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गुरुवार, 31 जुलाई 2014

कौन कहता है मेरी खटिया के नीचे जासूस है !

नवभारत टाइम्स में पहली बार.....31/07/2014  को प्रकाशित 
मंत्री जी के घर में जासूसी का सनसनीखेज मामला उजागर हुआ है।मीडिया और विपक्ष लगातार कह रहा है कि जासूस बेडरूम तक पहुँचने में सफल हो गए हैं।यह और गंभीर मसला है,जब इस जासूसी के तार अमेरिका से जुड़े बताए जाते हैं।सरकार और स्वयं मंत्री जी इकरार करने से इंकार कर रहे हैं पर दूसरे लोग पूरे यकीन से कह रहे हैं कि जासूसी हुई है।गोया कहने वालों को पूरी योजना पता हो ! जो पीड़ित है वह चिल्ला रहा है कि उसे कोई दर्द नहीं है पर भला कुशल-क्षेम के आकांक्षियों को ऐसे तसल्ली मिली है कभी ?

जासूस के क्षेत्र में काम करने वाले इस घटना से बहुत उत्साहित हैं।उनमें अब अपने गोपन-कृत्यों के प्रति अपराध-बोध जैसा कुछ फील नहीं होगा।जिसकी जासूसी की जाएगी अगर वही खुलेआम बयान जारी कर देगा कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है तो फिर किस बात का डर ? इससे सुरक्षा एजेंसियां भी राहत महसूस करेंगी कि यह सब उनके ज़बरदस्त सुरक्षा प्रबंधों का परिणाम है।सरकार यदि ऐसा स्वीकार कर लेगी तो सदन के अंदर और बाहर विशेष बयानों की आवश्यकता होगी जबकि ना-ना करने पर बस ऐसी खबरों का खंडन भर करना होगा।

विपक्ष सरकार को घेरने के प्रयास में पिछले दो महीने से लगा है।एक तरफ जहाँ अब तक विपक्ष के नेता का ही नहीं पता है,वहीँ वह मुद्दे ढूँढने के लिए गूगल-सर्चमें लगा है।अचानक इत्ताबड़ा मुद्दा हाथ आ गया है तो इसे कैसे जाने दे।यहाँ तक कि मामले की गंभीरता को देखते हुए पिछली सरकार में दस सालों से मौन रहे नेता जी भी बोल पड़े ।बढ़ती कीमतों या मंहगाई पर बात करना लोकलमुद्दा है।चूंकि जासूसी का मुद्दा इंटरनेशनल-टचलिए हुए है इसलिए भी इस पर ज्यादा फोकस है।

रही बात जासूसों की,वे हर युग और हर काल में रहे हैं।देवकी नंदन खत्री के उपन्यास चंद्रकांता संततिका कथानक केवल ऐय्यारों यानी जासूसों के दम पर ही सुपरहिट रहा।आज भी क्या हॉलीवुड,क्या बॉलीवुड,सब जगह इनके चर्चे हैं।हाल ही में एक बॉलीवुड अभिनेत्री ने भी जासूस का किरदार बखूबी निभाया है ।यह जेम्स बांड का ही जलवा है कि जासूसी से ज्यादा ज़िक्र उसकी गाड़ी और गर्लफ्रेंड का होता है।पर जासूसी का जो रोमांच राजनैतिक क्षेत्र में होता है,वह आपराधिक क्षेत्र में कहाँ ? ’विकिलीक्सया तहलकाको याद कीजिये,उनकी एलीट-टाइप की जासूसी को सारी दुनिया ने एडवेंचर माना था !

जिसकी जासूसी की जाती है उससे एक बात तो साबित हो ही जाती है कि उस बंदे में दम है।फोन टेप करने और बंगले में ताक-झाँक करने के जमाने लद गए।अब तो भाई लोग खटिया के नीचे ही कुछ अदृश्य-सी वस्तु फिट कर देते हैं जिससे उनकी फैमिली-वीडियोबनती रहती है।अब विरोधियों को इसमें कोई करतूतनज़र आती है,तो कोई क्या करे !

ऐसा भी नहीं है कि हमेशा किसी का विरोधी ही उसकी खैर-खबर लेने या उसकी रणनीति परखने के लिए बगका इस्तेमाल करता हो।कई बार यह काम अपने ही लोग बड़े सुभीते से कर लेते हैं।इससे अपने ही आदमी की चाल,ढाल और वफ़ादारी आसानी से पता हो जाती है।अकसर ऐसे कामों में जासूस कभी फेल नहीं होते,भले ही उन्हें दुश्मन-देश या अपराधियों की गतिविधियों की तनिक भी भनक न मिल सके।

मौजूदा मामला ज़रा अलग किस्म का है।सरकार इस तरह की जासूसी को सिरे से नकार रही है।वह यह कैसे मान ले कि उसके रहते यह काम दूसरों के द्वारा अंजाम दिया गया है।इससे तो गलत सन्देश जाएगा।हमें तो लगता है कि ऐसी सरकार या मंत्री ही नाकारा है जो जासूसी के योग्य नहीं है।फिर भी,विपक्ष की संजीवनी के लिए ही सही,सरकार को यह बात मान लेनी चाहिए।इससे सरकार की अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग में भी ज़बरदस्त उछाल आएगा।



मंगलवार, 29 जुलाई 2014

बदलाव देखना है गर तो नज़र पैदा कर !

आम आदमी फ़ोकट में परेशान है जबकि सरकार हमेशा की तरह मंहगाई की तरफ़ से बेफिक्र है।उसे कथनी-करनी का फर्क बखूबी पता है।बढ़ती मंहगाई केवल चैनलों और अख़बारों में है।धीरे-धीरे यह वहाँ से भी हट जाएगी।इसके लिए प्रयास प्रारम्भ भी कर दिए गए हैं।धर्म और संस्कृति के बहाने किताबों में इतिहास के पुनर्लेखन की बात हो रही है।अब देश की सबसे बड़ी समस्या यही है।इसलिए विशेषज्ञ इस पर चिंतन में जुट गए हैं।उनके लिए आलू और टमाटर के बारे में सोचना ‘चिरकुटिया-चिंतन’ की श्रेणी में आता है।

आम आदमी अपने खाली थैलों को भर निगाह देख भी नहीं पा रहा है।उसका सब्जी का मासिक खर्च न्यूनतम हो गया है।ऐसे में हर महीने उसकी अच्छी-खासी बचत हो रही है।यह बात उसे अभी नहीं कुछ दिन बाद पता चलेगी जब उसका बैंक-बैलेंस भारी और शरीर हल्का हो जायेगा।इस अनोखे योग से अपनी देह को स्लिम करने के लिए उसके जिम का खर्चा भी बच गया।इससे अच्छे दिनों की उम्मीद तो उसे भी नहीं थी।योग वाले बाबा भी इसलिए इन दिनों गायब हैं।ऐसी सरकार में उनके योग के बिना ही आम आदमी अनुलोम-विलोम में जुटा है।बाबा भी नया सेक्टर तलाश रहे हैं।

कुछ लोग आम आदमी को बरगलाने में लग गए हैं।अजी,ढाई महीने हो गए और उसके हाथ में आया क्या ? पड़ोसी देश से फायरिंग अभी भी बंद नहीं हुई है।हमारे भूभाग को गलत नक़्शे में दिखा दिया गया है।ऐसे बेतुकी बातों को सुनकर आम आदमी बिंदास है।उसे पता है कि ये सब बुरे दिनों की खबरें हैं।उसको ‘अच्छे दिनों’ के नायक पर पूरा भरोसा है।लाल होते टमाटर और बढ़ते आलू पर वक्तव्य देना अब उनके जैसे पद वाले को शोभा भी नहीं देता।यह गली-मुहल्ले के विक्रेता और स्थानीय सट्टेबाज की मिलीभगत का मामला भर है।

देश आलू-टमाटर से कहीं बड़ा है और उससे भी बड़ा मसला है हमारे गौरव का।बच्चों के लिए स्कूल या अध्यापक भले न हों पर पाठ्य-पुस्तकों में हमारे अतीत का बखान ज़रूर हो।सरकार का सारा फोकस अब इसी ओर होना चाहिए।मंहगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे तो स्वतः निपट जायेंगे जब धर्म और संस्कृति पर खतरा दिखाया जायेगा।रही बात बदलाव की,तो इतनी जल्दी गज भर की जुबान बन्द हो गई,ये क्या कम बड़ा बदलाव है ?

हिन्दुस्तान में 29/07/2014 को।

गुरुवार, 24 जुलाई 2014

सांसदों के लिए नया मेन्यू !

बड़े दिनों बाद एक अच्छी खबर आई है।चुनाव बाद थके-हारे,भूखे-प्यासे लोगों पर आखिरकार संसद की कैंटीन मेहरबान हुई है।कैंटीन में वर्षों से रोटी-दाल या कढ़ी-चावल जैसा देसी और उबाऊ खाना परोसा जाता रहा है।मेनू में शामिल ऐसी चीज़ें व्यंजन की श्रेणी में भी नहीं आतीं ।नेताजी को असली तृप्ति तो अब जाकर मिलेगी,जब वे चिकन-करी,ग्रिल्ड-फिश,कश्मीरी राजमा और छोले-भठूरे खाकर पूर्ण-तुष्टि की डकार भरेंगे।इस तरह मंहगाई से निपटने में संसद की कैंटीन एक मिसाल बन सकती है।जो भी अच्छी शुरुआत होनी है,तो क्यों न देश के गर्भ-गृहसे हो,यही सोचकर यह सराहनीय फैसला लिया गया है।

अब जब नए और शाही व्यंजन कैंटीन में आ गए हैं तो उनका जमकर लुत्फ़ उठाया जा सकेगा।भरे-पेट होने के अपने अलग फायदे हैं।जुबान और पेट के तुष्ट होने के बाद इनकी कार्य-प्रणाली वैसे भी सुस्त हो जाती है।इसका सीधा फायदा संसदीय कार्यवाही पर पड़ता है।ऐसे में सदन में न ज्यादा शोर-शराबा होगा,न कड़वाहट और न ही ज्यादा उछल-कूद।लोग अपनीअपनी सीटों में मस्त होकर पड़े रहेंगे।इस बीच सही मौका देखकर सत्ताधारी-दल अपने आवश्यक बिल पास करवा लेगा।ऐसे में कैंटीन के छोटे-मोटे बिल यदि सरकार के बड़े बिलों में अपना योगदान करते हैं तो इसमें बुरा क्या है ?

इसका एक उजला पक्ष यह भी है कि संसद की कैंटीन से तरह-तरह के सुस्वादु भोजन करने के पश्चात संसद-सदस्य सदन में बढ़ती मंहगाई और बढ़ते बिजली-बिल पर धारदार चर्चा कर सकेंगे।कैंटीन के मेनू में दक्षिण का इडली-सांभर-डोसा और इतालियन पिज्जा-बर्गर को भी शीघ्र समाविष्ट करना चाहिए।यदि गुजराती ढोकला-खांडवी,इन्दौरी-पोहा और पंजाबी-पराठा भी मेनू में आ जाँय तो संसद में उपस्थिति का प्रतिशत अपने-आप बढ़ जायेगा।देश के अधिकतर खाने वाले यदि कैंटीन में ही भर-पेट हो लेंगे,तो देश के अन्य भागों में,खासकर संसद के बाहरी इलाकों में खाने की डिमांड कम होगी।इससे मंहगाई में स्वतः कमी दर्ज हो सकती है।

फ़िलहाल,संसद की कैंटीन गुलजार है और माननीय वहीँ जीम रहे हैं।वैसे भी सदन के अंदर छत टपकने से उधर जाने और नहाने का कोई प्रोग्राम नहीं है।सही समय पर कैंटीन के मेनू में बदलाव किया गया है।सदन के अंदर कुरता-फाड़ने और भीगने के अंदेशे से अच्छा है कि मामूली रकम में भर-पेट भोजन किया जाय।सोने के लिए सदन में वैसे ही मनाही नहीं है इसलिए बिना घोड़े बेचे मंहगाई पर ज़रूरी चिंतन भी हो सकेगा और कैंटीन के व्यंजनों पर ढेर सारा विमर्श भी।



बुधवार, 23 जुलाई 2014

सूखे और भूखे पर नज़र !

नई सरकार के नए बजट ने सबका ध्यान रखा है।इसमें भूखे और सूखे पर ख़ास तवज्जो दी गई है। काले बादल भले ही बरसने से चूक गए हों,पर उजली सरकार तो जनता की है ना,उसे तो हर हाल में बरसना ही है।भले ही उसकी जेब खाली हो,पर बजट में हर सेक्टर को करोड़ों रुपए बाँटने का ऐलान किया गया है।भूखों के लिए यह आयोजन तपते जेठ में सावन की फुहार-सा आया है।रही बात धनराशि की,तो सरकारी योजनाओं के लिए पैसा कभी कोई समस्या रही ही नहीं ।उसके पास इससे निपटने की एक से एक नायाब स्कीमें मौजूद होती हैं।जब सरकार खुद ही जोर-जोर से पी-पी-पीचिल्ला रही हो तो उसके आवाहन को जनहित में लगीं मंगलकारी संस्थाएं कब तक और क्योंकर अनसुना कर पाएँगी ? देखिएगा,जल्द ही देशी-विदेशी कम्पनियाँ जनता के ऊपर ऐसी मूसलनुमा बारिश करेंगी कि सबकी सनातन-भूख  मिनटों में फुर्र हो जाएगी ।

कुछ लोग मौसम से नाराज हैं,पर मौसम कोई सरकार तो नहीं है जो मौका पड़ने पर किसी दूसरे से हाथ मिला ले।अगर ऐसा सम्भव हो जाए तो मुंबई और असम के बादल दिल्ली शिफ्ट हो जाएँ।ऐसा होने पर सरकार भी खाली हाथ हो जाएगी ।फिर सूखे के नाम पर बनने वाली उन राहत-योजनाओं का क्या होगा जिनसे कइयों को वास्तविक राहत मिलती है।रिक्त आपदा राहत कोषकी सुध कौन ले पाएगा,लेकिन फ़िलहाल ऐसा कुछ गजब नहीं हुआ।सूखे को लेकर देश के अंदर विशेष चिन्तन चल पड़ा है। कई सूखा-निवारक-पत्रतो राजभवन की ओर प्रेषित भी कर दिए गए हैं ।

सरकार इस संभावित विपदा पर पूरी तरह से देश के साथ है या कहिये उसके इंतजार में है।चिंतन के लिए माहौल का अनुकूल होना बहुत आवश्यक है।इसके लिए पचासेक वातानुकूलित यंत्रों से लैस आवासों की व्यवस्था की जा सकती है ताकि चिन्तन के बीच में कोई बाधा उत्पन्न न हो सके ।आम आदमी को एक पंखा चलाने और दो लट्टू जलाने के लिए बिजली किस तरह मुहैया कराई जाए,इसके लिए चिंतकों के टॉयलेट को भी वातानुकूलित बनाना पड़ता है।इस संदर्भ में महत्वपूर्ण तथ्य है कि वास्तविक चिंतन और मौलिक आइडिये अकसर वहीँ से निकलते हैं।ऐसे में उनका और देश का सूखा दोनों एकबारगी निपट जाते हैं।

मौसमी बारिश को लेकर सरकार कतई चिंतित नहीं है।उसके अपने हाथ में बादलों की पूरी एक टोली है जो रक्षा,रेल और सड़कों पर झमाझम बरसने को तैयार है।उधर निमन्त्रण का सूखा भी खत्म हो गया है।अंकल सैम ने वह दावतनामा भेज दिया है,जिसका वर्षों से इंतजार था।फिर भी यदि बरसाती बादलों ने सूखा राहत योजनामें अड़ंगा लगाने की कोशिश की तो उस योजना के नामपट्ट को बाढ़ राहत योजनामें तब्दील करने का बैक-अप प्लान भी तैयार है.कुल मिलाकर आम आदमी सरकारी राहत से बच नहीं सकता. इसी उम्मीद पर अधिकारी मौसम की ओर से बेपरवाह हैं.भूखे और सूखे का यह तालमेल निरंतर और चिर-काल तक बना रहे,इसी में उनका और उनके परिजनों का भला है ।रही बात आम आदमी की,सो वह सूखे खेत पर खड़े होकर आसमान की ओर ताके ,ईश्वर उसका भी भला करेगा !


शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

दो-नम्बरी बनने की दौड़ !


डीबी स्टार ,भास्कर में 18/07/2014 को प्रकाशित



हमारे यहाँ कला,खेल,शिक्षा हर जगह नम्बर एक बनने की होड़ लगी रहती है।लोग अव्वल नम्बर के लिए दिन-रात एक कर देते हैं,मगर राजनीति का क्षेत्र सबसे अलहदा है।दिन-प्रतिदिन यहाँ नए प्रयोग होते रहते हैं।सत्ता के समीप वाली राजनीति अजब-गजब खबरों से हमारा मनोरंजन करती रहती है।जहाँ सब जगह नम्बर एक होने की मारामारी है,वहीँ सरकार में नम्बर दो कौन है,इस पर भीषण विमर्श चल रहा है।कोई भी आम आदमी ‘नम्बर-दो’ नहीं बनना चाहता क्योंकि ‘दो-नम्बरी’ को सभ्य समाज में भली नजरों से नहीं देखा जाता।चूंकि मामला,सत्ता और उसकी हनक का है,इसलिए लोग दो-नम्बरी बनने के लिए लहालोट हो जाते हैं।

ऐसा नहीं है कि सरकार में एक नम्बर के पद की डिमांड नहीं होती लेकिन इसकी दौड़ में शामिल होने के लिए विशेष अर्हता होनी चाहिए।कई बार इसके लिए ख़ास कुल का होना ज़रूरी होता है तो कई बार वर्षों से ज़बरिया जमे-जमाये बुजुर्ग को धकेलना।नम्बर एक बनने का काम इतना तकनीकी,कूटनीतिक और जनतांत्रिक होता है कि ‘ड्राइंग-रूम’ पॉलिटिक्स करने वाले इसमें अपना सर खपाते ही नहीं।उनको आशंका होती है कि ऐसी कोशिश करने पर कहीं पूरा पत्ता ही न साफ़ हो जाय ! इसलिए बेचारे नम्बर-दो की दौड़ में खुद को आगे ले आते हैं।इसमें वे अनुभवी लोग बाजी मार ले जाते हैं जो अख़बारों के माध्यम से अपने नम्बर-दो होने की खबरों को योजनाबद्ध ढंग से प्लांट करवाते हैं।इससे भी काम नहीं बनता तो पिछले दरवाजे से खूब सिफारिश लगवाई जाती है,गोया ‘दो-नम्बरी’ बनते ही उनकी कार्य-क्षमता खुद-ब-खुद बढ़ जाती हो !

‘दो-नम्बरी’ और ‘दस-नम्बरी’ का लेबल किसी के लिए अच्छा नहीं माना जाता पर सत्ता की बात हो,तो ‘दो-नम्बरी’ किसी मायने में अव्वल नम्बर से कम नहीं होता।’दो-नम्बरी’ हमेशा मनाया करता है कि पहले नम्बर वाला अपना अधिकतर समय देश के बाहर ही गुजारे ताकि वह भी देश और समाज की सेवा अधिकृत ढंग से कर सके।ऐसा मौका आने पर नौकरशाहों और मीडिया से उसकी अच्छी-खासी पहचान हो जाती है।इससे भविष्य में उसके नम्बर एक बनने का दावा अपने आप पुख्ता हो जाता है।ख़ास बात है कि नम्बर-दो के बाद की स्थिति के लिए कोई मारामारी नहीं है,सो यहाँ दस-नम्बरी को पूछने वाला कोई नहीं होता।

उम्मीद की जाती है कि सरकार में ‘नम्बर-दो’ का मसला जल्द ही तय हो जायेगा।यह जितनी जल्दी हो सके उतना देश के लिए हितकर होगा क्योंकि इसके बाद चीन और पाकिस्तान के साथ मसले सुलझाने हैं,मंहगाई और भ्रष्टाचार पर लगाम लगानी है और पूरे पाँच साल सरकार भी चलानी है।


बुधवार, 16 जुलाई 2014

आतंकवादी भाई से इंटरव्यू !



देश के एक बड़े पत्तरकार ने एक बड़े आतंकवादी भाई से साक्षात्कार लेकर बड़ा दुस्साहस का काम किया है।जिस आतंकवादी के नाम से सरकारें तक काँपती हैं,उससे लोहा लेकर उस पत्तरकार ने पूरी बिरादरी का नाम गर्व से ऊँचा कर दिया है।यह साक्षात्कार सुरक्षा कारणों और देशहित में बड़े ही गुपचुप तरीके से लिया गया था।कुछ जल्कुक्कड़-टाइप लोगों की हरकतों से इस ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवादी अभियान’ में पलीता लगाने की कोशिश की गई है।बजरिये विकिलीक्स,देशहित में इस इंटरव्यू को लीक किया जा रहा है,जिसकी जिम्मेदारी केवल और केवल ‘केबल-वायर’ की होगी।प्रस्तुत है पत्तरकार और आतंकवादी भाई के इंटरव्यू के चुनिन्दा अंश :


पत्तरकार:बड़ी दूर से आए हैं,प्यार का तोहफा लाए हैं !


आतंकवादी :आइए,आइए ! हम ऐसे ही तोहफों के ‘रिटर्न-गिफ्ट’ देने के लिए जाने जाते हैं।हमको लगता है कि आप हमारे पिछले तोहफों से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।


पत्तरकार :देखिए भाई जी,हम तो शांति और अमन के पुजारी हैं।आप जो भी करते हैं वो आपका जिहाद है,हमें उस पर अधिक नहीं कहना।हम तो बस आपसे इतना रिक्वेस्ट करने आये हैं कि आप अपने गिफ्ट में हमें थोडा-सा डिस्काउंट दे दें।


आतंकवादी : हम कोई मौसमी-सेल नहीं ऑफर करते।हमारे लड़के अपना काम पूरा करते हैं।उसमें हमारी गौरमिंट कुछ नहीं कर सकती फिर हम दुश्मन देश की बात क्यों मानेंगे ?


पत्तरकार : भाई जी,आप तो बुरा मान गए ! हम तो यह गुजारिश कर रहे हैं कि अब हमारे यहाँ वही सरकार है जिसने आपको चांदनी चौक की जलेबियों के साथ कंधार में छोड़ा था।वो अब आपसे बस थोड़ा-सा डिस्काउंट चाहते हैं जिससे वो अपने विरोधियों पर भारी पड़ सकें।


आतंकवादी :तो क्या आप सरकार की तरफ से आए हैं ?


पत्तरकार :ना जी तौबा ! यह तो हम सद्भावना-मिशन के तहत स्वयं ही आए हैं।अब जब किसी तरह से देश में इत्ती अच्छी सरकार आ गई है तो लम्बे समय तक बरक़रार रहे,यह हमारा मूल धर्म और कर्तव्य है।हम आइन्दा आपकी भी शरीफ-टाइप भेंट करवाने पर काम कर सकते हैं।दरअसल,हम मिलजुलकर काम करने के हामी हैं।


आतंकवादी:पर आप तो किसी बाबा के साथ जुड़े हैं,उन्हें तो ऐतराज नहीं होगा ?


पत्तरकार :हमारे बाबा लोगों को योग सिखाते हैं और उसमें शीर्षासन एक प्रमुख आसन है।बाबा खुद इसमें सिद्धहस्त हैं।उनके लिए कोई सरकार नहीं बल्कि विश्व का बढ़ता बाज़ार ज़रूरी है।अब विश्वबंधुत्व के लिए ग्लोबल तो होना ही पड़ता है।वे आपके नेटवर्क से बहुत प्रभावित हैं।आप अपने देश में खुलेआम उपदेश देते हैं और सरकारी सुरक्षा भी पाते हैं।यही उन्हें भी चाहिए।वैसे भी ‘राम लीला मैदान’ वाली सरकार अब नहीं रही।यह वाली तो बाबा के प्रताप से ही बनी है।इसलिए हमें उम्मीद है कि आप हमारे अनुरोध को अन्यथा न लेंगे।


आतंकवादी :ठीक है,हम कोशिश करते हैं।भविष्य में यदि कोई भी आतंकवादी घटना होती है तो उसके लिए हमें बिलकुल न दोष दिया जाए।उसके बाद हम धीरे-धीरे अपने प्रोजेक्ट्स में डिस्काउंट दे सकते हैं।लीजिये,अब आप खीर खाइए और थोड़ी-सी हमारे हमदर्दों को भी लेते जाइए।


पत्तरकार :जी बहुत बहुत शुक्रिया।


इस तरह बेहद खुशनुमा माहौल में बातचीत समाप्त होती है।वे अपने मिशन से लौट आते हैं।पत्तरकार जी का खीर से भरा कटोरा कहाँ गायब हो गया,अभी इसकी खबर किसी को नहीं है।


 
जनसन्देश टाइम्स में 16/07/2014 को

बुधवार, 9 जुलाई 2014

वैनिटी-बॉक्स का इंतजार !

गरीबी रेखा आज संसद भवन के पास ही मिल गई।उसका मूड चढ़ते सेंसेक्स की तरह खिला हुआ था।हमने उसके यूँ उछलने का कारण पूछा तो हुलसकर बोली,’हमारी रेटिंग में जबरदस्त उछाल हुआ है।गाँव हो या शहर,सब जगह हमने ‘अबकी बार-इफेक्ट’ से अभूतपूर्व वृद्धि की है। गाँवों में जहाँ हम 27 से 32  पर पहुँच गए वहीँ शहरों में 33 से 47 रूपये पर।इससे पाँच रुपए की थालियाँ और ज्यादा हासिल हो सकेंगी। गरीबों ने पहली बार किसी मामले में रिकॉर्ड बेहतर किया है ,इसीलिए हमारी ख़ुशी संभाले नहीं संभल रही है।’
‘पर ये तो गणितीय आंकड़े भर हैं।हमें तो देश जस का तस दिख रहा है।पिसने वाला अभी भी पिस रहा है और कूदने वाला लम्बी छलाँगें भर रहा है।’ हमने अपनी गंभीर चिंता जताते हुए कहा ।गरीबी रेखा ने तुरंत पलटवार किया,’आप जैसे लोग नहीं चाहते कि हमारा नामोनिशान रहे,यह तो सरकार की कृपा है जो हमें बचाए और बनाये हुए है।हमारे अस्तित्व पर ही विपक्ष का कैरियर दाँव पर लगा है।अगर हम न हों,तो सोचिए,इन सबका क्या होगा ? आप जैसे समृद्ध और आर्थिक विशेषज्ञ नहीं चाहते कि हम आंकड़ों में भी बचे रहें।हम न होंगे,फिर आप सब किस पर चर्चियांयेंगे ?’
बात को ज्यादा उलझते देखकर हमने अगला सवाल सामने धर दिया,’नई रपट बताती है कि देश के अंदर गरीबों की संख्या में भारी उछाल आया है पर आपकी ‘प्राइस वैल्यू’ बढ़ा दी गई है।इससे भविष्य में गरीबों के अल्पसंख्यक होने का खतरा नहीं पैदा हो गया ?आपके बने रहने के लिए बुरे दिन ही ज़रूरी हैं।ऐसे अच्छे दिनों में आप कैसे सर्वाइव कर पाएँगी ? ’ गरीबी रेखा पहले से और आश्वस्त होती हुई बोली,’आप इस बात से निसाखातिर रहें।जब तक हमारे माँ-बाप,मंहगाई और भ्रष्टाचार,पूरे दम-खम के साथ जिंदा हैं,हम बने रहेंगे,हमारा कुनबा बढ़ता रहेगा।अंदर की बात यह है कि हमारे बने रहने से समाज और सरकार के सभी पक्षों को प्राणवायु मिलती है।वैसे भी अमीर भाई इन छोटे-मोटे आंकड़ों से बेफिक्र रहते हैं।यहाँ तक कि इन्हीं आंकड़ों की बदौलत कइयों की वार्षिक-योजना बनती है।इसलिए हमारा होना सबकी प्राथमिकता में है।हम दोनों की तुलना ही बेमानी है।हमारी विकास दर इकाई-दहाई की रेन्ज में होती है जबकि उनकी करोड़ों-अरबों में,पर देखिये आंकड़े हमारे ही भारी पड़ते हैं।लोग चुनावी घोषणापत्र में किये गए वायदों को भूलकर हमारे आंकड़ों में उलझ जाते हैं।इससे सरकार व विपक्ष सभी को राहत मिल जाती है और चैनलों पर विशेषज्ञ भी बहसियाने लग जाते हैं।‘
यह बातचीत जारी थी,तभी देश के खर्चे का बोझ लादे वित्तमंत्री जी आते दिखाई दिए।गरीबी रेखा उनके साथ ही संसद भवन के अंदर प्रविष्ट हो गई।हो सकता है उसे वित्त मंत्री के भारी-भरकम सूटकेस से इस बार अपने लिए वैनिटी-बॉक्स निकलने का अंदेशा हो गया हो ! पर इधर हमारे विश्वस्त सूत्रों ने बिलकुल इसके उलट खबरें दी हैं।उनका कहना है कि नए मंत्री जी ने अपने बक्से में गरीबों के रंग-रोगन से ज्यादा उनके फर्स्ट-ऐड का सामान भरा है।अब उसमें से यदि कड़वी दवा निकलती है तो यह उनका दुर्भाग्य है।

'प्रजातंत्र लाइव' में 09/07/2014 को.

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

अबकी बार ‘मंतरमार’ सरकार !

लोगों को उम्मीद थी कि उनके आते ही मँहगाई और भ्रष्टाचार छूमंतर हो जायेंगे,पड़ोसी देश थर-थर काँपने लगेंगे,बलात्कारी और कुसंस्कारी ढूंढें से भी नहीं मिलेंगे पर सब कुछ उल्टा हो रहा है।जिस जनता ने राहत के लिए नई सरकार का मुँह ताका था,वो खुद अपने लिए ‘हनीमून-पैकेज’ की माँग कर रही है।काम करने के लिए पूरी ज़िन्दगी पड़ी है।जो पाया है उसको भोगने का भी तो हक़ होना चाहिए।इसलिए प्राथमिकतायें बदल गई हैं। ’स्किल्ड’ नेतृत्व की यही विशेषता है कि समय के अनुसार स्वयं को ढाल ले,नहीं तो ढलने में ज्यादा वक्त नहीं लगता।

लोग बड़े नादान हैं।अभी महीना भी ना हुआ और वो मानसून की तरह ‘अच्छे दिनों’ की ओर टकटकी लगाये देख रहे हैं।जब मानसून कभी ‘टैम’ पर नहीं आया,तो सरकारी-बारिश कैसे परम्परा तोड़ सकती है ? अभी तो उनके लोग प्रशिक्षण-शिविरों में घुसे हैं,सरकार चलाने के ‘मंतर’ पा रहे हैं।वे ठीक तरह से सीख-साखकर बाहर निकलेंगे तभी जनसेवा का वास्तविक कार्यक्रम शुरू हो पायेगा।

वे सरकार की अगुवाई कर रहे हैं तो उसे चलाने का नुस्खा भी उन्हें मालूम है।’एक चुप,हज़ार सुख’ का सुफल उन्हें बखूबी पता है।इस बाबत उन्हें पुरानों से नहीं नए-नवेलों की तरफ़ से खटका है।उनको ठीक तरह से समझा दिया गया है कि मंहगाई और भ्रष्टाचार को दिल से लगाने की ज़रूरत नहीं है।कुछ भी कहने के पहले उन्हें अपने पूर्ववर्तियों का हश्र याद रखना होगा।पाँच रुपए और बारह रुपए की थाली परोसने वाले आज खुद कटोरा लिए घूम रहे हैं।इसलिए सौ बातों की एक बात है कि चुप मार कर बैठें,थोड़े दिनों में जनता अपने आप मन मार कर बैठ जाएगी।

सरकार से ‘अबकी बार चमत्कार’ की उम्मीद करने वाले अभी पूरी तरह नाउम्मीद नहीं हुए हैं।उनको लगता है कि किसी दिन बीजिंग को बिहार के नक्शे में दिखाकर और एक सिर के बदले दस सिर लाकर ‘अबकी बार टक्करदार सरकार’ का सफल प्रदर्शन होगा।रही बात मंहगाई और भ्रष्टाचार की,सो वे सब पिछली सरकार की उपज हैं और इन्हें खत्म करने में 67 साल से कुछ अधिक समय तो लगेगा ही।यह कम ‘अच्छे दिन’ हैं क्या कि अबकी बार सरकार खुद जनता से राहत माँग रही है और उससे बचने-निपटने के लिए अपने लोगों को ‘मंतर’ बाँट रही है !

'डेली न्यूज़ ' जयपुर में 04/07/2014 को प्रकाशित

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

ज़रूर आएँगे अच्छे दिन !


आज बहुत दिनों बाद अच्छेलाल जी दिखाई दिए।हम कबसे उनसे मिलने की फ़िराक में थे पर वो थे कि पकड़ में ही नहीं आ रहे थे।आज भी हमें देखकर उन्होंने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी थी पर हम भी ठहरे पूरे घामड़,सो दौड़ लगाकर उन्हें धर ही लिया।अच्छेलाल जी हमें पास पाकर हल्के से मुस्कराए और हम कुछ कहते कि उससे पहले ही बोल पड़े,’इस समय बहुत जल्दी में हूँ।पहली फ्लाइट पकड़नी  है।आप तो हमारे अपने हैं,कभी भी मिल लेंगे।’
हमने भी आव न देखा ताव, जवाबी हमला बोल दिया,’जल्दी में तो हम भी बहुत हैं भाई ! आपने ही थोड़े दिन पहले नगाड़ा बजाकर ऐलान किया था कि आपके आने भर से ही अच्छे दिन आने वाले हैं पर मुए दिन तो पहले से और खराब हो गए।अब आप अच्छे दिनों के इंतजार को ‘अच्छे सालों’ में कन्वर्ट कर रहे हैं।इससे ज्यादा बुरे दिन क्या होंगे कि हमेशा बोलते रहने वाले आपने अपने होंठ सी लिए हैं।हम तो आपके पहले वाले हैं ,फिर भी मिलने से क्यूँ कतरा रहे हैं ?’
अच्छेलाल जी अचानक गम्भीर हो गए।सड़क किनारे बनी पुलिया में ही बैठ गए और हमें भी बैठने का इशारा किया।आसमान की ओर देखकर गम्भीर हो गए और कहने लगे,’मौसम और नेता बहुत बेचारे होते हैं।इन्हें अपने बदलाव का स्वयं भी पता नहीं चल पाता।मौसम कब गर्म होकर बरसने लगे  और नेता कब बेशर्म होकर पलटने लगे ,यह किसी को नहीं पता।मौका देखकर कदम उठाने पड़ते हैं।अच्छे दिनों के लिए आप नाहक परेशान हैं।बीमारी बहुत बड़ी है यह  हम जानते थे पर उसकी दवा कड़वी होगी,यह बाद में पता चला।अब इस काम में कुछ महीने या साल तो लगेंगे ही।युग-परिवर्तन करना है तो युगों तक का भी समय लग सकता है ।इतना इंतजार तो बनता है जी।’
हम अब भी ढीले नहीं पड़े थे।अगला सवाल दाग दिया ‘क्या आपको पहले नहीं पता था कि बीमारी की दवा कड़वी होती है ? अगर आप पहले से बताकर रखते तो हम अपने मुँह को एडवांस में चीनी की बोरियों से पाट देते पर अब तो वह भी कड़वी हो गई है ।ऐसे में तो हमें बुरे दिन ही अच्छे लगने लगे हैं।’
अच्छेलाल जी अचानक खड़े हो गए;कहने लगे,’देखिये हमें दवा के स्वाद का पता तो तब चलता जब हम इसे चखते।हमारी मुश्किल है कि हमें ऐसी कोई बीमारी ही नहीं होती जिसमें ये कड़वी गोलियाँ खानी पड़ें।कुर्सी पाते ही बाय डिफ़ॉल्ट हम दुनिया भर की बीमारियों और दुःख-दलिद्दर से दूर हो जाते हैं।आप ऊपर वाले पर भरोसा रखें,अच्छे दिन ज़रूर आयेंगे।वैसे भी, बड़ी आफत आने के बाद पिछली वाली आफत राहत जैसी लगती है।इसी फार्मूले पर हम लगातार अमल कर रहे हैं।’

इतना कहकर अच्छेलाल जी धूल उड़ाते हुए अपनी नई जगुआर से एयरपोर्ट की तरफ भागे।हम वहीँ सड़क पर खड़े होकर शाम वाली बस का इंतजार करने लगे, पर दूर-दूर तक कोई भी बस दिखाई नहीं दे रही थी।

'प्रजातंत्र लाइव' में 01/07/2014 को प्रकाशित