पृष्ठ

रविवार, 22 फ़रवरी 2015

बजट का हलवा होना !

बजट बनकर लगभग तैयार है पर उससे पहले हलवा बन गया है।वित्त मंत्री जी ने हलवे से भरी कड़ाही में चमचा डालकर उसकी मिठास भी चख ली है।अब बजट में आने वाली कड़ाही में जनता का सिर डाला जायेगा पर उसका स्वाद तो जनता ही बताएगी।वित्त मंत्री जी के पास जितने भी प्रकार के मिश्रण थे,उन्होंने हलवे में मिला दिया है।गौर करने वाली बात है कि उसमें चुन-चुन कर ड्राई-फ्रूट्स डाले गए हैं।अब बजट के बाद किसी को सूखापन नज़र आये तो यह उसमें पड़े इन मसालों का दोष है न कि वित्त मंत्री जी का।

जनता ने जो हलवा कड़ाही में देखा,वो केवल उसके देखने के लिए था।साथ ही यह बताने के लिए भी कि बजट बनाना जितना हलवा-सा है,उसको खा लेना या पचा पाना उतना ही दुष्कर।जिन्हें खाने का अभ्यास नहीं है,वे इससे दूर ही रहें,गरम हलवा उनकी जीभ को लहू-लुहान भी कर सके है।उनके लिए जेटली की पोटली तैयार है।उसमें इतना कुछ है कि सबके लिए कुछ न कुछ निकल ही आयेगा।हलवे और बजट के पकाऊ होने में कोई संदेह नहीं है शायद इसीलिए जनता को ‘पकाने’ के लिए यह वार्षिक-आयोजन होता है।फिर भी सब दिल थामकर बजट का इंतजार करते हैं।

‘दिल्ली’ और ‘बिहार’ हो जाने के बाद जेटली की पोटली अधिक सतर्क हो गई है।अब उससे ऐसी बयार निकलने की आशंका बलवती हो गई है,जिससे सूट वाले चेहरों को सुकून और मफलर वालों को स्वाइन-फ्लू हो सकता है।इसलिए अपना ‘लक’ पहन कर चलें।वैसे भी बजट तभी लाया जाता है जब जनता होलियाना-मूड में होती है।भाँग और धतूरे के नशे में मस्त जनता बजट के कसैलेपन को ख़ुशी-ख़ुशी गटक जाती है।नशा हिरन होने के बाद ही उसे समझ में आता है कि सामने शेर है।फिर बोलने से भी क्या फायदा।शेर अपने प्रिय शिकार हिरन को हलवे की माफिक उदरस्थ कर लेता है।

बजट के साथ हलवा बनाने की परम्परा बहुत सोच-विचारकर शुरू की गई है।जनता पहले से ही यह सोचकर अपनी जीभ लपलपाती है कि वह इसे यूं ही गड़प कर लेगी।बिना दांत वाले भी हलवा खाने में आत्मनिर्भर होते हैं।ऐसे में दंतविहीन आदमी उस बड़ी पोटली से अपने लिए कितना-कुछ नोच सकता है यह उसकी ताक़त पर निर्भर है।

‘पाँचों उंगलियाँ घी में और सर कड़ाही में’ ऐसा तो पहले सुना जा चुका है पर अब इसका साक्षात् दर्शन भी किया जा सकता है।वित्त मंत्री जी हलवा बनाकर अपनी पाँचों उँगलियाँ घी में डुबो चुके हैं।हलवे का जायका सरेआम नहीं हुआ हा,बस वही जानते हैं।अब आम आदमी का सर कड़ाही में जाना बाकी रह गया है।यह कड़ाही घी से लबालब है या गरम खौलते तेल की,यह तो सर डालने के बाद ही पता चल पायेगा और यह स्वाद जनता के हिस्से आएगा।स्वादिष्ट व्यंजन के बाद उँगलियाँ चांटने का अपना ही मजा है पर कड़ाही में सर डालने के बाद बाल-बाल बचने और बाल नुचने की खबरें ही अभी तक सुनी गई हैं।इस बार बजट के बाद बाल बचते भी हैं या नहीं,यह देखना अभी बाकी है !

कोई टिप्पणी नहीं: