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शुक्रवार, 27 जून 2014

कुत्ते और आदमी में फर्क !


कुत्ते और आदमी का सम्बन्ध बहुत पुराना है।यह बहस का विषय हो सकता है कि कुत्ते ने आदमी का फ़ायदा उठाया या आदमी ने कुत्ते का, पर इतना तो तय है कि वफ़ादारी का पैमाना जब नापा जाता है तो मिसाल कुत्ते की ही दी जाती है।कुत्ते और आदमी के सम्बन्धों में यहाँ कुत्ते ने ही बाजी मारी, फिर क्या वजह है कि आदमी की औकात को घटाने के समय उसकी तुलना बेचारे कुत्ते से ही की जाती है।यह कुत्ते का बड़प्पन है कि वह आदमी के दुःख-सुख में तो काम आता ही है,उसके नीच कर्मों को भी वह अपने नाम ढोता है।

आदमी की तरह कुत्तों की भी कई किस्में हैं।जहाँ कुछ कुत्ते गली-गली मारे फिरते हैं,वहीँ कई कुत्ते आलीशान महलों में अय्याशी कर रहे हैं।इसके बावजूद कुत्तों में वफ़ादारी की एक-सी रेन्ज है।गली का कुत्ता कितना भी गलीच क्यों न हो,एक बार रोटी देने वाले का उपकार नहीं भूलता।ऐसे ही व्यवहार संभ्रांत किस्म के कुत्ते करते हैं।देश की राजधानी दिल्ली में हालिया घटी एक घटना है जिसने आदमी और कुत्ते के व्यवहार को सही-सही रेखांकित कर दिया है।राजधानी के पाश इलाके में एक अधिकारी के यहाँ ज़र्मन शेफर्ड कुत्ता अपने मालिक की खूब वफ़ादारी से सेवा कर रहा था।पास में ही एक धोबी था,जिसका उस घर में नियमित आना-जाना था।इस तरह उस कुत्ते से इस आदमी की भी दोस्ती हो गई।वे दोनों खूब हिल-मिल गए थे।

धोबी से दोस्ती करके कुत्ता उसकी तरफ से निश्चिन्त हो गया।इस बात का फायदा उठाकर उस आदमी ने एक रात उस घर से नकदी साफ़ कर दी।कुत्ता कुछ नहीं बोला क्योंकि वह समझता था कि उसने आदमी से दोस्ती की है।इस घटना का खुलासा होने पर पता चला कि कुत्ता तो आदमी का वफादार निकला मगर आदमी नहीं।कहने को तो आदमी ने कुत्ते जैसी हरकत की,पर यह कथन कहाँ तक सही है ?बेचारे कुत्ते ने उसे आदमी समझा,मगर आदमी ने बता दिया कि वह उससे भी गया-गुजरा है।

इससे साफ़ है कि आदमी के बारे में कुत्तों की सोच गलत साबित हुई।कुत्ते को प्रशिक्षण देकर कितना भी उन्नत बना दिया जाय,मगर वो रहेगा आदमी से पीछे ही।आदमी को यूँ ही चतुर नहीं कहा गया है।वह अपने कई गुणों को कुत्ते में समाविष्ट कर सकता है पर अपना मौलिक हुनर कभी नहीं।इसलिए जब अगली बार आप किसी को ‘कुत्ते-कमीने,तेरा खून पी जाऊँगा' कहकर कोसें,तो दस बार सोचें 

दैनिक भास्कर डीबी स्टार में 27/06/2014 को।

गुरुवार, 26 जून 2014

जनता तो मूरख है जी !

कई महीनों से लगातार बजने वाले ढोल-मंजीरे अचानक शांत हो गए हैं।’हर हर महादेव’ की पुड़िया में लपेटकर प्रसाद वितरण करने वाले भक्तगण पता नहीं कहाँ बिला गए ? नई सरकार देशहित में जनता को पुराने नुस्खे बाँट रही है और उसके समर्थक इसे क्रान्तिकारी बदलाव बता रहे हैं।

सरकार ने साफ़ कर दिया है कि देश के विकास के लिए खजाने का भरना ज़रूरी है।चूँकि यह सब जनहित में हो रहा है ,सो इसकी सारी जिम्मेदारी भी जनता की होगी।सपनों के भारत का निर्माण जनता की कीमत पर ही किया जायेगा क्योंकि सरकार भी तो जनता की है।जिस जनता ने ‘अच्छे दिनों’ के सुर में सुर मिलाते हुए ‘डांडिया-नृत्य’ किया था,उसे अब ख़ुशी-ख़ुशी ‘तांडव’ करने में कष्ट क्यों हो रहा है ? ’अबकी बार’ का बुखार इत्ती जल्दी उतरेगा,मरीज़ को भी नहीं पता चल सका।

जनता वैसे भी स्थिर नहीं रहती,जबकि सरकार को स्थिरता चाहिए।चुनावों से पहले जनता जहाँ भावुक हो जाती है,वहीँ चुनावों बाद नादान और नासमझ।यदि जनता सरकार को चुनती है तो सरकार भी उससे चुन-चुन कर बदले लेती है।ख़ास बात है कि वादों और इरादों में फर्क होता है।वादे चुनाव के पहले काम आते हैं और इरादे चुनाव जीतने के बाद।यह जनता की मूर्खता है कि वह वादों के पीछे भागती है,उसके पीछे के नेक इरादों को नहीं देखती।देशहित में वादे तो वादे,पूरी विचारधारा कुर्बान करनी पड़ती है,पर नादान जनता यह कहाँ समझ पायेगी ?

आज हर तरफ रेलवे के बढ़े हुए किरायों का शोर है।अव्वल तो यह काम पिछली सरकार ने किया था,ये तो बस लागू कर रहे हैं।विपक्ष को इस सरकार का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसका एजेंडा ही वह लागू कर रही है।इससे उसे दोतरफा फायदा मिला है।एक तो सरकार बदलने के बाद अभी भी उसी के आदेश काम कर रहे हैं,दूसरे मृतप्राय हो चुके विपक्ष को इस कदम से संजीवनी मिल गई है।अभी तक कहने व करने को कुछ नहीं था,पर अब धरना-प्रदर्शन का रास्ता खुल गया है।जब तक विपक्ष ऐसी हरकतें नहीं करता,तब तक सरकार को भी अपने होने का यकीन नहीं होता।ऐसे में दोनों काम करते हुए दिखते हैं।

आलोचक कहते हैं कि यह बढ़ोत्तरी ऐतिहासिक है।यह असहनीय इसलिए भी है क्योंकि यह काम ‘उम्मीदों वाली सरकार’ ने किया है।उनके मुताबिक इस तरह सारी उम्मीदें ही भारी हो गई हैं।आलोचक कभी भी दूरदर्शी सोच नहीं रखते।सरकार तो रेलगाड़ी को हवाई जहाज बनाने जा रही है और वे इस पर भी चिल्ल-पों मचाए हुए हैं।वास्तविक रूप से यदि सरकार के इस कदम का विश्लेषण किया जाय तो वह यात्रियों को भले ही सीटें मुहैया न करा पाए पर किराये के लिहाज़ से छुक-छुक गाड़ी की हवाई जहाज से बराबरी तो कर ही सकती है।इसे विश्वस्तरीय बनाने के लिए कुछ तो डाटा चाहिए,सो किरायों की नई दर देश के सामने हाज़िर कर दी गई है।

विकास यूं ही नहीं होता और न सपने देखने से कुछ होता है।यह बात वे नहीं समझ सकते जो सत्ता से बाहर हैं।सरकार को जनता की दरकार केवल चुनावों में होती है इसलिए अब उसका बोलना कतई गलत है।सरकार को काम करने दो,जनता की बात सुनने के लिए अभी पाँच साल पड़े हैं।

'प्रजातंत्र लाइव' व जनसन्देश टाइम्स में 26/06/2014 को !

मंगलवार, 17 जून 2014

देशहित में कड़वी दवाई का नुस्खा !

'हिन्दुस्तान' में 17/06/2014 को प्रकाशित। 

वो तो नाम के ही डॉक्टर थे,ये वाले काम के निकले।कड़वी दवा को अच्छे दिनों की पुड़िया में लपेटकर रोगी को चंगा करने जा रहे हैं।पहले वाले डॉक्टर साहब पर आरोप था कि मरीज़ को बचाने के सब नुस्खे उन्हें पता थे पर समय से इलाज करने की कोशिश नहीं की।ऐसे में रोगी की हालत खस्ता तो होनी ही थी।नए वाले डॉक्टर जबसे आए हैं,बस नुस्खे पर नुस्खे दिए जा रहे हैं।रोगी अभी भी ऑपरेशन थियेटर से उन्हें टुकुर-टुकुर निहार रहा है।उसके परिजनों को आस है कि ज़रूर कोई जादुई चमत्कार होगा और रोगी खांस-खखारकर बैठ जायेगा।

बात जब देश की हो तो सारे मायने बदल जाते हैं।जो पहले जनहित की बात करते थे,वो अब देशहित पर आ गए हैं।अच्छे दिनों का आना जहाँ जनहित के लिए आवश्यक था,वहीँ देशहित के लिए उसी जन को कड़वे घूँट पीने से गुरेज कैसा ? सो,वे इस दवा को लगातार घोल रहे हैं।पहले जनहित में खूब दहाड़ते थे अब देशहित में कट्टी साध ली है।एक डॉक्टर को देशसेवक बनने के लिए कितना कुछ बदलना पड़ता है,यह बात वो अब समझ चुके हैं ।देश के लिए कड़े कदम उठाने पड़ते हैं,यह उनके समर्थकों को अभी पता चला है।इसके लिए शाल से साड़ी को मैच करने में भी कोई सांस्कृतिक  समस्या आड़े नहीं आती।

फ़िलहाल,शेयर बाज़ार की तेज बयार से मरीज की लू उतारी जा रही है।इस काम में थोड़ा-बहुत ईंधन तो लगेगा ही,इसके लिए पूरी योजना तैयार है।देशहित में जनता को यदि गैस की थोड़ी मार सहनी पड़ती है तो उसके लिए ये अच्छे दिन ही हैं कि उसे कोयला,स्पेक्ट्रम और खदान के बवंडर से हल्की हवा का सामना करना पड़े। इस समय देश बीमार और बेबस निगाहों से हर तरह के घूँट पीने को मजबूर है।हो सकता है कि इस बार राष्ट्रवाद का ज्वर भी पूरी तरह उतर जाय।

कहते हैं कि उम्मीदों से भरा इन्सान सब कुछ सहन कर लेता है,यहाँ तो फिर भी देशहित का प्रश्न है।वे उम्मीदवार से उम्मीदों के दूत बन गए हैं।ऐसे में किसी यमदूत की क्या मजाल कि रोगी के पास फटक जाय !




शनिवार, 14 जून 2014

बँधी मुट्ठी लाख की !

देश में इस समय विरोधी दल के नेता की ज़ोरों से तलाश हो रही है।जिनसे थोड़ी बहुत उम्मीद थी,उन्होंने साफ़ कर दिया है कि वे विपक्ष की राजनीति करने नहीं आये हैं।ऐसा करने पर उनको लगेगा कि वे सत्ता से बाहर हैं,जबकि वो ऐसा दिखाना नहीं चाहते।उन्हें आभासी प्रभामंडल के ज़रिये अपनी हनक बनाने का ही अनुभव है।वे सत्ता का दोहन करने वाले परन्तु सीधी जिम्मेदारी से बचने वाली परम्परा के नए वाहक हैं।

उनके विपक्ष का नेता बनने का दावा न करने के कई कारण हैं।कहीं ऐसा न हो कि सत्ताधारी दल के नेता बनने की तरह ही विपक्ष का नेता बनने का स्वप्न भी ध्वस्त हो गया तो ? इस पद के प्रति ललक न होने का महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि विपक्ष का नेता होने के नाते सरकार के हर काम पर पूछे गए सवाल का जवाब भी देना पड़ेगा।इसमें थोड़ी तकनीकी समस्या है कि सलाहकारों की अनुपस्थिति के बिना भी उत्तर देना पड़ सकता है,जो बड़ा कठिन कर्म है।उनके जीवन का मूल-मन्त्र है कि जब तक कुछ करने या कहने से बच सकते हैं,बचना चाहिए।

नई सरकार बनाने वालों ने तो अपना नेता बहुत पहले ही घोषित कर दिया था और इसके साथ ही टीवी चैनलों ने ‘कौन बनेगा प्रधानमंत्री’ की ज़ोरदार और लम्बी मुहिम चलाई थी।नई सरकार के आने की उम्मीद सबको थी पर विरोधियों को इतना भी अंदेशा नहीं था कि देश में विपक्षी दल के नेता का टोटा पड़ जाएगा।सत्ताधारी दल का नेता खोजने में तो कोई अड़चन नहीं आई,पर विरोधी दल के नेता के लिए न तो कोई दल घोषणा कर रहा है और न ही चैनल वाले वैसा कोई अभियान चला रहे हैं।ऐसे में लगता है कि देश में विरोधी दल के नेता की कोई इज्ज़त ही नहीं है।सत्ताधारी दल का नेता बनने का बजट करोड़ों में था पर विरोधी दल के नेता बनने के लिए टके भर का नहीं।ऐसे लो-प्रोफाइल पद को कौन अपनाना चाहेगा ?

लोकतंत्र के कुछ समर्थकों की जहाँ एक तरफ यह चिंता है कि सत्तापक्ष को विरोधी दल का नेता बनाने के लिए स्वयं पहल करनी चाहिए,वहीँ कुछ यह भी सवाल उठा रहे हैं कि वह विपक्षी नेता कैसा जो सरकार के रहमोकरम पर बने.कुल मिलाकर विपक्ष के नेता का चुनाव लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा बन गया है.

उधर स्वयं विपक्ष पूरी तरह से आहत है.युवराज अभी भी कुछ करने नहीं बल्कि देखने के मूड में लगते हैं।सत्ता की खुमारी उतरने में समय लगता है और दूर-दूर तक अभी इसके उतरने के कोई लक्षण नहीं दिखाई देते।देश के सम्भावित नेता बन पाने के लिए वे सदन में मुठ्ठी भर लोगों का नेता बनकर नहीं रहना चाहते।साथ ही एक इम्तिहान में फेल होकर दूसरे इम्तिहान का खतरा भी नहीं उठा सकते।ऐसा करने का उनका केवल एक उद्देश्य है कि कुछ लोगों में उनके प्रति आगे भी थोड़ा भरम बना रहे।हो सकता है कि उनके किसी सलाहकार ने उनके कान में फूँक मार दी हो कि बँधी मुट्ठी लाख की,खुल गई तो ख़ाक की।

प्रजातंत्र लाइव में 17/06/2014 को प्रकाशित 

शुक्रवार, 13 जून 2014

फुटबॉल के हम धुरंधर !


फुटबॉल का महाकुम्भ शुरू हो चुका है।जहाँ इसमें संसार की सबसे शक्तिशाली ३२  टीमें एक-दूसरे के खिलाफ गोल पर गोल दागेंगी, वहीँ हमारा देश इस खेल से ही गोल है।फिर भी,हमारे देश में इस खेल को लेकर काफ़ी उत्सुकता दिख रही है।टीवी और अख़बार से यह खेल हमारे घरों में घुस गया है।इस खेल की प्रभुता इतनी है कि इसकी मौजूदगी खेल के मैदान के बजाय पूरे बाज़ार में पसर गई है।हम भले ही संसार को इस खेल के खिलाड़ी न दे पाए हों,पर ऐसा कतई नहीं है कि हमारी धरती ऐसे बहादुरों से खाली है।

यूरोप और लातिन अमेरिकी देशों में सबसे ज्यादा फुटबॉल को लेकर क्रेज़ है और वे अपने खिलाड़ियों के ऊपर लाखों-करोड़ का बजट निछावर करते हैं ।इधर हमारे देश में फुटबॉल और कबड्डी खेलने के चैंपियन हर गली-मुहल्ले में फ़ोकट में मारे-मारे फिरते हैं।मौका पड़ने पर ये प्रतिभाएं बहुत कम लागत में अपना दम-खम दिखा सकती हैं।पार्षद से लेकर विधायक और सांसद बनने की राह में हमारे होनहार जबरदस्त सिर-फुटौवल करते हैं।अगर इन्हें किसी फुटबॉल टीम से खेलने का मौका मिले तो इनके ‘हेडर’ से निकलने वाले गोल दर्शनीय और अद्भुत होंगे।लेकिन अफ़सोस है कि बड़ी टीमों को हमारे देश के मौलिक खिलाड़ियों की क्षमता बारे में कुछ पता नहीं है।

कबड्डी के खेल के हम ऐसे ही चैंपियन नहीं हैं।इसीलिए बाकी देश यह खेल हमसे खेलने से ही  कतराते हैं।हमारे यहाँ संसद और विधानसभाओं में कबड्डी को लगातार प्रोत्साहन दिया जाता है।इसी तरह फुटबॉल के विकास के लिए समय रहते हमें सचेत होना होगा।जब तक इस खेल को राजनीति से प्रेरणा नहीं मिलती,इसका भविष्य अंधकारमय रहेगा।क्रिकेट का उदाहरण हमारे सामने है।फुटबॉल खेलने वाले देश क्रिकेट में इसीलिए शून्य हैं।उन्हें खेल की सफलता का मूल मन्त्र ही नहीं पता।

फुटबॉल के विश्वकप से प्रेरणा लेकर हमें अपने मौलिक खेल को बढ़ावा देना होगा।हम स्वभावतः उठा-पटक पसंद वाले देश हैं।अब कुश्ती को ही लीजिए,इसमें भी हमारी तूती बोलती है।किस दाँव से हमारा विरोधी चित्त होगा ,यह हमें बखूबी पता है।ऐसे लोगों को खेल में कम और राजनीति में ज्यादा मौके मिलते हैं और वे सफल राजनेता बन जाते हैं।खेल खेलना और खेल से खेलना दोनों अलग बातें हैं।कबड्डी,कुश्ती और फुटबॉल के स्वाभाविक गुणों से युक्त हमारी प्रतिभाएं आज हर खेल में लगी हैं।उनको पता है कि सारे खेल मैदान में ही नहीं होते,इसलिए उन्हें पसीना बहाने की ज़रूरत महसूस नहीं होती।

फुटबॉल के खेल में बड़ी संभावनाएं होती हैं।इस खेल में केवल ताकत ही काम नहीं आती।कई बार जहाँ  ताकत फेल हो जाती है,वहाँ हिकमत काम आती है।ऐसे लोग अपनी हारी हुई टीम को जिता भी सकते हैं।

टंगड़ी मारना,सिर-फुटौव्वल करना ,जूता-लात चलाना ये सब आधुनिक हिकमतें हैं।इनसे लैस होकर ही कोई टीम विश्व-विजेता बन सकती है।इन सबके लिए हमारे देश में अलग से ट्रेनिंग नहीं दी जाती।सौभाग्य से इस तरह के खेल के हम उस्ताद हैं क्योंकि ऐसे हुनर हमारे खून में हैं। ऐसे में कोई फुटबॉल खेलने वाले देशों को हमारी प्रतिभा की जानकारी दे तो फिर देखिये,मेसी,रोनाल्डो और नेमार जैसे खिलाड़ी हमारे आगे पानी भरेंगे।



'नई दुनिया' में 13/06/2014 को।

गुरुवार, 12 जून 2014

एजेंडा पूरा होने के दुःख !


नई सरकार बड़ी तेजी से काम कर रही है।पहले ही दिन उसने अपने सभी मंत्रियों को सौ दिन का एजेंडा थमा दिया था पर उसके मंत्री और भी तेज निकले।दिए गए काम को पन्द्रह दिन में ही पूरा कर डाला।यह बात अलग है कि इस तथ्य पर किसी ने गौर ही नहीं किया कि मंत्रियों ने जनता से किए अधिकतर वादे कम समय में ही पूरे कर डाले।
नई सरकार की प्राथमिकता में धारा 370 को हटाना था,मंत्री जी ने शपथ लेते ही उस पर अमल कर दिया।धारा के विरुद्ध बयान देते ही इतना हंगामा कटा कि अब आने वाले पांच सालों में भी कोई इसका नाम नहीं लेगा।मंत्री जी के वश में एजेंडा पूरा करना था,सो कर लिया।अब सर्वत्र शान्ति पसरी है.
नई सरकार ने आते ही पाकिस्तान को सबक सिखा दिया है।जो देश अभी तक हमारे यहाँ लगातार आतंकवादी भेज रहा था,उसे साड़ी भेजने पर मजबूर कर दिया है।इसके बाद से ही सरकार के समर्थक ‘साड़ी से शाल को कभी मैच किया रे...’गीत गुनगुना रहे हैं।अब एक सिर के बदले दस सिरों की ज़रूरत नहीं रह गई है।
सबसे ज्यादा सुधार हमारी अमेरिकी-नीति में देखने को मिले हैं।जो अमेरिका वीसा देने में हज़ार नखरे  कर रहा था,उसने आगे बढ़कर अंकल सैम से मिलने का प्रोग्राम भी फिक्स कर दिया है।सुनने में तो यह भी आ रहा है कि अमेरिका हमारे प्रधानमंत्री के पहनावे से बहुत प्रभावित है।हो सकता है कि वह भविष्य में ‘नमो-कुरता’ और ‘नमो-सदरी’ का आयात भी करने लगे।पिछली सरकारों की इतनी नाकामी रही कि वे मुई एक सुई तक अमेरिका को न बेच पाए।
ऐसा नहीं है कि सरकार ने आर्थिक क्षेत्र में कुछ नहीं किया है।शेयर बाज़ार तीस हज़ारी पहुँचने पर आमादा है और सोना धूल फाँक रहा है।ऐसे मुनाफे के दौर में गैस के दामों में कुछ बढ़ोत्तरी और बिजली में कटौती हो जाए तो आसमान नहीं टूट पड़ेगा।विपक्ष तो उजड़कर मौन-मुद्रा में है,बहुत बोलने वाले भी सत्ता पाकर चुप्पी साधे हैं ।
इधर जनता सौ दिनों का एजेंडा पढ़ने में व्यस्त है,उधर मंत्रियों के हाथ खाली हैं .यहाँ तक कि उनके पैर छूने तक की मनाही कर दी गई है। मंत्रियों को बोलने के लिए भी मना कर दिया गया है.ऐसे में मीडिया में बिना बयान आये,कैसे पता चलेगा कि सरकार काम कर रही है ? मीडिया भी टकटकी लगाये किसी स्कूप की तलाश में लगा है पर यहाँ भी संकट है.नए लोगों को स्टिंग से बचने का ख़ास निर्देश है.ऐसे में खबर निकले तो कैसे ? भ्रष्टाचार से निपटने का काम भी पूरा हो चुका है.मंत्रियों ने अपने कार्यालयों के आगे सूचना छाप दी है कि मोबाइल और कलम के साथ भी कोई अन्दर न घुस पाए.इस तरह पांच साल तक ईमानदारी की रक्षा आसानी से हो सकेगी.
चुनाव से पहले बहुचर्चित काले धन पर भी सरकार बनते ही प्रहार हो चुका है.उसे लाने की जिम्मेदारी विशेष बल को सौंप दी गई है.अब उसका बल ही जवाबदेह होगा.

एजेंडे का जल्दी पूरा होना कितना नुकसानदेह है,यह कोई नए मंत्रियों से पूछे.

'प्रजातंत्र लाइव' में 12/06/2014 व जनसंदेश टाइम्स में 13/06/2014 को प्रकाशित