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बुधवार, 27 मार्च 2013

यूपीए का होली-मिलन !

27/03/2013 को जनसन्देश में !

यूपीए अध्यक्ष सोनिया जी ने अपने आवास पर होली-मिलन का कार्यक्रम रखा तो बड़ी संख्या में उनके सहयोगी शामिल हुए। इसमें वे भी लोग शामिल हुए जो कभी सरकार के अंदर रहे या बाहर से अपना हाथ हिलाते-मिलाते रहे। जो हाल-फ़िलहाल इस सरकार से अपना हाथ छुड़ाकर भागे हैं वे भी आये। सोनिया जी ने सोचा होगा कि सरकार को समर्थन देते या वापस लेते उनके हाथ थक गए होंगे,सो होली-मिलन के बहाने उन हाथों में पिचकारी थमा दी जाय। अगले साल इस तरह होली-मिलन का मौका मिले न मिले,इसलिए भी यह आयोजन ज़रूरी था। सत्ता और सरकार से जुड़े पत्रकार होने के नाते हमें भी न्योता आया था इसलिए हम भी मिलन-स्थल पर पहुँच गए।
हम जैसे ही मुख्य-द्वार पर पहुँचे,अगल-बगल तारकोल से भरे दो ड्रम दिखाई दिए। हमने इन ड्रमों के बारे में वहाँ तैनात कार्यकर्ताओं से बात की तो पता चला कि यह आपातकालीन सेवा है और पत्रकारों के लिए इससे डरने की ज़रूरत नहीं है। ये काले ड्रम केवल सहयोगी दलों की सेवा के लिए हैं। इसका प्रयोग अंदर जाने वालों पर नहीं होता है। अगर कोई अचानक बाहर निकलने की कोशिश करेगा तो ये स्वतः खुल जायेंगे और उसका मुँह और कोई रंग लगाने लायक नहीं बचेगा । हमें आभास हुआ कि दरवाजे पर कई आँखें होली खेलने के मूड में बेकरार बैठी हैं। हम जल्दी से मिलन-स्थल की तरफ़ रवाना हो गए।
अंदर का माहौल बड़ा खुशनुमा था। एक बड़े से पंडाल के नीचे दरी बिछा दी गई थी। कुछ कुर्सियां भी पड़ी थीं पर होली खेलने में उन्हें थोड़ा परेशानी हो रही थी । कुछ नेता गज़ब के होशियार थे जो कुरता-धोती पहनकर आए थे। इससे उन्हें जगह बदलने में तनिक भी कष्ट नहीं हो रहा था। वे कुर्सी और दरी दोनों जगह अपने को आराम से एडजस्ट कर रहे थे। होली-मिलन का औपचारिक कार्यक्रम शुरू होता कि उसके पहले ही एक बखेड़ा खड़ा हो गया।
पता नहीं कहाँ से बेनी बाबू आए और नेताजी की बाल्टी का रंग उन्हीं के ऊपर उड़ेल दिया। नेता जी इस हरकत से एकदम हरे हो गए। उनकी बाल्टी में भरा हरा रंग उन्हीं पर डाल देने से हडकंप मच गया। उन्हें लगा कि कि अब उनकी होली का क्या होगा ?उनके पास एक ही रंग था,जिसे उनके ही पुराने चेले ने चौपट कर दिया। नेता जी ने बेनी बाबू पर अपना पहलवानी दाँव आजमाया और वो दरी पर धड़ाम हो गए। इतने में हो-हल्ला सुनकर सोनिया जी आ गईं ।उन्होंने नेता जी से हाथ जोड़कर बेनी बाबू की गलती पर अफ़सोस जताया। नेता जी थोड़ा मुलायम हुए तो बेनी बाबू ने उनके कान में फुसफुसाकर कहा कि मैडम के हाथ जोड़ने का गलत अर्थ मत लगा लेना। उन्होंने आपको समझाया है कि अगर आप हमारे साथ होली नहीं खेलेंगे तो आपके हाथ ऐसे ही बंध जायेंगे। नेता जी कुछ समझ पाते कि सोनिया जी ने होली-मिलन की औपचारिक घोषणा कर दी।

ममता और करुणा अपनी खाली पिचकारियाँ लिए खड़े थे। सोनिया जी ने उन पर थोड़ा अबीर-गुलाल उड़ाया पर उन दोनों का ध्यान पास में रखी रंग से भरी बाल्टी पर था। इस बाल्टी से नेताजी और बहिन जी अपनी लंबी पिचकारी से रंग निकालने लगे। इसी बीच दरवाजे के बाहर खड़े कुछ लोग उनके पास आए और कान में कुछ बोल गए। फ़िर क्या था,नेता जी और बहिन जी ने सोनिया जी से गले मिल-मिलकर खूब होली मनाई,गुझिया खाई। वे दोनों अब दरवाजे की ओर देख भी नहीं रहे थे। हम वहीँ दरी पर बैठकर भांग घोलने लगे ।इसके बाद वहाँ क्या हुआ कुछ पता नहीं।






शुक्रवार, 22 मार्च 2013

हाथ,सीबीआई और होली !

 
22/03/2013 को नई दुनिया में

अगर आप हाथ के साथ नहीं हैं तो सीबीआई का हाथ आपके पास पहुँचाने की हमारी जिम्मेदारी है।यह हमारा राष्ट्रीय-कर्म और नैतिक-धर्म है कि हम हर हाल में आपकी सेवा अपने हाथों करें।हमारी सरकार ने शुरुआत से ही यह सुनिश्चित कर रखा है कि किसी भी आपदा से निपटने का वैकल्पिक-तंत्र तैयार रहे,ताकि बदलते समय के साथ हमारी स्थिति न बदले।ऐसी आपदा यदि सरकार के ऊपर आती है तभी हमारा आपदा-प्रबंधन तंत्र काम करता है,न कि आम आदमी के ऊपर आने पर।इतने दिनों के सेवा-काल से हमें यह अनुभव बखूबी हासिल हो गया है कि कब किस पर मुलायम होना है और किस पर कठोर !

कुछ लोगों को ग़लतफ़हमी है कि डीएमके के हाथ हटाने से सरकार का हाथ कमज़ोर हो गया है ।दरअसल ,यदि किसी का हाथ मज़बूत है तो वह हमारा ही है।इसने अतीत में कई उपलब्धियां अर्जित की हैं और इसका प्रभाव सरकार के सहयोगी दलों और आम आदमी पर समभाव से पड़ता है।सहयोगियों को सीबीआई की सेवा की इतनी आदत पड़ चुकी है कि वे इसके अलावा और किसी सेवा से मानने को तैयार ही नहीं होते।रही बात आम आदमी की, तो हमारा हाथ उसकी जेब और गर्दन पर सुविधानुसार शिफ्ट होता रहता है।चुनाव के समय वह बेचारा जाति-धर्म के मायाजाल में पड़कर सब-कुछ भूल जाता है।इसमें सभी दलों का बराबर का हाथ होता है।

अभी जैसे ही डीएमके ने अपने हाथ को सरकाया,सीबीआई ने अपने हाथ से उसकी एक फाइल सरका दी।हम यहाँ स्पष्ट कर देते हैं कि सीबीआई को हम इस बारे में कोई निर्देश नहीं देते।वह हमारे देश की बहुत चौकन्नी सुरक्षा-एजेंसी है।उसे जब भी लगता है कि सरकार की सुरक्षा के साथ कोई खिलवाड़ करने की कोशिश करता है ,वह अपने-आप सक्रिय-मोड में आ जाती है।अब उसके काम में दखल न देने के वचन से बंधे होने के कारण हम भी कुछ कर नहीं पाते।इस बात को सबसे ज्यादा हमारे चिर-सहयोगी माया और मुलायम जानते हैं।वे सरकार के हाथ को माँगे-बिना माँगे,अंदर-बाहर से,जहाँ से भी संभव होता है,पकड़े रहते हैं।

सरकार के गिरने की मनौती मनाने वालों को खुश होने की ज़रूरत नहीं है।सरकार के ममता-रहित हो जाने पर भी आम आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ा,सो करुणा-रहित होने पर भी नहीं होगा।मुलायम के कठोर होने पर हमारा हाथ कुछ नहीं करेगा,बस,सीबीआई अपने बंधे हाथ खोल देगी।इस बात को माया से बेहतर कोई नहीं जानता।अकूत संपत्ति की रक्षा करने वाले हाथ का कमज़ोर होना ठीक नहीं है इसलिए इसकी मजबूती की चिंता हमसे ज़्यादा दूसरों को है।सरकार के प्रति कठोर होने वाले इसलिए जल्द ही मुलायम हो जाते हैं।

कुछ लोग यह अफ़वाह फैला रहे हैं कि डीएमके के अध्यक्ष ने अपनी बेटी को जेल भिजवाने का बदला हमसे लिया है,पर यह सरासर गप्प है।हम इसे महज होली की ठिठोली मानकर चलते हैं।हो सकता है ,इसी प्रकार स्टालिन के पास सीबीआई का पहुंचना भी महज़ होली का मजाक सिद्ध हो।अब यह हमारे सभी सहयोगियों पर निर्भर है कि वे होली के मूड में हमारे हाथ से अपने मुँह में कालिख पोतवाना पसंद करते हैं या सीबीआई के द्वारा रंगे-हाथ होली खेलना ?

 

बुधवार, 20 मार्च 2013

मुड़-मुड़ के ना देख !

२१/०३/२०१३ को 'नैशनल दुनिया' में !

हम सरकार के ताज़ा कानून से सख्त नाराज़ हैं।उसने हम प्रेमियों से भरे-फागुन बदला लिया है।अब यह भी कोई बात हुई कि जो हमें खूबसूरत लगे उसे भर नज़र देख भी न सकें ! हम जैसे सीधे-सादे और निर्मल-जनों लिए यह कानून बहुत बड़ी आफत है।इसमें किसी की सुंदरता को हमें प्रशंसित करने से भी रोका जा रहा है।सरकार छेड़खानी और  अमानवीय-कृत्य करने वालों पर तो लगाम लगा नहीं पा रही है।उसे सबसे सॉफ्ट-टारगेट हम जैसे अहिंसक,शांति-प्रेमी और मूक-दीवाने ही मिले हैं।

अब अगर हमने किसी को मुड़-मुड़ कर देख लिया तो हमारा गंतव्य अचानक जेल की तरफ़ मुड़ जायेगा।इससे बचने के लिए यदि हम छुप-छुपकर देखते हैं तो उसकी निजता-हनन के चक्कर में अंदर चले जायेंगे या कोई हमें आतंकवादी समझकर पुलिस के हवाले कर देगा।यदि किसी तरह हिम्मत करके हम सामने आ भी गए और उसे सामने से घूरा तो कहीं ज़्यादा तेजी से हवालात की तरफ़ भागेंगे।यही नहीं अगर गलती से हमारी काया का स्पर्श हो गया तो और मारे गए।इस तरह हमारे लिए यह बहुत तकनीकी मसला भी बन गया है।ऐसी कोई तकनीक नहीं छोड़ी गई है जिसके सहारे हम लहालोट हो सकें।

सबसे बड़ी परेशानी हमें इस बात को लेकर है कि अब साहित्य-रचना भी मुश्किल हो जायेगी।खूबसूरती को परवान चढ़ाने वाले नगमों से सभी ग्रन्थ भरे पड़े हैं।यह सब बड़े अनुभव और शोध के बाद लिखा गया है।हमारी शेरो-शायरी विधा तो इस तरह के क़दमों से विलुप्त ही हो जायेगी।कानून बनाने वालों को यह नहीं समझ आता कि रोमांटिक शायरी केवल टेबल पर बैठकर नहीं लिखी जा सकती है।कई फ़िल्मी-मुखड़े जो अभी तक हम गुनगुना रहे हैं,उनका क्या होगा ?सोचिये ‘मुड़- मुड़ के न देख , मुड़- मुड़ के ‘ गाने को सुनते हुए हम बड़े हुए और सुनने वालों को कभी शिकायत भी न हुई।इसको सुनते हुए भी हम यही समझते रहे कि कहने वाले का इरादा हमें  मुड़कर देखने से मना करने का नहीं है।हम इसे महज़ आपसी ठिठोली ही समझते रहे और अब यह अच्छा-खासा जुर्म बन गया है।

हम सरकार की परेशानी समझ सकते हैं।वह हर बात में सहमति चाहती है।इसलिए यह कहा जा रहा है कि अगर कुछ भी सहमति से हो तो कोई जुर्म नहीं है।इसके लिए हम कलम और कागज़ साथ रखेंगे और जिसको देखना होगा उसकी अनुमति मांगेंगे कि यदि देखने से उसे कोई एतराज़ न हो तो हम अपनी सौंदर्य-प्यास बुझा लें।साथ में हम यह भी लिख सकते हैं कि हम कोई पेशेवर-घूरक नहीं हैं,इसी बहाने थोड़ी-बहुत शायरी कर लेंगे।यदि सहमति मिलती है तो हम चाहेंगे कि वह लिखित में हो क्योंकि पता नहीं कब उसका मूड बिगड़ जाए और हमें लेने के देने पड़ें । यह भी हो सकता है कि शायर जानकर वो हमें सहमति दे दे पर यदि हमारा लिखित आवेदन उसे नागवार लगा तो फ़िर पुलिस वाले हमें शायरी सुनायेंगे ।

सरकार के द्वारा लाये गए सभी प्रावधानों को हमने गौर से समझ लिया है और इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि शायरी या रचनात्मकता हमें बचा पाने में सक्षम नहीं हो सकती।किसी की खूबसूरती पर पूछकर लिखने से वो मौलिकता और वो भाव नहीं आ सकते जो छुप-छुपकर देखने और चाहने के अनुभव से आते हैं।इसलिए देखना और सोचना बन्द क्योंकि हम जेल में बंद होना फ़िलहाल अफ़ोर्ड नहीं कर सकते।ऐसे में फागुन जितनी जल्दी जाए अच्छा है।
 
२०/०३/२०१३ को जनवाणी में


हमें शांति का नोबेल चाहिए !

20/03/2013 जनसंदेश में





इस समय दुनिया के हम इकलौते शांतिप्रिय देश हैं.हमारी यह शांतिप्रियता कई बार सिद्ध हो चुकी है.यह अलग बात है कि हमारी ऐसी हर कोशिश को हमारा पड़ोसी हमसे ज्यादा साबित करने को प्रतिबद्ध रहता है.हमारे सहिष्णु स्वभाव का सबसे उजला पक्ष यह है कि हमारी संसद और हमारे लोगों पर हमला करने वालों के प्रति भी हम बेहद उदार हो जाते हैं.जिस अफज़ल गुरु ने संसद पर हमले में मुख्य भूमिका निभाई ,उसको भी हमने दस साल का जीवन-विस्तार दिया. हम लोगों के डीएनए में सहिष्णुता और अवसरवादिता के कीटाणु इतने गहरे तक व्याप्त हैं कि कश्मीर के मुख्यमंत्री तक उस के प्रति अन्याय  होने की बात कह चुके हैं।अब यदि हमारे पड़ोसी देश ने अपनी संसद में आतंकवादी के फाँसी लगने पर स्यापा किया है तो इसमें उसका लेशमात्र दोष नहीं है.


इटली के दो अपराधी अपने देश जाकर हमें टिलीलिली कर रहे हैं.इस काम में वहां की सरकार उनके साथ है.वे दोनों हत्या जैसे संगीन जुर्म के आरोपी हैं पर गोरी चमड़ी की जान दुनिया में अभी भी सबसे कीमती है.इसलिए उनके अपराधी नागरिक भी उपयोगी हैं और हम अपने निर्दोष लोगों की रक्षा में असमर्थ हैं.अपने देश के आम आदमी को हर हाल में मरना ही है,इसलिए सरकार के लिए यह चिंता का विषय नहीं है.उसे मंहगाई,भ्रष्टाचार ,बलात्कार या आतंकवाद जैसे किसी न किसी तरीके से मरना ही है,सो उसकी रक्षा करना सरकार के अजेंडे में सबसे नीचे है.


इटली की गुगली से हमारी सरकार को कुछ भी नहीं सूझ रहा है.वह उसके राजदूत को देश से बाहर न जाने देने के लिए प्रयासरत है.हमें लगता है कि यहाँ सरकार गलत कर रही हैछोटी-सी बात के लिए अपनी सार्वजनिक नीति को त्यागना ठीक नहीं है.उसे वहां के राजदूत को उन दोनों को मनाने के लिए भेजना चाहिए ताकि उसे भी अपने देश में सुरक्षित पहुँचने का मौका मिल जाय.इस प्रकरण को हमें अमेरिका से कहकर हल करवाना चाहिए .वह मध्यस्थता करके हमारी कटी नाक को जोड़ने में सक्रिय भूमिका निभा सकता है.इसके लिए हम संयुक्त राष्ट्र भी जा सकते हैं.

अभी हाल में हमारे पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री अजमेर में जियारत करने आये थे.आम आदमी पर शांतिपूर्ण आंदोलनों में लाठी-गोली चलवाने वाली सरकार ने उनका खैर-मकदम किया,दावत दी। हमारी आवभगत का माकूल जवाब उन्होंने अपने देश की संसद में अफज़ल की फांसी पर निंदा-प्रस्ताव पास कर तुरंत दे दिया.हो सकता है कि वे मरहूम के लिए ही दुआ करने अजमेर आये हों.पड़ोसी देश हमारे सैनिकों के सिर क़त्ल करके भले ही हमें उकसाने की कोशिश कर रहा हो पर हमें इस मामले में बिलकुल ठंडे दिमाग से काम करना चाहिए ।ऐसी बातों के हम अभ्यस्त हो चुके हैं.

इटली के अपराधी हमारी इन नीतियों से पूरी तरह वाकिफ थे,पर कसाब ने थोड़ी चूक कर दी.जिस तरह क्रिसमस के मौके पर इटली वालों को जाने दिया गया था,यदि वह ईद पर पाकिस्तान जाने की मांग करता तो हमारी शांति-प्रिय और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का पालन करने वाली सरकार ज़रूर शिष्टता के नाते उसे जाने देती.ऐसी सूरत में कम से कम पाकिस्तान को ईद का तोहफा देकर हम सम्बन्ध सुधारने का प्रयास करते.अब इस मोर्चे पर फेल होने के बाद सौहार्द बढ़ाने के लिए क्रिकेट,हॉकी या बस चलाने वाले परम्परागत तरीके ही बचते हैं.

फिलहाल,हम अपनी शांतिप्रियता के नाते नोबेल पुरस्कार पाने के सबसे बड़े हक़दार हो गए हैं,इसके लिए आम आदमी की शहादत से भी हमें गुरेज़ नहीं है.

  



बुधवार, 13 मार्च 2013

मुआवज़ा चाहिए या लैपटॉप ?

13/03/2013 को जनसंदेश और जनवाणी में !



राजधानी जगह–जगह तोरण द्वारों से पट गई थी।बड़े-बड़े होर्डिंग्स बता रहे थे कि कुछ भी सामान्य नहीं है।पहले तो मुझे शंका हुई कि कहीं यह फागुनी-बयार का असर तो नहीं है पर अखबार में बड़े पन्ने में इश्तहार देखकर समझ में आया कि प्रदेश में नई सरकार एक साल पूरा करने जा रही है ।सरकार ने इस मौके पर ऐतिहासिक कदम उठाते हुए लैपटॉप बांटने का अभियान शुरू किया है।युवा मुख्यमंत्री का उत्साही चेहरा इस पोस्टर में देखते ही बनता था। मेरे मन में आया कि ऐसी अभूतपूर्व उपलब्धि के लिए उनको बधाई दे दूँ,सो मुख्यमंत्री जी के आवास पर गुलदस्ता लेके पहुँच गया।

दरबान ने बिना कुछ पूछे ही सवाल दागा ‘लैपटॉप लेने आए हो कि मुआवजा ? अगर लैपटॉप लेना है तो उसके लिए अपना नंबर लिखवा दो,अभी लाइन लंबी है और अगर मुआवजा लेना है तो लिस्ट हमें दे दो।’ इस तरह के प्रश्न के लिए मैं एकदम से तैयार नहीं था।मैंने अचकचाकर उत्तर दिया,’क्या मतलब? अरे भई ! मैं लैपटॉप लेने या मुआवजे की लिस्ट लेकर नहीं आया हूँ।मैं तो बिना कुछ लिए ही इस सरकार को शुभकामनाएँ देने आया हूँ।’दरबान ने मुझे ऊपर से नीचे तक निहारा और कहा,’फ़िलहाल मुख्यमंत्री जी लैपटॉप और मुआवजे का ही वितरण कर रहे हैं,बहुत व्यस्त हैं।’मैंने अपना परिचय दरबान को दिया तो उसने झट-से कहा,’पहले क्यों नहीं बताया ? वितरण-समारोह की प्रक्रिया पत्रकारों के बिना थोड़ी पूरी होगी।आप बेधड़क जाइये।’

बड़े-से हॉल में दाखिल हुआ तो अंदर जश्न-सा माहौल था।मुख्यमंत्री ने हाथ में कई लिस्टें थाम रखी थीं।मैं उन्हें गुलदस्ता सौंपने ही जा रहा था कि एक अति-सक्रिय कार्यकर्त्ता ने सुरक्षा-कारणों  का हवाला देकर उसे हथिया लिया । मैंने उन्हें मौखिक रूप से ही एक-वर्षीय शुभकामनाएँ दीं ।उनका संकेत पाकर मैं पास वाली सीट पर ही बैठ गया । अपने गुलदस्ते के साथ हुई घटना से आहत हुए बिना मैंने सहज होकर मुख्यमंत्री जी से पूछा,’आप इस एक साल को किस तरह से देखते हैं ?’

मुख्यमंत्री जी ने उत्तर दिया,’यह बहुत ही गंभीर प्रश्न है।हम इस साल के बजाय आगे की ओर देख रहे हैं । इसके बारे में भुक्त-भोगी जनता ही बेहतर उत्तर दे सकती है ।इतने कम समय में ही हमने बड़े-बड़े अनुभव पा लिये हैं । कुम्भ-हादसे की जिम्मेदारी लेते हुए मंत्री से हमने इस्तीफ़ा लिया फ़िर वापस करके अपने आप दामन भी साफ़ कर लिया। पीडितों को मुआवजों के चेक देकर खून के धब्बे बड़ी आसानी से धो लिए।सबसे बड़ी उपलब्धि तो हमें तब मिली जब हत्यारोपी होने पर अपने प्रिय मंत्री को कुर्बान कर दिया ।उसने अपने पद के जाने और ट्रांसफर-पोस्टिंग में मिलने वाले भत्ते के नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा तक नहीं माँगा ।उसे अपने संसाधनों पर पूरा भरोसा है। पीडितों के लिए हमने मुआवजा देने के लिए हाथ खुला छोड़ दिया है ताकि भविष्य में हमें कोई पीड़ा न हो।विपक्षी दल जहाँ झूठ-मूठ का लॉलीपॉप दे रहे हैं,वहीँ हम बेरोज़गारी-भत्ते के बाद लैपटॉप बांट रहे हैं । इससे शिक्षित युवा बेरोजगार नहीं होगा,उसका भी ‘टाइम-पास’ हो जायेगा।’

हमारी बातचीत बीच में ही रुक गई ।एक कार्यकर्त्ता मुआवजे की लेटेस्ट-लिस्ट लेकर हाज़िर था और मुख्यमंत्री उसे अपने हाथ में लेकर पढ़ने लगे ।उन्होंने अपने सचिव को आदेश दिया कि लगे हाथों एक-साला उपलब्धि में इसे भी नत्थी कर दिया जाय !

DLA में १८/०३/२०१३ को

शनिवार, 9 मार्च 2013

संसद से कुछ काम की ख़बरें !

09/03/2013, nai dunia


भारी शोर-शराबा,वॉक-ऑउट और हंगामे की खबरों के बीच संसद से अच्छी खबर आई है।बहुत दिन बाद संसद में सरकार और विपक्ष ने एक-दूसरे को सुना।इस सुखद शुरुआत का श्रेय हमारे प्रधानमंत्री को जाता है।मौन के ठप्पे को अचानक उन्होंने उतार फेंका और वे सदन में ज़बरदस्त बोले।इस बोलने की ऊर्जा का स्रोत उसके अगले दिन फूटा,जब युवराज ने साफ़ कह दिया कि वे न घोड़ी पर चढेंगे और न ही सिंहासन पर।हो सकता है,इसी बात से हमारे प्रधानमंत्री को अपनी ऐतिहासिक चुप्पी को तोड़ने का साहस मिला हो।

प्रधानमंत्री दार्शनिक अंदाज़ में विपक्ष पर टूट पड़े।उन्होंने बिना रुके,बिना थके ,विपक्ष पर केवल नकारात्मक सोचने का आरोप लगाया।उन्होंने आंकड़े देकर सदन के अंदर सिद्ध किया कि यूपीए के कार्यकाल में देश की विकास-दर एनडीए  के समय से कहीं अधिक रही ।यह बात और है कि इतनी ऐतिहासिक ग्रोथ के बावजूद देश के आम आदमी का चेहरा लगातार सिकुड़ रहा है ,पर इसको विपक्ष साबित नहीं कर पाया।प्रधानमंत्री यही नहीं रुके।उन्होंने विपक्ष पर भावनात्मक चोट भी की और बिलकुल शातिराना और शायराना अंदाज़ में।संसद में असली काम-काज तभी शुरू हुआ जब उन्होंने यह शे’र पढ़ा,’हमको वफ़ा की है उनसे उम्मीद,जो नहीं जानते वफ़ा क्या है?’

सुनने वालों को तो पहले लगा कि प्रधानमंत्री अपनी निजी दर्द बयान कर रहे हैं क्योंकि उनकी वफादारी किसके साथ है,यह सब जानते हैं।पर विपक्ष की नेता ने इसे अपने ऊपर लिया और सरकार के हर कदम की तरह इसका भी जवाब देना ज़रूरी समझा।उन्होंने आक्रामक तेवर अख्तियार करते हुए बताया कि प्रधानमंत्री जी के एक शे’र का उधार नहीं रखेंगी,बदले में एक शे’र की उधारी और चढ़ा देंगी।यहाँ विपक्ष की नेता ने इस तथ्य को पूरी तरह से नज़रंदाज़ किया कि देश पर पहले से ही काफ़ी उधारी चढ़ी हुई है।बहरहाल,उन्होंने भी शेरो-शायरी के मजमे में अपनी तरफ़ से ये शे’र पढ़ा,’कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,यूँ ही नहीं कोई बेवफा होता’।इसके बाद तो पूरा माहौल ही बदल गया।उन्होंने दूसरे शे’र में वफ़ा और ज़फा दोनों को घसीटते हुए तालियाँ बटोरी।

इस सुखद माहौल का फायदा उठाते हुए विपक्षी दल के नव-निर्वाचित अध्यक्ष जी भी बोले ।उन्होंने कहा कि वे प्रधानमंत्री जी के बोलने से बहुत प्रसन्न हैं।आखिर उन्होंने नौ साल बाद अपना मौन तोड़ा है।इसके बाद वे भी दार्शनिक अंदाज़ में बोले कि तेल खत्म होता हुआ दिया अचानक बड़ी ज़ोर से कुछ पलों के लिए टिमटिमाता है,उसके बाद उसकी लौ शांत हो जाती है और इसी तरह आने वाले समय में यह सरकार भी निष्प्राण हो जायेगी।दिये की तरह इसका भी तेल खत्म हो गया है।उन्होंने आगे यह नहीं कहा कि तेल का ड्रम और कुप्पी लिए वे तैयार बैठे हैं।इसकी वज़ह यह भी हो सकती है कि इसे लोग गंभीरता से ले लेते और उनका शायराना मूड खराब हो जाता।  

सदन में बैठे लोग कुछ समय के लिए भूल गए कि वे वहाँ बैठे हैं जहाँ अकसर माइक फेंके जाते हैं,हाथापाई होती है और बिल फाड़े जाते हैं।ऐसे माहौल के लिए निश्चित ही सत्तापक्ष व विपक्ष बधाई के पात्र हैं।इसके लिए फागुन की उपस्थिति को किसी प्रकार से दोषी नहीं कहा जा सकता है।चाहे कारण जो भी रहे हों,कम-से कम इस बहाने संसद में कुछ काम की बातें होने की खबर आई।चर्चाकारों को टीवी चैनलों पर बोलने का विषय मिला।इससे आम आदमी में यह सन्देश बिलकुल नहीं गया कि भंग होने से पहले संसद अपनी उपस्थिति का भान करा रही है।

बुधवार, 6 मार्च 2013

मिशन,कमीशन और आम आदमी !



०६/०३/२०१३ को नैशनल दुनिया व जनसंदेश में !







सुबह-सुबह मंदिर के चबूतरे पर जैसे ही कदम रखा कि वहाँ पर पहले से ही खड़े दो लोगों ने मुझे आगे बढ़ने से रोक दिया।मैंने इसका कारण जानना चाहा तो दोनों ने एक साथ जवाब दिया कि उनके रहते मंदिर का प्रसाद कोई और उड़ा ले जाए,यह संभव नहीं है।मैंने कहा ,भई,मैं तो आम आदमी हूँ और मंदिर के प्रसाद पर मेरा भी हक है पर वे दोनों अपनी बात पर अड़ गए । मुझे जबरन रुकना पड़ा तो सोचा कि अब इस बात का पता लगना ज़रूरी है कि मुझे मंदिर का प्रसाद न मिलने के पीछे इनका क्या उद्देश्य है ?
मंदिर के बाहर ही एक बेंच पर हम उन दोनों के साथ बैठ गए।एक मेरे दायें बैठा और दूसरा मेरे मध्य में ;मैं बिलकुल किनारे था।मुझे गुस्सा आ रहा था कि उन दोनों ने मुझे मौलिक अधिकार से वंचित किया है।सबसे पहले मैंने दायीं तरफ़ वाले बंदे से पूछा कि वह  कौन है और मंदिर में प्रसाद लेने से उसका क्या नुकसान हो जायेगा ?

अपने भगवे पट्टे को लहराते हुए वह बन्दा बोला,’मैं मिशन हूँ और मेरा एकमात्र मिशन यही है कि इस बार मंदिर का ताला जब खुले तो सारा प्रसाद मैं ही चखूँ।इसके लिए मैंने लंबा इंतज़ार किया है और राम की कृपा से वह दिन अब आ गया है।तुम जैसे आम आदमी बीच में अड़ंगा न डालें,तो मेरा बहुप्रतीक्षित मिशन जल्द पूरा हो जायेगाऔर तुम कौन हो,क्या चाहते हो ?’ अब मैंने मध्य में बैठे हुए बंदे से भी यही सवाल किया।

वह बंदा बोला ,’मुझे सब लोग कमीशन के नाम से जानते हैं,इसलिए मैंने भी अब यही नाम धर लिया है।दरअसल यह हमारा पुश्तैनी धंधा है और हम इस काम में माहिर हैं।पिछले साठ-पैंसठ सालों से हम मंदिर की सेवा करते चले आ रहे हैं इसलिए प्रसाद पर बुनियादी हक हमारा ही बनता है।ये मिशन वाले नासमझ हैं।हर बार सुबह की आरती के वक्त मंदिर के चक्कर लगाने लगते हैं पर मंदिर के भक्तगण इन्हें कोई भाव नहीं देते।ये भगवान का नाम तो लेते हैं पर नज़र केवल प्रसाद पर रहती है,इसलिए अब तक इनका मिशन अधूरा है।

अब वार्ताकार की मेरी हैसियत छिन गई थी।मिशन और कमीशन दोनों आपस में ही उलझने लगे थे।मैं आम आदमी की तरह केवल श्रोता भर रह गया था।मिशन जी ने कमीशन जी की पोल खोलते हुए कहा,’तुमने सारा प्रसाद अपने परिवार में ही बाँट लिया है।काफ़ी मात्रा में तुमने इस प्रसाद की सप्लाई बाहर भी की है।अगर हमने इस मंदिर को ही बचाने के लिए इसका एक खम्भा गिराया है तो तुम तो दीमक की तरह सारे मंदिर में चिपट गए हो।अब हम प्रसाद बंटने का इंतज़ार नहीं करने वाले हैं,बल्कि पूरा हड़प लेंगे,यही हमारा मिशन है।

कमीशन जी बिलकुल शांत बैठे रहे।मिशन जी की बातों से बिना उत्तेजित हुए कहने लगे,’बेटा,यह बहुत बड़ा मंदिर है।किसी छोटे-मोटे मंदिर के पुजारी बनकर यह दंभ पाले बैठे हो कि बड़े मंदिर को भी संभाल लोगे,तो ये तुम्हारी भूल है।तुम्हारा जो भी मिशन है,कमीशन से ही बना है।हमने हमेशा कमीशन खाया और बिठाया है,इसलिए इस क्षेत्र के सबसे बड़े तजुर्बेकार हमीं है।अबकी बार तुम्हारे इस मिशन पर ही कमीशन बिठा दूंगा,फ़िर मंदिर के प्रांगण में नहीं,कच्छ के रण में ही नज़र आओगे।

बहस बढ़ती देखकर मैंने प्रसाद खाने का जोखिम लेना उचित नहीं समझा और वहाँ से चला आया।


 

मिर्ची-पाउडर का मंदिर के प्रसाद में बदलना !

जनता की आँखों में धूल झोंकने के अभ्यस्त रहे लोग यदि अपने लोगों की आँखों में मिर्च झोंकते हैं तो यह महज तकनीकी मसला भर है। इस पर नैतिकता का मुलम्मा चढ़ाकर बड़े-बड़े अश्रु बहाना निहायत पारंपरिक और स्थायी कर्म है,जो अब बंद होना चाहिए। पिछले कई वर्षों से ऐसे कर्णधार,जो धूल और कोयला झोंकने में निपुण हैं ,निरंतर अपनी उपयोगिता सिद्ध कर चुके हैं ।साथ ही,वे दल-बल सहित सदन में स्थायी आसन जमाकर बैठ गए हैं। ऐसे में अगर एकाध मिर्ची झोंकने वाला भी सदन में एंट्री मार लेता है तो हमारे दिल में अचानक नैतिकता की घंटियाँ क्यों बजने लगती हैं ? यह तो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का एक छोटा-सा अंग है ,जिसमें एक पाकेटमार या चेन-स्नैचर की तरह एक मिर्चीमार और चक्कूबाज को अपना हुनर दिखाने का मौका मिल जाता है। इसको सकारात्मक नजरिये से देखा जाये तो यह बाहुबलियों और माफिया डॉन के बीच अदने से लफंगे की हल्की-सी घुसपैठ भर है।

हमारी संसद एक पवित्र मंदिर की तरह है और इसमें पुजारी बनकर प्रवेश करने वाले देवताओं की जगह विराजमान हैं। यह सब कुछ नितांत लोकतान्त्रिक तरीके से हुआ है,इसलिए इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मंदिर में देवताओं और पुजारियों के विशेषाधिकार होते हैं,भक्तों के नहीं। इसलिए वे वहाँ भरतनाट्यम करें,मल्ल-युद्ध करें या माइक उखाड़ें,सब उनकी नित्यलीलाओं में शुमार माना जाता है। भक्ति से ओत-प्रोत भोली जनता को क्या चाहिए ?। बस,उसे समय-समय पर सब्सिडी के रूप में प्रसाद मिल जाता है और वह फिर से अगली लीला देखने की आतुरता से प्रतीक्षा करने लगती है। इसलिए मंदिर में होने वाले  पूजा-पाठ पर सड़क से उँगली उठाना अनैतिक तो है ही,बेहद असंवैधानिक भी है। मन्दिर के अंदर के विषय पर अंदर के लोग ही अंतिम निर्णय ले सकते हैं। यह उन पर निर्भर है कि मन्दिर के अंदर वे गुलाब-जल का छिड़काव चाहते हैं या मिर्ची-पाउड
हमें अपने युग के प्रभुओं और परमेश्वरों पर पूर्ण आस्था है। हम किसी आम आदमी को पूरी व्यवस्था पर उँगली उठाने और सनातन काल से चली आ रही परम्परा को ठेंगा दिखाने नहीं दे सकते। आम आदमी हमेशा से भक्त रहा है और बाय डिफॉल्ट बना रहेगा। मन्दिर में किया गया स्प्रे हमें आगामी भविष्य के प्रति पूरी तरह आश्वस्त करता है कि इसके इर्द-गिर्द मक्खी-मच्छरों को टिकने नहीं दिया जायेगा। सदन की पवित्रता बरकरार रहे इसके लिए जल्द ही देवता बने पुजारियों की एक समिति गठित की जाएगी,जिससे दिक्-भ्रमित भक्तों में पुनः विश्वास का संचार किया जा सके ! अब इसके बाद
संतोष त्रिवेदी

 

जे 3/78 ,पहली मंजिल,

खिड़की एक्स.,मालवीयनगर

नई दिल्ली-110017

 



9818010808

 



 

मिर्ची-पाउडर का मंदिर के प्रसाद में बदलना !

जनता की आँखों में धूल झोंकने के अभ्यस्त रहे लोग यदि अपने लोगों की आँखों में मिर्च झोंकते हैं तो यह महज तकनीकी मसला भर है। इस पर नैतिकता का मुलम्मा चढ़ाकर बड़े-बड़े अश्रु बहाना निहायत पारंपरिक और स्थायी कर्म है,जो अब बंद होना चाहिए। पिछले कई वर्षों से ऐसे कर्णधार,जो धूल और कोयला झोंकने में निपुण हैं ,निरंतर अपनी उपयोगिता सिद्ध कर चुके हैं ।साथ ही,वे दल-बल सहित सदन में स्थायी आसन जमाकर बैठ गए हैं। ऐसे में अगर एकाध मिर्ची झोंकने वाला भी सदन में एंट्री मार लेता है तो हमारे दिल में अचानक नैतिकता की घंटियाँ क्यों बजने लगती हैं ? यह तो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का एक छोटा-सा अंग है ,जिसमें एक पाकेटमार या चेन-स्नैचर की तरह एक मिर्चीमार और चक्कूबाज को अपना हुनर दिखाने का मौका मिल जाता है। इसको सकारात्मक नजरिये से देखा जाये तो यह बाहुबलियों और माफिया डॉन के बीच अदने से लफंगे की हल्की-सी घुसपैठ भर है।

हमारी संसद एक पवित्र मंदिर की तरह है और इसमें पुजारी बनकर प्रवेश करने वाले देवताओं की जगह विराजमान हैं। यह सब कुछ नितांत लोकतान्त्रिक तरीके से हुआ है,इसलिए इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मंदिर में देवताओं और पुजारियों के विशेषाधिकार होते हैं,भक्तों के नहीं। इसलिए वे वहाँ भरतनाट्यम करें,मल्ल-युद्ध करें या माइक उखाड़ें,सब उनकी नित्यलीलाओं में शुमार माना जाता है। भक्ति से ओत-प्रोत भोली जनता को क्या चाहिए ?। बस,उसे समय-समय पर सब्सिडी के रूप में प्रसाद मिल जाता है और वह फिर से अगली लीला देखने की आतुरता से प्रतीक्षा करने लगती है। इसलिए मंदिर में होने वाले  पूजा-पाठ पर सड़क से उँगली उठाना अनैतिक तो है ही,बेहद असंवैधानिक भी है। मन्दिर के अंदर के विषय पर अंदर के लोग ही अंतिम निर्णय ले सकते हैं। यह उन पर निर्भर है कि मन्दिर के अंदर वे गुलाब-जल का छिड़काव चाहते हैं या मिर्ची-पाउडर का !

हमें अपने युग के प्रभुओं और परमेश्वरों पर पूर्ण आस्था है। हम किसी आम आदमी को पूरी व्यवस्था पर उँगली उठाने और सनातन काल से चली आ रही परम्परा को ठेंगा दिखाने नहीं दे सकते। आम आदमी हमेशा से भक्त रहा है और बाय डिफॉल्ट बना रहेगा। मन्दिर में किया गया स्प्रे हमें आगामी भविष्य के प्रति पूरी तरह आश्वस्त करता है कि इसके इर्द-गिर्द मक्खी-मच्छरों को टिकने नहीं दिया जायेगा। सदन की पवित्रता बरकरार रहे इसके लिए जल्द ही देवता बने पुजारियों की एक समिति गठित की जाएगी,जिससे दिक्-भ्रमित भक्तों में पुनः विश्वास का संचार किया जा सके ! अब इसके बाद भी किसी को मिर्ची लगे तो कोई क्या करे ?

 

संतोष त्रिवेदी

 

जे 3/78 ,पहली मंजिल,

खिड़की एक्स.,मालवीयनगर

नई दिल्ली-110017

 



9818010808

 




 

मिर्ची-पाउडर का मंदिर के प्रसाद में बदलना !

जनता की आँखों में धूल झोंकने के अभ्यस्त रहे लोग यदि अपने लोगों की आँखों में मिर्च झोंकते हैं तो यह महज तकनीकी मसला भर है। इस पर नैतिकता का मुलम्मा चढ़ाकर बड़े-बड़े अश्रु बहाना निहायत पारंपरिक और स्थायी कर्म है,जो अब बंद होना चाहिए। पिछले कई वर्षों से ऐसे कर्णधार,जो धूल और कोयला झोंकने में निपुण हैं ,निरंतर अपनी उपयोगिता सिद्ध कर चुके हैं ।साथ ही,वे दल-बल सहित सदन में स्थायी आसन जमाकर बैठ गए हैं। ऐसे में अगर एकाध मिर्ची झोंकने वाला भी सदन में एंट्री मार लेता है तो हमारे दिल में अचानक नैतिकता की घंटियाँ क्यों बजने लगती हैं ? यह तो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का एक छोटा-सा अंग है ,जिसमें एक पाकेटमार या चेन-स्नैचर की तरह एक मिर्चीमार और चक्कूबाज को अपना हुनर दिखाने का मौका मिल जाता है। इसको सकारात्मक नजरिये से देखा जाये तो यह बाहुबलियों और माफिया डॉन के बीच अदने से लफंगे की हल्की-सी घुसपैठ भर है।

हमारी संसद एक पवित्र मंदिर की तरह है और इसमें पुजारी बनकर प्रवेश करने वाले देवताओं की जगह विराजमान हैं। यह सब कुछ नितांत लोकतान्त्रिक तरीके से हुआ है,इसलिए इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मंदिर में देवताओं और पुजारियों के विशेषाधिकार होते हैं,भक्तों के नहीं। इसलिए वे वहाँ भरतनाट्यम करें,मल्ल-युद्ध करें या माइक उखाड़ें,सब उनकी नित्यलीलाओं में शुमार माना जाता है। भक्ति से ओत-प्रोत भोली जनता को क्या चाहिए ?। बस,उसे समय-समय पर सब्सिडी के रूप में प्रसाद मिल जाता है और वह फिर से अगली लीला देखने की आतुरता से प्रतीक्षा करने लगती है। इसलिए मंदिर में होने वाले  पूजा-पाठ पर सड़क से उँगली उठाना अनैतिक तो है ही,बेहद असंवैधानिक भी है। मन्दिर के अंदर के विषय पर अंदर के लोग ही अंतिम निर्णय ले सकते हैं। यह उन पर निर्भर है कि मन्दिर के अंदर वे गुलाब-जल का छिड़काव चाहते हैं या मिर्ची-पाउडर का !

हमें अपने युग के प्रभुओं और परमेश्वरों पर पूर्ण आस्था है। हम किसी आम आदमी को पूरी व्यवस्था पर उँगली उठाने और सनातन काल से चली आ रही परम्परा को ठेंगा दिखाने नहीं दे सकते। आम आदमी हमेशा से भक्त रहा है और बाय डिफॉल्ट बना रहेगा। मन्दिर में किया गया स्प्रे हमें आगामी भविष्य के प्रति पूरी तरह आश्वस्त करता है कि इसके इर्द-गिर्द मक्खी-मच्छरों को टिकने नहीं दिया जायेगा। सदन की पवित्रता बरकरार रहे इसके लिए जल्द ही देवता बने पुजारियों की एक समिति गठित की जाएगी,जिससे दिक्-भ्रमित भक्तों में पुनः विश्वास का संचार किया जा सके ! अब इसके बाद भी किसी को मिर्ची लगे तो कोई क्या करे ?

 

संतोष त्रिवेदी

 

जे 3/78 ,पहली मंजिल,

खिड़की एक्स.,मालवीयनगर

नई दिल्ली-110017

 



9818010808

 

 


सोमवार, 4 मार्च 2013

'व्यंग्य यात्रा' में राम कथा !






'व्यंग्य यात्रा' के अक्टूबर -दिसम्बर २०१२ के अंक में पहली बार  

भगवान राम आज कुछ प्रसन्न-मुद्रा में दिखाई दे रहे थे।सीता जी ने उनकी इस प्रसन्नता का कारण पूछा ,'प्रभु ! आज आपकी मुख-मुद्रा अलग सन्देश दे रही है,क्या बात है ?' राम बोले ,'देवि,आज नारद मुनि मिले थे और कह रहे थे कि हम जब से धरती-लोक से आये हैं,काफी बदलाव हो गया है।मुझे अरसे से यह बात याद आ रही थी पर स्वर्ग के काम-काज से फुरसत ही नहीं मिल रही थी।यदि आपकी इच्छा हो तो अपनी कर्मभूमि के दर्शन फिर से कर आयें !'सीता ने बिना देरी किए ही झट-से हाँ कर दी और फ़िर उन दोनों ने मानव-रूप में धरती में प्रवेश किया।


संयोग से वे दोनों जहाँ उतरे ,वह पंचवटी का इलाका था।जिस स्थान पर कभी वे पर्णकुटी में रहे थे,उस जगह अब आलीशान महल था।राम और सीता उस महल से आकृष्ट हुए बिना नहीं रह सके।सहसा उन्हें अत्याधुनिक वेशभूषा में एक स्त्री दिखाई दी।राम और सीता उसको देखते ही रह गए।वे दोनों कुछ बोल पाते कि उस स्त्री ने जोर से आवाज़ दी,'पहचाना मुझे ? मैं सूपनखा हूँ।'राम विस्मित होते हुए बोले,' सूपनखा !तुम यहाँ '? लक्ष्मण ने तो तुम्हारी नाक काट दी थी ,पर तुम तो बिलकुल ठीक-ठाक और सम्पूर्ण हो !'सूपनखा ने उत्तर दिया,'आप किस युग की बात कर रहे हैं ?यह आपका त्रेता नहीं है।इस युग में हमारी नाक कटने का कोई जोखिम नहीं है,अब तो स्लट-वॉक का ज़माना है ।यह नाक-वाक से स्त्री को भयभीत करना दरअसल आप की चाल थी जो अब कामयाब नहीं होगी।'इतना सुनकर तो राम सन्नाटे में आ गए,पर सीता से न रहा गया।उन्होंने कहा,'सूपनखा !तुम मत भूलो कि तुमने केवल कपड़े बदले हैं,आचरण अभी भी तुम्हारा वही है।तुम इस तरह मेरे स्वामी का अपमान नहीं कर सकती हो ।'तब तक राम ने अपने को सँभाल लिया था।उन्होंने कहा,'सीते ! इन्हें कहने दो क्योंकि कभी हमारे द्वारा इनको कष्ट पहुँचा था।’



राम ने शांत होकर सूपनखा से अगला सवाल किया,'अच्छा यह बताओ,तुम यहाँ किसके साथ रह रही हो? मेरे द्वारा विवाह-प्रस्ताव ठुकराने के बाद तुम्हें कोई मिला ?'सूपनखा तमककर बोली,'क्या समझते हो ? यह आपका समय नहीं है।मैं तब से कई युगों तक भटकती रही।अंतत इस कलियुग में आकर मुझे राहत मिली है ।यहाँ विवाह जैसा बंधन ज़रूरी नहीं है।हम दोनों 'लिवइन रिलेशन ' को मान्यता देते हैं।कोई किसी को पूजता नहीं है।हम जीवन भर एक-दूसरे को ढोने को अभिशप्त भी नहीं हैं।अब मैं फेसबुक पर चैटिंग करती हूँ और मेरा पार्टनर किचन में सब्जियाँ पकाता है।हम पूरी तरह आजाद हैं।मैं तो सीता से भी कहूँगी कि वह अपने साथ किये गए दमन को नहीं भूले और हमारे साथ आ जाये'.




सीता ने उसकी किसी बात पर ध्यान नहीं दिया और राम से कहा,'प्रभु ! यहाँ से जल्दी चलो,मेरा दम घुट रहा है।' राम और सीता आगे बढ़ने को तैयार ही थे कि अचानक उन्हें ताड़का नज़र आई।उनके पीछे-पीछे खर-दूषण भी आ गए।उन लोगों ने आते ही सूपनखा से सवालों की बौछार कर दी,'बहन ! ये तपस्वी इतने दिनों बाद यहाँ कैसे ? सूपनखा ने कहा,'ये हमें देखने आये थे कि हमारा सर्वनाश हो गया कि नहीं।मैं तो सीता को लेकर दुखी हूँ कि यह इनके चंगुल से कैसे छूटे ?'अब उत्तर देने की बारी सीता की थी।उन्होंने ज़रा कड़ककर कहा,'सब लोग इस तरह हमें घेरकर क्यों खड़े हो गए हैं ? मैं अपने स्वामी के साथ बहुत खुश हूँ।मुझे त्रेता में भी उनमें कोई बुराई नज़र नहीं आई थी । मैं एक राजा के परिवार में ब्याह कर आई थी,उस समय इनके साथ वनवास जाने का निर्णय मेरा था। मैं कागजी रिश्तों में विश्वास नहीं करती ।ऐसे समय में मेरे पति ने मेरा साथ दिया और मैं जंगल में इनके साथ रही।अगर मुझे इनसे कोई शिकायत होगी भी तो हमारे रिश्तों में इतनी गर्मी बची है कि आपस में बातकर समझा जा सकता है ।और हाँ,ताड़का व खर-दूषण !तुम सब यहाँ कैसे आ गए ?किसने बुलाया तुम्हें ?' उत्तर सूपनखा ने दिया, 'ताड़का को मैंने ईमेल किया था और खर-दूषण को हमारे फेसबुक-स्टेटस से पता चला।’




अब तक चुप रहे राम बोल उठे,'सीते !तुम इनसे बहस न करो.आओ यहाँ से चलते हैं।'खर-दूषण ने तड़ से जवाब दिया,'हाँ ,इसी में भलाई भी है अब आपके पास न तो दैवीय शक्ति है और न ही वानर-सेना।हमने अगर एक भी स्टेटस और लगाया तो हमारे सभी सदस्य सक्रिय हो उठेंगे।'राम ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए वहाँ से चले जाना ही उचित समझा।सूपनखा ,ताड़का और खर-दूषण ने पहली बार राम को हरा दिया था।




राम और सीता अभी कुछ ही दूर पहुँचे थे कि एक कुटिया देखकर रुक गए।वहां एक बुढ़िया चारपाई पर बैठी दाल-चावल में पड़े कंकड़ बीन रही थी।राम को देखते ही पहचान गई और उठकर बोली,'प्रभु ! इतने दिनों बाद आपको पाकर धन्य हो गई। आपने मेरे जूठे बेर खाकर बहुत पहले मुझे कृतार्थ किया था।'राम इस जंगल में अचानक शबरी को पाकर प्रफुल्लित हो गए और गले लगा लिया।सीता भी शबरी से मिलकर बहुत खुश हुईं।शबरी ने कहा,'अभी मैंने खिचड़ी पकाई है,यदि आप बुरा न मानें...' ,राम ने बात बीच में ही काटकर कहा,'हम दोनों खाकर ही जायेंगे।'




खिचड़ी खाकर जैसे ही राम जाने को तैयार हुए,एक बुजुर्ग उनके पैरों पर गिर पड़े।शबरी ने बताया ,'प्रभु ! ये तुलसी हैं।इन्होंने आप पर कथा लिखकर बड़ा कष्ट भोगा है।कई लोग इनकी जान के पीछे पड़े हैं,सो मैंने इन्हें शरण दे रखी है।‘राम ने तुलसी को उठाकर गले से लगाया और कहा,'अब आप नए सिरे से राम-कथा लिखें।पिछली कथा अब इस युग में प्रासंगिक नहीं रह गई है।'तुलसी ने भाव-विह्वल होते हुए उत्तर दिया ,'भगवन ! मैंने जो भी लिखा था,भक्तिभाव से लिखा था।मुझे क्या पता था कि कालांतर में लोग मानस में भी जाति ,धर्म और लिंग का चश्मा लगाकर देखेंगे।अब मैं कोई कथा नहीं लिख सकूँगा।'



इसके बाद राम और सीता ने धरती पर ठहरना उचित नहीं समझा और बिना अतिरिक्त क्षण गँवाए वे दोनों स्वर्गलोक लौट गए !




व्यंग्य यात्रा के अक्टूबर-दिसम्बर २०१२ के अंक में प्रकशित

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

जादुई है रेल-बजट !


01/03/2013 को मिलाप में !

 

लो जी,रेल बजट आ गया और बड़े कमाल का रहा। सरकार के ऊपर बार-बार यह आरोप लगते रहे हैं कि वह आम जनता के लिए कुछ नहीं करती पर इतना तो तय है कि उसके मंत्रिमंडल में मंत्री कम जादूगर ज्यादा हैं। रेल बजट में मंत्री ने ऐसी जादूगरी दिखाई कि किराया भी नहीं बढ़ा और अपनी झोली भी भरने का इंतज़ाम कर लिया। सीधे-सीधे किराये में बढोत्तरी न करके सर्विस चार्ज और अन्य तकनीकी मदों के जरिये जनता को लूट लिया गया । यह सब ठीक वैसे ही हुआ,जैसे सामने की जेब से पैसे न निकालकर पीछे वाली पाकेट को नोंच लिया जाय।

मंत्री जी अपने नाम के अनुरूप बजट-बयार लेकर आए और सबको बता दिया कि इसे बसंत-बहार समझने की भूल न करें। वे बजट पेश करने के लिए बकायदा तैयार होकर आए थे। सबसे मजेदार बात तो यह रही कि उन्होंने ऐसी लूट-पाट करते हुए शेरो-शायरी सुनाने का पुराना नुस्खा भी आजमाया। इसका सीधा सन्देश यही है कि बजट को जिन्हें भुगतना है ,वे भुगतें मगर इससे उनको तो सत्ता की महक मिल रही है और सरकार को फुल कांफिडेंस है। उन्होंने अपने छुपे इरादों को इस शेर के बहाने ज़ाहिर भी कर दिया ;‘न बहारों से बात करनी है,न सितारों से बात करनी है,जब दरिया को पार करना है तो किनारों से बात करनी है’। अब उनके कहे का सामान्य अर्थ यही है कि वे कोई बहार लुटाने नहीं आए थे,बल्कि दरिया यानी चुनाव को पार करने के लिए किनारे यानी आम आदमी को और किनारे लगाना है।

विपक्ष इस रेल बजट से कुछ नहीं निकाल पा रहा है। वह इसे रेल-बजट के बजाय ‘रायबरेली-बजट’ कहकर केवल हल्की तुकबंदी और हास्य पैदा करने की कोशिश में लगा है। मंत्री जी ने बजट से एक महीने पहले ही जो निकालना था,निकाल लिया। अब इससे जो भी निकल के आएगा वह बोनस में होगा। रेलगाड़ियों की बढ़ी हुई संख्या यात्री कम मंहगाई अधिक ढोएगी। आगे चुनाव आने वाले हैं और इस सरकार का हाथ आम आदमी के साथ है इसलिए वह कभी भी उसकी जेब में प्रवेश कर सकता है। मंत्री जी यहाँ पूरी तरह व्यावहारिक हैं।

रेल-बजट को आम आदमी के अलावा युवाओं के लिए भी क्रान्तिकारी बताया जा रहा है। अब यात्रा करते समय वे वाई-फाई के माध्यम से निःशुल्क चैटिंग और स्टेट्स अपडेट करते रहेंगे। इससे कोच के अंदर का माहौल भी अति सुरक्षित रहेगा। उनके इस तरह मोबाइल या लैपटॉप में व्यस्त रहने से महिलाओं से छेड़खानी की आशंका भी कम हों जायेगी और खिड़की के बाहर की तांक-झाँक भी रुक जायेगी। अगले चुनावों में सोशल मीडिया का उपयोग कर रही यह युवा पीढ़ी बड़े काम आ सकती है।

इस बजट की बाजीगरी के बाद आम बजट भी आ रहा है। उसको पेश करने वाले मंत्री जी खासे  अनुभवी हैं और सरकार निश्चिन्त है कि रेल के बाद इसमें भी मंत्री जी कोई खेल दिखा देंगे। मतलब साफ़ है कि अपना हिस्सा पूरा वसूल हो जाए और वसूली की उँगली भी उसकी ओर न उठे। जिस तरह किराया न बढ़ने के बाद भी सफ़र मंहगा हो गया है,वैसे ही अगर अगले चुनावों में वोट बढ़ने के बावजूद सीटें न बढ़ें तो कैसा रहेगा ? सरकार का इस पर अभी जवाब नहीं आया है।