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शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

सौ करोड़ी लात!

मैंने जबसे सुना है कि राज्यसभा की एक सीट के बदले मिल रहे सौ करोड़ रूपयों पर किसी ने लात मार दी है,उस लात को खोज रहा हूँ।मैं कित्ता अभागा हूँ कि न जेब में दो कौड़ी हैं और न कायदे की लात ही।लात हो तो ऐसी जो सीधे सौ करोड़ पर पड़े।मेरी तुच्छ लात दिन भर म्युनिसिपल्टी की नालियों से टकराती रहती है और शाम तक महज डब्बे-भर कूड़ा जुटा पाती है।सोचिये उनके क्या जलवे होंगे,जिनकी लात करोड़ों-करोड़ स्पर्श करके सही-सलामत अपने मूल स्थान पर लौट आती है।

मुझे जहाँ उस लात पर गर्व और खुशी का अनुभव हो रहा है,वहीँ ‘सौ करोड़’ की हुई मानहानि पर चिन्ता और दुःख भी ।अगर यह बात सौ-करोड़ी फिल्म वालों को पता चल गई तो उन्हें अपनी रेटिंग हज़ार-करोड़ तक बढ़ानी पड़ सकती है।यह सरासर भारतीय मुद्रा का अवमूल्यन और अपमान भी है।लात की ऐसी हिम्मत कि अपने को खड़ा करने वाले का ही तिरस्कार करे ! लात के इस तरह बढ़ते प्रभाव पर गहन मंथन होना चाहिए अन्यथा भविष्य में लात खाने को लेकर कई नई सम्भावनाएं जन्म ले सकती हैं।जिनके पास सौ करोड़ नहीं होंगे,वे लात खाकर ही मुक्ति पा सकते हैं और जिनके पास इससे ज़्यादा बजट होगा,वे ही लात की जद से बाहर होंगे।

सौ करोड़ पर लात मारना खरीदारों के लिए खुलेआम चेतावनी है।वे अपनी जेब को इस हिसाब से भरकर लाएँ कि बदले में लात नसीब न हो।लातों के भूत बातों से नहीं मानते,ऐसा सुना था पर अब तो करोड़ों रुपयों से भी नहीं मान रहे हैं।वे टिकट पाकर ‘लातत्व’ को भूल सकते हैं,भले ही इसका अनुभव उन्हें सार्वजनिक रूप से हो।कुर्सी पाकर खुद की लात में अपने आप गुरुता आ जाती है,सो इस भारीपन को पाने के लिए सौ-दो-सौ करोड़ क्या चीज़ हैं ! अभी तक आदमी वीआईपी होता था पर अब से वह बजरिये लात जाना जाएगा।जिसकी जितनी टिकाऊ और कीमती लात,उसकी उतनी बड़ी औकात।

उस गौरवशाली लात को बार-बार नमन है जो पल भर में ही करोड़ों रुपयों से ऊँचे तुल गई।इससे सदन की गरिमा और टिकट की अस्मिता की रक्षा की है।करोड़-दो-करोड़ रूपये जेब में लेकर चलने वाले धन्नासेठ अब टिकट पाने के बजाय अपनी कोई कम्पनी खोल लें,जिसमें ‘लात से कैसे बचें’ का बेहतर ढंग से प्रशिक्षण दिया जाय।इससे उनका व्यापार-घाटा तो कम होगा ही,भविष्य में बनने वाले लतखोर भी कुशल और दक्ष हो सकेंगे।ऐसे में उनको भी लाभ होगा,जो लात मारने के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं।फ़िर वे सरेआम लतियाकर पीठ पीछे ‘समर्पित कार्यकर्त्ता’ का प्रमाण-पत्र निर्गत कर सकेंगे,जिससे दोनों पक्ष अधिकतम लाभ उठा पाने में समर्थ होंगे।

सौ करोड़ तो मेरे पास नहीं हैं पर सोच रहा हूँ कि एक बार उस ‘दैवीय-लात’ का प्रहार सह लूँ,ताकि मुझे भी जीने की वजह मिल जाये।टिकट लेने का शौक तो सिनेमा से भी पूरा कर सकता हूँ पर ऐसी दिव्य-लात दुर्लभ है।इस समय मन में विकट अंतर्द्वंद्व मचा हुआ है कि उच्च सदन का टिकट पाकर अपने को धन्य समझूँ या लात खाकर? 

बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

मोहे लालकिला पहुँचा दो !



 
 
 
२०/०२/२०१३ को जनसंदेश में !
 
प्यारे कार्यकर्ताओं !
प्रदेश की गद्दी हाथ से जाने के बाद से ही मेरे दिल में अजीब-सी छटपटाहट महसूस हो रही है,पर आप सबको नाहक परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। बस,सही समय का इंतज़ार है। अभी प्रदेश में सत्ता पाने का समय बहुत दूर है,यहाँ तक कि अभी इसका स्वप्न भी नहीं आ रहा है। हमने पिछले साल संसद में कोशिश की थी कि पदोन्नति में आरक्षण दिया जाए पर कुछ बहुजन-विरोधी ताकतों ने एक षड्यंत्र के तहत उसे कानून नहीं बनने दिया। उन सभी को आशंका थी कि इससे कहीं उनके अपने हित न प्रभावित हों। अगर ऐसा हो जाता तो एक मुख्यमंत्री की पदोन्नति आसानी से प्रधानमंत्री पद पर हो सकती थी,पर अब हमें इसे पाने के लिए सीधे मैदान में उतरना होगा।
अबकी बार आनेवाले लोकसभा चुनावों में हमें प्रधानमंत्री पद हथिया लेने की भीषण सम्भावना प्रतीत हो रही है। जहाँ हमारे मुख्य विरोधी पुत्र को प्रदेश का राज थमाकर अपने लिए देश के प्रधानमंत्री पद का ख्वाब देख रहे हैं,वहीँ हमारे सभी सहयोगी बिलकुल बेरोजगार हो गए हैं। इन लोगों को ऐसा करते हुए तनिक भी लिहाज़ नहीं है। अगर एक दलित, ख़ासकर महिला, इस देश की प्रधानमंत्री बन जाए,तो मान्यवर का सपना पूरा हो जायेगा,पर विरोधी शक्तियाँ इस नेक काम को रोकने के लिए एक हो गई हैं। हम ऐसा हरगिज़ नहीं होने देंगे कि कोई प्रदेश और देश दोनों जगह अपनी दावेदारी ठोंके और हम यूँ ही हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें। हाथ के साथ रहने से जो मिलना था,वह भी तो नहीं मिल पाया क्योंकि न्यायालय ने फ़िर से हमारे मामलों को खोलने का फरमान जारी कर दिया है।
हम लालकिले की प्राचीर पर चढ़ना चाहते हैं और यह सब अब हाथ के सहारे नहीं,हाथी पर सवार होकर ही संभव होगा। इसलिए आप सब अगर समाज की भलाई और हमारे लिए मलाई चाहते हो तो लोगों के बहकावे में नहीं आयें। हमारे प्रतिपक्षी चुनावों तक खूब सक्रिय रहेंगे। इसके लिए वे डायरेक्ट कैश या लैपटॉप का लॉलीपॉप देने की कोशिशें कर रहे हैं,पर आप सब इनके बहकावे में न आइयेगा। आप तो जानते ही हैं कि हम सत्ता से बाहर रहते हुए वैसे ही खस्ताहाल हैं। ऐसे में हम अपनी गठरी को थैली बनाने का जोखिम नहीं ले सकते हैं। इसलिए आपसे अपील है कि अगले चुनाव में हमारे सिवा किसी अन्य के झांसे में न आयें। हम बहुजन हितों के लिए लालकिले को नीला करना चाहते हैं और यह हम आपके दम पर करके दिखायेंगे।
इस बार प्रधानमंत्री पद मिल जाना असंभव नहीं है। हमें इसके लिए बहुमत की भी चिंता नहीं करनी है। जहाँ हाथ वाले युवराज इस पद को लेकर अनमने हैं वहीँ दूसरे लोग मोदी और गैर-मोदी राग अलाप रहे हैं। हमने अगर लोकसभा में पचास सीटें भी हथिया लीं तो पांच सौ पैंतालीस के सदन में हमारी लॉटरी लग सकती है। इसलिए आप सब मिलकर जुट जाएँ और हमारी अंतिम मनोकामना पूरी करने में सक्रिय सहयोग करें। सच मानिये,मैं जब लालकिले की प्राचीर से ,बुलट-प्रूफ शीशे से अपना वक्तव्य दूँगी,हर शोषित और दलित खुशहाल हो जायेगा। मैं मंत्रिमंडल में अपने पुराने सहयोगियों की पहले की सेवाओं को देखते हुए,उनका भी पुनर्वास करूँगी। रही बात जनता की,तो जो पैंसठ सालों से अब तक सही-सलामत है,कौन-सा मेरे कार्यकाल में मर-खप जायेगी ??


 DLA में २८/०२/२०१३ को !

अपने करम जाँहिं अपकारी

कई दिनों बाद ककुआ कल शाम को दिखाई दिए।मैं पान की दुकान के पास खड़ा था कि अचानक उन पर नज़र पड़ी।वह बचकर निकलने ही वा...