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शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

चरणों में लोटने का सुख !

वे आते ही नेता जी के चरणों में लोट गए। नेता जी ने बहुतेरी कोशिश की कि वे उनके मुलायम चरण छोड़ दें पर वे छोड़ने के मूड में बिलकुल नहीं थे। नेता जी उन्हें कुर्सी पर बैठने का प्रस्ताव दे चुके थे मगर इस बार वे कोई चूक नहीं करना चाहते थे। पहले ही वे एक बार कुर्सी-वियोग का आघात सहन कर चुके थे। सो इस बार वे कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। जब कई बार नेता जी के आश्वस्त करने के बाद भी वे टस से मस नहीं हुए तो उन्होंने अंतिम रूप से उन्हें आगाह किया। इस बार उनके निर्जीव से शरीर में जरा-सी हरकत हुई और वे अंततः उठ बैठे।

अब वे कुर्सी पर जम चुके थे। सूनी पड़ी कुर्सी मानो उन्हीं के इंतज़ार में थी। वह उनकी विशाल काया को लादकर खुद को धन्य समझने लगी। जब तक खाली थी,हल्की थी। अब उसमें स्वाभाविक भारीपन आ गया था। दुनिया में वजन की ही पूछ है। कुर्सी मिलने से कुर्सी और वे दोनों वजनी हो गए थे। इस लिहाज़ से नेता जी का भी वजन पहले से बढ़ गया था,कद भले ही घट गया हो !

नेता जी उन्हें धीरे से समझाने लगे-देखो बरखुरदार,राजनीति में सार्वजनिक रूप से कुछ कार्य सर्वथा वर्जित माने गए हैं।इनमें चरण पकड़ना सबसे वर्जित कर्म है। इस क्रिया से चरण पकड़ने वाले और चरण धारक दोनों का नैतिक मूल्य हल्का हो जाता है।राजनीति में वजन तभी तक कायम रहता है,जब तक पर्दे के पीछे गुल खिलते रहें,ग़लती का सबूत न छूटे। सरेआम चरणों में लोटना राजनैतिक हाराकिरी है। तुम जैसे अनन्य जनसेवक को मैं खोना नहीं चाहता इसलिए आइन्दा सबके सामने ऐसे खुरदुरे और कठोर हाथों से मेरे कोमल चरण मत छूना।हल्के हो जाएँगे।

इतना सुनते ही वे सिसक पड़े। कहने लगे-आप मेरे देवता हैं। मेरा अस्तित्व आप का ही दिया हुआ है। माई-बाप तो बस नाम के हैं। प्रजापति होने का जो अवसर आपने सुलभ कराया है,उसे मैं कैसे भुला सकता हूँ ! मैं तो सुलभ शौचालय जाता हूँ तो वहाँ भी लोटा ले जाता हूँ। मैंने ज़िन्दगी में दो ही काम किए हैं। जिस वक्त चरणों में नहीं लोटता हूँ,लोटा पकड़ लेता हूँ। पिछले कई दिनों तक पकड़े रहा। विरोधी खुश थे कि मुझे पेचिश की बीमारी हुई है पर मेरी असल बीमारी तो आपको पता है। जब तक जनहित का पूर्ण मनोयोग से खनन न कर लूँ,दिल को चैन नहीं आता। आपने कृपा की है तभी चरणों में लोट रहा हूँ। इसी में मुझे परम-शांति मिलती है। कृपया मुझे चारों दिशाओं में लोटने दें। यही मेरा मौलिक कर्म है।

नेता जी ने पीठ पर हाथ धरते हुए कहा-जाओ,फ़िलहाल रेत पर लोटो।

मंगलवार, 13 सितंबर 2016

बाहुबली जमानत पर और ऊपरवाले का डर !

नेता जी जमानत पर हैं। आम आदमी को बाहर जितनी सुविधाएँ नहीं मिलतीं,उनको अंदर रहकर हासिल होती हैं। यह उनकी अपनी अर्जित कमाई है। आदमी और नेता को जो अलग करती है,वह यही हनक होती है। बताते हैं कि जेल से बाहर आने पर तेरह सौ गाड़ियाँ उनके आगे-पीछे नाच रही थीं। इससे एक भी कम होती तो जलवे में दाग लग जाता। सुशासन भले जल-भुनकर राख हो गया हो,पर जनता ने अपने प्रतिनिधि पर आँच नहीं आने दी। कुछ भी करने और बोलने के लिए नेता जी अब पूरी तरह तैयार थे।

दरबार सज गया। नेता जी को खुला दरबार पसंद है। वास्तविक नेता बिना दरबार के जीवित नहीं रह सकता। कारागार में भी इसीलिए कारगर इंतजाम किए गए थे।वहाँ थोड़ा लुका-छिपी थी,अब सरेआम है। नेता बोल रहा हो और आप न सुनें तो वह बुरा मान जाता है। यही सोचकर हम भी कुछ सवाल लेकर पहुँच गए।

वे चौतरफ़ा घिरे हुए थे। आधुनिक पत्रकार उनके साथ सेल्फी लेकर कृतार्थ हो चुके तो अपन का नम्बर आया। मैंने उन्हें बाहर आने की औपचारिक बधाई दी। उन्होंने सहर्ष स्वीकारी भी। मेरा पहला सवाल यही था-आपके आने से राज्य की राजनीति में क्या असर पड़ेगा ?’ नेता जी इस प्रश्न के लिए जैसे तैयार ही बैठे थे,लपकते हुए बोले-यह हमसे मत पूछिए। जनता सही समय पर इस बात का जवाब देगी। उसने देना शुरू भी कर दिया है। आप जो इत्ती भीड़ देख रहे हैं,दरअसल यह कातर जनता है। हम इसी के लिए जेल से बाहर आने के लिए आतुर थे। ’

‘आप पर बाहुबली होने का भी आरोप हैं। इसमें कितना झूठ है ?’ मैंने अगला सवाल धर दिया। सामने लगते जयकारे के बीच वे सहजता से बोल उठे-यह सब विरोधियों की साजिश है। हम हिंसा में विश्वास नहीं करते। हमारा नाम ही काफ़ी है। रही बात बाहुबली होने की,तो हमारी बाजुएँ जनता ने मजबूत कर रखी हैं। यह मजबूती उसी को समर्पित है।’

‘अब एक आखिरी सवाल,आपको किससे डर लगता है ?’

‘देखिए वैसे डरने का काम हमारा नहीं है। कानून हमारे साथ है। सरकार और जनता भी हमारे साथ है फिर भी हम थोड़ा-बहुत ऊपरवाले से डर लेते हैं। इससे लोगों में भी डर के प्रति आस्था बनी रहती है। यही हमारी पूँजी है। ’ नेता जी ने दो-टूक जवाब दे दिया था।

नेता जी की अट्टहास वाली फोटो के साथ साक्षात्कार समाप्त हुआ। दूर सुशासन का सूरज अस्त हो रहा था। अँधेरा ज्यादा बढ़ता उसके पहले ही हम लौट आए।

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

डूबते-उतराते लोग और टंगे हुए भूपाल !

पूरा राज्य जलमग्न था।जनता घोर कष्ट में थी।उसके दुःख देखने के लिए वे बेचैन हो रहे थे।दुःख तभी समझ में सही आता है,जब दिखाई दे,आर्तनाद करे।राज्य के मुखिया के नाते वे आधिकारिक रूप से इसे देखने के हकदार थे।इसके साक्षी बनने के लिए वे निकल पड़े।जनता के दुःख ठीक प्रकार से दिखाई दें,इसके लिए पहले वे हवा में उड़े।ऊपर से जल और जमीन एक-सी लग रही थी।मैदान उजले और झक सफ़ेद थे।चारों तरफ पूर्ण शान्ति पसरी हुई थी।वे दुःख देखने के लिए अवतरित हुए थे,पर यहाँ तो दूर-दूर तक उन्हें निर्जन दिखा।न कोई कोलाहल,न चिल्ल-पों।यह भी कोई ‘एडवेंचर’ हुआ ?

उन्होंने तत्काल साहसिक निर्णय लिया।ज़मीन पर उतर आए।न,न कहने का मतलब उन्होंने विमान त्याग दिया।अब सामने जल था,वे थे और उनका समर्पित दल।जनता कहाँ-कहाँ तक जल में समाई है,वे निकट से देखना चाहते थे।पर समस्या इससे भी विकट थी।वे अभी तक बेदाग़ और उजले थे।यहाँ तक कि उनके जूते भी उनकी सफेदी की गवाही दे रहे थे।आज उन्हीं पर संकट था।जल-स्तर तीस सेंटीमीटर के खतरनाक लेवल यानी घुटनों तक पहुँच चुका था।वे घुटनों पर कोई संकट नहीं चाहते थे।वे राजा थे,प्रजा नहीं,जो गले तक भी पानी भर आने पर खुद को सहज महसूस करती है।इस विकट परिस्थिति में भी उन्होंने हार नहीं मानी।आख़िरकार पानी से रार ठान दी।

हर मौके पर सुस्त रहने वाला राज्य-बल तुरंत सक्रिय हो गया।राज्य की व्यवस्था खतरे में थी।उसे अगल-बगल से टांग लिया गया।कुछ लोग तो उसे कंधे पर भी बिठाना चाहते थे पर तब जनता के दुःख से वह साठ सेंटीमीटर और दूर हो जाती।वे व्यवस्था की साक्षात् मूर्ति बन गए।जल के बीचोबीच वे जनता के दुःख देखने लगे।कुछ जासूसी आँखें भी उन्हें देख रही थीं।आखिरकार कड़ी मशक्कत के बाद दुःख को कैमरे में क़ैद कर लिया गया।राज्य के बाढ़-पीड़ित मुखिया को उसकी झक-सफेदी के साथ धरा पर सुरक्षित धरा गया।

दुःख का आकलन हो चुका था।जायजा भलीभांति हुआ था ताकि सबको उचित मुआवजा मिल सके।मुआवजे का बजट बढ़ा दिया गया।बाढ़ में फँसे लोग अभी इतना गिरे नहीं थे कि राज्य-कोष के बदले जयघोष न उच्चार सकें।हाहाकार के बीच जयकारा गूँज उठा।दुःख देखने का प्रयोजन सफल हुआ।

कुछ लोग इस ‘दुःख-दर्शन’ पर भी तिरछी नजर उठा रहे हैं।उनको ऐतराज है कि दुःख देखने के लिए दुःख समझना ज़रूरी है।उनका मानना है कि इसके लिए उनको पानी में उतरना चाहिए था।पर ये लोग यह भूल जाते हैं कि इससे उनका पजामा गीला हो जाता।तब बड़ा अनर्थ होता।वैसे भी दुःख-दर्द देखने के लिए थोड़ा फासला होना चाहिए।वे तो बस इसी आपदा से निपट रहे थे।

बुधवार, 7 सितंबर 2016

पत्थर के सनम,तुझे हमने....!

घाटी में बैठक हुई।कबूतरबाज और पत्थरबाज अपनी-अपनी माँगों के साथ मिले।कबूतरबाज चाहते थे कि वे पत्थर न फेंके।इससे शांति के कबूतरों को चोट लगती है।पत्थरबाज इसके लिए तैयार नहीं थे।उन्हें इसके सिवा और कोई हुनर सिखाया ही नहीं गया।दोनों पक्षों में वार्ता ज़रूरी थी।हुई भी।कबूतरबाजों की तरफ से सरकार के प्रतिनिधि ने अपनी बात रखी-हम आपकी समस्या से अवगत हैं।आप यदि पत्थर फेंकना ही चाहते हैं तो इसके लिए भारतीय परम्पराओं का ख्याल रखा जाए।कहने का मतलब कि पत्थर वही फेंके,जिनके निशाने सटीक हों।यह नहीं कि निशाना कनपटी पर हो और वह दिल पर जाकर लगे।इससे जनभावनाएं आहत हो सकती हैं।और हम ऐसा न होने देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

एक वरिष्ठ पत्थरबाज-प्रतिनिधि ने अपना पक्ष खोलकर धर दिया-देखिए,हम पाक-पत्थरबाज हैं।जो भी पत्थर हमारे हाथ आ जाता है,नापाक नहीं रह पाता।दूसरी बात यह कि पत्थर को तो भारतीय संस्कृति में पूजा जाता है।हम उसी परम्परा को बस आगे बढ़ा रहे हैं।फूलों की वादी में हमें पत्थरों से खेलने की आज़ादी मिलनी चाहिए।हम पत्थर के सनम होना चाहते हैं।हम कितने शरीफ हैं, फिर भी आप हमें छर्रा-बंदूक से नवाज रहे हैं ?

शान्ति का कबूतर फड़फड़ा उठा-आप पत्थर फेंकिए,पर हमें मना करने से मत रोकिए।इतनी आज़ादी तो हमारे पास भी है।पत्थरों से हमारा प्रतिरोध प्राचीन-काल से चला आ रहा है।सुना ही होगा-‘कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को ! और अगर आपको मारना ही है तो पहले ठीक से रिहर्सल कर लिया करिए।फेंकना आसान नहीं होता।आप लोग तैयार हों तो हम इसमें केंद्र सरकार की सब्सिडी-योजना लागू कर सकते हैं।आप लोग थोड़ा कम वजन के और मझोले टाइप के पत्थर फेंके।बदले में हम छर्रा-बंदूक के बजाय फ्रंट पर मिर्च के गोले तैनात कर सकते हैं।

पत्थरबाज-प्रतिनिधि ने कहा-हम आपकी माँग को ऊपर तक पहुँचा देंगे।फ़ैसला उन्हीं को करना है।हमारे हाथ में तो केवल पत्थर पकड़ा दिए गए हैं।इनकी मात्रा और साइज़ भी हम नहीं तय करते।इस मामले में हम बच्चे हैं।

सर्वदलीय बैठक बिना किसी नतीजे के सम्पन्न हो गई।घाटी में शान्ति को लेकर दोनों पक्ष सहमत थे,पर पत्थरों और छर्रों के मसले पर आम सहमति नहीं बन पाई।तय हुआ कि अगली बैठक तक ‘ऊपरवाले’ का कोई निर्देश प्राप्त हो जाएगा।तब से शान्ति के कबूतर यही गुनगुना रहे हैं,’पत्थर के सनम तुझे हमने मुहब्बत का ख़ुदा जाना,बड़ी भूल हुई अरे हमने,ये क्या समझा,ये क्या जाना !’