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शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

फागुन कितना बदल रहा है !

जब से फागुन आया है,सब कुछ बदलने पर आमादा है।पहले इस महीने केवल दिल बदलने की खबरें आया करती थीं पर पिछले कुछ दिनों से जो कुछ हो रहा है,उससे आशंका उत्पन्न हो गई है कि जल्द ही सब कुछ बदलने वाला है।राजनीति,मौसम और खेल सब यू-टर्न ले रहे हैं।जहाँ एक तरफ़ कभी चुनाव न हारने वाले ‘शाह’ दिल्ली की जंग हार गए,जिस झाड़ू को ‘स्वच्छ भारत’ अभियान का प्रतीक बनाया था,उसी ने दिल्ली के अभिमान को ढहाया । वहीँ दूसरी तरफ़ क्रिकेट के विश्वकप में भारत से कभी न हारने वाले ‘चोकर्स’ पहली बार चूक गए।लगातार सबसे पिटने वाली टीम इण्डिया अचानक ‘विश्व-कप’ हथियाने की ओर अग्रसर दिखने लगी है।


दिल्ली से लेकर बिहार तक कुर्सी छोड़ने वाले इस्तीफ़े माफ़ी के साथ फिर से काबिज़ हो गए हैं।बदले समय में एक सस्ते मफ़लर ने महंगे सूट को नीलाम कर दिया।हाल की हार ने नौलखा-हार को भी मात दे दी है।पिछली बार हर घंटे घोषणाएं करने वाले लगता है इस बार बड़ी फुरसत में हैं।इत्ते दिनों में पहली कोई घोषणा ‘बिजली हाफ़ और पानी माफ़’ की हुई है.जनता इसी पानी से अब होली खेल सकती है.ब्रेकिंग न्यूज़ के आदी दर्शकों में इससे बड़ी उकताहट बढ़ रही है,साथ ही मीडिया पर मंदी छाने का भी अंदेशा हो गया है।


फागुन का मौसम हो और कुछ बदले नहीं ,ऐसा तो नहीं हो सकता है ना।जब बाबा भी देवर लगने लगे,ऐसे में बंजारा और बाबू बजरंगी कब तक जेलों में बैठे रहते ? फागुन में हर ‘गरीब’ के दिन बहुरते हैं,इसी को ध्यान में रखकर सरकार बहादुर बजट बनाती है।खुद हलवा खाकर जनता को ‘लॉलीपॉप’ दिखाने का फागुन से बेहतर मौका दूसरा कहाँ मिलेगा ? इस मौसम में हर कोई भंग की तरंग में होता है,सो जनता से चुनाव का ‘बदला’ लेकर भी सरकार बेगुनाह साबित हो सकती है।जब जनमत बदल सकता है तो सरकार क्यों नहीं ? गरीब वैसे भी हर किसी की ‘भौजाई’ होता है और भौजाई से फागुन में मजाक तो बनता ही है।


बदलाव तो और भी हो रहे हैं।सरकार अध्यादेशों को कानून बनाने के लिए कृत-संकल्प है.किसान चिल्ल-पों मचा रहे हैं पर सरकार डरने वाली नहीं है।वह यह चाहती है कि उन्होंने खेती-पाती तो बहुत कर ली,अब उनके भी आराम के दिन हैं.स्मार्ट-सिटी के नागरिक अब चने का साग नहीं लोहे के चने चबायेंगे.सरकार के पास काम करने को बहुतेरे विकल्प हैं।इसीलिए लगातार कई एक्ज़ाम फेल हो जाने के बाद भी वह ‘मन की बात’ कर रही है।सरकार कोई बच्चा थोड़ी ना है जो बोर्ड एक्जाम से डर जाए ? अब इतना भी बदलाव नहीं हुआ है।

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

उनका छुट्टी पर जाना!

अब इसे फागुनी हवा का असर कहें या एक्ज़ाम और रिजल्ट का प्रेशर कि वो छुट्टी पर चले गए हैं।जब तक रहे,अपनी पूरी ताकत के अनुसार काम किया।कभी नतीजे की परवाह नहीं की।वो काम के प्रति इतने लगनशील हैं ,यह इसी से पता चलता है कि वो हर समय काम में डूबे रहते थे;इतना कि अपनी पार्टी को भी उसी तरह डुबो दिया।सामने आए भी तो ड्रोन मिसाइल की तरह ।फटाफट बमबाजी की और घुस गए अपनी खोह में।फिर वहाँ अगले काम को तमाम करने के लिए अपनी हिम्मत बटोरने में लग जाते।जब बाहर आने लायक ताकत इकट्ठी हो जाती; आते,कागज़ फाड़ते,बाजू फड़काते और चले जाते।क्रांति में क्रोध का सही मिश्रण तो कोई उनसे सीखे।उन्होंने अपनी पार्टी को कभी इतना भाव दिया ही नहीं कि वह उठकर खड़ी हो सके।उनको अंदेशा था कि ऐसे में कहीं वह देश से बाहर न चली जाय ! फ़िलहाल पार्टी ज़मीन पर ही बैठ गई है।देश इसके लिए बड़ा अहसानमंद है।ऐसे बंदे के छुट्टी पर जाने पर सवाल उठाने वाले देश-विरोधी से कम नहीं हैं।

पिछले काफी समय से वे काम पर थे।उन्हें लगता था कि बच्चों को साल में केवल एक बार ही पेपर देना पड़ता है,पर उनके साथ बहुत नाइंसाफी हुई।साल भर में पाँच बार पेपर ले लिए गए।यह भी कोई बात है ! बच्चे की जान लोगे क्या ? माँ का प्रथम दायित्व है ,बच्चे की सुरक्षा।उन्हें छुट्टी देकर कई हमलों से माँ ने बचा लिया है।यह समाज का भी धर्म है कि वह बच्चों के प्रति सहृदय रहे ।रही बात छुट्टी के बहाने मस्ती करने की,तो फागुन में बाबा को भी ऐसा करने का विशेषाधिकार होता है।वे कुछ नया थोड़ी ना कर रहे हैं फिर उनके साथ अन्याय क्यों ? वैसे भी फागुनी-माहौल में बजट-सत्र की ज़रूरत होनी ही नहीं चाहिए पर सरकार जानबूझकर जनता के साथ ‘होली’ खेलना चाहती है।विरोध तो इस परम्परा का होना चाहिए न कि काम के जंजाल से आजिज एक ‘जिम्मेदारी’ के अवकाश पर चले जाने का।

छुट्टी पर जाना राजनेताओं का मौलिक अधिकार होना चाहिए क्योंकि यह कालान्तर में एक मज़बूत हथियार साबित हो सकता है।आये दिन कोई न कोई नेता ‘दुर्लभ वचन’ उचारता है।जब उस पर खूब बवाल मच ले,तब यह कहा जा सकता है कि ‘बयान’ के वक्त नेता या मंत्री छुट्टी पर था।इसे सरकार का नहीं उसका व्यक्तिगत बयान माना जाय।इसकी काट विरोधी भी नहीं कर सकते।चिंतन के लिए भी अवकाश बड़ा सुभीता प्रदान करता है जब व्यक्ति के खाते में शून्य हो।जिन पलों को आप मौज-मस्ती की संज्ञा दे रहे हैं,हो सकता है उन पलों में वह शून्य से ज़रूरी वार्तालाप कर रहा हो।अवकाश के क्षणों में आकाश उसका सबसे निकट का मित्र होता है।चिंता भले ही व्यक्तिगत हो पर चिंतन तो सार्वभौमिक होता है।राजनेता यदि ऐसा चिंतन करते हैं तो यह शर्म नहीं गर्व की बात है।

उनके अचानक यूँ अवकाश पर चले जाने से खुद उनके अपने निर्विकार हैं।कुछ को लगता है कि वो काम पर थे ही कब,जो छुट्टी पर चले गए ! उनका तो बस नाम ही काफी है।हर जिम्मेदारी ओढ़ने के लिए पार्टी में अलग-अलग प्रकोष्ठ बने हैं।चूंकि हार की श्रंखला तनिक लम्बी है और सर्दियाँ भी कमोबेश विदा हो गई हैं,इसलिए ‘ओढ़ने-ओढ़ाने’ का कार्यक्रम गैर-ज़रूरी है।विरोधी बेवजह हल्ला मचा रहे हैं।वे कामकाज के सत्र में छुट्टी लेने को उनकी संवेदनहीनता बताते हैं जबकि असल बात तो यह है कि वे शुरू से ही बेहद संवेदनशील रहे हैं।अध्यादेशों के प्रति उनका लगाव जगजाहिर है।सरकार के हित में यही है कि उनकी गैर-मौजूदगी में अपने अध्यादेश सुरक्षित ढंग से पास करा ले।वे सरकार और अपनी पार्टी के भले के लिए ही लोगों से ‘लुकते’ रहे हैं।इसलिए उन पर दोष लगाना न्यायसंगत नहीं है।अब तो फागुन भी उफ़ान पर है ऐसे में लोग ही बौराए हुए हैं.वे तो बस ‘होली’ खेलने का पूर्वाभ्यास कर रहे हैं।

रविवार, 22 फ़रवरी 2015

राजधानी में दाखिला

अपने तीन साल के बेटे चुन्नू को लेकर जैसे ही ‘न्यू इंग्लिश पब्लिक स्कूल’ के गेट पर पहुँचा,वहाँ तैनात मुस्टंडे से गार्ड ने रोक दिया।मैंने उसे बताया कि नर्सरी में एडमिशन के लिए आए हैं तो उसने वहीँ पर इंटरव्यू शुरू कर दिया।मुझे सशंकित नज़रों से देखते हुए बोला-‘एकाउंट है आपका ?’।मैंने भी झट से उत्तर दिया,’जी क्यों नहीं ! अभी पिछले महीने ही ‘जन-धन’ योजना में खुलवा लिया है।चाहो तो चेक कर लो,मिनिमम बैलेंस तो अभी भी पड़ा है,निकाला नहीं है।’इतना सुनते ही गार्ड आपे से बाहर हो गया।कहने लगा-‘भाई साहब,आप किस दुनिया में रह रहे हैं ? मैं सोशल मीडिया में,मसलन ट्विटर और फेसबुक में एकाउंट की बात कर रहा हूँ।’


अभी भी बात मेरे भेजे में चढ़ नहीं पाई थी।मैंने यूँ ही तुक्का मारा-‘ तुम्हारा कहने का मतलब जिसमें अपने प्रधानमंत्री जी और अमिताभ बच्चन जी ‘ट्विट-ट्विट’ खेलते रहते हैं ?’ ‘हाँ जी।यह स्कूल बिलकुल लेटेस्ट है और इसलिए इसमें उन्हीं लोगों का एडमिशन होता है ,जो हरदम अपडेट रहते हैं’ गार्ड ने महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए बताया।मैंने एक बार अपने चुन्नू को निहारा फिर उससे मुखातिब हुए-’पर भाई,एडमिशन तो बेटे का होना है,मेरा नहीं।मुझे अंदर तो जाने दें।मेरा बेटा बड़ा होनहार है।पंडितजी ने बताया है कि बड़ी शुभ घड़ी में ये बालक पैदा हुआ है।बहुत दूर तक जायेगा’


‘हाँ तो सही ही कहा है पंडिज्जी ने।यह बालक अपने घर से पन्द्रह-बीस किलोमीटर दूर जाकर ही पढाई कर पायेगा।’गार्ड ने भविष्यवाणी की विस्तृत व्याख्या कर दी।’पर यह स्कूल तो सबसे नजदीक है।इसी में क्यों न जाए ?’मैंने सतर्क होकर उत्तर दिया।गार्ड भी खूब घुटा हुआ था,तुरंत बोल पड़ा-माना यह स्कूल नजदीक है पर आपकी पॉकेट से तो दूर है।’


तभी गेट पर इलाके के विधायक जी दिखाई दिए।मैंने उनसे स्कूल के प्रांगण तक पहुँचने में मदद की गुहार लगाई ।वे पसीजे भी और इस तरह हम चुन्नू सहित अंदर दाखिल हुए।


अंदर मेला-सा लगा था।एक काउन्टर पर थोड़ी कं भीड़ थी,हम उधर ही भिड़ गए।एक कन्या सबके आवेदन-पत्र ले रही थी।मैंने भी अपना आवेदन सामने पेश किया तो कन्या ने बताया कि सारे डाकूमेंट यहाँ जमा कर दीजिये और लाइन में लग जाइए।सामने डिस्प्ले बोर्ड पर अपना नम्बर देखते रहिए,जब आएगा,बच्चे के साथ कमरे के अंदर आ जाना।मैंने स्लिप में देखा मेरा सत्तावनवां नम्बर था।डिस्प्ले बोर्ड में फ़िलहाल दसवाँ नम्बर चल रहा था।मैं चुन्नू को लेकर लाइन में खड़ा हो गया।


पूरे तीन घंटे बाद मेरा नम्बर आया तो अचानक चुन्नू को गायब पाया।अब मेरी घबराहट बढ़ गई थी।अगर मैं चुन्नू को ढूँढने निकलता हूँ तो इधर नम्बर कट जायेगा।इस उधेड़बुन में मैंने सोचा,बात तो हमें ही समझनी है,चले चलते हैं।स्लिप लेकर अंदर पहुँचा तो सामने पड़े बड़े से सोफे पर तीन मूर्तियाँ पसरी हुई थीं।बीच वाली मूर्ति ने पहला सवाल यही किया कि बच्चा कहाँ है।मैंने उन्हें बताया कि अभी तो यहीं था,बस इधर-उधर निकल गया होगा।बाईं तरफ बैठी मूर्ति तब तक सक्रिय हो चुकी थी।कहने लगी-‘क्या हम यहाँ झख मारने के लिए बैठे हैं ? आप अपना बच्चा तक नहीं संभाल सकते,इतना बड़ा स्कूल कैसे अफोर्ड कर पाओगे ?’।मैंने थोड़ा सहमते हुए उत्तर दिया-‘पर स्कूल को अपने कंधे पर थोड़ी उठाना है।बच्चा है,मिल जायेगा।आप डाकूमेंट चेक कर लें’।


दाईं ओर बैठी मूर्ति ने पहले मुझे ऊपर से लेकर नीचे तक देखा,फिर बम फोड़ा-‘अब तक छप्पन हो चुके हैं,पर ऐसा पीस पहली बार दिखाई दे रहा है।क्या क्वालीफिकेशन है आपकी ?’ मैंने थ्री-पीस पहने उस मूर्ति को जवाब देने के बजाय प्रश्न कर दिया-‘मेरी क्वालिफिकेशन का क्या मतलब है ? मैं बेटे के एडमिशन के लिए आया हूँ,अपनी नौकरी के लिए नहीं।


बीच वाली मुख्य मूर्ति ने हस्तक्षेप करते हुए कहा-‘आप किस तरह यहाँ एडमिशन चाहते हैं ? हम एलूमनी को प्रेफर करते हैं।ऐसा कुछ है तो बताओ ?’


मैंने डरते हुए उत्तर दिया,’मगर मुझे पता चला था कि बिना किसी ‘मनी’ के यहाँ एडमिशन हो जायेगा।अख़बार में आज ही पढ़कर आया हूँ कि स्कूल गरीब बच्चों को एडमिशन देने से मना नहीं कर सकते।न तो मेरे पास देने को आलू हैं और ना ही मनी।‘


इतना सुनते ही स्कूल की घंटी बज गई।मुझसे कहा गया कि मेरा समय अब समाप्त होता है।मैं बाहर आकर चुन्नू को घर ले जाने की तलाश में जुट गया।

 

बजट का हलवा होना !

बजट बनकर लगभग तैयार है पर उससे पहले हलवा बन गया है।वित्त मंत्री जी ने हलवे से भरी कड़ाही में चमचा डालकर उसकी मिठास भी चख ली है।अब बजट में आने वाली कड़ाही में जनता का सिर डाला जायेगा पर उसका स्वाद तो जनता ही बताएगी।वित्त मंत्री जी के पास जितने भी प्रकार के मिश्रण थे,उन्होंने हलवे में मिला दिया है।गौर करने वाली बात है कि उसमें चुन-चुन कर ड्राई-फ्रूट्स डाले गए हैं।अब बजट के बाद किसी को सूखापन नज़र आये तो यह उसमें पड़े इन मसालों का दोष है न कि वित्त मंत्री जी का।

जनता ने जो हलवा कड़ाही में देखा,वो केवल उसके देखने के लिए था।साथ ही यह बताने के लिए भी कि बजट बनाना जितना हलवा-सा है,उसको खा लेना या पचा पाना उतना ही दुष्कर।जिन्हें खाने का अभ्यास नहीं है,वे इससे दूर ही रहें,गरम हलवा उनकी जीभ को लहू-लुहान भी कर सके है।उनके लिए जेटली की पोटली तैयार है।उसमें इतना कुछ है कि सबके लिए कुछ न कुछ निकल ही आयेगा।हलवे और बजट के पकाऊ होने में कोई संदेह नहीं है शायद इसीलिए जनता को ‘पकाने’ के लिए यह वार्षिक-आयोजन होता है।फिर भी सब दिल थामकर बजट का इंतजार करते हैं।

‘दिल्ली’ और ‘बिहार’ हो जाने के बाद जेटली की पोटली अधिक सतर्क हो गई है।अब उससे ऐसी बयार निकलने की आशंका बलवती हो गई है,जिससे सूट वाले चेहरों को सुकून और मफलर वालों को स्वाइन-फ्लू हो सकता है।इसलिए अपना ‘लक’ पहन कर चलें।वैसे भी बजट तभी लाया जाता है जब जनता होलियाना-मूड में होती है।भाँग और धतूरे के नशे में मस्त जनता बजट के कसैलेपन को ख़ुशी-ख़ुशी गटक जाती है।नशा हिरन होने के बाद ही उसे समझ में आता है कि सामने शेर है।फिर बोलने से भी क्या फायदा।शेर अपने प्रिय शिकार हिरन को हलवे की माफिक उदरस्थ कर लेता है।

बजट के साथ हलवा बनाने की परम्परा बहुत सोच-विचारकर शुरू की गई है।जनता पहले से ही यह सोचकर अपनी जीभ लपलपाती है कि वह इसे यूं ही गड़प कर लेगी।बिना दांत वाले भी हलवा खाने में आत्मनिर्भर होते हैं।ऐसे में दंतविहीन आदमी उस बड़ी पोटली से अपने लिए कितना-कुछ नोच सकता है यह उसकी ताक़त पर निर्भर है।

‘पाँचों उंगलियाँ घी में और सर कड़ाही में’ ऐसा तो पहले सुना जा चुका है पर अब इसका साक्षात् दर्शन भी किया जा सकता है।वित्त मंत्री जी हलवा बनाकर अपनी पाँचों उँगलियाँ घी में डुबो चुके हैं।हलवे का जायका सरेआम नहीं हुआ हा,बस वही जानते हैं।अब आम आदमी का सर कड़ाही में जाना बाकी रह गया है।यह कड़ाही घी से लबालब है या गरम खौलते तेल की,यह तो सर डालने के बाद ही पता चल पायेगा और यह स्वाद जनता के हिस्से आएगा।स्वादिष्ट व्यंजन के बाद उँगलियाँ चांटने का अपना ही मजा है पर कड़ाही में सर डालने के बाद बाल-बाल बचने और बाल नुचने की खबरें ही अभी तक सुनी गई हैं।इस बार बजट के बाद बाल बचते भी हैं या नहीं,यह देखना अभी बाकी है !

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

यही हैं असल खिलाड़ी !

यह तो बड़ा गजब हुआ जी ! लोगों ने जिन्हें नाकारा समझ लिया था ,वे तो करोड़ों के निकले।उन्होंने बाज़ार में लगी अपनी कीमत से साबित कर दिया है कि वे कितने काम के हैं ! खेल के असली युवराज वही हैं।क्रिकेट में आज रन बनाने का स्तर धन बनाने से लगता है।आप कितने भी रन बनाते हों,पर आपकी रेटिंग ‘बोली’ से ही लगेगी।यहाँ पारियों में शून्य बनाने का रिकॉर्ड भले न देखा जाता हो,पर बोली की राशि में कितने शून्य हैं,मायने रखता है।खिलाड़ी का स्टेमिना इसी पर आँका जाता है।बदले में वह अपने खेल से अपनी टीम को कितने शून्य समर्पित करता है,यह बाद की बात है।

खेल की तरह राजनीति में भी युवराज हैं।उनके समर्थक उन्हें ‘अनमोल’ कहते हैं।खेल के युवराज को जहाँ कई शून्य चुकाकर अनमोल बनाया गया है ,वहीँ राजनीति वाले युवराज स्वयं अपने खाते में शून्य दर्ज कर रहे हैं।खेल और राजनीति में शून्य इस तरह हावी है कि दर्शक और जनता सिवाय शून्य की ओर ताकने के,कुछ नहीं कर सकती है।एक को बाज़ार अपनी गोद में हिला रहा है और दूसरे को परिवार।दोनों के अपने-अपने दाँव हैं।

खेल को खेल की तरह समझने वाले आखिर में केवल मुँह ताकते रह जाते हैं जब पता चलता है कि उनकी जीत तो पहले से ही फिक्स थी।यही हाल राजनीतिक जीत-हार का होता है।जनता जिसे अपनी जीत समझती है,वह उसका ‘धोखा,जुमला या नसीब निकलता है।

आज बाज़ार का समय है।खरीदने-बिकने वाले ही असल खिलाड़ी हैं।मैदान में खिलाड़ी से ज्यादा मैदान से बाहर बैठे सट्टेबाज खेलते हैं।चुनावी-जीत भी चंदेबाजों और धंधेबाजों की होती है।पर ये सारी धारणाएं गुप्त घोषणा-पत्रों की तरह होती हैं।इनका पता तभी चलता है जब कोई खिलाड़ी ‘हाई-स्कोर’ करके अपनी रेटिंग मजबूत कर लेता है।जनता की रेटिंग हमेशा से रेलवे के तीसरे दर्जे जैसी रही है।लगता है इसी बात को ध्यान में रखकर उसे भी ‘बुलेट ट्रेन’ से अपग्रेड किया जायेगा।

फ़िलहाल,करोड़ों में खेलने वाले अपने खाते दुरुस्त कर रहे हैं और हम जैसे निठल्ले उनके खाते में दर्ज हुए शून्य गिन रहे हैं।सबका अपना-अपना नसीब है।

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

सब कुछ ऊपरवाले के हाथ में है जी !

अभी तक हम यह सुनते आये थे कि हमारे यहाँ सरकारें भगवान-भरोसे चलती हैं पर अबकी बार यह रहस्योद्घाटन भी हुआ कि सरकारें बनती भी उसी के भरोसे हैं।आम आदमी समझ रहा था कि दिल्ली में अद्भुत बहुमत से बनी सरकार उसके वोट से बनी है,पर खुद सरकार ने साफ़ कर दिया है कि इसमें ऊपरवाले का हाथ रहा।उसी की मंशा थी कि दिल्ली में किसकी सरकार बने।हारने वालों ने जब यह रहस्य सुना तो उनको लगा कि अच्छा ही हुआ कि उन्होंने मन से मेहनत नहीं की।उनके नेता ने भी पहले ही बता दिया था कि वे सब खुशनसीब के साथ हैं और उन्हें कुछ नहीं करना है ।इसीलिए उन्होंने इस बार किसी से वादा भी नहीं किया।आख़िरकार वो खुशनसीब निकले कि उन्हें कोई वादा नहीं पूरा करना है।

इस चुनाव से यह भी फायदा हुआ है कि आम आदमी और सरकार बिलकुल बराबरी के स्तर पर आ गए हैं।आम आदमी अपनी हर छोटी-बड़ी समस्या के लिए ऊपरवाले की शरण में जाता है तो अब सरकार को भी ऊपरवाले की दरकार है।इससे सामाजिक समरसता तो प्रकट होती ही है,जवाबदेही जैसी फिजूल की लटकन से भी निजात मिलती है।एक को चुनाव से पहले ईश्वर की घड़ी के मुताबिक मैदान में उतारा गया था तो दूसरे को चुनाव जीतने के बाद ईश्वर की मंशा पूरा करने के लिए कुर्सी पर बिठाया गया है।यह रामराज्य नहीं तो और क्या है,जहाँ पक्ष-विपक्ष और आम अवाम सब एक ही दर पर खड़े हैं।इनमें से अगर किसी के साथ भी कुछ बुरा होता है तो यह उसका नसीब।

आम आदमी के जीवन में ईश्वर का अहम रोल होता है।कदम-कदम पर वह जनता की तकलीफों को दूर करने के लिए अपने को आगे ले आता है।उसका न अपना कोई घोषणा-पत्र है और न ‘विज़न’। वह चाहे दूसरों के द्वारा किये गए वादे पूरा करे या नहीं,उनकी मन्नतें ज़रूर पूरी करता है।दुआ में इतनी ताकत होती है कि वह सरकार बनाती है और चलाती भी।जो आज सरकार के बाहर हैं,उनको भी बस उसी का आसरा है,भले ही इसके लिए पन्द्रह या पचीस साल लग जाएँ।उन्हें पता है कि ऊपरवाले के घर देर है,अंधेर नहीं।यही बात अब जनता को भी पता चल गई है।

हमें उम्मीद है कि सरकारों के कामकाज पर आलोचक अपना मुँह बंद रखेंगे।जो भी हो रहा है या होगा,सब ऊपरवाले की मंशा है।कौन खुशनसीब है या बदनसीब,यह उसकी अपनी किस्मत है !

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

हारने का सुख !

चुनाव निपट गए हैं और इस बार वे पूरी तरह निपट गए।हार कर भी वे अवसाद के शिकार नहीं बने बल्कि बड़ी राहत महसूस कर रहे हैं।हार का झटका तो पल दो पल के लिए था,उससे वे अब पार पा चुके हैं।अब वे किसी भी वादे और इरादे से पूर्णतः निवृत्त हो चुके हैं।कम से कम वे पाँच साल तक लम्बी तानकर सो सकते हैं।तब तक जीतने वाले खुद ही थक जायेंगे,चुक जायेंगे और अगली बार ‘हार’ उनके गले नहीं,गले में पड़ेगी।रोज-रोज की चिक-चिक और जवाबदेही से वे एक ही वार से एक बार में मुक्त हो गए हैं।अब तो दूर से बैठकर तमाशा देखेंगे।उन्हें तमाशा बनाने वाले स्वयं तमाशा हो जायेंगे।

जीत का सुख भी लम्हे भर का होता है पर परेशानियाँ पाँच साल तक सालती हैं।उम्मीद लगाये लोग रोज़ उनके दरवाजे खटखटाएंगे और जीतने वाले चैन की एक रात भी न सो पाएंगे।हारकर वे कुछ ऐसा ही सोच रहे हैं।मुफ़्त के वादों की टोकरी कब तक हवा में लहराती है,वे नीचे पड़े टुकुर-टुकुर निहार रहे हैं।उन्हें यकीन है कि वादों का टोकरा फूटने पर प्रथम लाभार्थी वे ही होंगे।इसलिए आज मन मसोसकर वे कल की उम्मीद देख रहे हैं।

हार इसलिए भी सुखद होती है कि उस वक्त हारने वाला ईश्वर के सबसे निकट होता है।सब कुछ हारकर ही ईश्वर को पाया जा सकता है,ऐसा शास्त्रों में भी बताया गया है।कहा गया है कि सफलता के हज़ार पिता होते हैं,असफलता अनाथ होती है।वे चुनाव हारे हैं,हिम्मत नहीं।उन्हें भरोसा है कि भले ही उनके आगे-पीछे से भीड़ गायब हो गई हो,पर ’हारे को हरिनाम’ का सहारा ज़रूर मिलता है।जब उन्होंने जीत को भगवान-भरोसे छोड़ रखा था,तो अब संकट के समय भगवान को कैसे छोड़ सकते हैं ? हारकर भी उनको बहुत कुछ बचा हुआ दीखता है।वे इसे शून्य तक लाना चाह रहे हैं,जहाँ पहुँचकर वे हर तरह के सांसारिक मोह से मुक्त हो सकें।अब अगले पाँच साल उनका यही मिशन है।

हार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हारने वाला आशावादी होता है।वह हमेशा इस ताक में रहता है कि जीतने वाला घुड़सवार घोड़े से कब फिसले।उसे घोड़े की लगाम नहीं साधनी होती ,बस प्रतीक्षा होती है उस पल की,जब उसे कोई टंगड़ी मारकर गिरा दे ! उसके पास न वादों का कोई बोझ  होता है और न काम पूरा करने का कोई अल्टीमेटम।मगर वह अपने कुरते की हर जेब में वे सवाल रखता है ,जिन्हें वह कभी हल नहीं कर सका।पराजित का कोई अपना दर्द नहीं होता।वह सबके दर्द को अपना बना लेता है।वह यकायक दार्शनिक हो उठता है और दुखी दुनिया का एकमात्र शुभचिंतक भी।

हारने के बाद ही उन्होंने जाना है कि जीत कितनी बेमजा होती है।हार से अन्दर का हाहाकार बाहर निकल आता है ,वहीँ जीत से बाहर की जयकार अहंकार का रूप धर लेती है।इस नाते तो जीत किसी भी रूप में हार के आगे नहीं टिकती।इसीलिए जीतने वाले अभागी और बदनसीब हैं और हारने वाले परमसुखी और खुशनसीब।ईश्वर ने पहले से ही यह घड़ी निश्चित कर दी थी ,इसलिए इस हार का दोष किसी मानवीय भूल पर नहीं है।

सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

एक्जिट पोल से बनती सरकार !

मतदाता वोट डालकर अपने घर भी नहीं पहुँचा था कि टीवी में न्यूज़ चैनलों और पोल वालों ने मिलकर सरकार बना डाली।सरकार अब एक बार में नहीं बनती और ना ही केवल मतदाता बनाता है।मतदान से पहले और मतदान के बाद बाहर निकलने वाले पोल भी असली सरकार बनने से पहले अपनी सरकार बना डालते हैं।अब केवल बटन दबाने से भी सरकार नहीं बनती।पोल वाले अपने काम में इतने कुशल हो गए हैं कि वे मतदान करके बाहर आते हुए वोटर का चेहरा बखूबी समझ लेते हैं।उन्हें पता है कि वोट देने से पहले भले ही कोई वोटर झूठ बोल दे,पर बाद में कतई नहीं।बावजूद इसके, हर बार चुनाव पूर्व सर्वे किया जाता है।त्रासदी तो यही है कि एग्जिट पोल एक बार ही हो सकता है।

एग्जिट पोल भले ही एक बार आता हो,पर यह सबको कुछ न कुछ दे जाता है।जीतने वाले के लिए जहाँ सतरंगी सपने बुनने की रफ़्तार तेज हो जाती है,वहीँ संभावित हार वाले को सहज बनने का पर्याप्त मौक़ा मिल जाता है।इस बीच इतना समय मिल जाता है कि जीतने वाला फूलों का टोकरा और हारने वाला कायदे का कोई ठीकरा ढूँढ ही लेता है।चैनल पर पैनल-दर-पैनल चर्चा होती है और हारने वाले की कई खूबियाँ उसकी खामियों में तब्दील हो जाती हैं।जिसे जीता हुआ बताया जाता है,उसकी हर खामी,उसकी चतुराई भरी चाल में बदल जाती है।

एक तरफ एग्जिट पोल में जीतने वाला अपनी सरकार की प्राथमिकतायें गिनाने लगता है,वहीँ दूसरी ओर हारने वाला अपनी हिम्मत को असल परिणाम आने तक साधे रखता है।वह अब जीतने का दावा नहीं करता बल्कि निवेदन करता है कि आख़िरी परिणाम उसके पक्ष में ही आयेंगे।इस वक्त चैनलों की टीआरपी हाई पर होती है।खुदा-न-खास्ता,यदि एग्जिट पोल के उलट परिणाम आते हैं तो इसके जिम्मेदार सिर्फ पोल वाले होंगे।हारा हुआ पक्ष अचानक ‘पोल’ पर चढ़ जायेगा।जो अभी तक अपनी जीत को जनता की जीत बता रहा था,वह पोल में हुई पोल को खोल देगा।

टीवी चैनलों के दोनों हाथों में लड्डू हैं।वे एग्जिट पोल की सरकार बनाने के बाद वास्तविक नतीजे आने का इंतज़ार कर रहे हैं।इसके बाद वे सभी असल सरकार बनाने में भी इतने ही जी-जान से जुट जायेंगे।प्रत्याशी चुनावी-थकान से निपटकर अपनी हजामत बनवा रहे हैं और जनता को भी इस बात का इंतज़ार है कि उसकी ‘हजामत’ कौन बनाता है !