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रविवार, 27 जनवरी 2019

झूठ और सच का महा-मुक़ाबला

सुनते थे कि झूठ के पाँव नहीं होते पर यह भी झूठ निकला।वह सरपट भाग रहा है या यूँ कहिए वह अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी ‘सच’ से बहुत आगे है।इसकी रफ़्तार मन की गति से भी तीव्र है।झूठ की हमजोली ‘अफ़वाह’ इसे पलक झपकते गंतव्य तक पहुँचा देती है।असली ख़बर वही जो तेज़ी से फैले।बिना सनसनी और थ्रिल के ख़बर क्या मुई आग भी पड़ोसी के घर तक नहीं पहुँच सकती ! ’सच’ तो अपंग होता है।वह बिना गवाही के अपना बचाव तक नहीं कर पाता।जबकि झूठ को गवाह की नहीं अफ़वाह की ज़रूरत होती है।वह कई रहस्यों को ऐसे आत्मसात कर लेता है जैसे अगस्त्य मुनि ने सारा समुद्र सोख लिया था।झूठ की सत्ता हो तो सच सूली पर टँग जाता है।ऐसे बलशाली ‘झूठ’ को बिना पाँव कहकर इसकी महिमा को कम करने की चाल है।सच तो यह है कि झूठ की चाल इतनी तेज़ है कि विलायत से एक बटन दबाते ही वह हिंदुस्तान के ईवीएम में प्रकट हो जाता है।नक़ाब में रहकर वह सच को ‘बेनक़ाब’ करने का दावा करता है।कई बार तो सच को भी अपने ‘झूठे’ होने का अहसास होने लगता है।पर झूठ कभी भी सच नहीं होना चाहता क्योंकि इससे वह ‘गतिहीन’ हो जाएगा,प्रगति नहीं कर पाएगा।

सच और झूठ का ताज़ा क़िस्सा बड़ी तेज़ी से शहर में फैल रहा था।तभी सच को हमेशा आगे रखने वाले चैनल को अपना कर्तव्य याद आया।उसे पता था कि सच अपने आप झूठ से आगे नहीं जा सकता इसलिए उसने उसको कंधा दे दिया।चैनल के उत्साही एंकर को लगा कि सर्द मौसम में सच और झूठ का ‘महामुक़ाबला’ हो जाए तो उसकी सच्चाई की रेटिंग भी आगे बढ़े।सो उसने दोनों पक्षों को अपने दंगल में बुला लिया।शुरू में तो सच सामने आने से हिचक रहा था पर झूठ इतना ललकार चुका था कि उसे आना ही पड़ा।अब अखाड़े में सच और झूठ दोनों थे,एंकर निर्णायक की भूमिका में था।उसके सीटी बजाते ही ‘खेल’ शुरू हो गया।

पहला दाँव झूठ ने ही मारा ‘तुम अभी भी कबीरदास के समय में रह रहे हो।उन्होंने कहा था साँच बराबर तप नहीं इसलिए तपस्या करना तुम्हारा धर्म है और भोगना हमारा।तुम मशीन की छोटी प्रिंटेड पर्ची हो और हम कोरे काग़ज़ की असीम सम्भावनाएँ।चाहे जितना भी स्याह कर लो,दामन झक सफ़ेद बना रहेगा।तुम्हारा और मेरा क्या मुक़ाबला ?’

सच ने झूठ को उसी दाँव से मारते हुए कहा-‘तुमने कबीर को पढ़ा है,यह झूठ है।फिर भी यदि पढ़ा है तो पूरा पढ़ो।उन्होंने झूठ को पाप बताया है।तुम्हारी दिक़्क़त यही है कि तुम आधी बात पकड़कर उसे ही चिल्लाने लगते हो।किसी बात को समझने के लिए तुम्हारे पास समय नहीं है।बार-बार कहने से झूठ सत्य नहीं बन जाता।हम कबीर के समय भी थे,आज भी हैं और कल भी रहेंगे।सत्य परेशान हो सकता है,पराजित नहीं।’

‘हा हा हा।’ झूठ अचानक अट्टहास करने लगा-तुम हमें आधी बात कहकर घेर रहे हो,यह भी नादानी है।महाभारत भूल गए ? युधिष्ठिर का बोला गया आधा झूठ आज तक लोगों को याद है।सच के कई क़िस्से इतिहास के हिस्से बन गए पर असल इतिहास बनाने का काम हमने ही किया।रही बात तुम्हारे पराजित न होने की,तो परिणाम की चिंता हम करते भी नहीं।तुमसे अधिक ‘गीता’ के अनुयायी तो हम हैं।केवल कर्म में विश्वास करते हैं।हमारा मुख्य काम है कि सामने वाले को ‘संदिग्ध’ बना दो।इससे आधी से ज़्यादा लड़ाई पहले ही जीती जा सकती है।जब तक लोगों को तुम्हारी आहट आए,हम अपना काम कर चुके होते हैं।इसीलिए तुम्हारा ‘सतयुग’ नितांत अकेला है और हम हर युग में हैं।हमें कभी कोई परीक्षा नहीं पास करनी पड़ती जबकि तुम रोज़ ‘अग्निपरीक्षा’ से गुज़रते हो।और हाँ,बाज़ार में तुम्हारी क़ीमत कुछ नहीं।चारों तरफ़ झूठ का बाज़ार है।ड्रॉइंग-रूम से लेकर कोर्टरूम तक मैं ही बिक रहा हूँ।अब तुम्हीं बताओ,कौन बड़ा ?’

झूठ के इस ताबड़तोड़ हमले से सच एक पल को दहल गया।फिर पछाड़ मारते हुए बोला, ‘माना कि तुम्हारे पास सत्ता है,संसाधन हैं,दाँव है पर हमारे पास आत्म-सम्मान है,प्रतिष्ठा है,प्रतिरोध है।हम साधन-हीन भले हों पर दीन-हीन नहीं।रही बात बिकने की,हम बिकते नहीं टिकते हैं।बाज़ार हमसे है,हम बाज़ार से नहीं।अपन ‘दो रोटी’ खाते हैं और चैन से सोते हैं।’ यह सुनते ही झूठ ज़ोर से झूम उठा।जीभ निकालते हुए कहने लगा-‘खाने की बात से ख़ूब याद आया।तुम केवल शपथ खाते हो।उसके बाद जो भी खाना है,हमीं खाते हैं।कोयला,खाद,बालू हम सभी कुछ खा जाते हैं और मजाल कि हमारा हाज़मा ख़राब हो ! एक और बात,सच उगलवाना पड़ता है पर झूठ ज़ोर से चिल्लाता है।तुम्हारी सबसे बड़ी हार यही है कि सब कुछ तुम्हारे नाम से होता है पर काम हमारा होता है।’ यह सुनकर सच सन्न रह गया।उसकी स्थापनाएँ हिलने लगीं।

इस बीच एंकर को याद आया कि उसकी भी कोई भूमिका है।उसने झट से ‘ब्रेक’ ले लिया।

संतोष त्रिवेदी

रविवार, 6 जनवरी 2019

न बिक पाने का दुःख

वे बिकने को तैयार थे,पर बिक नहीं सके।अपना भाव भी खोल दिया था पर कोई ख़रीदार नहीं मिला।पुराने खिलाड़ी हैं,ख़ूब ‘खेले’ भी हैं पर नए खिलाड़ियों से मात खा गए।करोड़ों की छोड़िए, कौड़ियों के लायक भी किसी ने नहीं समझा।जिसका बाज़ार भाव नहीं,उसकी प्रतिभा दो कौड़ी की।ऊँची क़ीमत पर बिकने के लिए खेल भी ऊँचा होना चाहिए।पहले घोड़ों पर ऊँचे दाँव लगते थे,अब खिलाड़ियों पर लगते हैं।बोली ही बता देती है कौन घोड़ा है,कौन खच्चर ! बाज़ार इसकी पहचान अपने तरीक़े से करता है।वे इसी बेरहम बाज़ार में नीलाम होना चाहते थे पर चूक गए।बाज़ार की भाषा में वे अपने खेल में अब चुक गए हैं।उन्हें इसी बात का दुःख है।भाव मिलता तो कैरियर ‘गली’ से निकलकर सीधे हाईवे पर आ जाता।पर होनी को कौन टालता !

बीते ज़माने में ‘बिकना’शर्म और ज़लालत का विषय होता था।अब गौरव और उपलब्धि का विषय है।न बिक पाना सबसे बड़ी ज़िल्लत है।प्रतिभा की परख इतनी आसान कभी नहीं रही।जिसका ऊँचा दाम,उसका बाज़ार ग़ुलाम।एक बार क़ायदे से बिक जाते तो आगे फ़ायदे ही फ़ायदे।विज्ञापन के बाज़ार में हर रोज़ बिकते।इस तरह ग्राहकों के ‘बिक’ जाने की वजह बनते।पर उनके ऐसे नसीब कहाँ ! मंडी सजी,बिकने का बिल्ला भी लटका पर उन पर ख़रीदने वाली कोई नज़र न टिक सकी।इस तरह वे भी बाज़ार में नहीं टिक सके।बाहर हो गए।‘अनबिका’ रह जाना उनके कैरियर की सबसे बड़ी असफलता है।इस बिकाऊ समय में ‘अनबिके’ रहने का दर्द उनसे ज़्यादा और किसे होगा ? घर-परिवार वालों को बिन-बिका मुँह दिखाएँगे तो लज्जा नहीं आएगी ? वे तो उजला करने वाली क्रीम चुपड़कर बैठे थे,फिर भी ख़रीदारों को गच्चा नहीं दे पाए।उन्हें पता नहीं कि गच्चा देने का काम बाज़ार का है।आज बाज़ार से बाहर हुए हैं,कल ‘खेल’ से भी बाहर होंगे।जो ख़ुद को ठीक से बेच भी न सके,वह कुछ भी हो सकता है,अच्छा ‘खिलाड़ी’ नहीं।

और इधर देखिए।क्या ख़ूब बिके हैं ! बिकने में भी रिकॉर्ड क़ायम किया है।इन पर सबसे बड़ी बोली लगी है।नीलामी का टैग सरे-बाज़ार उछला।फिर भी घर-परिवार में उत्सव का आलम है।बिकने की मेरिट-लिस्ट छापी जा रही है।क्या ‘स्कोर’ बनाया है बंदे ने ! मंडी में टॉप किया है।सरोकारी पत्रकार उससे इंटरव्यू लेने को उतावले हैं।चड्डी-बनियान से लेकर मच्छर-मार अगरबत्ती निर्माता तक उसके दरवाज़े पर लाइन लगाकर खड़े हैं।एक ‘बिका हुआ’ आदमी क्या-क्या नहीं बेच सकता ! सम्भावनाएँ तलाशी जा रही हैं।प्रायोजक ढूँढ़े नहीं छाँटे जा रहे हैं।उसकी प्रोफ़ाइल मोटी हो गई है।बाज़ार खुलकर खेलता है ताकि खिलाड़ी भी खुलकर ‘खेल’ सके।उसका संदेश साफ़ है कि नई पीढ़ी नैतिकता और सदाचार के कुपाठ अब बंद करे।इसीलिए जो ‘खेल’ पहले बंद कमरों में होते थे,अब डीटीएच के ज़रिए सीधे प्रसारण का सुख पाते हैं।जनता का क्या है,जैसे ‘आधार’ से जुड़ी है,बाज़ार से भी जुड़ जाती है।

हम अभी बाज़ार के हिसाब-किताब में पड़े थे कि सामने से ‘वे’ आते हुए दिखाई दिए।हम ऐसे मौक़ों को भुनाने के समय खासे संवेदनशील हो जाते हैं।हमें बाज़ार में बने रहने के लिए यह बेहद ज़रूरी है।उनकी भावनाएँ आहत हुई थीं और उसमें हम अपनी संभावनाएँ देख रहे थे।सहानुभूति जताने के बाद उनसे पहला सवाल यही पूछा-‘बिकने में क्या कमी रह गई थी ? मैदान में तो तुम्हारा ‘पेस’ भी ठीक-ठाक है !’ वे भावुक हो गए।कहने लगे-यह आप और हम समझते हैं।मैं ‘मीडियम पेसर’ हूँ।उन्हें ऐसा खिलाड़ी चाहिए था,जो चकमा दे सके।एक ही बॉल को यार्कर और गुगली में तब्दील कर सके।बल्लेबाज़ी करे तो बॉल को बल्ले में लगने से पहले सीमारेखा का पता मालूम हो।फ़ील्डिंग करूँ तो बॉल हमारे सर के ऊपर से न निकल पाए।अब उन्हें कोई कैसे समझाए कि मैदान में ‘नो फ़्लाइट ज़ोन’ नहीं हो सकता।दरअसल,उन्हें खिलाड़ी नहीं ‘करामाती जिन्न’ चाहिए।हम यहीं पर मात खा गए।’

‘पर अब करोगे क्या ? बाज़ार के बाहर तो ‘खेल’ का कोई मतलब भी नहीं ?’ हमने ‘दूसरा’ फेंकते हुए उन्हें टटोला।

‘अभी ऐसी नौबत नहीं आई कि मैं बेरोज़गार हो गया हूँ।खेल मेरे ख़ून में है।अपना ‘स्टार्ट-अप’ खोल दूँगा।’ वे अपना ग़म ग़लत करते हुए बोले।
‘मतलब ?’हमने अनजान बनते हुए पूछा।
‘कुछ नहीं,मैदान के बाहर ही पकौड़े तल लूँगा।आम आदमी की भूख शांत करने से बड़ा कोई काम नहीं है।दुआओं के साथ दो पैसे मिलेंगे सो अलग।बिक नहीं पाया तो क्या हुआ,अब बेचने का कारोबार शुरू करूँगा।सुना है,आजकल इसमें बड़ा ‘स्कोप’ है।उसी की तैयारी में लगा हुआ हूँ।फ़िलहाल पुदीना बोने जा रहा हूँ।साथ में चटनी भी तो होनी चाहिए’।यह कहते हुए वे विदा हो गए और हम अवाक् से खड़े उन्हें देखते रहे।

उनसे मिलने के बाद हम अपने दफ़्तर की ओर बढ़ ही रहे थे कि रास्ते में जाम लग गया।पता चला कि बोली में टॉप आए ‘खिलाड़ी’ को कंधे पर उठाए लोग नाच रहे थे।हम वहीं रुककर उस ‘अनबिके’ खिलाड़ी की दशा को यादकर एंजॉय करने लगे।चाहें तो अब आप भी खुलकर हँस सकते हैं !