हाथ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हाथ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

हज़ार हाथों वाली सरकार !

09/04/2013 को हरिभूमि में !


 
अभी तक हम केवल दो हाथों के कमाल से परिचित थे क्योंकि उन्हीं से अपनी साइकिल को मनमर्जी से चलाते थे। हमें अब तक यह भ्रम था कि अपने हाथों पर हमारा ही नियंत्रण है और अपनी साइकिल को हम मनचाही दिशा दे सकते हैं । इस बात का हमें अभी-अभी इलहाम हुआ है कि ये हाथ भी हमारे साथ नहीं हैं क्योंकि हम अपनी साइकिल को कहीं भी और कभी भी नहीं घुमा सकते हैं। सरकार बहादुर के हाथ लम्बे ही नहीं,संख्या में भी हज़ार हैं। हमने बचपन में पढ़ा था कि पुराने समय में सहस्रबाहु नाम के कोई राजा हुए थे पर उसका प्रत्यक्ष प्रमाण आज मिल पाया है । हजार हाथ होना अब मिथक या कोरी गल्प नहीं रहा। हम हर समय अपनी गर्दन पर हज़ार हाथों का दबाव महसूस कर रहे हैं।

हम सत्ता में जब भी रहे हैं,अपनों के प्रति सदैव मुलायम रहे हैं। आज हमारा बेटा भी प्रदेश में यही कर रहा है। पर जो जुम्बिश केन्द्र के हाथ में है,वह प्रदेश में कहाँ ? हमने सरकार के हाथ को यह सोचकर सहयोग दिया  था कि उसके हाथ कमज़ोर होने से सांप्रदायिक शक्तियों के हाथ मज़बूत हो जायेंगे पर यहाँ तो हमारी जान के लाले पड़े हैं। जिन्हें हम सांप्रदायिक शक्तियाँ समझते रहे हैं,दरअसल वे तो राष्ट्रीय एकता के लिए प्रतिबद्ध हैं। अब जाकर हमें अहसास हुआ है कि रथयात्री जी हरिश्चन्द्र की तरह सत्यवादी हैं तथा उनके आदर्श नेता एक महान विभूति थे। अब ऐसे अतीत वाले लोग न तो देश के लिए और न ही हमारे लिए खतरा बन सकते हैं। हम दो-मुँहे और दोनों हाथ से खाने वाले तो हो सकते हैं पर सरकार बहादुर की तरह हज़ार-मुँह और हज़ार हाथ वाले नहीं ।
शुरू में हमने समझा था कि सरकार के पास मुख्य रूप से दो ही हाथ हैं;सीबीआई और आयकर विभाग, पर वास्तव में ये महज़ दो नहीं हैं। सीबीआई और आयकर वालों के हर कर्मचारी के पास भी दो-दो हाथ हैं। उन सबको जोड़ लेने पर संख्या हजारों में पहुँचती है और हम उनसे दो-दो हाथ करने की कल्पना भी नहीं कर सकते। टेलीफोन-टेपिंग से लेकर आय से अधिक संपत्ति के मामले और अनगिन घोटाले इनके बाएं हाथ का खेल है। इनको दूसरे हाथ की ज़रूरत विश्वासमत के समय पड़ती है जब वह हमारी जेब में कुछ डालकर सब कुछ निकालने के काम आता है। हम इस सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे हैं,तभी तक हम बाहर हैं। जैसे ही हमने अपने हिसाब से साइकिल घुमाने की जुर्रत की,तुरंत अंदर हो जायेंगे। इसलिए हमने अपने हाथ आत्म-समर्पण की मुद्रा में ऊपर की ओर उठा रखे हैं।

हम आम आदमी को यह आश्वस्त करना चाहते हैं कि भविष्य में यदि हम केन्द्र में आ गए तो हमारे पास सीमित हाथ होंगे। हमारे और हमारे परिवार के अलावा और कोई हाथ जनता की सेवा में हम नहीं लगाएंगे। हम मुलायम हाथों से ही अपना काम कर लेंगे। साथ ही हमारा यह पक्का वायदा है कि अपने हाथों से और कोई काम नहीं करेंगे जिससे हमारे सहयोगियों को कष्ट हो। इसलिए हम राजनैतिक बिरादरी में भी खांटी समाजवाद लायेंगे।


मिलाप में १०/०४/२०१३ को !
 

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

हाथ,सीबीआई और होली !

 
22/03/2013 को नई दुनिया में

अगर आप हाथ के साथ नहीं हैं तो सीबीआई का हाथ आपके पास पहुँचाने की हमारी जिम्मेदारी है।यह हमारा राष्ट्रीय-कर्म और नैतिक-धर्म है कि हम हर हाल में आपकी सेवा अपने हाथों करें।हमारी सरकार ने शुरुआत से ही यह सुनिश्चित कर रखा है कि किसी भी आपदा से निपटने का वैकल्पिक-तंत्र तैयार रहे,ताकि बदलते समय के साथ हमारी स्थिति न बदले।ऐसी आपदा यदि सरकार के ऊपर आती है तभी हमारा आपदा-प्रबंधन तंत्र काम करता है,न कि आम आदमी के ऊपर आने पर।इतने दिनों के सेवा-काल से हमें यह अनुभव बखूबी हासिल हो गया है कि कब किस पर मुलायम होना है और किस पर कठोर !

कुछ लोगों को ग़लतफ़हमी है कि डीएमके के हाथ हटाने से सरकार का हाथ कमज़ोर हो गया है ।दरअसल ,यदि किसी का हाथ मज़बूत है तो वह हमारा ही है।इसने अतीत में कई उपलब्धियां अर्जित की हैं और इसका प्रभाव सरकार के सहयोगी दलों और आम आदमी पर समभाव से पड़ता है।सहयोगियों को सीबीआई की सेवा की इतनी आदत पड़ चुकी है कि वे इसके अलावा और किसी सेवा से मानने को तैयार ही नहीं होते।रही बात आम आदमी की, तो हमारा हाथ उसकी जेब और गर्दन पर सुविधानुसार शिफ्ट होता रहता है।चुनाव के समय वह बेचारा जाति-धर्म के मायाजाल में पड़कर सब-कुछ भूल जाता है।इसमें सभी दलों का बराबर का हाथ होता है।

अभी जैसे ही डीएमके ने अपने हाथ को सरकाया,सीबीआई ने अपने हाथ से उसकी एक फाइल सरका दी।हम यहाँ स्पष्ट कर देते हैं कि सीबीआई को हम इस बारे में कोई निर्देश नहीं देते।वह हमारे देश की बहुत चौकन्नी सुरक्षा-एजेंसी है।उसे जब भी लगता है कि सरकार की सुरक्षा के साथ कोई खिलवाड़ करने की कोशिश करता है ,वह अपने-आप सक्रिय-मोड में आ जाती है।अब उसके काम में दखल न देने के वचन से बंधे होने के कारण हम भी कुछ कर नहीं पाते।इस बात को सबसे ज्यादा हमारे चिर-सहयोगी माया और मुलायम जानते हैं।वे सरकार के हाथ को माँगे-बिना माँगे,अंदर-बाहर से,जहाँ से भी संभव होता है,पकड़े रहते हैं।

सरकार के गिरने की मनौती मनाने वालों को खुश होने की ज़रूरत नहीं है।सरकार के ममता-रहित हो जाने पर भी आम आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ा,सो करुणा-रहित होने पर भी नहीं होगा।मुलायम के कठोर होने पर हमारा हाथ कुछ नहीं करेगा,बस,सीबीआई अपने बंधे हाथ खोल देगी।इस बात को माया से बेहतर कोई नहीं जानता।अकूत संपत्ति की रक्षा करने वाले हाथ का कमज़ोर होना ठीक नहीं है इसलिए इसकी मजबूती की चिंता हमसे ज़्यादा दूसरों को है।सरकार के प्रति कठोर होने वाले इसलिए जल्द ही मुलायम हो जाते हैं।

कुछ लोग यह अफ़वाह फैला रहे हैं कि डीएमके के अध्यक्ष ने अपनी बेटी को जेल भिजवाने का बदला हमसे लिया है,पर यह सरासर गप्प है।हम इसे महज होली की ठिठोली मानकर चलते हैं।हो सकता है ,इसी प्रकार स्टालिन के पास सीबीआई का पहुंचना भी महज़ होली का मजाक सिद्ध हो।अब यह हमारे सभी सहयोगियों पर निर्भर है कि वे होली के मूड में हमारे हाथ से अपने मुँह में कालिख पोतवाना पसंद करते हैं या सीबीआई के द्वारा रंगे-हाथ होली खेलना ?

 

अपने करम जाँहिं अपकारी

कई दिनों बाद ककुआ कल शाम को दिखाई दिए।मैं पान की दुकान के पास खड़ा था कि अचानक उन पर नज़र पड़ी।वह बचकर निकलने ही वा...