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शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

मैनूँ शॉपिंग करा दे....!

अंकल सैम आए और हमें लहालोट करके चले गए। बताया जा रहा है कि इस दौरे में कई रिकॉर्ड टूटे हैं। टूटे तो विपक्षी दलों के दिल भी हैं,पर वे किसी तरह किरिच-किरिच हो चुके टुकड़ों को संभालने में जुट गए हैं। पड़ोसी देशों ने तो बकायदा अपने-अपने दिल टूटने के साक्ष्य प्रस्तुत किये हैं। पाकिस्तान ने चीन का काउंटर-दौरा करके बताया कि उसकी सेहत बिगाड़ने की कोई भी कोशिश नाकाम कर दी जाएगी,वहीँ चीन को दिल का दौरा पड़ा है। उसके दिमाग ने सुझाया है कि भारत और अमेरिका की दोस्ती बनावटी है बिलकुल चीन-पाकिस्तान की तरह। बहरहाल,हमारे प्रधानमंत्री ने अमेरिकी राष्ट्रपति को उनके नाम से बुलाकर जाहिर कर दिया कि ये दोस्ती नौ इंच की दीवार पर उकड़ू बैठ कर घरबार की बातें बतियाने के स्तर तक जाती है।

ओबामा के भारत आने के कई असर बताए जा रहे हैं। एक तो यह कि मीडिया का ध्यान केजरीवाल से हटा इससे भाजपा का डर घटा। दूसरे यह कि अमेरिका भी चाहता है कि दिल्ली में भाजपा की सरकार बने। इस यात्रा ने यह भी साफ़ किया कि किसी सरकारी कार्यक्रम में निमन्त्रण अधिकारी नहीं भगवान देते हैं या भाजपा। गणतन्त्र दिवस के समारोह में इसीलिए किरन बेदी मौजूद रहीं। भाजपा और भाग्य दोनों उनके साथ हैं।अोबामा ने हिन्दुस्तान के साथ -साथ उन्हें भी उड़ा दिया है। देखना यही है कि रिज़ल्ट के बाद दिल्ली ही न उड़ जाय! वहीं केजरीवाल चुनावी-मौसम में आम से ख़ास बनने को आतुर हैं पर दावत के बजाय उन्हें अदावत ही मिल रही है।

रिकॉर्ड पर लगातार नज़र रखने वाले जोड़-घटाकर बता रहे हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति केवल पैंतालिस मिनट तक खुले आसमान के तले रह सकते हैं पर वे यहाँ पूरे एक सौ बीस मिनट तक रहे। यह गिनीस बुक में नया रिकॉर्ड हो सकता है। अगर उनकी तरफ से यह रिकॉर्ड बनाया गया है तो हमारी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी गई। दिल्ली गणतंत्र में पहली बार छाते के नीचे आई।हमारे प्रधानमंत्री ने अंकल सैम को खुलेआम अपने हाथों से चाय बनाकर पिलाई। इस आधार पर सत्ताधारी पार्टी भविष्य में अमेरिकन राष्ट्रपति को पानी पिलाने का दावा भी ठोंक सकती है।ओबामा भी कई सौदों को निपटाने के चक्कर में मोदी के साथ टहलते रहे। अंततः किसने किसको टहलाया,यह तो समय ही बताएगा ?

कहते हैं कि जहाँ ओबामा ठहरे थे,वहाँ आसपास ’मैंनू शॉपिंग करा दे....’ का रिकॉर्ड लगातार बज रहा था। आखिर मिशेल के कहने पर उन्होंने हमारे कटोरे में चार अरब डॉलर डाले और अपनी जान बचाई !

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

सम्मान और संन्यासी !

पद्म पुरस्कार हर बार की तरह इस बार भी खूब बंटे हैं। जिनको मिलना था मिले,जिनको नहीं मिलना था,उन्हें भी दिए गए। जिन लोगों ने इन्हें शिरोधार्य किया,माना जाता है कि वो इसके सही पात्र थे पर जिन लोगों ने इन्हें लेने से मना किया ,उन्होंने इस बहाने बताया कि वो इनसे बहुत बड़े हैं। स्वामी जी और संतश्री ने तो पद्म-पुरस्कार का तिरस्कार यह कहकर किया कि साधु-संतों को इस तरह के पुरस्कारों से कोई मतलब नहीं। वे तो निस्वार्थ भाव से बस समाज-सेवा करना चाहते हैं।
स्वामीजी और संतश्री को लगता है कि उनकी सेवा-साधना में इस तरह के सम्मान और पुरस्कार न केवल खलल डालते हैं बल्कि उनका अपने धंधे की ओर से ध्यान भी भंग करते हैं। स्वामीजी निःशंक भाव से गाय का घी बेचते रहें,इसके लिए सम्मान से अधिक जेड-प्लस सुरक्षा ज़रूरी है। बाबा को पद्म-सम्मान वह अहसास नहीं दे सकता जो दर्जनों कमांडों से घिरे होने पर मिलता है। चौतरफ़ा सुरक्षा से घिरा होना ही बताता है कि कोई समाज या देश के लिए कितनी अहमियत रखता है। पद्म-सम्मान तो एक रुक्का भर है। बाबा यूं ही नहीं पहुंचे हुए योगी हैं ! पहले कई मौकों पर वे भले ही पुरस्कार और सम्मान स्वीकार कर चुके हों पर जब सामने जब बड़ा फ़ायदा नज़र आ रहा हो तो छोटे-मोटे त्याग भी कुछ न देकर बहुत कुछ दे जाते हैं।
संतश्री की ख्याति अंतरराष्ट्रीय स्तर की है। विदेशों में बड़े-बड़े सम्मान उन्होंने अपने धवल-वस्त्र में खूब समेटे हैं। हमारी सरकार ने भी उनकी इस अर्हता को देखते हुए सम्मानित करने का फैसला किया पर उसे नहीं पता था कि ऐसा करने से उनकी रेटिंग में गिरावट आ सकती है। संतश्री को ’ग्लोबल-टच’ और ‘लोकल-टच’ वाले सम्मान के बीच का अंतर बखूबी पता था सो पद्म-सम्मान उनके लिए अचानक ‘अनटचेबल’ हो गया। कारण यही कि एक संत को सम्मान से क्या काम ! उनका नाम वैसे ही दोहरी समृद्धि लिए हुए है,इसलिए इस सम्मान को ठुकराकर भी उनको दोहरा लाभ मिल गया है। एक तो त्यागी होने को लेकर उठती नित-नई आशंकाओं को उन्होंने खारिज़ किया तो दूसरी ओर अपना अंतरर्राष्ट्रीय ब्रांड भी बरकरार रखा।
संन्यासियों को वैसे भी क्या चाहिए ! वो तो जो भी अर्जित करते हैं,सब बाँटने के लिए होता है,बशर्ते वह सुपात्र हो। सरकार को भले ही सुपात्र की परख न हो पर आजकल के बाबा और संन्यासियों को अपने पात्र की खूब फ़िक्र होती है। वे हमेशा भरे होने चाहिए। उन्हें सुख,समृद्धि और सुरक्षा से परहेज नहीं है क्योंकि ये सब होंगे तो ऐसे सम्मान उनके आगे-पीछे घूमेंगे और सरकारें सिर के बल खड़ी होंगी।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

आओ जी,आपका स्वागत है !

राजधानी में गहमागहमी अचानक बढ़ गई है। एक तरफ़ सरकार को तलाशने में सारे नेता लगे हुए हैं,वहीँ सुरक्षा एजेंसियाँ किसी भी आतंकवादी हरक़त पर नज़र गड़ाए हुए हैं। दुनिया की सबसे बड़ी सरकार राजधानी में पधारने वाली है,इसके लिए हमारी सरकार ने अपनी कमर कस ली है। जगह-जगह ऐसे कैमरे फिट कर दिए गए हैं,जिससे किसी भी आदमी का इतिहास-भूगोल मिनटों में पता किया जा सकता है। अंकल सैम के इतने बड़े लाव-लश्कर के आने में जितना खर्च हो रहा है,उतने में तो किसी छोटे-मोटे प्रदेश का सालाना बज़ट निपट जाता। पर सरकार इतने छोटे दिल की नहीं है कि वह पाई-रत्ती का हिसाब रखे। आखिर नाक भी तो कोई चीज़ होती है।

हमारे यहाँ प्राचीन काल से अतिथि को भगवान माना गया है। यहाँ तो साक्षात् भगवान ही पधार रहे हैं। अंकल सैम के आस-पास कोई परिंदा तो पर मार ही नहीं सकता,हवा भी पास से गुजरने की हिम्मत नहीं कर सकती। दुनिया के दरोगा ने आने से पहले ही हमलावरों को अलर्ट जारी कर दिया है कि कम से कम तीन दिन वो अपनी आरामगाह में ही रहें। यदि उस वक्त सीमा पर कोई फुलझड़ी भी सुनाई दी तो उसका हुक्का-पानी बंद कर दिया जायेगा। ऐसे में हमारे देश को लीज़ पर तीन दिन के लिए शांति प्रदान की जा रही है। यदि यह प्रयोग सफल रहा तो आगे भी हमारे निवेदन पर इसको रिचार्ज किया जा सकता है।

राजधानी के आकाश-पाताल पर अंकल सैम का कब्जा बड़ा सुकून पैदा करने वाला होगा। सड़क,रेल और नभ के यातायात पूरी तरह चाक-चौबंद रहेंगे। अपराधियों और आतंकवादियों को अंदरूनी एडवाइजरी जारी कर दी गई है और वे सभी दम साधे इन तीन दिनों के गुजरने का इंतज़ार कर रहे हैं। थानेदार साहब के जाते ही सब अपने-अपने मोड में सक्रिय हो जायेंगे। इसकी चिंता हमारी सरकार को नहीं है तो दुनिया की सबसे बड़ी सरकार को क्यों होगी ?
पाकिस्तान जी से निवेदन है कि हमारे मुल्क की बेहतरी में वो भी अपनी तरफ से सहयोग करे। तीन दिन गोले नहीं दागने पर आदत नहीं छूट जाएगी। पुरानी और मुंहलगी आदतें ऐसे ही नहीं जातीं। अंकल सैम के जाने के बाद आप अपने गोले बदस्तूर ज़ारी रखना ताकि आपको भी अंकल सैम से राहत-राशि की पुड़िया मिलती रहे। आओ,आप और हम दोनों मिलकर उनका खैर-मकदम करें।


बुधवार, 21 जनवरी 2015

चेहरा बनाम मोहरा !

यहाँ हर किसी को किसी की तलाश है।भगदड़-सी मची हुई है।दल और दिल फुर्ती-से बदल रहे हैं।सभी हलकान हैं।किसी को चेहरा चाहिए तो किसी को मोहरा।जनता को एक अदद सरकार चाहिए पर अभी भी उस पर कोहरा छाया हुआ है।मौसमी कोहरा तो मौसम बदलने पर छँट जाएगा पर राजनैतिक कोहरे के खुलने में वक्त भी है और अंदेशा भी ।राजधानी में मौसम सर्द है पर सेवा करने की गर्मी अचानक बढ़ गई है। लोग एक चेहरे पर नज़र टिकाते हैं पर तभी वह धुंध में विलीन हो जाता है।नया चेहरा उभरता है;पहले से अधिक उजला और बेदाग़,पर उस पर भी छींटे पड़ने शुरू हो जाते हैं।लोग भौंचक हैं।चेहरे यक-ब-यक रोज़ बदल रहे हैं पर जनता के ‘भाग’ कब बदलेंगे,इसकी कोई पुख्ता खबर अभी तक नहीं है।

कुछ लोग कहते हैं कि जनता को चेहरा चाहिए। इस पर वे कहते हैं कि हमारा तो एक ही चेहरा है।अब चेहरा आ गया है तो कहते हैं कि वह मोहरा है।जनता असमंजस में है।उससे कोई नहीं पूछ रहा कि उसे क्या चाहिए ? उसके हाथ में एक अदद बटन है,जिसकी मदद से कई लोग अपने ‘काज’ टाँकना चाहते हैं।चुनाव बाद जनता को सब अँगूठा दिखा सकें,इसके लिए वे सब जनता का अँगूठा भी काट लेना चाहते हैं।जनता अपनी उँगली को कब तक सबसे छुपाए रखेगी ? जल्द ही वह स्याह होने वाली है उसकी जिंदगी की तरह ।

देश सेवा के लिए लोग चेहरे,मोहरे और सारे संकल्प बदलने को तैयार हैं।वे अचानक प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं।पुरानी प्रेरणाएं अब प्रेत की तरह पीछा करती हैं,जिन्हें नई वाली से रिप्लेस किया जा रहा है ।प्रेरणा वही जो जीवन में काम आये।कागजी प्रेरणाएं बड़ा कष्ट देती हैं।चेहरे और मोहरे में एक बुनियादी फर्क है।मोहरे पिट जाते हैं तो खेल से बाहर हो जाते हैं जबकि चेहरे पिटकर अधिक शोभनीय और क्रान्तिकारी इमेज के साथ खिल उठते हैं।अब लोगों को प्रेरणा नहीं मिलती,बल्कि प्रेरणा ही अनुकूल बंदे को पकड़ लेती है।ईश्वर की घड़ी भी उसी के हाथ बंधती है ,जिसे सही समय में सही प्रेरणा मिलती है।जनता की घड़ी न जाने कब से बंद है ! वह केवल बटन दबाने के समय ही चलती है।

राजधानी में कोहरा अभी भी घना है।न जाने कितनी सूरतें रोज़ इधर से उधर हो रही हैं पर इसकी सूरत बदलती नज़र नहीं आती।कोहरे की वजह से चेहरों को पाले बदलने में खूब सहूलियत हो रही है,भले ही जनता के अरमानों पर पाला पड़ रहा हो।ऐसे घोर अदल-बदल के समय में कौन-सा चेहरा जनता के नसीब में आता है,इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता ।कहीं चेहरा पुराना है तो संकल्प नए हैं तो कहीं नया चेहरा है और संकल्प पुराने ।कोहरे के बाद चेहरे तो साफ़ दिखेंगे पर संकल्प फिर से प्रेरणा की आस में रहेंगे । कुछ लोगों ने चेहरे तलाश लिए हैं तो कुछ ने मोहरे, पर अभी सब कोहरे में ही अपनी-अपनी चालें चल रहे हैं।देखना यह है कि जनता इस कोहरे से कब तक उबरती है !

रविवार, 18 जनवरी 2015

अपनी-अपनी खोज!

दोपहर में कक्कू मिले तो बहुत भन्नाए हुए थे।धूप बहुत हल्की थी पर हमें देखते ही गरमा गए।कहने लगे-‘ई नहाने का खोज किसने किया है ? इहाँ ठण्ड के मारे हाथ नहीं उठ रहा और घरैतिन कहती हैं कि हम दो लोटा पानी अपने ऊपर डाल लें।ये हमसे तो ना हो सकेगा।’कक्कू की समस्या सुनकर हम भी परेशान हो गए पर उनके प्रश्न का उत्तर हमारे पास भी नहीं था।हमने बात बदलते हुए पूछा,’कक्कू,नहाने की खोज से ज्यादा अहम् लोटे की खोज है।अगर ये न होता तो इसे यूँ उठाने की नौबत ही न आती।’ हमारी बात सुनते ही कक्कू नहाने से लोटे की तरफ लौट पड़े।वे बोले-तुम बिलकुल ठीक कहत हौ लल्लू ! सारे झगड़े की जड़ यही लोटवा ही है।अब हमें नहाने से कउनो समस्या नाही है।लोटा है तो उठाना ही पड़ेगा नहीं तो मौका पाते ही ई ससुर इधर-उधर लुढ़कने भी लगता है ।’

लोटे की लुढ़कन-क्षमता को देखते हुए हमें इसमें तमाम संभावनाएँ नज़र आने लगीं।सोचने लगा कि इसकी खोज ज़रूर हमारे ही देश में हुई होगी।तभी तो जिस किसी को देखो,जहाँ देखो वहीँ लुढ़का जा रहा है या लुढ़कने पर आमादा है।आदमी अपने कर्म से,संत अपने धर्म से,नेता अपने दल से,रुपया बाज़ार से और सरकार अपने वादे से लगातार लुढ़क ही तो रही है।अब अगर लोटे की खोज करने वाले की खोज हो भी जाए तो क्या हमारी लुढ़कन-क्षमता में कोई फर्क पड़ेगा ?हम लुढ़कने का कारण सोचने लगे।

कक्कू को लगा कि उन्होंने ऐसा क्या कह दिया जो अचानक हम इस तरह की गंभीर-मुद्रा में आ गए।बोलने लगे-‘बेटा,छोड़ो नहाने-धोने की चिंता।हम तो अपने शरीर पर दो बूँद गंगाजल छिड़क लेंगे,हो जायेगा हमरा नहान।भला हो गंगा मैया की खोज करने वाले भगीरथ की,ऊ न होते तो आज इतनी ठण्ड में हम कइसे बचते ?’

‘पर कक्कू विज्ञान या इतिहास की किताबों में तो कहीं ऐसा नहीं लिखा है कि भगीरथ गंगा को स्वर्ग से लाए थे।हमने तो पढ़ा है कि गंगा हिमालय से निकलती हैं।‘ हमने कक्कू के सामने अपनी पढ़ाई खोलकर रख दी।कक्कू अब तक ठण्ड से पूरी तरह बाहर निकल आये थे।मेरे सवाल ने और गरमाहट पैदा कर दी थी।वे कहने लगे-‘मैंने तेरे बाप से कहा था कि इसे पढ़ने शहर मत भेजियो पर हमरी सुनता कौन है ! ई सब शहरी किताबों में लिखा नहीं मिलेगा और ना ही विलायती लोगन के जेहन में लल्लू ! ’ कक्कू पूरी तरह तैश में थे।वे बोले जा रहे थे-‘पुराने ग्रन्थन में जो विज्ञान भरा पड़ा है,उसे समझे के लाने वैसन ही सोच चाही।आज जहाज में बैठकर दुनिया कितना भी इतरा ले पर पुराने समय में पुष्पक विमान जैसा अजूबा हमारे ही पास था जिसमें एक सीट हमेशा खाली रहती थी।पर उस खोज की दुनिया को कोई खबर नहीं है।’इतना कहकर कक्कू अचानक रुक गए।

हमने देखा,सामने से काकी चली आ रही थीं।अब कक्कू लोटे को खोजने लग गए,जो वहीँ कहीं लुढ़क गया था।इधर लोटा उनके हाथ में आया और हम उनका नहान पक्का जानकर नए ठिकाने की खोज में निकल पड़े।

शनिवार, 17 जनवरी 2015

बदलाव वाले चुनाव!

राजधानी बदलापुर में चुनाव होने वाले हैं।खबर है कि लोग सरकार बदलने वाले हैं और नेताजी अपना दल।बदलाव के इस व्यापक मौके पर कोई भी चूकना नहीं चाहता।हर कोई काँपा-कटिया लगाए बैठा हुआ है।लोग इसलिए बदलना चाहते हैं क्योंकि सालों से उनकी जीवनचर्या जस-की-तस है।वो नहीं बदली तो कम से कम सरकार ही बदल जाए।फिर शायद कुछ बदले।नेताजी भी एक डाल पर बैठे-बैठे ऊब गए हैं।जिस डाल पर वो अब तक बैठे थे,वह पेड़ सहित बैठने वाली है।नेता जी गिरने से पहले कहीं और लटकना चाहते हैं,इसलिए वे पेड़ ही बदल रहे हैं।
समय बदल रहा है तो हर कोई बदलने को आतुर है।कहीं निष्ठाएं बदल रही हैं तो कहीं धारणाएं।बदलाव को लेकर इतनी बेचैनी है कि अगले पल ऊँट किस करवट बदल जाए,कुछ कहा नहीं जा सकता।चुनाव आते ही हैं बदलाव के बड़े एजेंडे को लेकर,इसलिए सारे माहौल में बदलाव तारी है।जनता को जहाँ दिन बदलने की उम्मीद है,वहीँ नेता को अपनी कुर्सी बदलती दिखती है।दूर रखी चीज़ बिलकुल पास महसूसती है।कोहरे में सुन्न पड़ा हाथ भी जेब में जाकर गर्माहट में बदलना चाहता है।जेब हमेशा नुचती है,झड़ती है,पर उसकी किस्मत नहीं बदलती।
चुनाव कई दुश्मनों को दोस्त में और दोस्तों को दुश्मनों में बदल देता है।ठिया बदलते ही कसमें बदल रही हैं।घोर साम्प्रदायिक व्यक्ति कट्टर सेकुलर हो जाता है और सेकुलर को अचानक राष्ट्रहित में सारे विकल्प खोलने पड़ जाते हैं।निगाह अर्जुन की तरह मछली पर ही रहती है,वह नहीं चूकती,सटीक निशाना साधती है।हथियार बदलता है पर वार नहीं।नेताजी सशरीर अपने विचार बदलते हैं,इस मायने में वे पूर्ण आत्म-निर्भर हैं।शाम ढलते ही पार्टी बदल जाती है और इसके साथ ही उनकी किस्मत।पहली वाली पार्टी में जो नाकारा मान लिए गए थे,नई वाली में कुर्सी के दावेदार बन जाते हैं।ऐसे हसीन मौके चुनाव ही उपलब्ध कराता है।
बदलने को तो मौसम भी बदल रहा है।भरे जाड़े में बरसात हो रही है।इस ठिठुरन में पिछले वादे याद नहीं रहते।सारे दल इस बीच अपने घोषणा-पत्र बदल डालते हैं।पीछे मुड़कर देखने का वक्त गया।आगे की सोचो,वादे बदलो।गरीबी पर चर्चा पिछड़ेपन की निशानी है,बहस करनी है तो ‘डिजिटल इण्डिया’ पर करो।शब्द बदलने चाहिए ताकि उसके अर्थ ढूंढें जा सकें।जब तक यह काम पूरा होगा,अगले चुनाव आ जायेंगे।मंजिल नहीं मिल रही,कोई बात नहीं,रास्ते बदल लो।असल मंजिल वही पाते हैं जो सुविधानुसार अपने रास्ते बदल लेते हैं।शिखर पर वही विराजते हैं जो शरीर ही नहीं आत्मा को भी बदलने की क्षमता रखते हैं।
पानी बरसता है तो चला भी जाता है पर अपने पीछे बहुत सारा बदलाव कर जाता है।खेत में वर्षों से बंधी-बंधाई मेंड़ ढह जाती है,पुल तक बह जाते हैं।नदी-नाले सब एक हो जाते है।सूखी और प्यासी धरती जलमग्न हो जाती है।चुनाव भी इसी तरह बदलाव का ज़ज्बा लाते है।सबके दिन बहुरते हैं।कोई ऊपर-ऊपर बटोर पाता है तो कोई तलहटी से मलाई मार लाता है।’जिन बूड़ा तिन पाइयाँ,गहरे पानी पैठि’ इसी दिन के लिए कहा गया है।राजधानी बदलापुर में चुनावी-बरसात आ गई है।सभी उम्मीद से हैं।

बुधवार, 14 जनवरी 2015

अपनी-अपनी मास्टरी!

अभिनन्दन रैली में जमकर क्रन्दन हुआ।चार राज्यों में अभूतपूर्व विजय के बाद पताका दिल्ली में फहरानी है।दिल्ली को असल खुशहाली तभी मिल सकती है,जब विरोधी जंगल चले जाँय।यह देश ’होनहार बिरवान के होत चीकने पात’ की लकीर पर चलने वाला रहा है।शुरू से ही पता चल जाता है कि कौन आदमी किस लायक है ।बचपन में ही हर किसी को अपने शरीर की चिकनाहट अच्छी तरह से देख लेनी चाहिए,नहीं तो आगे जाकर वह खाली-पीली में ही हाथ-पैर मारेगा ! जिसको जिस काम में मास्टरी है,वही करे।यही काम पुलिस और बाबू लोग मुस्तैदी से करते आ रहे हैं।सरकार चलाने वाले चेहरे अलग ही होते हैं।वे मफलर या टोपी वाले निखट्टू-टाइप लोग नहीं होते।इसके लिए अरमानी जैसे डिजायनर सूट पहनने वाले,दिन में दस बार ड्रेस बदलने वाले जेंटलमेन चाहिए।तब कहीं जाकर देश आगे बढ़ता है।

दिल्ली लुटने के लिए तैयार है पर यह मौका उन्हें मिलना चाहिए जिनको लूटने में महारत हासिल है।झूठ की छोटी-मोटी फैक्ट्री से न दिल्ली चलेगी और ना ही देश, इसलिए जो बड़ी-बड़ी कम्पनियों का माल खींच सके,वही गाड़ी को आगे बढ़ा सकता है।’जिसका काम उसी को साजे,और करे तो डंडा बाजे’ यानी फेंकने वाले फेंकें और इस्तीफ़ा देने वाले इस्तीफ़ा दें।जिन्हें कुर्सी पर जमकर बैठने की आदत नहीं है,वे धरने पर बैठें,सड़क पर रहें।गुड गवर्नेंस देने की नहीं मनाने की चीज है,इसलिए इसका सेलिब्रेशन होता है ।’वाइब्रेंट इण्डिया’,’डिज़िटल इण्डिया’ और ‘मेक इन इण्डिया’ जैसे इण्डिया के कई वर्जन लाकर इसे ‘भारत-मुक्त इण्डिया’ बनाकर ही दम लेना है।

झूठ बोलने वाले बहुत कच्चे खिलाड़ी हैं।उनकी फैक्ट्री इसका कच्चा माल ही सप्लाई कर रही है,जबकि राजनीति में सब कुछ परफेक्ट होना चाहिए।दूसरी तरफ देखिए,वे पके-पकाए हैं।उनका झूठ सच के ऊपर भी भारी है।डील-डौल के मुताबिक ही डील होती है।वे जो बोलते हैं,वही सच होता है।ऐसा समझकर पड़ोसी देश तो न जाने कब से अपने–अपने बंकरों में घुसे बैठे हैं।पता नहीं कब उनकी भाषण-मिसाइल उनके अड्डे तबाह कर दे।’सबका साथ,सबका विकास’ देश के वोटरों के पल्ले भले न पड़ा हो,पर अमेरिकन अंकल उसे चिप्स की तरह चबा रहे हैं।उन्हें जादू करने में मास्टरी है।

जनता लुटने के लिए बेताब है।मंहगाई और भ्रष्टाचार से निजात पाई जनता ठुमके लगा रही है।ऐसे में इस खेल में अड़ंगी मारने वाला जनता का दुश्मन है।जनता खुमारी में मगन है और अराजक लोग इस पर झाड़ू मारना चाहते हैं।ये ‘नए इंडिया’ के असली दुश्मन हैं।

बुधवार, 7 जनवरी 2015

हम नया विज्ञान बनाएँगे।

जो लोग बार-बार कह रहे थे कि नई सरकार आने पर भी कुछ नहीं बदला,सब वैसे ही है,उनके मुँह पर करारा तमाचा लगा है।कई सालों से एक ही परिवार की सरकार को उखाड़ फेंककर पहले तो इतिहास बनाया गया,फिर बयानों और किताबों के ज़रिये इतिहास को बदला गया।सरकार जब कुछ नया करने की तलाश में थी,धर्म ने उसमें अड़ंगी लगाई तो उसकी भी ‘घरवापसी’ कर दी गई।अब राजनीति ‘अधर्म’ होकर निश्चिन्त हो गई है और उसने धर्म को भी सही ठिकाने पर लगा दिया है।इतना सब होने पर भी विद्वेषियों को चैन नहीं आया और वे ‘अच्छे दिन कब आयेंगे’ का जुमला उछालने से बाज नहीं आ रहे थे।इस पर सरकार को बदलाव के संकेत तो देने ही थे,सो उसने विज्ञान की ओर निहारा।

इतिहास और धर्म के दुरुस्त हो जाने के बाद विज्ञान भी कातर नेत्रों से उसी ओर देख रहा था।आखिर सरकार के लोगों ने ‘जय विज्ञान’ का हुँकारा भरते हुए पुराने ग्रन्थ और पांडुलिपियाँ खोज डालीं।उन्हें पता लगा कि हवाई जहाज का आविष्कार ‘राइट ब्रदर्स’ ने नहीं,हमारे ही किसी बंदे ने किया था।उसकी खोज दुनिया के सामने इसलिए नहीं आ पाई क्योंकि हम भारतीय स्वभाव से बड़े संकोची होते हैं।अब जब दुनिया से न डरने वाली और न झुकने वाली सरकार देश में काबिज हो गई है तो विज्ञान में हुई गड़बड़ियों को भी जल्द सुधारा जायेगा।हो सकता है कि कल को यह भी पता चल जाय कि अमेरिका की खोज कोलम्बस ने नहीं हमारे ही किसी मछुआरे ने की थी।अब यही सब बदलाव तो करने हैं और हो भी रहे हैं।
विज्ञान के अंदर बड़े पैमाने पर बदलाव सम्भावित हैं।गिनीस बुक वालों को फिर से अपना रिकॉर्ड दुरुस्त करने की ज़रूरत है।रामायण काल में हमारे यहाँ पुष्पक विमान था,जिसमें कितने भी लोग बैठ जाएँ, फिर भी एक सीट खाली रहती थी।पत्थरों पर नाम लिखकर समुद्र में तैराना रहा हो या तीर मारकर पाताल से पानी निकालना,ये सारे अजूबे हमारी ही देन है।अब देखिये ना,शून्य की खोज हमने की पर हमारे पल्ले शून्य ही आया।इसको ही बदलना है।

दुनिया को अब यह भी जान लेना चाहिए कि विज्ञान केवल करने या होने की चीज़ नहीं है।उसे किताबों में बदलकर भी हासिल किया जा सकता है।बदलाव हो रहा है पर दिखना भी तो चाहिए।इसलिए बदलाव हो भी रहे हैं।आपको नहीं दिखता है तो अपना चश्मा बदल लें।हम नया इतिहास बना चुके हैं,अब नया विज्ञान बनायेंगे।