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बुधवार, 20 मार्च 2013

हमें शांति का नोबेल चाहिए !

20/03/2013 जनसंदेश में





इस समय दुनिया के हम इकलौते शांतिप्रिय देश हैं.हमारी यह शांतिप्रियता कई बार सिद्ध हो चुकी है.यह अलग बात है कि हमारी ऐसी हर कोशिश को हमारा पड़ोसी हमसे ज्यादा साबित करने को प्रतिबद्ध रहता है.हमारे सहिष्णु स्वभाव का सबसे उजला पक्ष यह है कि हमारी संसद और हमारे लोगों पर हमला करने वालों के प्रति भी हम बेहद उदार हो जाते हैं.जिस अफज़ल गुरु ने संसद पर हमले में मुख्य भूमिका निभाई ,उसको भी हमने दस साल का जीवन-विस्तार दिया. हम लोगों के डीएनए में सहिष्णुता और अवसरवादिता के कीटाणु इतने गहरे तक व्याप्त हैं कि कश्मीर के मुख्यमंत्री तक उस के प्रति अन्याय  होने की बात कह चुके हैं।अब यदि हमारे पड़ोसी देश ने अपनी संसद में आतंकवादी के फाँसी लगने पर स्यापा किया है तो इसमें उसका लेशमात्र दोष नहीं है.


इटली के दो अपराधी अपने देश जाकर हमें टिलीलिली कर रहे हैं.इस काम में वहां की सरकार उनके साथ है.वे दोनों हत्या जैसे संगीन जुर्म के आरोपी हैं पर गोरी चमड़ी की जान दुनिया में अभी भी सबसे कीमती है.इसलिए उनके अपराधी नागरिक भी उपयोगी हैं और हम अपने निर्दोष लोगों की रक्षा में असमर्थ हैं.अपने देश के आम आदमी को हर हाल में मरना ही है,इसलिए सरकार के लिए यह चिंता का विषय नहीं है.उसे मंहगाई,भ्रष्टाचार ,बलात्कार या आतंकवाद जैसे किसी न किसी तरीके से मरना ही है,सो उसकी रक्षा करना सरकार के अजेंडे में सबसे नीचे है.


इटली की गुगली से हमारी सरकार को कुछ भी नहीं सूझ रहा है.वह उसके राजदूत को देश से बाहर न जाने देने के लिए प्रयासरत है.हमें लगता है कि यहाँ सरकार गलत कर रही हैछोटी-सी बात के लिए अपनी सार्वजनिक नीति को त्यागना ठीक नहीं है.उसे वहां के राजदूत को उन दोनों को मनाने के लिए भेजना चाहिए ताकि उसे भी अपने देश में सुरक्षित पहुँचने का मौका मिल जाय.इस प्रकरण को हमें अमेरिका से कहकर हल करवाना चाहिए .वह मध्यस्थता करके हमारी कटी नाक को जोड़ने में सक्रिय भूमिका निभा सकता है.इसके लिए हम संयुक्त राष्ट्र भी जा सकते हैं.

अभी हाल में हमारे पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री अजमेर में जियारत करने आये थे.आम आदमी पर शांतिपूर्ण आंदोलनों में लाठी-गोली चलवाने वाली सरकार ने उनका खैर-मकदम किया,दावत दी। हमारी आवभगत का माकूल जवाब उन्होंने अपने देश की संसद में अफज़ल की फांसी पर निंदा-प्रस्ताव पास कर तुरंत दे दिया.हो सकता है कि वे मरहूम के लिए ही दुआ करने अजमेर आये हों.पड़ोसी देश हमारे सैनिकों के सिर क़त्ल करके भले ही हमें उकसाने की कोशिश कर रहा हो पर हमें इस मामले में बिलकुल ठंडे दिमाग से काम करना चाहिए ।ऐसी बातों के हम अभ्यस्त हो चुके हैं.

इटली के अपराधी हमारी इन नीतियों से पूरी तरह वाकिफ थे,पर कसाब ने थोड़ी चूक कर दी.जिस तरह क्रिसमस के मौके पर इटली वालों को जाने दिया गया था,यदि वह ईद पर पाकिस्तान जाने की मांग करता तो हमारी शांति-प्रिय और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का पालन करने वाली सरकार ज़रूर शिष्टता के नाते उसे जाने देती.ऐसी सूरत में कम से कम पाकिस्तान को ईद का तोहफा देकर हम सम्बन्ध सुधारने का प्रयास करते.अब इस मोर्चे पर फेल होने के बाद सौहार्द बढ़ाने के लिए क्रिकेट,हॉकी या बस चलाने वाले परम्परागत तरीके ही बचते हैं.

फिलहाल,हम अपनी शांतिप्रियता के नाते नोबेल पुरस्कार पाने के सबसे बड़े हक़दार हो गए हैं,इसके लिए आम आदमी की शहादत से भी हमें गुरेज़ नहीं है.

  



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