पृष्ठ

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

हारने का सुख !

चुनाव निपट गए हैं और इस बार वे पूरी तरह निपट गए।हार कर भी वे अवसाद के शिकार नहीं बने बल्कि बड़ी राहत महसूस कर रहे हैं।हार का झटका तो पल दो पल के लिए था,उससे वे अब पार पा चुके हैं।अब वे किसी भी वादे और इरादे से पूर्णतः निवृत्त हो चुके हैं।कम से कम वे पाँच साल तक लम्बी तानकर सो सकते हैं।तब तक जीतने वाले खुद ही थक जायेंगे,चुक जायेंगे और अगली बार ‘हार’ उनके गले नहीं,गले में पड़ेगी।रोज-रोज की चिक-चिक और जवाबदेही से वे एक ही वार से एक बार में मुक्त हो गए हैं।अब तो दूर से बैठकर तमाशा देखेंगे।उन्हें तमाशा बनाने वाले स्वयं तमाशा हो जायेंगे।

जीत का सुख भी लम्हे भर का होता है पर परेशानियाँ पाँच साल तक सालती हैं।उम्मीद लगाये लोग रोज़ उनके दरवाजे खटखटाएंगे और जीतने वाले चैन की एक रात भी न सो पाएंगे।हारकर वे कुछ ऐसा ही सोच रहे हैं।मुफ़्त के वादों की टोकरी कब तक हवा में लहराती है,वे नीचे पड़े टुकुर-टुकुर निहार रहे हैं।उन्हें यकीन है कि वादों का टोकरा फूटने पर प्रथम लाभार्थी वे ही होंगे।इसलिए आज मन मसोसकर वे कल की उम्मीद देख रहे हैं।

हार इसलिए भी सुखद होती है कि उस वक्त हारने वाला ईश्वर के सबसे निकट होता है।सब कुछ हारकर ही ईश्वर को पाया जा सकता है,ऐसा शास्त्रों में भी बताया गया है।कहा गया है कि सफलता के हज़ार पिता होते हैं,असफलता अनाथ होती है।वे चुनाव हारे हैं,हिम्मत नहीं।उन्हें भरोसा है कि भले ही उनके आगे-पीछे से भीड़ गायब हो गई हो,पर ’हारे को हरिनाम’ का सहारा ज़रूर मिलता है।जब उन्होंने जीत को भगवान-भरोसे छोड़ रखा था,तो अब संकट के समय भगवान को कैसे छोड़ सकते हैं ? हारकर भी उनको बहुत कुछ बचा हुआ दीखता है।वे इसे शून्य तक लाना चाह रहे हैं,जहाँ पहुँचकर वे हर तरह के सांसारिक मोह से मुक्त हो सकें।अब अगले पाँच साल उनका यही मिशन है।

हार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हारने वाला आशावादी होता है।वह हमेशा इस ताक में रहता है कि जीतने वाला घुड़सवार घोड़े से कब फिसले।उसे घोड़े की लगाम नहीं साधनी होती ,बस प्रतीक्षा होती है उस पल की,जब उसे कोई टंगड़ी मारकर गिरा दे ! उसके पास न वादों का कोई बोझ  होता है और न काम पूरा करने का कोई अल्टीमेटम।मगर वह अपने कुरते की हर जेब में वे सवाल रखता है ,जिन्हें वह कभी हल नहीं कर सका।पराजित का कोई अपना दर्द नहीं होता।वह सबके दर्द को अपना बना लेता है।वह यकायक दार्शनिक हो उठता है और दुखी दुनिया का एकमात्र शुभचिंतक भी।

हारने के बाद ही उन्होंने जाना है कि जीत कितनी बेमजा होती है।हार से अन्दर का हाहाकार बाहर निकल आता है ,वहीँ जीत से बाहर की जयकार अहंकार का रूप धर लेती है।इस नाते तो जीत किसी भी रूप में हार के आगे नहीं टिकती।इसीलिए जीतने वाले अभागी और बदनसीब हैं और हारने वाले परमसुखी और खुशनसीब।ईश्वर ने पहले से ही यह घड़ी निश्चित कर दी थी ,इसलिए इस हार का दोष किसी मानवीय भूल पर नहीं है।

कोई टिप्पणी नहीं: