पृष्ठ

शनिवार, 22 जून 2013

गिरता हुआ रुपय्या !


२२/०६/२०१३ को 'नई दुनिया' में !
 

देश के तमाम अर्थशास्त्री और वित्तीय जानकार इस समय गहन सोच में डूबे हुए हैं। उनसे रूपये की मौजूदा हालत देखी नहीं जा रही है। वह अनवरत रूप से पतनोन्मुख मुद्रा धारण किए हुए है। रूपये का यूँ फिसलना ,बाज़ार से ही नहीं अपने हाथ से फिसलने जैसा है। रिज़र्व बैंक के कई उपायों और नियमित बैठकों के बाद भी रुपया खड़ा नहीं हो पा रहा है। इसकी वज़ह से सेंसेक्स और सोना भी गोता लगा रहे हैं। सभी लोग देश की गिरती हुई अर्थ-व्यवस्था का ठीकरा रूपये के ऊपर फोड़ रहे हैं। उनके मुताबिक ,यही नामुराद सबको रसातल में ले जा रहा है।  

पर क्या किसी ने रूपये की तरफ से भी सोचने की ज़रूरत महसूस की है या इस बारे में उसका पक्ष जानने की कोशिश की है ?आज रूपये का गिरना सबसे बड़ी खबर है जबकि देश-दुनिया में और भी बहुत कुछ गिर रहा है,जिस पर अब हमारा ध्यान भी नहीं जाता। रूपये को इस बात का सख्त अफ़सोस है कि जहाँ आए दिन नैतिक मूल्य गिर रहे हों,ईमानदारी की रेटिंग जमीन छू रही हो वहाँ उसका अकेले का गिरना इतना चिंतनीय कैसे हो गया ? उसे इस बात से भी एतराज़ है कि गिरते हुए मानवीय रिश्ते और चरित्र-हीनता के नित-नए रिकॉर्ड बनाता हुआ समाज अपनी उन्नति को रूपये से जोड़कर देखता है। ऐसे हालात में यदि रुपया उठ खड़ा नहीं  हुआ तो क्या यह देश और समाज भरभराकर गिर जायेगा ? यह सब सोचकर धरती पर पड़ा हुआ रुपया हलकान हुआ जा रहा है।

रूपये के प्रति मेरी गहरी सहानुभूति है पर उसका ऐसे गिरना बिलकुल स्वाभाविक है। आज उसके ऊपर चारों तरफ से दबाव है। उससे सबको कुछ न कुछ उम्मीदें हैं। ऐसे में ज़्यादा उम्मीदों के भार से उसका नीचे गिरना लाजमी है । उद्योगपतियों से लेकर राजनेता तक उसके ऊपर टूटे पड़ रहे हैं,बाबू और अफ़सर उसके लिए दिन-रात बेगार कर रहे हैं तथा आम आदमी मंदिरों में उसके लिए प्रार्थनारत है,सो वह कहाँ तक अपने को संभालेगा ? आज अगर वह पतनशील है तो इसके जिम्मेदार केवल हम हैं पर इस तरफ सोचने की फुरसत किसे है ? अब उसके नीचे गिरने पर इतना मातम क्यों मचा हुआ है ?

अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए जब चवन्नी गिरते-गिरते बाज़ार से गायब हो गई थी। कभी उसका भी ज़माना था। लोग महफ़िलों में जाते थे और ‘राजा दिल माँगे,चवन्नी उछाल के’ गाने पर पता नहीं क्या-क्या उछाल आते थे। उस चवन्नी की कीमत भी उछलने पर ही थी। जैसे ही वह ज़मींदोज़ हुई,कोई उसका नाम भी न लेता है। गिरते हुए रूपये के बारे में शायद इसीलिए लोग चिंतित हैं। अगर यही गिर गया तो बाज़ार में क्या उछलेगा ? अमीर लोगों का पैमाना किस तरह नापा जायेगा ? इसलिए इसके उबार के लिए पूरा देश और समाज चिंतित है। अर्थशास्त्री लगातार बैठकें कर रहे हैं ताकि रूपये को अपने पैरों पर खड़ा किया जा सके। रुपया हमारे देश की राष्ट्रीय मुद्रा भर नहीं ,यह नवधनाढ्यों का स्टेटस-सिबल है,इसलिए इसका गिरना बड़ी खबर है और चिंता की बात भी।

बहरहाल,जहाँ देश गिर रहा है,समाज गिर रहा है,बादल और पहाड़ गिर रहे हैं,रिश्ते-नाते और चरित्र गिर रहा है,इन सबके बीच यदि बेचारा रुपय्या गिर रहा है तो कौन-सा पहाड़ टूट जायेगा ?

कोई टिप्पणी नहीं: