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शनिवार, 17 जनवरी 2015

बदलाव वाले चुनाव!

राजधानी बदलापुर में चुनाव होने वाले हैं।खबर है कि लोग सरकार बदलने वाले हैं और नेताजी अपना दल।बदलाव के इस व्यापक मौके पर कोई भी चूकना नहीं चाहता।हर कोई काँपा-कटिया लगाए बैठा हुआ है।लोग इसलिए बदलना चाहते हैं क्योंकि सालों से उनकी जीवनचर्या जस-की-तस है।वो नहीं बदली तो कम से कम सरकार ही बदल जाए।फिर शायद कुछ बदले।नेताजी भी एक डाल पर बैठे-बैठे ऊब गए हैं।जिस डाल पर वो अब तक बैठे थे,वह पेड़ सहित बैठने वाली है।नेता जी गिरने से पहले कहीं और लटकना चाहते हैं,इसलिए वे पेड़ ही बदल रहे हैं।
समय बदल रहा है तो हर कोई बदलने को आतुर है।कहीं निष्ठाएं बदल रही हैं तो कहीं धारणाएं।बदलाव को लेकर इतनी बेचैनी है कि अगले पल ऊँट किस करवट बदल जाए,कुछ कहा नहीं जा सकता।चुनाव आते ही हैं बदलाव के बड़े एजेंडे को लेकर,इसलिए सारे माहौल में बदलाव तारी है।जनता को जहाँ दिन बदलने की उम्मीद है,वहीँ नेता को अपनी कुर्सी बदलती दिखती है।दूर रखी चीज़ बिलकुल पास महसूसती है।कोहरे में सुन्न पड़ा हाथ भी जेब में जाकर गर्माहट में बदलना चाहता है।जेब हमेशा नुचती है,झड़ती है,पर उसकी किस्मत नहीं बदलती।
चुनाव कई दुश्मनों को दोस्त में और दोस्तों को दुश्मनों में बदल देता है।ठिया बदलते ही कसमें बदल रही हैं।घोर साम्प्रदायिक व्यक्ति कट्टर सेकुलर हो जाता है और सेकुलर को अचानक राष्ट्रहित में सारे विकल्प खोलने पड़ जाते हैं।निगाह अर्जुन की तरह मछली पर ही रहती है,वह नहीं चूकती,सटीक निशाना साधती है।हथियार बदलता है पर वार नहीं।नेताजी सशरीर अपने विचार बदलते हैं,इस मायने में वे पूर्ण आत्म-निर्भर हैं।शाम ढलते ही पार्टी बदल जाती है और इसके साथ ही उनकी किस्मत।पहली वाली पार्टी में जो नाकारा मान लिए गए थे,नई वाली में कुर्सी के दावेदार बन जाते हैं।ऐसे हसीन मौके चुनाव ही उपलब्ध कराता है।
बदलने को तो मौसम भी बदल रहा है।भरे जाड़े में बरसात हो रही है।इस ठिठुरन में पिछले वादे याद नहीं रहते।सारे दल इस बीच अपने घोषणा-पत्र बदल डालते हैं।पीछे मुड़कर देखने का वक्त गया।आगे की सोचो,वादे बदलो।गरीबी पर चर्चा पिछड़ेपन की निशानी है,बहस करनी है तो ‘डिजिटल इण्डिया’ पर करो।शब्द बदलने चाहिए ताकि उसके अर्थ ढूंढें जा सकें।जब तक यह काम पूरा होगा,अगले चुनाव आ जायेंगे।मंजिल नहीं मिल रही,कोई बात नहीं,रास्ते बदल लो।असल मंजिल वही पाते हैं जो सुविधानुसार अपने रास्ते बदल लेते हैं।शिखर पर वही विराजते हैं जो शरीर ही नहीं आत्मा को भी बदलने की क्षमता रखते हैं।
पानी बरसता है तो चला भी जाता है पर अपने पीछे बहुत सारा बदलाव कर जाता है।खेत में वर्षों से बंधी-बंधाई मेंड़ ढह जाती है,पुल तक बह जाते हैं।नदी-नाले सब एक हो जाते है।सूखी और प्यासी धरती जलमग्न हो जाती है।चुनाव भी इसी तरह बदलाव का ज़ज्बा लाते है।सबके दिन बहुरते हैं।कोई ऊपर-ऊपर बटोर पाता है तो कोई तलहटी से मलाई मार लाता है।’जिन बूड़ा तिन पाइयाँ,गहरे पानी पैठि’ इसी दिन के लिए कहा गया है।राजधानी बदलापुर में चुनावी-बरसात आ गई है।सभी उम्मीद से हैं।

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