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मंगलवार, 1 मार्च 2016

परीक्षाओं का मौसम और झुमका !

परीक्षाओं का समय है।बच्चों की होने वाली हैं,सरकार की हो रही है।स्कूली परीक्षा देने का मौक़ा जिन्दगी में एकाध बार ही आता है पर सरकार आए दिन देती रहती है।ऐसी भी क्या परीक्षा जिसे देकर ज़िन्दगी भर के लिए सर्टिफिकेट मिल जाता है।इसमें फल-सुधार की गुंजाइश भी बहुत कम होती है।अति सयाने लोग रट्टा मार कर मैदान मार लेते हैं पर अमूमन परीक्षार्थी के पास सीमित विकल्प होते हैं।ऐसी परीक्षाएं बच्चे एक बार देते हैं और उसका फल ज़िन्दगी भर भोगते हैं।

सरकार की परीक्षा जरा अलग टाइप की होती है।इसमें पेपर देने वाला खुदई पेपर सेट कर लेता है।उसकी जाँच भी खुद करता है पर फल का टोकरा दूसरों के ऊपर गिरता है।यह झुमका भी नहीं है जो केवल बरेली में ही गिरता हो।इसकी जद में बरेली और रायबरेली सब आते हैं।बार-बार आते हैं।बच्चे पेपर देने से पहले खाना-पानी तक भूल जाते हैं पर सरकार परीक्षा-भवन जाने से पहले कड़ाही भर हलवा उदरस्थ करती है।हलवे में पड़े काजू और चिलगोजे अपनी परीक्षा में पहले ही पास हो जाते हैं।जनता खाली हुई कड़ाही की छन्न से ही अपने छिन्न-भिन्न होने का ज़श्न मना लेती है।

इस परीक्षा की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें पेपर देने वाला पहले से ही पास होता है।वह सवालों को आगे पास भर करता है।परीक्षार्थी के पास एक नहीं हज़ार मौके होते हैं सुधरने के लिए।अव्वल तो उसे फेल होने की आशंका तक नहीं होती।अगर ऐसी कोई साजिश हुई भी तो वह एक ट्वीट से ‘सत्यमेव जयते’ का बिगुल बजा देता है।

डर कर परीक्षा देने वाले कायर होते हैं।उनको दुबारा मौक़ा देना मतलब कायरता को प्रतिष्ठित करना है।सरकार बहादुर होती है इसीलिए उसकी परीक्षा रोज होती है।वो इन परीक्षाओं से घबराती भी नहीं।उसे पता होता है कि उसकी अच्छी पढाई का असर तो उस पर पड़ता है,खराब का नहीं।

किसी सरकार का फेल होना देशहित में नहीं होता।उसकी परीक्षा देश की परीक्षा होती है।इसलिए बच्चे अपनी परीक्षाओं में पास हों न हों,सरकार का पास होना उतना ही निश्चित है,जितना झुमके का बरेली में गिरना।

शनिवार, 31 मई 2014

लड़कियों से पीछे रहते लड़के !

अखबार में छपी एक खबर पढ़कर हम चौंक गए।मोटी-मोटी हेडिंग में लिखा था,’इस बार भी लड़कियों से पीछे रहे लड़के।शीर्षक अटपटा-सा लगा, सो पूरी खबर पढ़ी।मालूम हुआ कि बात सीबीएसई के बारहवीं के परीक्षा-परिणामों की हो रही थी।फ़िर भी,हमारा मन अखबार की हेडिंग से इत्तिफाक रखने को तैयार नहीं हुआ।लड़के अगर लड़कियों से आगे रहते तब तो कोई खबर बनती क्योंकि लड़कों ने हमेशा लड़कियों का पीछा ही किया है,कभी अगुवाई नहीं की।

लड़कों के लड़कियों से पीछे रहने की तर्कसंगत वजह भी है।यह लड़कों के डीएनए में ही है कि उन्हें लड़कियों का पीछा करना है।इस काम में उन्हें इतना आनंद आता है कि वो अपनी पढ़ाई-लिखाई क्या,पूरा कैरियर ही दाँव पर लगा देते हैं।यह एक स्वाभाविक और सहज प्रक्रिया है।इसलिए कुछ समय पहले लड़कियों का पीछा करने को लेकर कानून बन रहा था तो समझदार लोगों ने उसका विरोध किया था।स्कूली पढ़ाई से ही लड़के इस काम में इतना तल्लीन हो जाते हैं कि कॉलेज पहुँचते-पहुँचते कुछ को इसमें ब्लैक-बेल्टहासिल हो जाती है और वो पढ़ाई के दौरान ही कारागार को भी पवित्र कर आते हैं।

इन मामलों के अंदरूनी जानकार बताते हैं कि दरअसल लड़कों का पीछा करना लड़कियों को भी भाता है।बस,यह काम ज़रा उनकी च्वाइस का हो ! कई बार इन्हीं पीछा करने वालों में से ही वे किसी एक को अपना जीवनसाथी चुन लेती हैं।लेकिन यह एक लंबी प्रक्रिया होती है।जो लड़का पीछा करने में जल्दी हार मान जाता है,लड़कियाँ भी उसे भाव नहीं देतीं।सबसे ज़्यादा रेटिंग उस लड़के की होती है जो येन-केन प्रकारेण, कूद-फाँदकर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करने में सक्षम होता है।इस अभियान में कई बार सम्बन्धित लड़के की हड्डियाँ भी शहीद हो जाती हैं,पर मजाल है कि उसकी हिम्मत का बाल-बाँका भी हो।

ऐसा नहीं है कि लड़के लड़कियों से पीछे इसलिए रहते हैं कि वो उनसे शारीरिक क्षमता में कम होते हैं या दौड़ नहीं पाते।अगर ऐसे लड़कों की भागने की क्षमता देखनी हो तो उन्हें किसी महिला की पर्स या चेन खींचकर भागते हुए देखा जा सकता है।कुछ विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि लड़के इसलिए भी लड़कियों से आगे नहीं होते क्योंकि इससे उनके चूहे होने का संदेश जाता है और वे लड़कियों को कभी भी बिल्ली के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं हो सकते।बहरहाल,परीक्षा में लड़कों ने लड़कियों से पीछे रहकर अपनी पुरातन परम्परा को ही और समृद्ध किया है और वे इसके लिए बधाई के पात्र हैं।  



शांतिप्रेमी का दुनिया के नाम ख़त

  प्यारे विश्व नागरिको   मैं दुनिया का सबसे बड़ा शांतिदूत बोल रहा हूँ।तुम सबकी ख़ैर चाहता हूँ इसलिए कुछ कहने आया हूँ ।...