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रविवार, 8 दिसंबर 2019

लोकतंत्र की छतरी के नीचे !

इन दिनोंलोकतंत्रऔरसत्यलगातार खबरों में बने हुए हैं।इससे इस बात की पुष्टि भी होती है कि ये दोनों अभी तक जीवित हैं।यह इस सबके बावजूद हुआ जबकि हर दूसरे दिनलोकतंत्र की हत्याहोने की मुनादी पिटती है।पर यह सशक्त लोकतंत्र का कमाल ही है कि वह अगले दिन सही-सलामत और दुरुस्त पाया जाता है।अचानकलोकतंत्र की जीतहोती है।उस पर संपूर्ण निष्ठा समर्पित हो जाती है।कुछ ऐसा ही मामला बेचारेसत्यके साथ भी घटित होता है।जब भी लोकतंत्र को थोड़ी कमजोरी महसूस होती है,वह सत्य की टॉनिक पी लेता है।सत्यस्वाभिमानी होता है।वह सदन से उठकर पंचसितारा होटलों में सुकून की साँस लेता है।और तब तोसत्य की जीतज़रूर होती है,जब किसी आरोपी को सहसान्यायमिल जाता है।

अपना देश कोई आम लोकतंत्र नहीं है।जिस तरह देश का आख़िरी आदमी मरते-मरते जी उठता है,ठीक उसी तरह अपना लोकतंत्र भी आख़िरी साँस निकलने से पहले एकदम से चिहुंक उठता है।पिछले सत्तर सालों सेगनतंत्रकी गठरी संभाले वह आज भी उसी दम से हुंकार भरता है।यह लोकतंत्र का चमत्कार ही है कि न्याय की आस में पीड़ित का दम निकलता है तो निकल जाए,परन्यायिक-व्यवस्थाका बाल-बाँका भी नहीं होता ! दस साल में न्याय दस कदम भले बढ़ पाए पर उसकी फ़ाइलें नौ दिन में अढ़ाई कोस ज़रूर चल लेती हैं।अंधा होने के कारण क़ानून ख़ुद नहीं देख पाता।इसलिए व्यवस्था उसेटॉर्चदिखाती है।जैसे हिरन कस्तूरी खोजता है,फिर वैसे हीसत्यकी खोज होती है।

औरसत्यहै कि वह सबसे अनूठा है।एक ही समय में वह सबके पास होता है।सबका अपनासत्यहोता है।पुरानी कहावत हैसत्यमेव जयतेइसका जाप करते ही सत्य एकदम से साधक के  पाले में जाता है।नींव भले असत्य की हो,पर उस पर झंडा सत्य का ही फहरता है।साधक को जो दिखता है,वह सत्य होता है।और जो नहीं दिखता वही असल सत्य होता है।इसमें एक और ख़ास बात है।सत्य हमेशासबलहोता है।बलवान के पास ही रहता है।निर्बल तो सत्य को परेशान करने की ज़हमत भी नहीं उठाता।ये तो बलशाली हैं जिन्हें इस बात का आत्म-विश्वास होता है किसत्य परेशान हो सकता है,पराजित नहींउन्हें अपने सत्य पर पूरा भरोसा होता है।उनका यह भरोसा कभी भ्रम में नहीं बदलता।उनका सत्य कभी पराजित नहीं होता।परम ज्ञानियों ने इन्हीं वजहों से इसे अपना जीवन-वाक्य बनाया है।और एक बात,सत्य को हमेशा प्रिय पसंद है।अप्रिय सत्य दुःखकारी होता है।इसीलिए साधुजन सदैव सत्य बोलते हैं।

महान लोगों केसत्यको स्थापित करने में जिस घटक की ख़ास भूमिका है,वह है लोकतंत्र।यह ऐसा अभेद्य कवच है जिसे कोई भेद नहीं सकता।बड़े-बड़े संकटलोकतंत्रकी छतरी के नीचे समाधान पाते हैं।ख़तरेसदैव सुरक्षित होते हैं और फलते-फूलते भी।इसीलिए हमारा लोकतंत्र अब तक मज़बूत बना हुआ है।सड़क से सदन तक इसके ज़बर्दस्त पैरोकार हैं।यह रैलियों और भाषणों का सार होता है।चुनावों में इसे बड़े आदर से पूजते हैं।बाद में श्रद्धापूर्वक इसका आचमन भी किया जाता है।यूँ कह लीजिए,लोकतंत्र हमारे देश की रीढ़ है।इसीलिए ये बड़ा संवेदनशील होता है।ज़रा-सी बात परहर्टहो लेता है और बड़ी बात पर संज्ञा-शून्य।आजकलप्राइम-टाइमकी सारी बहसें इसी पर टिकी हुई हैं।

कल ऐसी ही एक बहस में लोकतंत्र काआख़िरी आदमीघुस गया।बड़ी मुश्किल से उसकी जान छूटी।वहाँलोकतंत्रऔरन्यायमें सीधी टक्कर चल रही थी।लोकतंत्र का कहना था किन्यायने उसकी व्यवस्था में सीधा दख़ल दिया है।जबकि उसे कुछ करने का नहीं सिर्फ़ देखने का अधिकार है।यह उसकीअति-सक्रियताहै।ऐसे में लोकतंत्र कैसे चलेगा ? ‘सत्यतो उसके साथ है।जीत भी उसी की होनी चाहिए।ऐसे ही चलता रहा तो अराजकता जाएगी

इस परन्यायने भी अपने तर्क दिए।हम कब तक मूक-दर्शक बने रहेंगे ? इंसान हमारी ओर टकटकी लगाए देख रहा है।अब तो पट्टी-बँधी इन आँखों में दर्द भी होने लगा है।लोकतंत्रका लोक लुप्त हो रहा है।यह सुनकर सत्य ने बग़ल में बैठीव्यवस्थाको कोहनी मारी।वह ज़ोर से हँसी।कहने लगी, ‘तुम सभी हमारे सहयोग के लिए बनाए गए हो।केवल काम करिए।सोचने का काम हमारा है।अगर हमें कुछ हुआ तो तुम एक भी नहीं बचोगे।रही बात आदमी की,यह सब उसके लिए नया नहीं है।लोकतंत्रतो बना ही हम दोनों से है।इसके अलावा कुछ भी सत्य नहीं है।हम तो शपथ भी सत्य की खाते हैं।इसके बाद खाने को कुछ बचता नहीं।
सरेआम ऐसे सत्य-वचन सुनकर सत्य भी शरमा गया।वह पानी-पानी होता,इससे पहले ही लोकतंत्र ने बचा लिया।बहस देखता आदमी सकते में था।तभी न्याय ने तनिक झेंपते हुए कुछ कहना चाहा पर उसे अगली तारीख़ मिल गई।

इस तरह बहस में भीलोकतंत्र की जीतहुई।


-संतोष त्रिवेदी