की है.राजनीति ऐसे थोड़ी ना चलेगी.
सब मिले हुए हैं जी.हम भी देखते हैं कि इस खिचड़ी में मिलने का हमारा कितना स्कोप है ?बाजीगरी करनी केवल तुम्हें ही नहीं आती.

गुरुवार, 5 मार्च 2015

उनकी कैंटीन और हमारी कटिंग वाली चाय !

शाम को ढाबे के पास पंचम काका मिल गए।तरकारी और पूड़ी दाब चुके थे,हमें देखकर पास आ गए।कहने लगे-बच्चा,भूख लगी होय तो थोड़ा खा लियो।हियाँ खाना बहुतै सस्ता है।तीस रुपय्या में दू ठो पूरी और आलू-टमाटर की सब्जी मिलत है,साथ मा अचार फिरी है।हमने मना करते हुए कहा-नहीं काका,मैं तो कैंटीन से खाकर आ रहा हूँ।आप बहुत दिन बाद मिले हैं,बताइए क्या चल रहा है ?
काका कैंटीन का नाम सुनकर ही चौंक पड़े।कहने लगे-हाँ बच्चा,ई कैंटीन का मसला का हवै ? रेडियो मा खबर सुनी रहै कि हमरे परधानमंतरी जी उहाँ जीमत रहे।सुनत हैं कि टोटल उनतीस रुपय्या मा पूरी थाली मिली रहै।वहिमा दू तरह की दाल,तीन तरह कै तरकारी,मिठाई,खूब सारा सलाद और पापड़ भी।’ हमने उनकी जिज्ञासा को शांत करते हुए कहा-काका,हम उस कैंटीन से खाकर नहीं आए हैं।हमारी कैंटीन में वही थाली एक सौ पचास रूपये की है।आप जिस कैंटीन की बात कर रहे हैं,वह आम आदमी के लिए नहीं है।वैसी थाली पाने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं।ऐसी भरी-पूरी थाली पाने के लिए नोट नहीं वोट बटोरने की ज़रूरत होती है।’
काका फिर भी बात को समझ नहीं पा रहे थे,बोलने लगे-जो फसल हम उगावत हैं,वो थाली मा पककर इतनी मँहगी कइसे होइ जात हवै ? फिर ऐसी कैंटीन तो हम लोगन के लिए भी खुला चाही।काम-काज के बाद अगर भूख लागे तो हम भी पेट भर खा सकें।हम परिवार सहित ढाबे मा खाएं तो एक दिन भी गुजारा न होए।ई पेसल   वाली कैंटीन सबके लिए काहे नहीं खोली जाती बच्चा ?’
हमने उनके कंधे पर हाथ धरते हुए समझाने की कोशिश की-आप नाहक परेशान हो रहे हैं।हमारे देश में राजा और प्रजा के लिए अलग-अलग नियम हैं।वो सड़क किनारे,झोपडी में या कैंटीन में शौक के लिए आते हैं,खाने के लिए नहीं।वो हमारी तरह भूखे भी नहीं होते।उनके पेट का दायरा हमारे-आपके खेत-खलिहान-रसोई से कहीं बड़ा होता है काका।फ़िर उनकी यह मजबूरी है।वो अपने लिए नहीं देश के लिए खाते हैं,इसीलिए देश भर में खाते हैं।’

पता नहीं,काका हमारी बात समझे कि नहीं पर इतना सुनकर उन्होंने कटिंग वाली चाय का ऑर्डर दिया और हम दोनों चाय सुड़कने लगे।

बुधवार, 4 मार्च 2015

अपना खयाल रखना.....!

गज़ब उलटबाँसी है।इधर फागुन में सावन बरस रहा है और उधर बजट के बाद रोने के लिए आम आदमी एक कंधे को तरस रहा है।सरकार ने बिलकुल साफ़ कह दिया है कि वह अपना ख़याल खुद रखे।वह चाहे तो अच्छे दिनों की छतरी लगाकर इस बेमौसम की बारिश में नाच सकता है।उसे अपना ख्याल रखने को इसलिए भी कहा गया है क्योंकि वह अब कोई बच्चा नहीं रहा,बड़ा हो गया है।कहा जाता है कि आम आदमी हाल-फ़िलहाल तक मध्य वर्ग में ही शुमार होता था पर जबसे दिल्ली में ‘आम आदमी’ की सरकार बनी है,वह ख़ास हो गया है।जिस आम आदमी ने अपने ‘विकास’ को नज़र-अंदाज़ करते हुए दिल्ली में अराजकता का साथ दिया,पूरे देश से उसका बोरिया-बिस्तर गोल करना ज़रूरी था।यानी मध्य वर्ग को ‘आम आदमी’ होने का इनाम मिला है।किसी ज़र्जर बस में बैठी हुई सवारी ’अपने सामान की रक्षा स्वयं करें’ की तर्ज़ पर वह ‘अपना ख्याल खुद रखने वाला’ अब एक आत्म-निर्भर तबका बन चुका है।
सरकार ने ‘मिडिल क्लास’ को उसके हाल पर यूं ही नहीं छोड़ा है।यह वही ‘कैटल क्लास’ है,जो चुनावों में झुंड बनाकर उसे वोट देने आया था।उसके वोट की स्याही इतनी भी चटख नहीं होती कि वह पाँच साल तक चले।वोट से केवल सरकार बनती है पर चलने के लिए तो नोट चाहिए और इस काम के लिए ‘मिडिल क्लास’ की नहीं ‘मिडिल मैन’ की ज़रूरत होती है।यह बात अगर कोई नहीं समझता तो यह उसकी नादानी है।कुछ सिरफिरे फिर भी कह रहे हैं कि सरकार को जिस ‘मध्य वर्ग’ ने वोट दिया है,उसे उसका ख़याल पहले रखना चाहिए पर सरकार तो समझदार ठहरी ।उसे बखूबी पता है कि मिडिल क्लास के वोट और कार्पोरेट के नोट को कब और कहाँ निवेश करना है।सबसे पहले चुनाव के समय खाली हुए सूटकेस भरे जायेंगे,फिर ’मनरेगा’ के गड्ढे।ये गड्ढे भी तब तक नहीं भरेंगे,जब तक तेल और कोयले की सारी खदानें खुद नहीं जातीं !


वैसे भी इस देश के मिडिल-क्लास का हाजमा बहुत मज़बूत है।घर से लेकर कार्यालय तक उसे रोज इतने अधिक ख़याल रखने पड़ते हैं कि सरकार के इस छोटे-से आह्वान को पूरा करने के लिए उसे किसी अतिरिक्त श्रम की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।जिस दिन देश का इतना बड़ा वर्ग बिना किसी सरकार के अपना ख़याल रखना शुरू कर देगा,सरकारें बेरोजगार हो जाएँगी।बस देखने वाली बात यह है कि चुनाव के समय यही मिडिल-क्लास अपनी मध्यमा उँगली का क्या और कैसे इस्तेमाल करता है ?