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बुधवार, 7 मई 2014

रुपय्या किसका है ?




07/05/2014 को नई दुनिया में।




वो नाम के ही नहीं काम के भी राजा हैं।फ़िलहाल राजपाट छोडकर चुनाव और चिंतन में लगे हैं।चुनाव से उन्हें कोई खतरा नहीं है क्योंकि चुनावों से प्रजा डरती है,राजा नहीं।रही बात चिंतन की,सो वे इस समय ख़ूब कर रहे हैं।एक खबर आई है,जिसमें उनके ताजे चिंतन की दिशा का पता चलता है।उन्होंने स्वयं को दूरसंचार घोटाले में लपेटे जाने का बड़ी कुशलता और दार्शनिक चिंतन के साथ बचाव किया है।उनका कहना है कि बेईमानी का एक भी रुपया उनके पास नहीं है और वे यह साबित कर सकते हैं।इस बयान को सुनकर जाँच एजेंसियां सकते में हैं पर हमें उनकी बात सही लगती है।

उनका यह कहना कि बेईमानी का एक रुपया उनके पास नहीं है,बिलकुल सच है।पहली बात यह है कि रुपया उनका है न कि बेईमानी का।अगर बेईमानी का होता तो उनके पास कैसे रहता ? दूसरी बात यह कि जाँच एजेंसी उनके सभी बैंक अकाउंट चेक करवा ले,एक भी चेक बेईमानी का नहीं निकलेगा।’काम के बदले अनाज योजना’ तो उनकी सरकार की हिट-योजना रही है।उन्होंने तो बस उसमें सक्रिय भागीदारी निभाई तो वे कहाँ से दोषी हो गए ?अनाज को तो सीधे बैंक में डाला नहीं जा सकता इसलिए वह गाँधी-मुद्रा में वहाँ विराजमान है।यह सारा रुपया बेईमानी का नहीं बल्कि उनकी गाढ़ी कमाई का है।अगर ऐसा नहीं है तो किसी को भी चुनौती है कि वो साबित करके दिखाए ?

रूपया वैसे भी नेताओं के पास अपने मूल रूप में नहीं होता।कई लोग अपने रूपये को इसी फार्मूले के तहत स्विस बैंक में फेंक देते हैं।यह आचरण बताता है कि उनमें रूपये के प्रति कितना वैराग्य है ।कुछ समझदार लोग हैं जो इसे ज़मीन या रजाई-गद्दों में गाड़ देते हैं,जिससे बखत-ज़रूरत उनके काम आ जाता  है।सबसे चतुर तो वे खिलाड़ी हैं जो रूपये को ज़मीन में ट्रांसफर कर देते हैं और दो-चार साल में वह ज़मीन सोना बन जाती है।इस सबसे यही सिद्ध होता है कि नेताओं को रूपये की ज़रूरत नहीं बल्कि रूपये को नेताओं की ज़रूरत होती है।वही सबसे अच्छी तरह से इसकी देखभाल कर सकते हैं। इस दौरान बेईमानी इन रुपयों पर से अपना दावा हटा लेती है और रुपया विशुद्ध ईमानदारी का हो जाता है।

महत्वपूर्ण बात है कि रूपया चलता-फिरता और लुढ़कता तो है पर बोलता नहीं है।यह हवाला से आ सकता है पर हवालात में नहीं जा सकता और न गवाही दे सकता है ।रुपया इधर से उधर तो जा सकता है,पर न बरामद हो सकता है और न ही नदारद।जब रुपया अपने स्वामी के प्रति निष्ठावान रहता है तो दूसरा इसे कैसे साबित कर सकता है कि यह बेईमानी का है।चुनाव के समय बेईमानी वैसे भी मुँह छिपाए घूम रही है।ऐसे में रूपये का वास्तविक दावेदार नहीं मिलता और ट्रकों रुपया सड़क पर या पुलिस थानों में अपनी शरण मांगता फिरता है।

इस तरह हम पूरी तरह यह मानने को मजबूर हैं कि रुपया राजा का नहीं अंततः प्रजा का ही है।नेता  बस उसकी देखभाल और समृद्धि में जुटे हैं।अब इसको लेकर किसी के पेट में मरोड़ उठता है तो उठता रहे मगर सनद रहे कि करोड़ रुपयों की डकार महज़ देश-सेवा है और कुछ नहीं।



सोमवार, 2 सितंबर 2013

वह सुबह कभी तो आएगी !


२/९/२०१३ को हरिभूमि में
 
रुपये के रोज़ रसातल में जाने की और सोने के सातवें आसमान में पहुँचने की खबरों से हमारी बेचैनी बढ़ रही है। हमें लगता है कि इसका कारण हमारे दिल का कमज़ोर होना ही है। अभी तक इस बात की कोई खबर नहीं मिली कि इन खबरों से सरकार की तबियत खराब है। इस रोजाना की उठापटक से दूर सरकार के सभी सलाहकार बंकरों में सुरक्षित बैठे हुए हैं। वे सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर अभी भी निश्चिन्त हैं। जनता भी सरकार की मुस्तैदी की कायल हो चुकी है। उसे लगता है कि उसकी सरकार सब संभाल लेगी। सँभालने वाले समझ रहे हैं कि रुपया,सेंसेक्स और सोने के भाव अपने आप ठिकाने पर आ जायेंगे ,ये केवल ‘दिनन का फेर’ है। सारी गलती अख़बारों की है जो विकास की खबरों के बजाय गिरते हुए रूपये के पीछे पड़े हैं। डॉलर की गुगली से रुपया बार-बार बीट हो रहा है पर उसके उद्धारक पवेलियन में बैठे इस बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि वह कम से कम शतक लगा ले तो फील्ड पर आयें। इसलिए हम जैसे कमज़ोर दिल वाले दर्शकों का भले ही रोज़ कलेजा बैठ रहा हो,देश के कप्तान को लगता है कि वे बिना कुछ कहे और किए ही बाजी जीत लेंगे।

देश में रूपये की हालात पर बेजा चिंता जताई जा रही है। ऐसे रूपये का गिरना तो स्वाभाविक ही है जिस पर गाँधी बाबा की पुरानी फोटो लगी हुई है। वे देश के जननेताओं के मानस से कब के उतर चुके हैं,अब अगर नोटों से भी जितनी जल्दी उतर जांय,ठीक रहेगा। आज़ादी के बाद उनके बताये अनुसार देश चलता तो ठीक से खड़ा भी नहीं हो पाता । इस सचाई को हमारे कर्णधारों ने जल्द पहचान लिया और उनके विचारों को खूँटी पर टाँगकर उनकी फोटो को अपना लिया। इसीलिए हर सरकारी दफ्तर में गाँधी जी निगहबानी करते मिलते हैं। अब उन्हीं की आँखों के सामने उनके अनुयायी नए भारत का निर्माण करने में जुटे हैं। जाहिर है यह एक कठिन प्रक्रिया है,पर वे गिरकर भी इसका निर्वाह करने में तत्पर हैं।

अगर रुपया गिर रहा है तो सोना छलाँग लगा रहा है। इन दोनों बातों से आम आदमी खुश और बेफिक्र है। रुपया तो उसके हाथ में पहले से ही नहीं रहा,तो उसके गिरने और बने रहने से उसे कोई अंतर नहीं पड़ता और रही बात सोने की तो वह इसकी भरपाई ख़ूब नींद लेकर कर लेता है। सोना हाथ में होने पर उसको खटका बना रहता है ,इसलिए अच्छा है कि सोना सातवें आसमान में ही रहे। इस रहस्य को हमारी सरकार भी जान गई  है। हो सकता है,इसी वज़ह से उसने ‘खाद्य-सुरक्षा’ की चादर ओढ़ ली हो और सोने की खोज में सातवें आसमान में हो। अब वह रूपये को तभी तो संभाल पायेगी,जब सोने से फुरसत पायेगी ।

देश को यकीन हो न हो,पर सरकार निश्चिन्त है कि किसी सुबह अख़बारों में वह खुशहाली की खबर पढ़ लेगी। सबकुछ अपने आप ठीक हो जायेगा। चिंतित लोग केवल उस सुबह का इंतज़ार करें !

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

गरीबी जी अब मन से खुश हैं !

 
२०/०८/२०१३ को नेशनल दुनिया में !
 

नुक्कड़ पर अचानक गरीबी जी अमीरी जी से टकरा गईं । गरीबी जी रोज फुटपाथों और गलियों में टहला करती थीं पर अमीरी जी का सातवें तल्ले से नीचे उतरना कभी-कभार ही हो पाता था। इसलिए दोनों का जब आमना-सामना हुआ तो एकबारगी गरीबी जी भौंचक रह गईं । अमीरी जी ने गरीबी जी को दूर से ही पहचान लिया। वह ज़मीन पर धड़ाम हुए रूपये को उठा रही थीं,यह सोचकर कि ये ऊपर रहती हैं,इन्हीं का होगा। पर अमीरी जी ने गिरे हुए रूपये की ओर निहारा तक नहीं। उन्होंने पास खड़ी सकुचाती हुई गरीबी जी से मुखातिब होते हुए कहा,’कहो बहन ! आजकल तो सब जगह तुम्हारे ही चर्चे हैं। सरकारी योजनाओं और बड़े-बड़े अख़बारों में तुम खूब गिरी और बिखरी पड़ी हो ! जिसको देखो वही तुम्हारे ऊपर बयान झाड़ रहा है। हमारी तो खबर भी तभी आती है जब गलती से कहीं छापा पड़ता है या स्कैम खुलता है। दुखद यह है कि किसी भी खबर में हमारे साथ कोई नहीं है ;और तो और हमारा सगा भाई रुपया भी मुँह के बल गिरा पड़ा है। ’

गरीबी जी को पहली बार अपने होने पर गर्व हुआ। उनकी इतनी चर्चा है और वे इससे अनजान हैं। नरम लहजे में वे अमीरी जी से बोलीं,’ बड़ी बहन ! हम तो पहले से ही ज़मीन पर हैं । अब इससे नीचे तो जा नहीं सकते। आप ऊपरवालों को यह सहूलियत रहती है कि जितना चाहें ,नीचे गिर सकते हैं। आपको थामने के लिए रूपये की नहीं डॉलर की ज़रूरत पड़ती है। शुक्र है कि आपको डॉलर सँभाल लेता है,वर्ना गिरा हुआ रुपया भी हमें नसीब न हो। रही बात खबर में रहने की,सही बात तो ये है कि बड़े पन्नों में भले हमारी फोटू छपे पर हमारी खबर हाशिए में ही होती है। आप दिल छोटा न करें। हमारे चर्चे करके ही सरकार आपके लिए खर्चे का प्रबंध करती है। सुना है कि मनरेगा में हमारी दिहाड़ी बढ़ा दी गई है,अब आप ज्यादा खुशहाल होंगी। हमारा क्या है ,हम तो पाँच और बारह रूपये में अपना पेट भर लेते हैं पर आपकी तो पाँच-सितारा चाय भी सौ रूपये की बैठती है। इसलिए हमारे चर्चे से ज्यादा ज़रूरी आपका खर्चा है। ’’

‘पर तुम्हें तो अब ‘डाइरेक्ट-कैश’ दिए जाने की तैयारी है। ऐसे में हमारा जुगाड़ कैसे होगा ?’अमीरी जी अभी भी अपने भविष्य के प्रति आशंकित लग रही थीं। गरीबी जी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए बताया ,’बहन ! अब आपको परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। हमारे हाकिम ने कहा है कि गरीबी केवल एक मानसिक दशा है। इसलिए हम भी निश्चिन्त हैं। आगे से जेब में पाँच रुपये होंगे तो मन में हम यह बैठा लेंगे कि पाँच सौ हैं। इस तरह ढाबे पर बैठकर हम पाँच-सितारा भोजन का मजा ले पाएंगे। यह सब आपकी कृपा से संभव हुआ है। ’ इतना सुनते ही अमीरी जी मुस्कराते हुए निकल गईं।
 

असली गिरावट यहाँ है !


हिंदुस्तान में २०/०८/२०१३ को

जब हर जगह उनके गिरने की खबर गर्म थी,शेयर बाज़ार और रूपये ने औंधे मुँह गिरकर उनकी लाज बचा ली। आम आदमी के लिए तीन सौ पैंसठ दिन ‘ब्लैक-डे‘ होता है पर बाज़ार ने उनके लिए एक दिन ‘ब्लैक फ्राइडे’ मना लिया तो हंगामा मच गया। देश में जिस समय लाल-किले में दिए प्रधानमंत्री के भाषण पर बहस होनी चाहिए थी ,वहाँ दलाल-पथ के भालू ने कब्ज़ा कर लिया। सारे विशेषज्ञ देश और दामाद को छोड़कर बाज़ार को बचाने में व्यस्त हो गए। उन्होंने अचानक आई इस गिरावट से राहत की साँस ली और वे फिर से गिरने की तैयारी में जुट गए।
एक तरफ जहाँ टमाटर और प्याज अपनी ऊँचाई के पिछले रिकॉर्ड सुधार रहे हैं,वहीँ रुपया सतह से भी नीचे जाने पर आमादा है। अख़बारों में इस बात की खबरें आ रही हैं कि निवेशकों का लाखों-करोड़ रुपया डूब गया। भोला-भाला आम आदमी इस खबर पर यकीन कर लेता है। वह भरी बारिश में नदी,नाले,गड्ढे में डूबे हुए रूपये को खोजता है पर खाली हाथ लौटता है। उसे तो तब धक्का लगता है जब पता चलता है कि इस खोजबीन में उसके टेंट में बंधा पाँच रूपये का नोट भी कहीं खिसक गया। रूपये को उठाना सबको आता भी नहीं,यह काम बड़ी कुशलता से किया जाता है।
आम आदमी भले अपना पाँच रुपया नहीं सँभाल पाता हो,पर उनको अपनी गठरी बचाने का पूरा अनुभव है। शेयर बाज़ार के विमुख होते ही वह सोने की शरण में चले जाते हैं। उन्हें गिरते हुए रूपये को सोने और डॉलर में तब्दील करने की कला खूब आती है। इसीलिए उनका हमेशा से यही मानना है कि रुपया उसी के पास होना चाहिए जो उसे सँभाल सके। यह भी हो सकता है कि इसी बात को आम आदमी को समझाने के लिए रुपया गिर रहा हो ! आखिर उबारना तो उनको ही है और उठाना भी। अगर भूलचूक से या सरकारी सब्सिडी या डायरेक्ट-कैश के ज़रिये रुपया किसी तरह आम आदमी के खीसे में पहुँच भी गया तो उसे भी ‘वो’ अपने बोरे में भर लेते हैं।
ऐसा नहीं है कि सब जगह गिरावट का ही बोलबाला है। इस बात को वे समझते हैं; तभी सब्जी,दाल और पेट्रोल-डीजल को हिदायत है कि वे बराबर बढ़ते रहें। गिरने के लिए देश में चरित्र ,ईमान और नैतिकता की कोई कमी नहीं है। उन्होंने उसे बाज़ार की गिरावट के बराबर कर दिया है। रुपया इसीलिए नहीं उठ पा रहा है क्योंकि उसने ईमान से होड़ ले रखी है। वे इस बात का ज़रूर ख्याल रख रहे हैं कि इस मुकाबले में उनका ईमान रूपये से पीछे न रह जाए। आने वाले समय में यदि रुपया और गिरता है तो उसकी चिंता न करें बल्कि यह सोचें कि इसके लिए बेचारे ईमान को कितना गिरना पड़ा होगा !
 

 जागरण आई नेक्स्ट में २०/०८/२०१३ को !

बुधवार, 24 जुलाई 2013

सरकार इतनी गिरी नहीं है !


सरकार अब इतना भी नहीं गिर सकती है कि गिरे हुए रूपये को उठाने को और गिर सके। रूपये ने तय कर लिया है कि वह जमींदोज होकर रहेगा पर सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है। गिरे हुए रूपये को उठाने के लिए उसने कई ताबड़तोड़ फैसले किए हैं। उसने आनन-फानन कई क्षेत्रों को पूरा का पूरा  एफडीआई की झोली में डाल दिया है । सरकार का सोचना है कि उसकी झोली से रिसकर उसके हाथ भी कुछ लगेगा। उसे भरोसा है कि एफडीआई के आने से रुपया भी चहक उठेगा और धरती से उछलकर सीधे उसकी गोद में जा बैठेगा। इसलिए सरकार नाकारा नहीं बड़ी कारसाज है।

सरकार गिरे हुए रूपये को उठाने के साथ ही खुद के उठने के लिए कई कदम उठा रही है। देश भर में गरीबों को ‘खाद्य-सुरक्षा’ के ज़रिये खिला-पिलाकर पुष्ट और मज़बूत बनाना चाहती है ताकि वे इतने अशक्त न रहें कि मतदान-केन्द्र तक ही न जा पाएँ। इस बात को सरकार के विरोधी समझ गए हैं इसीलिए इसका विरोध कर रहे हैं। विरोधी जानते हैं कि अघाए पेट वाला मतदाता कभी भी नीयत बदल सकता है। इस बात का प्रमाण खुद उन्हें साथी दलों के नेताओं से मिल चुका है।  सरकार भले चाहे जितनी गिरी हुई हो,मर नहीं सकती । उसे अपनी प्राणरक्षा की कीमत पता है। वह जानती है कि जब तक उसके तोते में जान है,वह नहीं मरेगी। तोते ने भी अपने मालिक को कभी निराश नहीं किया है,सो ’खाद्य-सुरक्षा’ बिल और सरकार,दोनों को फिलहाल खतरा नहीं है।

सरकार अपने से ज़्यादा जनता के लिए फिक्रमंद है। उसे पता है कि भ्रष्टाचार और मंहगाई से कभी कोई नहीं गिरा है। खुद सरकारों का जब इनसे कुछ नुकसान नहीं होता तो आम जनता की क्या बिसात ? उसे तो विकास चाहिए और इसके लिए पहले सरकार खुद विकसित होना चाहती है। तभी उसने विकसित देशों से एफडीआई और डॉलर को न्योता भेजा है। सरकार हर वो काम करना चाहती है जिसमें उसका हाथ तंग न हो। रुपया वैसे भी हाथ का मैल है,गिर जाय तो भी क्या फर्क पड़ता है ? डॉलर सारी दुनिया का मालिक है,उसका मजबूती से स्थापित होना ज़रूरी है।

सरकार गिरे हुए रूपये की तरह ही गरीब की गिरावट को लेकर भी चिंतित है। वह इसके लिए तन-मन-धन से उसकी सेवा करना चाहती है। सरकार गरीब की झोली भरकर और मीठी गोली देकर उसकी सेहत ठीक करने में जुटी है। अपने बीमार और दागी लोगों को भी वह जीवनदान देने का जतन कर रही है। जनता और नेता के हित में समान रूप से सोचने वाली सरकार गिरी हुई हालत में यह सब कर रही है। अगर कहीं मज़बूती से खड़ी होती तो जनता की अच्छी-खासी सेवा कर डालती। ऐसी सरकार को गिरने देना अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। उम्मीद है कि चुनाव तक गरीब इतना तो उठ सकेगा कि पास के मतदान-केन्द्र तक पहुँच सके । यदि इसमें कोई कोताही हुई तो सरकार को मजबूरन इस क्षेत्र में भी एफडीआई बुलानी पड़ेगी। भला कोई गरीब विदेशी-सुन्दरी को कैसे मना कर सकेगा ?

फ़िलहाल ,सरकार को बचाने के लिए रुपया आत्म-बलिदान पर उतारू है। उसके चिथड़े उड़ रहे हैं पर मजाल है कि सरकार को कोई आँच आ जाय। वहीँ तोते ने कड़वे फल कुतरने शुरू कर दिए हैं। मीठे फल उसने अपने आका की झोली में डाल दिए हैं !
 
'जनवाणी' में २४/०७/२०१३ को !

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

रूपये की आत्म-कथा !


 
05/07/2013 को हरिभूमि में मेरा व्यंग्य....बस नाम बदल गया !
 

मैं आज़ाद भारत का ऐसा प्रतिनिधि हूँ,जिसकी हालत इन दिनों सबसे ज़्यादा खस्ता है।आज हमारे गिरे होने को लेकर बड़ा हल्ला मच रहा है,पर इसमें मेरा रत्ती भर भी कुसूर नहीं है।आज़ादी के साथ ही कई और चीज़ें व प्रजातियाँ अस्तित्व में आईं थीं,जिन्हें मुझसे जीवनदान मिला और वो आज सबसे ऊपर हैं।इसका मुख्य कारण यही है कि इन सबने मुझ पर ही अपने पाँव रखकर चढ़ाई की ।मेरे गिरने की  एकमात्र जिम्मेदार वह खास प्रजाति है,जिसने दिखाने के लिए तो मुझ पर गाँधी बाबा को बिठा दिया पर असल में वही अपने घर-परिवार के साथ मुझ पर सवार हो गई । मुझमें फ़िर भी थोड़ी शर्म बची हुई है जिससे मैं ज़मीन में गड़ा जा रहा हूँ पर उनके बारे में मैं कुछ नहीं कहूँगा जो मेरे बहाने अपनी गिरावट को छुपाये हुए हैं।

मुझे याद है जब शुरू में मैं ‘आना’ था,तब मेरी शुद्धता और सत्यनिष्ठा को लेकर लोग कई तरह की बातें किया करते थे।किसी बात को बल देने के लिए अकसर वे ‘सोलहों आना सच ’की मिसाल देते थे।उस समय किसी के पास ‘आना’ होना,खुशियों का आना होता था।लोग मेला-हाट जाते थे और बच्चों को ‘आना-दो आना’ देकर निश्चिन्त हो लेते थे।’चार आने की पाव जलेबी बैठ सड़क पर खाऊँगी’ या ‘सैंया दिल माँगे चवन्नी उछाल के’ गाने उस समय सबकी जुबान पर रहते थे।इससे साबित होता है कि उस समय ‘आना’ की हैसियत क्या थी।एक और बात ,तब ’आना’ हथेली पर होता था और सामान झोले में जबकि अब हम झोले में होते हैं और सामान हथेली में।

मेरी मुद्रा में तब अप्रत्याशित रूप से बदलाव आया,जब सारी दुनिया में आर्थिक उदारीकरण की हवा चली।इस प्रक्रिया में क्रान्तिकारी परिवर्तन आया और मुझे पाने की चाह में आदमी ने अपने को सामान बना लिया।वह बकायदा बड़े तराजुओं में तुलने लगा।मेरे लिए उसने अपनी बोली तक लगा ली। मुझे लपकने के लिए वह लगातार गिरता गया ।मेरी निकटता में वह अपने नैसर्गिक सम्बन्धों,रिश्तों को भूल गया।हद तो तब हुई जब वह विदेसिया ’डालर’ के तराजू में मुझे तौलने लगा।’डालर’ के ऊपर जहाँ ज्यादा दबाव नहीं है,मेरे ऊपर वह अपने खानदान सहित चढ़ बैठा।अब इसके नीचे दबे-दबे मेरा दम फूल रहा है पर वह हटने को तैयार नहीं है।

अब जब मैं ज़मीन पर आ चुका हूँ,मुझ पर बैठे लोगों ने राहत की साँस ली है। अभी तक उनकी जग-हंसाई हो रही थी,क्योंकि वे इसके लिए किसी भी सीमा तक नीचे गिर सकते हैं ।अब उन्होंने खुद मुझे इतना नीचे गिरा दिया है कि लोग गिरने के मामले में उनके बजाय मेरा उदाहरण दें।अभी तक वो मुझ से पेट भरते थे,अब पीठ पर चढ़कर बैठ गए हैं।देश को आज़ादी मिले कई बरस हो गए और अभी होंगे ,पर मुझे  हिलने-डुलने तक की आज़ादी नहीं है और न होगी।इस मुद्रा में पड़े-पड़े मैं केवल असहाय होकर अपने रहनुमा को देख रहा हूँ,जो छुड़ाने के बजाय मुझे विदेसिया ‘डालर’ के साथ तौलने और स्विस बैंक के हवाले करने में लगा है।मुझे अपने मरने की चिंता नहीं है क्योंकि मुझ पर सवार लोग ही मुझे बचा लेंगे ।ऐसा न होने पर फ़िर वो किस पर अपनी सवारी गाँठेंगे ? इसीलिए मैं अजर-अमर हूँ ।

शनिवार, 22 जून 2013

गिरता हुआ रुपय्या !


२२/०६/२०१३ को 'नई दुनिया' में !
 

देश के तमाम अर्थशास्त्री और वित्तीय जानकार इस समय गहन सोच में डूबे हुए हैं। उनसे रूपये की मौजूदा हालत देखी नहीं जा रही है। वह अनवरत रूप से पतनोन्मुख मुद्रा धारण किए हुए है। रूपये का यूँ फिसलना ,बाज़ार से ही नहीं अपने हाथ से फिसलने जैसा है। रिज़र्व बैंक के कई उपायों और नियमित बैठकों के बाद भी रुपया खड़ा नहीं हो पा रहा है। इसकी वज़ह से सेंसेक्स और सोना भी गोता लगा रहे हैं। सभी लोग देश की गिरती हुई अर्थ-व्यवस्था का ठीकरा रूपये के ऊपर फोड़ रहे हैं। उनके मुताबिक ,यही नामुराद सबको रसातल में ले जा रहा है।  

पर क्या किसी ने रूपये की तरफ से भी सोचने की ज़रूरत महसूस की है या इस बारे में उसका पक्ष जानने की कोशिश की है ?आज रूपये का गिरना सबसे बड़ी खबर है जबकि देश-दुनिया में और भी बहुत कुछ गिर रहा है,जिस पर अब हमारा ध्यान भी नहीं जाता। रूपये को इस बात का सख्त अफ़सोस है कि जहाँ आए दिन नैतिक मूल्य गिर रहे हों,ईमानदारी की रेटिंग जमीन छू रही हो वहाँ उसका अकेले का गिरना इतना चिंतनीय कैसे हो गया ? उसे इस बात से भी एतराज़ है कि गिरते हुए मानवीय रिश्ते और चरित्र-हीनता के नित-नए रिकॉर्ड बनाता हुआ समाज अपनी उन्नति को रूपये से जोड़कर देखता है। ऐसे हालात में यदि रुपया उठ खड़ा नहीं  हुआ तो क्या यह देश और समाज भरभराकर गिर जायेगा ? यह सब सोचकर धरती पर पड़ा हुआ रुपया हलकान हुआ जा रहा है।

रूपये के प्रति मेरी गहरी सहानुभूति है पर उसका ऐसे गिरना बिलकुल स्वाभाविक है। आज उसके ऊपर चारों तरफ से दबाव है। उससे सबको कुछ न कुछ उम्मीदें हैं। ऐसे में ज़्यादा उम्मीदों के भार से उसका नीचे गिरना लाजमी है । उद्योगपतियों से लेकर राजनेता तक उसके ऊपर टूटे पड़ रहे हैं,बाबू और अफ़सर उसके लिए दिन-रात बेगार कर रहे हैं तथा आम आदमी मंदिरों में उसके लिए प्रार्थनारत है,सो वह कहाँ तक अपने को संभालेगा ? आज अगर वह पतनशील है तो इसके जिम्मेदार केवल हम हैं पर इस तरफ सोचने की फुरसत किसे है ? अब उसके नीचे गिरने पर इतना मातम क्यों मचा हुआ है ?

अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए जब चवन्नी गिरते-गिरते बाज़ार से गायब हो गई थी। कभी उसका भी ज़माना था। लोग महफ़िलों में जाते थे और ‘राजा दिल माँगे,चवन्नी उछाल के’ गाने पर पता नहीं क्या-क्या उछाल आते थे। उस चवन्नी की कीमत भी उछलने पर ही थी। जैसे ही वह ज़मींदोज़ हुई,कोई उसका नाम भी न लेता है। गिरते हुए रूपये के बारे में शायद इसीलिए लोग चिंतित हैं। अगर यही गिर गया तो बाज़ार में क्या उछलेगा ? अमीर लोगों का पैमाना किस तरह नापा जायेगा ? इसलिए इसके उबार के लिए पूरा देश और समाज चिंतित है। अर्थशास्त्री लगातार बैठकें कर रहे हैं ताकि रूपये को अपने पैरों पर खड़ा किया जा सके। रुपया हमारे देश की राष्ट्रीय मुद्रा भर नहीं ,यह नवधनाढ्यों का स्टेटस-सिबल है,इसलिए इसका गिरना बड़ी खबर है और चिंता की बात भी।

बहरहाल,जहाँ देश गिर रहा है,समाज गिर रहा है,बादल और पहाड़ गिर रहे हैं,रिश्ते-नाते और चरित्र गिर रहा है,इन सबके बीच यदि बेचारा रुपय्या गिर रहा है तो कौन-सा पहाड़ टूट जायेगा ?

शांतिप्रेमी का दुनिया के नाम ख़त

  प्यारे विश्व नागरिको   मैं दुनिया का सबसे बड़ा शांतिदूत बोल रहा हूँ।तुम सबकी ख़ैर चाहता हूँ इसलिए कुछ कहने आया हूँ ।...