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बुधवार, 24 अप्रैल 2013

वो ईमानदारी सीखकर आएँगे !


24/04/2013 को जनसंदेश में !

25/04/2013 को नैशनल दुनिया में ! 
 


बचपन से हम सुनते आए हैं कि ईमानदारी व्यक्ति के संस्कारों में होती है।यह ऐसा जीन होता  है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने-आप आगे बढ़ता है।इसलिए पुराने लोग परिवार के संस्कार से व्यक्ति की पहचान आसानी से कर लेते थे।हम अपनी पढ़ाई के दौरान भी इससे इतर नहीं जान पाये थे ।अब जब से सुना है कि विदेश में ईमानदारी सिखाने के प्रशिक्षण केंद्र हैं,लगता है कि हमारी सारी पढ़ाई अकारथ हो गई।हाल ही में मध्य प्रदेश के लोकायुक्त ने शासन को एक प्रस्ताव भेजा है जिसमें अधिकारियों को ईमानदारी सीखने के लिए विदेश भेजने की बात कही गई है।यह जानकर लगा कि वास्तव में हम कितनी पिछड़ी सोच के साथ जी रहे थे।

समय बहुत तेजी से बदल रहा है।ईमानदार अधिकारियों का नए समाज में जीना मुश्किल हो रहा है।कुछ समय पहले तक उनकी रोटी-पानी ठीक-ठाक चल रही थी पर अब आए दिन पड़ते छापों ने उनकी बड़ी अवमानना की है।बेचारे कितने श्रम से दिन-रात लगाकर आईएएस,पीसीएस बनते हैं,अपनी नींद खराब करते हैं और जब मजे से सपने पूरा करने के दिन आते हैं तो भ्रष्टाचार-विरोधी सिरफिरे फ़िर उनकी नींद खराब कर देते हैं।ऐसे माहौल में हर अफसर शक की निगाह से देखा जाता है।इसलिए अफसरों का पाक-साफ़ दिखना ज़रूरी है।भ्रष्ट नेता तो चुनाव में जीतकर ईमानदारी का प्रमाणपत्र पा लेता है पर बेचारे अफ़सर कहाँ जाएँ ? सो लोकायुक्त ने ऐसे अफसरों के लिए राहत योजना लाकर प्रशंसनीय काम किया है।

अब अफसर यदि विदेश से ईमानदारी सीखकर आएगा तो ज़रूर कुछ खास बात होगी।अव्वल तो उसके पास ईमानदारी का अंतर्राष्ट्रीय बिल्ला होगा जिस की वैधता पर कोई सवालिया निशान नहीं लगा सकता ।ईमानदारी या भ्रष्टाचार के सूचकांक आदि देखने का काम विदेशी एजेंसियां ही करती हैं,सो ऐसे प्रमाण-पत्र धारक शत-प्रतिशत ईमानदार होंगे।अपने देश में आकर वे बिलकुल निर्भय होकर पुश्तैनी काम करेंगे जबकि दूसरे अफसर ईमानदारी से काम करते हुए भी डरेंगे ।विदेश से ईमानदारी सीखकर आए अफसरों पर किसी ने यदि उँगली उठाई तो वे झट से अपना प्रमाण पत्र दिखा देंगे ।इसलिए अब विदेश जाने में भी मारामारी रहेगी।ऐसे में कुछ ले-देकर हमारे अफसर ईमानदारी  सीखकर आते हैं तो बुरा क्या है ?

यदि हमारे अफसर विदेश में यह सीखने जाते हैं कि ईमानदारी कैसे की जाय या बरक़रार रखी जाय तो विदेशी भी उनसे सीखेंगे या यूँ कहिये कि विदेशी ही सीख जायेंगे।हमें अपने अफसरों की खानदानी प्रतिभा पर पूरा भरोसा है और वहाँ वे ईमानदार दिखने के अपने प्रयोग साझा कर सकते हैं।जो व्यक्ति उन्हें ईमानदारी का पाठ पढायेगा उसके घर-परिवार की ये ऐसी सेवा कर देंगे कि वही इनका मुरीद होकर उच्च कोटि का प्रमाण पत्र दे देगा।ये अफसर भ्रष्टाचार को ईमानदारी से करने के गुर बताकर विदेशों में भी अपना झंडा गाड़ देंगे।

इसलिए हम तो यह चाहेंगे कि ऐसे क्रान्तिकारी प्रस्ताव को सरकार की तुरंत स्वीकृति मिलनी चाहिए।सरकार पर दबाव बनाने के लिए अगर अफसरों को कुछ दिन ईमानदारी से काम करना पड़े तो भी कोई हर्ज़ नहीं होना चाहिए।अफसरों के विदेश जाकर ईमानदारी सीखने के पीछे कोई गलत मंशा नहीं है।आखिरकार उन्हें जब कोई चीज़ संस्कार में नहीं मिली है तो उसे उधार लेने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।वे बाहर से ईमानदारी सीखकर आयें और निडर होकर अपना स्वाभाविक काम करें।सरकार को भी चाहिए कि ऐसे अफसरों को छापों से दूर रखे क्योंकि इससे विदेशी-प्रतिष्ठा पर आँच आएगी।इस तरह हम ईमानदार देशों की सूची में पहले पायदान पर पहुँच सकते हैं।

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

टोपी के साथ टीका भी लगाओ !


18/04/2013 को नैशनल दुनिया में !

19/04/2013 को कल्पतरु में ! 

 

भारतीय राजनीति में टोपी का अपना खास महत्व है।यह दो तरह से काम करती है।टोपी लगाने वाला प्रत्यक्षतः स्वयं टोपी धारण करता है पर दरअसल वह औरों को ही टोपी लगाता है।टोपी की यूएसपी यही है कि इसे पहनता कोई और है,महसूसता कोई और।टोपी लगाने वाले हमेशा आनंदित रहते हैं,जबकि जिनको टोपी लगती है ,वे इसका असर पाँच साल के पहले तक नहीं महसूस कर पाते।टोपी-महिमा से प्रभावित होकर एक दल ने तो आम आदमी को आधिकारिक रूप से टोपी लगाने की सोची है।बात टोपी तक रहती तो गनीमत थी,अब इसका नया संस्करण टीके के साथ आ गया है।आने वाला समय देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध होने वाला है।आज़ादी के समय से लेकर अब तक देश में टोपी की कई किस्में लगातार सक्रिय रही हैं।इसी से उत्साहित होकर अब टीका लगाने का नया नुस्खा भी ईजाद किया गया है।

एक नेता ने उद्गार व्यक्त किया है कि टोपी तो लगाना ही चाहिए पर समय की माँग को देखते हुए टीका लगाने के लिए भी तैयार होना पड़ेगा ।यानी आम आदमी को टोपी पहनाने के लिए यदि ज़रूरी हुआ तो टीके से परहेज नहीं है।इसका मतलब यह है कि सत्ता का टीका लगाने का अधिकारी वही होगा,जो बहुरंगी और सामयिक टोपी पहने हो। इससे आम आदमी को सटीक टोपी लगने की प्रत्याशा अचानक बढ़ जाती है।टीका भी उसी को लगाया जाता है जो या तो नेक काम के लिए प्रस्थान कर रहा हो या उसने कोई उपलब्धि अर्जित की हो।अब टोपी लगाने से बेहतर नेक काम दूसरा तो होगा नहीं इसलिए टीका लगाने की सार्थकता इसी से सिद्ध हो जाती है।चुनावी-जंग में विजेता बनने के लिए यदि टीका बाधक बनता है तो उसे पहले या बाद में अपनी सहूलियत के आधार पर लगाया जा सकता है। इस तरह ‘दुहूँ हाथ मुद-मोदक मोरे’ वाली स्थिति होती है ।

रही बात आम आदमी की,सो उसे जब अब तक टोपी से कोई शिकायत नहीं है तो टीका भी स्वीकार्य हो जायेगा।आखिर टोपी पहनना और टीका लगाना उसके अपने हाथ में तो है नहीं ।उसे तो बस इस सबके बीच अपने को टिकाये और बचाए रखना है।अब तक टोपी उसे अपनी छत्रछाया से निहाल करती रही है ,संरक्षित किए हुए है ,तो टीका भी टिकाये रखेगा।वैसे भी हल्दी और चूना मिलाकर टीका बनता है,बस टीका लगाने वाले को थोड़ा एहतियात बरतना होगा कि चूने की मात्रा कम हो ताकि उसका साइड-इफेक्ट न हो।इस तरह वह टीका लगाकर आम आदमी को सही चूना लगा सकता है।आम आदमी बड़ा आशावादी होता है।उसे जिस तरह टोपी लगने की लत लग चुकी है,जल्द ही टीके को भी वह अपना लेगा।उसके लिए भ्रष्टाचार,मंहगाई आदि से निजात पाने का टीका खोजना किसी के एजेंडे में नहीं है।बस यही बात उसे पता नहीं है और लगनी भी नहीं चाहिए।ऐसा होने पर उसे अपने ऊपर से ही भरोसा खत्म हो जायेगा।हमारे राजनेता भी इस भरम को बने रहने देना चाहते हैं।टोपी के साथ टीका लगाना नेताओं से ज़्यादा अब आम आदमी की ज़रूरत है।इसलिए नए माहौल में टोपी और टीका पर कोई टोकाटाकी स्वीकार्य नहीं होगी।अब दोनों के ज़रिये सही ढंग से चूना लग सकेगा। 
 


जनवाणी में १७/०४/२०१३ को प्रकाशित

हम बिलकुल बेकसूर हैं,साब !



 
23/04/2013 को कल्पतरु में
'जनसंदेश टाइम्स' में १७/०४/२०१३ को प्रकाशित

वो तो एकदम बेकसूर निकले। यह बात तब पता चली जब उन सभी ने यह ऐलान कर दिया । दरअसल हम सब अभी तक यही समझते रहे कि राजधानी में हुए गैंगरेप में उन्हीं का हाथ है। यह बात हमें भुक्तभोगियों के बयान ,टीवी चैनलों,अख़बारों की रिपोर्टिंग और पुलिस की सतर्क कार्रवाई के ज़रिये पता चली थी। इतने दिनों की थुक्का-फजीहत के बाद उन बेचारों का बयान अब सबके सामने आया है। यह नौबत आज भी न आती ,अगर उन्हें एक परोपकारी वकील साहब न मिलते। सुनते हैं कि उन्हीं की ज़बरदस्त हौसला-अफज़ाई के बाद वो बयान देने लायक हुए हैं,नहीं तो उन बेकसूरों में से एक ने तो कारागार में ही अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली थी। वकील साहब के बार-बार उसे निर्दोष बताने के बाद भी उसे उनकी वक़ालत पर शक था । अगर आज वह जिंदा होता तो,वह भी बेकसूरों की सूची में शामिल होता।

इन बेचारों के बारे में यह महत्वपूर्ण जानकारी हमें तब मिली,जब पेशी के वक़्त जाते समय थोड़ी देर के लिए अचानक उनसे मुलाक़ात हो गई । जिन लोगों पर इस कांड में शामिल होने का आरोप लगा था  ,उसमें एक तो बिलकुल नाबालिग है। उतनी उम्र वाले तक को तो बलात्कार का मतलब ही नहीं पता होता ! यही सोचकर कुछ लोगों ने उसे अपराधी मानने से साफ़ इंकार कर दिया । दूसरे ने फांसी लगाकर यह साबित करने की कोशिश की कि उसे गलत फंसाया जा रहा था। बाकी बचे हुए चार लोगों ने अपने बचाव में बिलकुल नई सच्चाई बताई । उनमें से एक ने कहा है कि वह उस बस में ही नहीं था,जिसमें यह घटना हुई थी। यहाँ तक कि उसने बस में कभी सफ़र ही नहीं किया है ,यह बात उसे अपने वकील साहब के माध्यम से मालूम हुई है।

दूसरे आरोपी ने खुलासा किया ,’साब ! हम तो उस दिन दिल्ली में ही नहीं थे। हमारे गाँव में मनकापुर की नौटंकी का प्रोग्राम था और ऐसे में हम और कहीं क्यूँ जाते ? नौटंकी देखते हुए ही पुलिस हमें धर लाई थी । उस वक्त हमारे दिमाग में ससुरी नौटंकी चढ़ी हुई थी,सो हम कुछ समझ न पाए। अब जाकर वकील साहब ने यह रहस्योद्घाटन किया है कि हमारे खिलाफ यह साजिश है। ’तीसरे आरोपी ने मुँह बनाते हुए जवाब दिया,’साहब ! हमें तो नशे की लत ने मार दिया। उस दिन रोज़ की तरह चौपाल में हम गाँजे की पिनक में लुढके पड़े थे। हमारे कई साथी वहाँ मस्त और बेसुध थे। पता नहीं,कब पुलिसवाले आए और हमको उठा लिया। वह तो भला हो वकील बाबू का,जो उस रात वहीँ से गुजर रहे थे जब हम चिलम फूँक रहे थे। अब उनकी ही गवाही से हम बेकसूर साबित होंगे। ’

बचे हुए चौथे बेक़सूर ने साफ़-साफ़ बताया,’साब ! हम तो पिकनिक मनाने के लिए अंडमान-निकोबार के टूर पर थे। अगले दिन होटल के कमरे में लगे टीवी में हमें पकड़े जाने की खबर मिली। इस बात से हम बेहद डर गए थे और अपने आप वहीँ की जेल में बंद होने जा रहे थे,पर हमारे वकील साहब ने फ़ोन करके हमें बुला लिया कि जेल में हम सेफ रहेंगे। अचानक एक साथी के जेल में ही निपट जाने के बाद हम सहम गए थे,पर वकील साहब ने अपनी पिछली कई उपलब्धियाँ गिनाई,जिससे हमें इस देश के कानून पर भरोसा हो गया है। ’

इस तरह का वाकया बताता है कि हम बहुत ही भावुक लोग हैं जो किसी भी आन्दोलन या खबर से बहुत जल्द प्रभावित हो जाते हैं। ऐसे में हमेशा बेकसूर ही मारे जाते हैं।


'हरिभूमि' में १२/०६/२०१३ को प्रकाशित
 
 

 

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

मधुमक्खी बनाम मोदी-मक्खी !

११/०४/२०१३ को कल्पतरु में !
 
10/04/2013 को जनसंदेश में !


मैं बिस्तर पर सोने की कोशिश में लगा था कि अचानक कानों में भिन-भिन, भुन-भुन का तीखा स्वर सुनाई दिया।मैंने थोड़ा ध्यान से देखा तो मेरे कान के दोनों ओर मक्खियाँ भिन-भिना रही थीं।मुझे लगा कि वे किसी भी क्षण काट सकती हैं,यह सोचकर थोड़ा होश में आया ।मैंने पहले बाईं ओर वाली मक्खी से अर्ज किया ,’तुम क्यों मेरे पीछे पड़ी हो ? मुझे थोड़ा तो आराम करने दो।’ उस युवा मक्खी ने बताया कि मैं काटने वाली मक्खी नहीं हूँ।मैं यहाँ सीधे मधुमक्खी के छत्ते से प्रकट हुई हूँ।रानी मक्खी का आदेश है कि लोगों को बता दो कि छत्ते पर शहद बन चुका है।हमारे कई लोग उस पर चिपट चुके हैं।आप भी थोड़ा-सा शहद चट लें,बस यही बताने आई हूँ।’

मेरी तन्द्रा तब तक भंग हो गई थी।मैं सोचने लगा कि आजकल कितना अच्छा समय आ गया है कि मक्खियाँ स्वयं अपने शहद को हमें समर्पित करने को आतुर हैं।लगता है अब चैन की नींद सो सकूंगा ।यह सोच ही रहा था कि दाएँ कान की तरफ़ ज़ोर की भन्नाहट हुई।मैं एकदम से हड़बड़ा उठा।उधर की ओर मुखातिब हुआ तो पीले रंग की बड़ी सी मक्खी दिखाई दी।मैंने सहमते हुए उससे अपना गुनाह पूछा।उस मक्खी ने ज़वाब देने से पहले मेरे पूरे शरीर का निरीक्षण किया और ठीक कान के नीचे भन्ना कर बोली,’मैं मधुमक्खियों की नकली नस्ल की नहीं हूँ।मेरा आधुनिक अवतार हुआ है और लोग मुझे मोदी-मक्खी के नाम से जानते हैं।मेरी खासियत है कि मैं शहद-वहद नहीं चटाती,बल्कि ज़ोर से काट लेती हूँ।’

इतना सुनते ही मैं और सतर्क हो गया।मैंने जिज्ञासा की कि मगर काटने का काम तो बर्र का होता है,आप तो मक्खी लग रही हैं।मैंने अभी-अभी मधुमक्खी से बात की है। अब ये मोदी-मक्खी कौन-सी नई प्रजाति आ गई ?’उसकी भिन्नाहट पहले से तेज हो गई थी;बोलने लगी,’अब सब लोग जान जायेंगे।अभी तक हमने कुछ लोगों का ही कर्ज उतारा है।अब मौका आ गया है कि सभी लोगों पर यह उपकार कर दूँ।रही बात नई प्रजाति की,सो हम वैसे तो बहुत दिनों से सक्रिय हैं,पर हर बार हमारे रूप-रंग बदल जाते हैं।मैंने बात आगे बढाते हुए पूछा,’तुम्हारे यहाँ रानी मक्खी कौन है और उसका काम क्या है?’उसने तड़ से ज़वाब दिया ,’हमारे यहाँ कोई रानी-वानी नहीं है।एक बूढ़ी बर्र है जिसके डंक अब निष्क्रिय हो गए हैं।हम उसको कोई काम नहीं करने देते।हम मोदी-मक्खी की पोशाक पहनकर मधुमक्खी जैसा भले दिखते हैं पर हमने अपना स्वाभाविक गुण नहीं छोड़ा है।’

‘पर क्या तुम्हारा छत्ता भी है ?हमने धीरे से अगला सवाल पूछ लिया।मोदी-मक्खी अचानक ज़ोर से भन्नाने लगी।वह अब हमारी ठीक छाती के ऊपर मंडराने लगी।अपने डंक को बाहर निकालते हुए वह बोली,’हम छत्ता नहीं बनाते।हमारे पास माँ है जिसकी हिफाज़त हम अपने तरीके से करते हैं।जो भी इसे छत्ता समझकर चाटने आता है,हम उसे काट लेते हैं।माँ थोड़ा नादान है जिसे चाटने और काटने वालों में फर्क नहीं पता है।हम अगर उसकी सेवा भी करते हैं तो हमारे डंक उसे लग जाते हैं।अब इसमें भला हमारी क्या गलती ?माँ को हमारी भावनाएं समझनी चाहिए।मैं इसीलिए तुम्हें सतर्क करने आई हूँ कि यह बात तुम भी समझो और मेरी माँ को भी समझाओ !”

मैंने अब मधुमक्खी की तरफ़ निहारा।वह नदारद हो चुकी थी।हो सकता है रानी मक्खी ने उससे केवल भिनभिनाने का ही काम करने को कहा हो।मेरी नींद अब पूरी तरह गायब हो चुकी थी।



मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

बुढ़ापे में फगुनाहट !

 
जबसे हमारे शरीर में बुढ़ापे ने दस्तक दी है,जीवन में किसी प्रकार का रस नहीं दिखता है।मात्र फागुन ऐसा महीना है,जिसके आने की आहट से ही बूढ़ी और मुरझाई नसों में गजब का रक्त-संचरण होने लगता है।इसके आगमन से मांसल-त्वचा से रहित हड्डियाँ एकाएक आत्म-निर्भर हो उठती हैं।पूरे साल भर की प्रतीक्षा के बाद मन में ऐसी कसमसाहट होने लगती है जिसको दबा पाना अशक्त काया के लिए बड़ा कठिन होता है ।मन में न जाने कितने मौलिक और गुलाबी विचार आने लगते हैं ?क्या यह सब फागुन का असर है या हमारी शारीरिक संरचना में बदलाव के महत्वपूर्ण संकेत ?

फागुन हमेशा से हमें अपना समझता रहा है।इसके आने की खबर से ही मौसम बिलकुल हमारे अनुकूल बन जाता है।फागुन में पता नहीं क्या है कि ये जब आता है,अंग-अंग में,पोर-पोर में, नई तरंग पैदा कर देता है।फागुन के इस काम में हवा खूब सहयोग करती है।वह फागुन के संग जब चलती है,मौसम में क़यामत-सी आ जाती है।हमारे सूखे शरीर पर यह ऐसी झुरझुरी पैदा कर देती है कि ग्यारह महीने से संत-प्रवृत्ति वाला मन डांवाडोल होने लगता है।दिल के ऊपरी भाग में अनायास धड़कन बढ़ जाती है,साथ ही साथ हाथ-पैरों में जादुई ताकत का अहसास होने लगता है।

फागुन की हवा का सबसे बड़ा असर आँखों पर पड़ता है और इसका सबसे अधिक खामियाजा यही भोगती हैं।जब भी कोई नवयौवना आँखों के झीने पर्दों से टकराती है,इनकी ज्योति अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती है।रति और अनंग की कल्पना करके हमें असीम सुख की प्राप्ति होती है और हम नई कल्पनाओं में लहालोट होने लगते हैं।अगर सुंदरी परिचित हुई तो यह सुख दूना हो जाता है।जिन सुंदरियों से कभी बात करने की हिम्मत नहीं हुई,हम उनको अपने प्रेम-निवेदन से स्वागत करने को आतुर हो उठते हैं।

इस फागुन की सबसे बड़ी सहेली होली है।इसके शुरुआती दिन बड़े मादक होते हैं।छेड़छाड़ और प्रेम-प्रस्ताव के लिए सबसे कम जोखिम वाले यही दिन माने जाते हैं।जिन स्वप्न-सुंदरियों को दूर से देखकर हम साल भर केवल आहें भरते रहते हैं,इन दिनों उनके कोमल गालों पर अबीर-गुलाल मलने का बहाना हमें आसानी से हासिल हो जाता है।यह समय इतना मादक होता है कि इसकी बानगी खेत-खलिहान तक देखी जा सकती है।फगुनाहट आते ही सरसों और गेहूं को सरे-आम रति-प्रसंग करते हुए पकड़ा जा सकता है।फागुनी-हवा के मदमस्त झोंके से सयानी सरसों पके हुए गेहूं पर झुक जाती है।इस प्रयास में कई बार वह मुँह के बल (बाली सहित) ज़मीन पर आ जाता है,पर उफ़ नहीं करता ।इस क्रिया को देखकर पड़ोसी चना जल-भुन कर ऐंठ जाता है।अपने छोटे कद के कारण वह ऐसे प्रसंग का हिस्सा नहीं बन पाता,बस आहें भरकर रह जाता है।

फागुन में होली का असर मानव से लेकर प्रकृति तक समभाव से होता है।फागुनी-हवा जहाँ हममें अतिरिक्त ऊर्जा का संचार कर देती है,वहीँ पेड़-पौधों को भी पका देती है।यह हवा खासकर आम के वृक्ष पर तुलनात्मक रूप से अधिक मेहरबान होती है।यह ठीक वैसे ही होता है जैसे मनुष्यों में वह बुजुर्गों पर असर करती है।फागुनी-हवा आम के पत्तों के रस में इतना घुलमिल जाती है कि फागुन के जाते ही वे निचुड़कर टपकने लगते हैं।इसके थोड़े दिन बाद ही उनमें नया यौवन आ जाता है और वे बौराने लगते हैं।मनुष्यों के बारे में अभी तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला है क्योंकि इनका पतझड़ और बौराना सार्वजनिक रूप से देखा नहीं गया है।

फागुन कुछ रिश्तों को उनके उच्च स्तर पर पहुँचाने के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।भाभी,बुआ और साली के रिश्ते बड़े आकर्षक होते हैं और इन दिनों इनमें और निखार आ जाता है।इन सभी रिश्तों में साली का रिश्ता बिलकुल फागुनी सांचे में फिट बैठता है।जीजा-साली अपने दबे हुए अरमानों को फागुन के लिए बचाकर रखते हैं और होली में पिचकारी के रंगों के साथ पूरी तन्मयता से उड़ेल देते हैं।सबसे बड़ी बात यह भी कि यह सब खुले-आम होता है और किसी को नागवार नहीं गुजरता ।पाहुन को परमानन्द की अनुभूति तब होती है जब वह अपने खुरदुरे हाथों से प्यारी साली के कोमल कपोलों को गुलाल से मसलता है।इस मामले में हम भाग्यहीन निकले,जो हमारी कोई साली न हुई।ऐसे में हम फागुन के द्वारा प्रदत्त अन्य सुविधाओं का लाभ उठाने को मजबूर होते हैं।इस तरह फागुन में रस लेने से कोई वंचित नहीं रहता।हमारे बूढ़े होते शरीर के लिए तो यह एक टॉनिक का काम करता है।शरीर तब और फड़कने लगता है,जब ढोल की थाप के बीच फाग की धुन सुनाई देती है।ऐसे फागुन का हम तो पूरे दिल से स्वागत करते हैं।

 

हज़ार हाथों वाली सरकार !

09/04/2013 को हरिभूमि में !


 
अभी तक हम केवल दो हाथों के कमाल से परिचित थे क्योंकि उन्हीं से अपनी साइकिल को मनमर्जी से चलाते थे। हमें अब तक यह भ्रम था कि अपने हाथों पर हमारा ही नियंत्रण है और अपनी साइकिल को हम मनचाही दिशा दे सकते हैं । इस बात का हमें अभी-अभी इलहाम हुआ है कि ये हाथ भी हमारे साथ नहीं हैं क्योंकि हम अपनी साइकिल को कहीं भी और कभी भी नहीं घुमा सकते हैं। सरकार बहादुर के हाथ लम्बे ही नहीं,संख्या में भी हज़ार हैं। हमने बचपन में पढ़ा था कि पुराने समय में सहस्रबाहु नाम के कोई राजा हुए थे पर उसका प्रत्यक्ष प्रमाण आज मिल पाया है । हजार हाथ होना अब मिथक या कोरी गल्प नहीं रहा। हम हर समय अपनी गर्दन पर हज़ार हाथों का दबाव महसूस कर रहे हैं।

हम सत्ता में जब भी रहे हैं,अपनों के प्रति सदैव मुलायम रहे हैं। आज हमारा बेटा भी प्रदेश में यही कर रहा है। पर जो जुम्बिश केन्द्र के हाथ में है,वह प्रदेश में कहाँ ? हमने सरकार के हाथ को यह सोचकर सहयोग दिया  था कि उसके हाथ कमज़ोर होने से सांप्रदायिक शक्तियों के हाथ मज़बूत हो जायेंगे पर यहाँ तो हमारी जान के लाले पड़े हैं। जिन्हें हम सांप्रदायिक शक्तियाँ समझते रहे हैं,दरअसल वे तो राष्ट्रीय एकता के लिए प्रतिबद्ध हैं। अब जाकर हमें अहसास हुआ है कि रथयात्री जी हरिश्चन्द्र की तरह सत्यवादी हैं तथा उनके आदर्श नेता एक महान विभूति थे। अब ऐसे अतीत वाले लोग न तो देश के लिए और न ही हमारे लिए खतरा बन सकते हैं। हम दो-मुँहे और दोनों हाथ से खाने वाले तो हो सकते हैं पर सरकार बहादुर की तरह हज़ार-मुँह और हज़ार हाथ वाले नहीं ।
शुरू में हमने समझा था कि सरकार के पास मुख्य रूप से दो ही हाथ हैं;सीबीआई और आयकर विभाग, पर वास्तव में ये महज़ दो नहीं हैं। सीबीआई और आयकर वालों के हर कर्मचारी के पास भी दो-दो हाथ हैं। उन सबको जोड़ लेने पर संख्या हजारों में पहुँचती है और हम उनसे दो-दो हाथ करने की कल्पना भी नहीं कर सकते। टेलीफोन-टेपिंग से लेकर आय से अधिक संपत्ति के मामले और अनगिन घोटाले इनके बाएं हाथ का खेल है। इनको दूसरे हाथ की ज़रूरत विश्वासमत के समय पड़ती है जब वह हमारी जेब में कुछ डालकर सब कुछ निकालने के काम आता है। हम इस सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे हैं,तभी तक हम बाहर हैं। जैसे ही हमने अपने हिसाब से साइकिल घुमाने की जुर्रत की,तुरंत अंदर हो जायेंगे। इसलिए हमने अपने हाथ आत्म-समर्पण की मुद्रा में ऊपर की ओर उठा रखे हैं।

हम आम आदमी को यह आश्वस्त करना चाहते हैं कि भविष्य में यदि हम केन्द्र में आ गए तो हमारे पास सीमित हाथ होंगे। हमारे और हमारे परिवार के अलावा और कोई हाथ जनता की सेवा में हम नहीं लगाएंगे। हम मुलायम हाथों से ही अपना काम कर लेंगे। साथ ही हमारा यह पक्का वायदा है कि अपने हाथों से और कोई काम नहीं करेंगे जिससे हमारे सहयोगियों को कष्ट हो। इसलिए हम राजनैतिक बिरादरी में भी खांटी समाजवाद लायेंगे।


मिलाप में १०/०४/२०१३ को !
 

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी !


 

 
04/04/2013 को दैनिक मिलाप में !

 


08/04/2013 को कल्पतरु एक्सप्रेस में !
चुनावों के सन्निकट आते ही सन्निपात में पड़ी देश की मुख्य विपक्षी पार्टी अचानक सक्रिय हो उठी। पार्टी अध्यक्ष ने ढेर सारे विमर्श किए,कई तरह के मेनू खंगाले,तब कहीं जाकर ताजा चुनावी-व्यंजन तैयार हुआ। इसमें हर तरह के मसाले और तड़के का समायोजन था। हाई-प्रोफाइल समिति के बन जाने के बाद इसकी पहली बैठक आहूत की गई जिसका मुख्य एजेंडा था कि आगामी चुनाव में पार्टी किस चेहरे के साथ चुनाव में उतरे। इस बैठक से देश से ज़्यादा पार्टी की दशा और दिशा तय होनी थी,इसलिए इसमें सभी महत्वपूर्ण चेहरे शामिल हुए । अध्यक्ष जी के आवास पर ही एक बड़े पंडाल के नीचे केसरिया दरी बिछा दी गई । बीच में एक कुर्सी रखी गई ,जिस पर आगामी चुनावी-चेहरे को बैठना था ।पंडाल के दायें-बाएं टीवी स्क्रीन लगी हुई थीं।

अध्यक्ष जी ने इसी बीच औपचारिक बैठक की घोषणा कर दी। उन्होंने कार्यवाही शुरू करते हुए बताया कि आने वाले चुनावों में पार्टी को प्रधानमंत्री पद मिलने की घोर आशंका है,इसलिए इच्छुक लोग अपनी दावेदारी पेश करें । अध्यक्ष जी ने व्यवस्था दी कि कार्यक्रम की शुरुआत दाईं ओर से होगी,इसलिए प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए उसी तरफ से एक आवाज़ आई । ’मैं नेता-प्रतिपक्ष हूँ। सरकार बदलने पर स्वाभाविक रूप से मेरा ही दावा बनता है। वैसे भी देश की जनता स्वराज चाहती है और  स्वराज के आने पर शुचिता अपने आप ही आ जायेगी । इसलिए इस पद पर मेरी प्रबल दावेदारी है ।’

उस आवाज़ के शांत होने के बाद एक जोशीले नेता खड़े हुए। उन्होंने कहा,’इस देश की अधिसंख्य जनता खेल--प्रेमी है। क्रिकेट और राजनीति दोनों हमारे प्रिय खेल हैं। देश में इस समय अपराधों की भी बाढ़ है और एक कानून-विशेषज्ञ होने के नाते मुझे इन अपराधों का मनोविज्ञान समझ में आता है। इस लिहाज़ से इस पद के लिए मैं कहीं अधिक फिट हूँ। ’ अचानक परदे पर केसरिया पगड़ी पहने थ्री-डी चेहरा उभरा, जिसने घोषणा की ,’’अगला उम्मीदवार निर्विवाद रूप से मैं ही हूँ। मीडिया से लेकर गिनीस बुक तक मेरे चर्चे हैं। मैंने अभी-अभी अमेरिका वालों को अपने दर्शन दिए हैं,जबकि सारी दुनिया उनके दर्शन करना चाहती है। मैं छोटे-मोटे खेल नहीं खेलता,मेरे पास गेमप्लान है। प्रदेश की तरह पूरे देश में हम खुल के खेलेंगे । हमारे पास नेटवर्क है,समझ है, सोच है। ’

तभी पास में बैठे एक बुजुर्ग नेता उठकर बोलने लगे ,’पर भाई ! मेरे पास ज़्यादा समय नहीं है। मैंने देश व पार्टी को बहुत कुछ दिया है। देश में रथ चलाने का श्रेय मुझे ही जाता है। जिन्ना की तरह मैं सेकुलर भी हूँ । गहरे अनुभव और आशावाद का मैं दुर्लभ उदाहरण हूँ। प्रधानमंत्री बनने पर दावेदारी मैंने छोड़ी भी नहीं,फ़िर कैसे इतने लोग सामने आ गए ?’

चुनावी-चिंतन की बैठक अचानक गर्म हो उठी। मजबूरन अध्यक्ष जी को हस्तक्षेप करना पड़ा। वे कहने लगे,’कोई यह मत सोचे कि अध्यक्ष बनने से उसकी दावेदारी खत्म हो जाती है। दरअसल ,जब कोई सहमति नहीं बनती है तो वही अंतिम विकल्प बचता है । पार्टी और देश में से एक को चुनने के समय मैं देश को चुनना ज़्यादा पसंद करूँगा। इसलिए आप लोग आम सहमति से मुझे ही यह दायित्व सौंप दें। ’अध्यक्ष जी के बीज-वक्तव्य के बीच में ही किसी ने पंडाल की बत्ती गुल कर दी। चारों तरफ अँधेरा पसर गया था ।टीवी स्क्रीन पर अब केवल थ्री-डी वाली केसरिया-आकृति हुंकार भर रही थी ।

बयान बाबू का बयान !

०४/०४/२०१३ को जनवाणी और जनसंदेश में !


राजधानी की व्यस्तता से समय निकालकर थोड़े दिन के लिए हम गाँव आ गए थे।होली का त्यौहार ख़त्म हुआ और हमारी छुट्टियाँ भी,सो हम अपने सामान के साथ शहर की ओर जाने वाली सड़क पर बस का इंतजार करने लगे।अचानक सामने से बयान बाबू साइकल पर सवार दिखाई दिए।हमें देखते ही वो साइकल पटककर हमारी तरफ लपके।हमने उनके बोलने से पहले ही आत्मसमर्पण करते हुए गुहार लगाई कि इस समय हम बयान लेने के मूड में नहीं हैं,बेबस होकर राजधानी पहुँचने का साधन देख रहे हैं।हम आपसे वहीँ पर बयान ले लेंगे।

बयान बाबू कुछ और सुनने के मूड में नहीं थे ।बोलने लगे,’समय बहुत कम है।हम कहीं भी,किन्हीं भी परिस्थितियों में बयान देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।इसलिए इस समय हम गाँव-गली और शहर का भेद किये बिना बयान बाँट रहे हैं।जब दूसरी दिशा से हर पल बदलते हुए बयान आ रहे हों तो हम उसका जवाब देना अपना कर्तव्य समझते हैं।हमारी खासियत है कि हम अपने बयान पर कायम और डटे रहते हैं,मुलायम नहीं होते।आप हमसे ताज़ा बयान ले लीजिये,अपनी बस बाद में पकड़ लेना।मेरा बयान छूट गया तो बहुत अनर्थ हो जायेगा।हाईकमान ने हमारा चयन बयान देने के लिए ही किया है और हम अपनी उपयोगिता सिद्ध करने पर उतारू हैं इसीलिए हम साइकल से उतरे हैं।

हम बेबस होकर उनके बयान को गले लगाने को तैयार हो गए ।वे अपने पूरे फॉर्म में दिख रहे थे।हमने उनसे पहला सवाल पूछा कि प्रदेश में आगामी लोकसभा चुनाव में आपकी पार्टी का प्रदर्शन कैसा रहेगा ?बयान बाबू ने पास पड़ी साइकल को नज़रंदाज़ करते हुए कहा,’केंद्र में हमारी सरकार फिर से बनने जा रही है ।कुल सीटों में आधी हमारे खाते में डायरेक्ट-कैश की तरह ट्रांसफर हो जाएँगी।हम खांटी समाजवादी हैं और खोटे समाजवादियों से हमारा कोई मुकाबला ही नहीं है।हाथ और हाथी स्वाभाविक मित्र हो  सकते हैं,पर साइकल नहीं ।हाथ ही साइकल को घुमाता है,साइकल कभी हाथ को न घुमा सकती है और न ही दिशा दे सकती है। ऐसे लोगों को  सिर्फ कांधा देने के लिए हाथ का साथ मिलेगा और यह काम हमारी अगुवाई में होगा।

हमने उनकी इस आत्मविश्वास भरी भविष्यवाणी का कारण पूछा तो उन्होंने स्पष्टीकरण देते हुए बताया,’हमारे बयान दुराग्रह या सत्याग्रह से परे होते हैं।जब भी हमारी जीभ मचलती है,बयान फट पड़ते हैं।हमारा काम बयान देना है,संभालना नहीं। हम केवल मंत्रालय सँभालते हैं।हमने अपने हाथ से आम आदमी को उठाने का संकल्प लिया हुआ है।इस काम को हम किसी और के भरोसे नहीं छोड़ सकते।जो ऐसा करने की कोशिश करेंगे,वे ही उठ जायेंगे।

अचानक बयान बाबू थर-थर कांपने लगे।हमने पूछा कि सब कुशल तो है ? वे सहज होते हुए बोले,’यह थरथराहट मोबाइल की है।हाईकमान का सन्देश है आया है कि जिम्मेदारी बदल रही है।अब आपको राजधानी में कल मिलूँगा,एक नए बयान के साथ।इतना कहकर उन्होंने पास पड़ी साइकल को असहाय नज़रों से देखा और हमारे साथ ही अगली बस में सवार हो गए।