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शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

हम सबको आंनद चाहिए !

आखिरकार सरकार से जनता के दुःख देखे नहीं गए।उसने लोगों को ‘आनंद’ देने का फैसला ले ही लिया।इस उल्लेखनीय शुरुआत का श्रेय मध्य प्रदेश सरकार को जाता है,जिसने बक़ायदा एक ‘आनंद मंत्रालय’ खोल रखा है।यह विभाग तकलीफ़ पाए लोगों को ‘आनंद’ की खुराक देगा।उनको फील कराया जाएगा कि जिसे वे दुःख या तकलीफ समझ रहे हैं,दरअसल वह आनंद है।हम तो वैसे ही ठंडा पानी पीकर सारे गम भुलाने वाले लोग हैं।फिर यहाँ तो आपको खुश करने के लिए पूरा विभाग पीछे लग गया है।कल पूरी कायनात लग जाएगी।जब तक आप विभाग को यह लिखकर नहीं दे देते कि आप खुश हैं,कहीं नहीं जा सकते।सुख की छोड़िए,दुखी रहना भी अब आपके वश में नहीं रहा।

इस तरह की शुरुआत असल में थोड़ा देर से हुई।दूसरे देश इसमें काफी आगे बढ़ गए हैं।हो सकता है सरकारी दौरे में गए किसी ‘आनंद पथिक’ को वहीँ से यह आइडिया मिला हो।आए दिन दाल-रोटी जैसी छोटी-मोटी बातों से आजिज सरकार को एक बड़ा नुस्खा हाथ लगा।उसने झट से इस ‘दुखहरण विभाग’ का गठन कर दिया।इससे अन्य प्रदेश और फिर पूरा देश प्रेरणा लेगा।

कुछ लोग ‘हैप्पीनेस डिपार्टमेंट’ खोले जाने से ज्यादा हैप्पी नहीं हैं।जब हमारे यहाँ ‘आपदा मंत्रालय’ काफी पहले से खुला हुआ है और आपदाएं भी सुचारू रूप से आ रही हैं तो ‘आनंद मंत्रालय’ क्यों नहीं हो सकता भाई ! सरकारी हो या असरकारी,आनंद तो सबको हर हाल में चाहिए ही ।फ़िलहाल नया विभाग खुलने भर से ही कई चेहरे खिल गए हैं!

सच पूछिए,ऐसे मंत्रालय की दरकार सारे देश को है।सरकार के तमाम भारी-भरकम विभाग मिलकर भी आनंद की आपूर्ति नहीं कर पा रहे हैं।मध्य-प्रदेश ने हमें राह दिखाई है।सूखा-राहत,बाढ़-राहत के नाम पर कब तक अधिकारी और जनप्रतिनिधि आनन्दित होते रहेंगे ?इसमें ज्यादा स्कोप भी नहीं बचा है।नया विभाग खुलेगा तो सबको राहत मिलेगी।लोगों में आनंद के ‘कैसेट,सीडी और टेबलेट बाँटने की योजना है।इसमें पहले आओ-पहले खाओ का चक्कर भी नहीं है।‘सरकारी आनंद’ प्राप्त व्यक्ति किसी दूसरे को यह नुस्खा पास कर सकता है।शुरुआत में महीने में एक ही टेबलेट खाने का आनंद मिलेगा।आगे ऐसे टेबलेट की खोज की जा रही है,जिसे केवल एक बार खाकर पाँच साल तक आनंदित रहा जा सकता हो ! फिर नेता,अफसर और जनता सब मगन रहेंगें ।मिल-बाँटकर खाने का आनंद ही कुछ और है। 

बुधवार, 27 जुलाई 2016

सुल्तान को 'केस' पसंद है !

आपको चिंकारा की चीत्कार भले सुनाई दी हो,पर हमें लगता है कि उसे मुक्ति मिली।पिछले बीस सालों से वह नन्हीं जान रोज मर रहा था।फैसला आते ही वह सांसारिक बन्धनों से,कोर्ट-कचहरी से मुक्त हो गया।जब यह साफ़ हो गया कि उसे किसी ने नहीं मारा तब कहीं जाकर उसे सुकून मिला।इस फैसले से यह भी जाहिर हुआ कि हिरन जंगल में हरे-भरे पेड़ों के बीच ही लम्बी छलांग नहीं मार सकता,वह किसान की तरह पेड़ से लटक भी सकता है।जंगल में वह भले घूमता हो पर राज आदमी का ही चलता है।यह भी सबक मिलता है कि पैर ज्यादा होने से दिमाग नहीं बढ़ जाता।चौपाया दोपाए के नीचे ही रहेगा।

इधर ‘सुल्तान’ रुपहले परदे पर धूम मचाए है।सिनेमा के जानकार उसके खाते में रोज करोड़ों जोड़ते जा रहे हैं।कहते हैं कि ‘सुल्तान’ की रफ़्तार को सुल्तान भी नहीं रोक सकता।एक बार जो उसने कमिटमेंट कर ली फिर वह अपनी भी नहीं सुनता।यह बात उस अपढ़ और सिनेमा-द्रोही हिरन को नहीं पता थी।जब हमारा नायक महाबलियों को पलक झपकते ही धूल में मिला देता है तो यह तो ‘छौना’ था।उसकी देह के पास से गुजरने वाली हवा ने ही उसे उड़ा दिया।यह पाँच सौ करोड़ी-हवा थी।दो कौड़ी के हिरन की अगर कुछ कीमत होती भी है तो उसके मरने के बाद।इसीलिए उसकी खाल खींचने के लिए कुछ लोग हमेशा तत्पर रहते हैं।पिछले बीस सालों से यही हो रहा था।अब जाकर नामुराद हिरन को मुक्ति नसीब हुई है।

कुछ लोग अभी भी ‘सुल्तान’ पर उँगली उठा रहे हैं,उन्हें इस पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है।जो लोग आज तक ठीक से ‘आदम-राज’ का अध्ययन नहीं कर पाए,वे ‘जंगलराज’ के अलिखित कानून पर सवाल उठा रहे हैं।न्याय का मतलब सिर्फ़ यह नहीं कि ‘बड़े आदमी’ और ‘छोटे आदमी’ पर एक ही धारा लगे।ख़ास बात यह कि विपरीत धारा में भी कौन पार उतर सकता है ? ’ख़ास आदमी’ का विधायक और ‘आम आदमी’ का विधायक एक-सा नहीं हो सकता।कायदन ‘आम’ को आदमी बने रहने की तमीज तो आई नहीं अभी,और चला है विधायक बनने।असल ‘विधायक’ वह जो विधायी नियमों से परे हो।कानून का ख़ास होने के लिए सुल्तान होना या सुल्तान का ख़ास होना ज़रूरी है।और आप बात करते हैं उस हिरन की,जिसके पास ख़ास को देने के लिए एक वोट भी नहीं ! ऐसे आदमी,विधायक और हिरन जितनी जल्दी मुक्ति पा जाएँ,भला होगा।

सोमवार, 18 जुलाई 2016

घड़ी के उल्टा घूमने का यह मुफीद समय है !

पहले उत्तराखंड और अब अरुणाचल में घड़ी उल्टा घूम गई है।इसने सारी गणित बिगाड़ दी।तब की बात और थी जब गणित का मतलब केवल जोड़तोड़ और गुणा-भाग होता था।घड़ी के घूमने से अब भाग्य हावी हो गया है।हो सकता है घड़ी में यह गुण नेताओं की संगत से आ गया हो।सड़क पर आ चुके रंक को सिंहासन पर बैठा देना अब घड़ी के ही बूते की बात है।इसके घूमने से खुशियों के लड्डू ही नहीं फूटते,जमी-जमाई कुर्सी भी रेत की मानिंद ढह जाती है।जो काम तीर-तलवार से संभव नहीं,वह पतन्नी-सी सुई कर रही है।

घड़ी के उल्टा घूमने का यह मुफीद समय है।भाग्य पर भरोसा करने वाले इससे बड़े खुश हैं।वे चाहते हैं कि ऐसी चमत्कारी घड़ी उनकी हर मुराद पूरी कर दे।अगर ऐसा होने लगा तो चीजें बड़ी तेजी से बदल जाएँगी।एक तरफ जहाँ कबाड़ख़ाने में जा चुकी खादी फिर से कलफ़ पाकर चमचमा जाएगी,वहीँ दूसरी ओर मलमली-कुर्सी पर जमा पैर काँटा चुभने से ‘कलप’ उठेगा।अचानक सुहाने दिन काली रातों में बदल जाएँगे।मीठी नींद ‘अनिद्रा’ की बीमारी बन जाएगी।

जब से ऐसी खबर आई है,हमारे दोस्त गुप्ता जी अपने घर की दीवाल घड़ी को कई बार ताक चुके हैं।उसे किस एंगल से और कितना घुमाया जाय इसकी संभावित योजना भी तैयार कर ली है।वे अपनी घड़ी के काँटे को एक सौ अस्सी डिग्री घुमाकर ‘अच्छे दिनों’ से ‘बुरे दिनों’ की ओर ले जाना चाह रहे हैं।उन्हें नहीं पता कि ऐसा करने के लिए घड़ी फुल चार्ज होनी चाहिए।हो सकता है कि उल्टा घुमाते वक्त घड़ी ऐसी जगह ठिठक जाए,जब वे निरे कुँवारे थे।जब हमने ऐसी आशंका जाहिर की,वे सिहर गए।उनको सत्तर वाली दाल दो सौ में मंजूर है पर अपनी वैवाहिक स्थिति में इत्ता उलटफेर कतई नहीं।इसी साल बमुश्किल उनके चुन्नू को नर्सरी में दाखिला मिला है।घड़ी घुमाकर वे उसे गँवाना नहीं चाहते।


सोचिए,भविष्य में हर आदमी के पास ऐसी ‘टाइम-मशीन’ हो जाए तो क्या होगा ! हमें ‘वेदों की ओर लौटें’ या ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ जैसे नारे लगाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।सुई घुमाते ही पूरा कश्मीर हमारा और ईराक सद्दाम का हो जाएगा।मुक्तिप्रदायिनी गंगा भगीरथ की जटाओं से निकलकर हमारे सामने निर्मल रूप में प्रवाहित होने लगेंगी।इस सबसे बड़ी बात यह होगी कि ‘अबकी बार,मंहगाई पर वार’ का नारा फिर से गूँजने लगेगा।हमें ऐसी घड़ी की सख्त ज़रूरत है जो पलक झपकते ही नेताओं की तरह ‘यू-टर्न’ ले ले।

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

आत्मा का पर्यटन !

चुनाव की आहट आते ही क़दमों में जान आ गई है।नेता जी मोबाइल हो गए हैं।जिस कम्पनी का नेटवर्क अच्छा है,टॉकटाइम भी फ्री है,उसी का कनेक्शन लेने में समझदारी मानी जाती है।ऐसे समय में नेता जी खुद को रीसेट करते हैं ताकि अनावश्यक मेमोरी डिलीट हो जाय।इससे नयापन तो आता ही है,तगड़ा स्पेस भी मिलता है।उनको पुराना कुछ याद भी नहीं रहता।वे अचानक स्मृतिदोष का शिकार हो जाते हैं।पिछले सारे बयान इस आधार पर स्वतः निरस्त हो जाते हैं।


नेता जी ने पुराना घर छोड़ दिया है।वहाँ उनका दम घुट रहा था।इससे पहले जब यहाँ आए थे,तब भी यही लक्षण थे।वे तो बस बीमारी का सही इलाज करना चाहते हैं।जनसेवा के लिए दम होना पहली शर्त है।वे नशे के भी खिलाफ़ हैं,इसलिए वे दम के लिए दूसरे दल पर लद लेते हैं।इस क्रिया से उनमें और उस दल में यानी दोनों में दम बहाल हो जाता है।कई बार दूसरे दल में लदने वाले का दम इतना भारी होता है कि उस दल का ही दम निकलने लगता है।ऐसा विलय अचानक प्रलय में बदल जाता है।इससे संभावित क्रांति वहीँ ठिठक जाती है।


नेता जी की मजबूती उनकी निष्ठा है।यह ‘पंचकन्या’ की तरह हमेशा पवित्र बनी रहती है।वे जहाँ-जहाँ जाते हैं,उनके साथ चलती है।वे इस मामले में बड़े निष्ठुर हैं।किसी भी पद का लोभ उन्हें आसक्त नहीं करता।वे सबको आश्वस्त करते हैं कि उनकी लड़ाई सिद्धांतों की है।ऐसा संकल्प सुनते ही सारे सिद्धांत उनकी मुट्ठी में दुबक जाते हैं।


वह पिछड़ा समय था जब सुर बदलने में थोड़ा वक्त लगता था।उधर मोबाइल सिंगल से डबल सिम हुआ और इधर नेता जी भी अपडेट हो गए।पलक झपकते ही सुर बदल जाता है।एक ही काया में कई रूप धरने का हुनर आ चुका है।इससे राजनीति को बड़ा फायदा हुआ।दल और नेता दोनों के पास विकल्पों का आसमान खुल गया है।खुले आसमान में घाम,बारिश और शीत सहने का दम सबके पास नहीं होता।नेता जी को इसका अभ्यास है।इस मायने में वे सच्चे योगी हैं।उनकी आत्मा ही नहीं काया भी कलुषरहित हो गई है।


नेता जी के आवागमन को दलबदल कहना नादानी है।यह तो विशुद्ध पर्यटन है।ये बातें संसारी लोग नहीं समझ सकते।


सरकार का अनोखा सब्सिडी-प्लान

आख़िरकार सरकार का विकास हो गया।वह पूरी तरह  फ़ैल गई है।देश भर में छा जाने के लिए ज़रूरी है कि चुन-चुन कर सब जगह की सेवा की जाय।खासकर उन जगहों की ज्यादा जो चुनाव की चपेट में हैं।एक जिम्मेदार सरकार का दायित्व है कि वह वहाँ पर सेवा की सप्लाई बढ़ा दे।इसलिए सरकार ने अपना साइज़ बढ़ा लिया है।अब वह दलित,पिछड़ा,अगड़ा सभी को समान रूप से देख सकती है।उसने जनता की चाक-चौबंद पहरेदारी करने के लिए चौकीदारों की संख्या बढ़ा दी है।ज़रूरत हुई तो भविष्य में दाल और टमाटर मंत्री भी नियुक्त कर दिए जायेंगे जो बाज़ारों पर भी चौकस नज़र रख सकेंगे।

सरकार में मंत्री तो बढ़े ही हैं,बदल भी गए हैं।जो शिक्षा में क्रांति कर चुके हैं,अब कपड़ा संभालेंगे।पहले केवल विश्वविद्यालयों में झंडे फहराए जा रहे थे,अब घर-घर झंडा फहरेगा।आगामी दिनों में सुस्त पड़े कपड़ा उद्योग में हलचल मचने की आशंका है।विस्तार के बीच वे लोग अत्यंत दुखी हैं,जिन्हें सेवा की पंगत से अचानक उठा दिया गया है।कम से कम डकार लेने तक की मोहलत तो मिलती।पचहत्तर पार की पनौती ऐसी लगी कि कुछ तो पार हो गए,कुछ गुबार देखते रहे।

बदलाव करने पर उतारू यह सरकार दो साल पहले मिनिमम गवर्नमेंट,मैक्सिमम गवर्नेंस’ के बुलंद दरवाजे से घुसी थी।थोड़े समय में ही इसने उस दरवाजे के बरक्स एक खिड़की खोल ली है।उसके अनुसार मैक्सिमम गवर्नेंस’ की आधिकारिक पुष्टि हो चुकी है।उसके पास मिनिमम’ को ‘मैक्सिमम’ में बदलने का हुनर बारीकी से आ गया है।अगर उसके उपायों से गवर्नेंस ‘मिनिमम’ और 'स्लिम' हो जाती है तो यह उसकी सेहत के लिए बेहतर ही है।

सब्सिडी इस सरकार के ख़ास एजेंडे में है।वह उसे लगातार छोड़ने की अपील करती आई है।उसकी ये कोशिशें रंग ला भी रही हैं।इसी का असर है कि उसने खुद को बड़ा कर लिया है ताकि ज़्यादा काम कर सके।वह अपने कामों में सब्सिडी नहीं लागू कर रही क्योंकि इससे मँहगाई से दबी जनता पर उस काम का भी बोझ लद जाएगा।सुनने में यह भी आ रहा है कि सरकार अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों से यह मार्मिक अपील करने वाली है कि वे स्वेच्छा से चाहें तो पद छोड़ सकते हैं।सरकार लोगों को छोड़ने की प्रेरणा भी दे रही है।वह हाल ही में एक उद्योगपति के दो सौ करोड़ रुपए छोड़ भी चुकी है।

सरकार में कई नए चेहरे आ गए हैं।वह लगातार बदल रही है।देश बदल रहा है।अब आप भी बदल जाइए।



शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

व्यंग्य की युवा पीढ़ी और चुनौतियाँ !

व्यंग्य से हमारा सीधा सम्बन्ध करीब चार साल से है,जबसे हमने औपचारिक रूप से अख़बारों और पत्रिकाओं में लिखना शुरू किया।यह बिलकुल वैसा नहीं रहा कि अचानक व्यंग्य दिमाग़ में घुसा और हमने उसे कागज में उतारकर धर दिया हो।यानी कि यह ओवरनाइट जैसी कोई उपलब्धि नहीं रही।बचपन से ही घर-परिवार-दोस्तों के बीच टेढ़ी बात करने की आदत रही।व्यक्तिगत जीवन में कई बार मेरे तंज के कारण निजी सम्बन्ध भी प्रभावित हुए।यह हमारे व्यंग्य-लेखन की पृष्ठभूमि हो सकती है पर यह सब व्यंग्य नहीं है,यह भी जानता हूँ।जबसे लिखना शुरू किया है,मुझे अमूमन आनंद मिलता है।व्यंग्य मेरे लिए केवल मनोरंजन जैसा नहीं है।व्यंग्य लिखना शौक भी है और एक कर्तव्य भी।


व्यंग्य को लेकर मेरी शुरूआती समझ यही है कि जब भी कुछ आपको कचोटता है,दुखता है,पिराता है,आप अपने को इस माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं।शालीनपूर्ण विरोध करने के लिए व्यंग्य सबसे बढ़िया ‘टूल’ है।(हथियार नहीं कहूँगा क्योंकि आजकल इसके सन्दर्भ बदल गए हैं।हर आदमी फरसा लिए घूम रहा है )।व्यंग्य लिखने के लिए सबसे ज़रूरी बात लक्ष्य तय करने की है।आपको सबसे पहले यह विचार करना है कि जिस बात को हम कहने जा रहे हैं,वह व्यक्ति-केन्द्रित है या प्रवृत्ति-केन्द्रित।हाँ कई बार व्यक्ति इतना हावी हो जाता है कि वह प्रवृत्ति बन जाता है।इसी से यह बात भी साफ़ हो जाती है कि आप कमजोर पर प्रहार कर रहे हैं या सहजोर पर।हमें याद रखना चाहिए कि कोई भी सत्ता या व्यवस्था दुर्बल नहीं होती।राजनीति में अमूमन कमजोर कोई नहीं होता।कोई कम मजबूत है तो कोई अधिक।सब मिले हुए हैं।हमें रोजाना अधिक विषय भी राजनीति से ही मिलते हैं।अगर आपको लगता है कि व्यंग्य पर क्या लिखा जाए,तो आप चैनल खोलते हैं या अख़बार पलटते हैं।जैसे हवा-हवाई बयानबाजी होती है,वैसे ही आपका विषय भी जल्द हवा हो जाता है।हम उन विषयों को बहुत कम पकड़ पाते हैं,जिन्हें रोजमर्रा की ज़िन्दगी में भोगते हैं।

राजनीतिक विषयों पर लिखने की बाढ़ है।टीवी खोलते ही विषय छलक पड़ते हैं।न्यूज़ चैनलों की बहस में हम एक पक्षकार की तरह न पड़ें बल्कि अपनी अलग दृष्टि रखें।इसके अभाव में हमारी दृष्टि किसी पार्टी-प्रवक्ता या समर्थक की तरह हो जाएगी।जो दिखाया जा रहा है,उसके पीछे की नज़र व्यंग्यकार के पास होनी चाहिए।तभी वह किसी बयान या घटना के सीधे प्रसारण से बच सकता है।


साहित्य में आज सबसे ज्यादा मारामारी है तो व्यंग्य में ही है ।जो नए हैं वो छपना चाहते हैं,जो नामचीन हैं वो कॉन्ट्रैक्ट पे रेगुलर होना चाहते हैं।व्यंग्य लिखकर साहित्य की मुख्य-धारा में कूदना सबसे आसान लगता है।यह प्रसिद्धि का शॉर्टकट बन गया है।नई पीढ़ी इसी में आत्ममुग्ध हैं।हमारे अधिकतर संपादक और आलोचक भी चाहे-अनचाहे इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे हैं।इससे नुकसान उन्हें नहीं जो इस लायक नहीं हैं।उन्हें तो कुछ फायदा ही मिल रहा है,जिसके काबिल वो नहीं हैं,पर नुकसान केवल व्यंग्य का हो रहा है।नई पीढ़ी सीधे-सपाट लिखे संस्मरण को,चुटीली किस्सागोई को,चलताऊ मुहावरेबाजी को ही व्यंग्य समझ रही है।वह केवल शब्दों के साथ खेल को ही व्यंग्य मान रही है।भाषा तो पठनीय हो ही,पर यदि उसमें तंज का हथौड़ा नहीं है तो वह अपने शिकार को तोड़ने में समर्थ नहीं।व्यंग्य आपके डीएनए में होता है।इसे आप स्किल-इंडिया के प्रोग्राम के तहत डेवलप नहीं कर सकते।हाँ,अध्ययन-मनन या गाइडेंस से थोड़ा मेक-अप ज़रूर किया जा सकता है।जिसे कुछ लोग तकनीकी भाषा में व्यंग्य का सौंदर्यशास्त्र कह सकते हैं।


नई पीढ़ी के बारे में अभी यह भी निश्चित नहीं है कि वह वाकई में आई है या नहीं।अभी भी हम हर बात में परसाईं,जोशी,श्रीलाल और त्यागी जी को ही कोट करते हैं।व्यंग्य की बात वहीँ से शुरू और वहीँ पर खत्म हो जाती है।इस लिहाज से तो उनके बाद जो पीढ़ी आई,अभी तक युवा है और उसी में नए-नए लोग जुड़ते जा रहे हैं।पीढ़ियों में विभाजक-रेखा नहीं दिख रही।चालीस साल पहले लिखने वाले अभी लिख रहे हैं और वैसे ही लिख रहे हैं। है।स्तम्भ लेखन से शुरू हुए थे,आज भी केवल स्तम्भ लिख रहे हैं।पीढ़ी कब रिप्लेस होगी,पता नहीं।शायद अगले बीस-तीस सालों तक भी नहीं।ऐसा भी नहीं है कि नई पीढ़ी के पास अच्छे,अनुभवी और आदर्श व्यंग्यकारों का निर्वात हो,टोटा हो।यह नई पीढ़ी की कमजोरी है कि उसके पास अपने पूर्ववर्तियों को जानने,समझने,पढ़ने का समय नहीं है।सबकी अपनी पसंद और राय होती है।मेरी भी है।अब तक जो पढ़ा है,बेझिझक कह सकता हूँ कि ज्ञान चतुर्वेदी,नरेन्द्र कोहली,सुशील सिद्धार्थ,सुभाष चंदर आदि ऐसे लेखक हैं,जिन्हें पढ़कर समकालीन व्यंग्य समझा जा सकता है।इसके अलावा भी और लोग हो सकते हैं,जो हमारी संकुचित दृष्टि से वंचित रह गए हों।

पिछले पाँच-सात सालों में इस पीढ़ी में बहुत से लोग जुड़े हैं।व्यंग्य ऐसी अकेली विधा है,जिसमें हर दिन नया नाम दिखता है,पर उसका व्यंग्य कहीं नहीं दिखता।आज सैकड़ों लोग व्यंग्य लिख रहे हैं पर जिन चंद लोगों से उम्मीदें हैं,उनमें सुरजीत सिंह,अनूपमणि त्रिपाठी,पंकज प्रसून,निर्मल गुप्त,शेफाली पांडेय आदि हैं।इनमें ‘आदि’ में मेरी जबरदस्त सम्भावना है।हालांकि खुद मुझको मुझसे ज्यादा उम्मीद नहीं है।इन गिने-चुने लोगों में बर्बाद होने की उतनी ही गुंजाइश है।यह स्थिति बताती है कि नए समय में व्यंग्य कहाँ जा रहा है।आज हर तीसरा आदमी व्यंग्य लिख रहा है पर यदि तीन व्यंग्यकार खोज निकालने हों तो पसीने छूट जायेंगे।हाँ,हर व्यंग्यकार और आलोचक की अपनी-अपनी टीम है।यह व्यंग्य का नया समय है।मुँहदेखी और गुटबाजी और सम्मान-समारोह इसकी यूएसपी है।नई पीढ़ी पढ़ने-लिखने के बजाय इसमें व्यस्त है।वह अपने समकालीनों को खूब पढ़े,व्यंग्य समझे तब लिखे।मौका मिले तो अपने लिखे को भी एक बार पढ़ ले ।केवल छपने के दम पर आप अधिक समय तक व्यंग्यकार नहीं बने रह सकते।यह हमारे-आपके जीवन-मरण का नहीं वरन व्यंग्य के अस्तित्व का प्रश्न है।इसको इसी दृष्टि से देखें।लेखन बहुत बदल गया है।जो समय के साथ बदल रहे हैं,अभी भी प्रासंगिक हैं।ज्ञान चतुर्वेदी इसके सशक्त उदहारण हैं।


समकालीन आलोचक भी अपनी सही भूमिका नहीं निभा रहे हैं।अधिकतर आलोचक रद्दी-किताबों की भूमिका लिखने में ही अपनी भूमिका देख रहे हैं।उनको हम जैसे लेखकों से भी शिकायत है।हम अच्छा नहीं लिख रहे हैं तो वे क्या आलोचित करें ? पर आज अधिकतर आलोचना या समीक्षा के नाम पर जो भी हो रहा है,दयनीय लगता है।दोस्ताना-आलोचनाएँ और सुपारी-समीक्षाएं हो रही हैं।‘तुम हमें सम्मान दो,हम तुम्हें व्यंग्यकार बना देंगे’ की पैकेज-डील हो रही है।वाहवाही और बधाई देने के लिए उदारमना बनने की होड़ मची हुई है।व्यंग्य का इतिहास लिखना व्यंग्यकारों की जनगणना करने जैसा कर्म बन गया है।यह बाजारवाद का विस्तार है पर इससे व्यंग्य की समझ संकीर्ण हुई है।इतिहास को लिखने की भी एक दृष्टि होती है पर आज वह समदर्शी हो गई है।सबको साधने की कला, व्यंग्य की आधुनिक साधना है।उसे ‘फनलाइनर’ और व्यंग्यकार एक जैसे दिखते हैं।माना कि व्यंग्य के पास भी ‘फ़न’ है,पर वह तो दुष्प्रवृत्तियों को डसता है भाई।


समकालीन व्यंग्यकारों के सामने कई बड़ी चुनौतियाँ हैं पर वे व्यंग्य लिखने को सबसे कम चुनौती-पूर्ण मानते हैं।हमारी चिन्ता उनके प्रति है जो दाएँ हाथ से लिखते हैं।जिनके लिए व्यंग्य-लेखन बाएं हाथ का खेल है,वे तो पहले ही चैम्पियन बन चुके हैं।उनसे कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं है।ये बातें सिर्फ़ उनके लिए हैं जो व्यंग्य से प्रेम करते हैं।हम या आप व्यंग्य के इतिहास में रहें या इतिहास बन जाएँ,यह महत्वपूर्ण नहीं है।महत्वपूर्ण यह है कि व्यंग्य की ‘स्पिरिट’,उसकी मूल भावना जीवित रहनी चाहिए।आज उसी पर संकट है।इसकी सबसे पहली जिम्मेदारी मैं लेता हूँ। क्या हम इस लायक भी हैं ?