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गुरुवार, 13 जून 2013

कलियुग में दशरथ होना !


जनसंदेश टाइम्स में १३/०३/२०१३ को
  

आज जब चौपाल पर पहुँचा तो भोन्दे चाचा माथा पकड़कर बैठे हुए थे,सामने रामायण रखी थी।चिंतित होते हुए हमने उनकी कुशल-क्षेम पूछी। चाचा ने भरे हुए मन से बताया ‘बेटा ,हमारी तबियत को कुछ नहीं हुआ।हमने जब से सुना है कि राम वाली पार्टी के बुजुर्ग नेता ने इस्तीफ़ा दे दिया है,सिर घूम रहा है।रह-रहके हमें वह अयोध्या वाला दृश्य याद आ रहा है।राम का मंदिर बनाने का उद्घोष करने वाले लोगों में यही बुजुर्ग सबसे आगे थे।राम का मंदिर तो बना नहीं ,अब तो इन्हीं का अपने घर में रहना दूभर कर दिया ।लगता है इसीलिए उन्होंने पार्टी के मुँह पर इस्तीफ़ा मारा था।इस घटना के बाद से मेरा अपने ही घर में दम घुट रहा है ।’

हमने चाचा को गंभीरता से लेते हुए समझाया,’अब समय कितना बदल गया है,चाचा ! आप भी तो तब जवान थे और मंदिर-मंदिर की रट लगाया करते थे।अब देखिए ना,न वो मंदिर बनाने वाले रहे और न ही माँग करने वाले,फ़िर भी धर्म और देश बचा हुआ है।जिस तरह अब मंदिर बनाने की ज़रूरत नहीं रह गई,ठीक उसी तरह मंदिर के लिए रथ निकालकर अलख जगाने वालों की।’’तो इसका मतलब,क्या राम अब हमारे लिए पूज्य नहीं रह गए या उनकी प्रासंगिकता खत्म हो गई ? माना कि यह कलियुग है पर आस्था भी तो कोई चीज़ होती है ?’ चाचा ने हमारी बात को बीच में ही काटकर अपना सवाल हमारी तरफ उछाल दिया ।

‘देखिए चाचा,आस्था तो अभी भी बची हुई है,पर वह किसी सिद्धांत या मुद्दे के लिए नहीं,बल्कि सत्ता के लिए है।कुर्सी को पाया बनाकर ही आस्था को मूर्त-रूप दिया जा सकता है।बिना कुर्सी के तो वह इंच-भर भी अपनी जगह से टस से मस नहीं हो सकती।हमारे रहनुमा बदलते समय की नब्ज को बराबर पकड़े हुए हैं और इसलिए कुर्सी पर आस्था अभी भी बची हुई है।’चाचा ने अब हमें समझाने की गरज से तुलसी बाबा की रामायन को पलटना शुरू किया,’बच्चा,समय कितना भी बदल जाए पर क्या हमारे संस्कार भी इस तरह बदल सकते हैं ? त्रेता में जो राम थे,उन्होंने अपने पिता की इच्छा जानकर वनवास का वरण किया था,लेकिन उनको अपना आदर्श मानने वाले,आज कलियुग में ऐसे राम बन गए हैं,जो दशरथ को ही वनवास देकर स्वयं गद्दी पर बैठने को आतुर हैं।’

‘चाचा,आप लिखी-लिखाई बातों को अपनी कंठी में क्यों बाँधे बैठे हो ? त्रेता के राम केवल पूजा-पाठ और ग्रंथों तक ही रहें तो गनीमत है।आज की राजनीति में उनकी बस इतनी ही उपयोगिता है।वह समय दूसरा था जब भाई-भाई ,पिता-पुत्र या गुरु-शिष्य के रिश्ते दिल से बंधे होते थे,कुर्सी के खूंटे से नहीं।सत्ता की इस दौड़ में सबकी अपनी भूमिका है और फिनिश-लाइन पर पहुँचने के बाद कोच का काम समाप्त हो जाता  है।इसलिए,इस बात को आप दिल से मत लगाइए।’हमने उनके दिल पर मरहम लगाने की कोशिश की।

इस बीच चाचा का पोता दौड़ता हुआ आया और उनकी पीठ पर सवार हो गया।वह झट से खड़े हुए और उसे लादकर अपने घर की ओर बढ़ गए। जल्दबाजी में चाचा अपनी रामायण वहीँ छोड़ गए थे।

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