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बुधवार, 31 अगस्त 2016

कृपया ड्रोन साथ लेकर आएं !

दुनिया के महाबली विदेश मंत्री जॉन कैरी साहब ख़ास गुफ्तगू के लिए भारत दौरे पर आए।एयरपोर्ट से होटल के रास्ते में ही उनकी गाड़ी रुक गई।आगे-पीछे केवल गाड़ियाँ दिख रही थीं।कैरी ने अपने सहयोगी से कहा-मि. मोदी हमारा इतना स्वागत कर रहे हैं।इतना एस्कॉर्ट तो हमारे प्रेसिडेंट के लिए भी नहीं होता।उनसे कहो,हम पाकिस्तान को सबक सिखा देगा पर अब हमें होटल पहुँचने दें।पास बैठे एक वरिष्ठ अफसर ने बताया कि सर यह भारतीय जाम है।कैरी बोले-भई,उन्हें समझाओ।मैं दिन में नहीं पीता।’

एक भारतीय अफसर उनकी बातचीत सुन रहा था।शायद ख़ुफ़िया विभाग का था।उसने डिटेल में समझाना शुरू कर दिया,’सर थोड़ी देर पहले रुक-रुक कर बारिश हो रही थी।आपको रुक-रुक कर ही होटल तक पहुँचना होगा।’

‘तो क्या हमारा स्वागत रुक-रुक कर होगा ?’कैरी से न रहा गया। ‘जी जनाब।जैसे पाकिस्तान की सहायता रोक-रोक कर पूरी दे दी जाती है ,वैसे ही यहाँ स्वागत रिलीज किया जाता है।क्या करें,यह हमारी परिपाटी है।’

आखिर दो घंटे बाद कैरी अपने होटल पहुँच गए।रास्ते में जाम के स्वागत से इतने अभिभूत हो चुके थे कि मुँह से बोल नहीं फूट पा रहे थे।अमेरिका से आई कोई भी कॉल वे अटेंड नहीं कर सके।व्हाइट हाउस में हड़कंप मच गया।तुरत-फुरत ओबामा जी ने मोदी जी से हॉटलाइन पर बात करनी चाही।इधर से संदेश दिया गया कि वे अगली ‘मन की बात’ का एजेंडा तय कर रहे हैं।उन्होंने किसी वरिष्ठ मंत्री से उनकी बात करवाने को कहा।

पर्यटन मंत्री जी वहीँ बैठे सैलानियों के ड्रेस-कोड को सेट कर रहे थे।ओबामा जी से वही मुखातिब हुए।बोले-सर क्या बात है ?ओबामा-हमारे विदेश मंत्री कहाँ हैं?हमें उनकी खबर नहीं मिल रही है।’

बस,इत्ती-सी बात ! अभी हमने भी टीवी पर खबर देखी है।वे दो घंटे तक जाम में थे,अब होटल में आराम कर रहे हैं।’मंत्री ने आश्वस्त किया।


ओह माय गॉड ! पर आपके यहाँ इतना समय जाम में खराब होता है ?


‘सर अगली बार कैरी सर को कहना कि अपने साथ एक ड्रोन कैरी करते आयेंगे।जाम से निपटने में आसानी होगी।’मंत्री ने समाधान प्रस्तुत कर दिया था।

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

पचहत्तर पार का पराक्रम !

वे बड़े मजे से जनसेवा में रत थे।जनता को भी उनसे कोई व्यक्तिगत तकलीफ़ नहीं थी।अपने विरोधियों को मात देकर वे कुर्सी पर काबिज हुए थे और लगातार इस पर बने रहना चाहते थे।उन्होंने किसी के आगे सरेंडर नहीं किया था पर नामुराद कलेंडर ने धोखा दे दिया।अचानक उन्होंने पचहत्तर की ‘फिनिश लाइन’ पार कर ली।विरोधी खुश हुए कि वे ढल गए पर यह उनकी भूल थी।उन्होंने अभी तक अपनी मौलिक प्रतिभा संरक्षित कर रखी थी।वही काम आई।वे फिर से काम पर लग गए मंत्री से लाट-साहब बनकर।इस तरह सरकार ने प्रतिभा-पुंज बुझने से पहले उसमें और तेल डाल दिया।लालबत्ती फिर से भभकने लगी।

प्राचीन समय में हमारे यहाँ व्यवस्था थी कि पचहत्तर पार होते ही व्यक्ति वानप्रस्थ चला जाता था।वो माया-मोह से रहित होकर केवल भजन-कीर्तन में तल्लीन रहता था।र है।सरकार ने उसी से प्रेरित होकर वानप्रस्थ-योजना लागू की है।लाभार्थी इस योजना का स्वागत भी कर रहे हैं।वे सत्ता-भजन के लिए काला-पानी जाने को तैयार हैं।

सरकार की पूरी कोशिश है कि वे ऐसे लोगों का पुनर्वास करे,फिर भी कुछ लोग रह जाते हैं।उनको उम्मीद है कि वे प्रतीक्षा-सूची को नष्ट कर जल्द ‘री-एम्प्लायड’ हो सकेंगे।पचहत्तर पार का राजनेता खूब पका और घुटा हुआ होता है।उसको काम पर न लगाया जाय तो वह कुछ नहीं,बद्दुआ का पराक्रम तो रखता ही है।एक काम करती सरकार बड़े-बूढ़ों को कम से कम आशीर्वाद लायक तो समझती ही है।उनके पुनर्वास से पार्टी और सरकार दोनों का भला होता है।रही बात जनता की,सो वह अपना भला करने के लिए आत्मनिर्भर है ही।

पचहत्तर पार के नेता खुद चलने या सरकार चलाने के काम के भले न हों पर उम्मीद के प्रतीक-पुरुष हैं।सरकार उन्हें ‘लाट-साहब’ बनाकर यह संदेश देने में सफल है कि ‘सरकारी आदमी’ कभी रिटायर नहीं होता।सेवा ही उसका जीवन है।इस कृत्य से उसे यदि वंचित किया गया तो राजनीति वरिष्ठविहीन हो जाएगी।समय गवाह है कि साहित्य और राजनीति में वरिष्ठों ने सबसे अधिक ‘पदक’ बटोरे हैं।इसलिए पचहत्तर पार के लाट साहब जंगल में भी मंगल मना रहे हैं।

बुधवार, 15 जून 2016

सरकार की कार और काग के भाग !

भाग केवल आदमियों के ही नहीं खुलते।पक्षियों में अपशकुन का प्रतीक कौआ भी भाग्यशाली हो सकता है।रसखान ने इसका सबूत देते हुए कहा भी है ‘काग के भाग बड़े सजनी,हरि हाथ से ले गयो माखन-रोटी’।पर तब की बात अलग थी।अब एक कौए के हाथ रोटी के बजाय नई कार लगी है।एक मुख्यमंत्री की नई-नवेली गाड़ी पर उनके बैठने से पहले काला कौआ बैठ गया।बिलकुल लालबत्ती के पास।सरकार को कार में शनिदेव दिखाई दिए।उसका ‘भाग’ उस कौए का ‘भाग’ बन गया।मजबूरन सरकार को अपने ‘भाग’ के लिए दुबारा ऑर्डर देना पड़ा।इस के लिए सरकार बहादुर को केवल मुंडी हिलाने की ज़रूरत थी कि राज्य की हुंडी उनके सामने खुल गई।इस बात का ध्यान ज़रूर रखा गया कि इस बार किसी और कौए को उनके ‘भाग’ में चोंच मारने का मौक़ा न मिले।इससे उनकी गाड़ी और कुर्सी दोनों सलामत हो गई।

इस छोटी बात पर विरोधी कांव-कांव करने लगे।कहा जाने लगा कि मुख्यमंत्री जी अन्धविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं।पर उन्होंने बिलकुल ठीक किया।पहली बात कि गाड़ी में कौआ बैठा था।इसे सबने देखा,इसलिए यह अंध-विश्वास की श्रेणी में नहीं आता।दूसरी यह कि कौए को हमारे यहाँ संदेशवाहक माना गया है।उन्होंने सोचा होगा कि हो न हो,यह कौआ हाई कमान का कोई संदेश लेकर आया हो।उसकी तौहीन करना ठीक नहीं।जिस गाड़ी पर हाई कमान का कौआ बैठ चुका हो,उस पर सेवक कैसे बैठ सकता है !

बरसों से यह मान्यता है कि आंगन की मुंडेर पर बैठा कौआ घर में मेहमान आने की सूचना देता है।यहाँ तो ससुरा सीधा मंत्री जी की छाती सॉरी गाड़ी पर ही चढ़ गया।अब ई तो पक्का असगुन हुआ ना ! मंत्री जी तो अपने लिए गाड़ी पर बैठने जा नहीं रहे थे।वे ठहरे भाग्य-विधाता।जनता का भाग्य सुधारने से पहले खुद का बिगड़ जाए,वह भी कोई भाग्य है भला !उनका तो पूरा जीवन ही जनता के लिए अर्पित है सो मुहूर्त के लिए एक गाड़ी और अर्पित हो गई तो कौन-सा आसमान टूट पड़ा !

एक काले कौए से बड़ा ‘भाग’ राजा और उसके राज्य का होता है।शापित हो चुकी गाड़ी से जनता पर वरदान नहीं बरस सकते।इसलिए एक कौए ने राज्य की जनता को बड़े संकट से उबारा ही,साथ ही गाड़ियों की बिक्री को नया सूत्र दिया।आप चाहें तो उसके ‘भाग’ पर रश्क कर सकते हैं !

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

सेल्फी-संक्रमित लोगों के बीच हमारी असहिष्णुता !

सत्ता में अकड़ न हो तो उसकी पकड़ भी नहीं रहती।ढीली-ढाली दिखने वाली सरकार का प्रशासन तो ढीला रहता ही है ,उसकी ढंग की सेल्फी भी नहीं आ पाती।जैसे डंडे वाली सरकार बड़ी कारसाज मानी जाती है,वैसे ही स्टिक वाली सेल्फी सबसे कारगर।अब सेल्फी है तो सरकार दिखती है।जहाँ सरकार और सेल्फी दोनों एक साथ हों,ऐसा ‘संजोग’ दुर्लभ होता है।इस तरह के मौके को कोई छोड़ता है भला ! मीडिया चौथा खम्भा है।उसने यही खम्भा सरकार के काँधे से टिकाया हुआ है बस।खम्भे की मजबूती उसके टिके रहने तक ही है।इसलिए यह खम्भे की अतिरिक्त जिम्मेदारी है कि वह सरकार को अपने कंधे पर उठाए रहे।इससे मीडिया की सेल्फी भी निखरकर आती है ।पोज़ के बहाने ‘पोल’ दिखती है.

सेल्फी कैमरे का शॉट भर नहीं है।वह हमारा अन्तःचित्र है,हनक है।हर आदमी अपने को अभिव्यक्त करना चाहता है।जब उसके पास शब्द न हों या कमजोर हों तो उसका दिखना बड़ा काम करता है।बड़े नेता या कलाकार के साथ की सेल्फी अपनी हैसियत बयान करती है।बिना कुछ कहे सामने वाला ‘फ्लैट’हो जाता है।सब एक-दूसरे को इसीलिए रौंद रहे हैं।सूखी फसलों और भूखी देहों के साथ कोई नहीं सेल्फियाना चाहता।ऐसी लोकेशन में दाल-रोटी के अनावश्यक मसले मूड बिगाड़ते हैं।इसीलिए सेल्फी के लिए सबसे सुरक्षित और नयनाभिराम जगह लुटियन ज़ोन है।यहाँ किसी तरह के सवाल नहीं किये जाते।उत्तर सब चेहरों पर छपे होते हैं पर उनको पढ़ने की तमीज अमूमन सबमें नहीं होती।

सेल्फी-संक्रमित व्यक्ति से आम जन को दूर रहना चाहिए।आत्ममुग्धता से लैस आदमी मिनटों में सामने वाले को अपने आभामंडल से ढहा सकता है।जिनके पास ऐसी आभा नहीं है और संक्रमित होने के इच्छुक होते हैं,वे किसी न किसी बहाने अपनी अंतिम इच्छा पूरी कर लेते हैं।कोई भी नैतिक मिशन इसके आड़े नहीं आता।

ऐसे ही एक सेल्फी-संक्रमित पत्रकार से भेंट हो गई।मैंने कहा-यह बहुत खतरनाक प्रवृत्ति है।पत्रकार को सरकार और सत्ता से दूर रहना चाहिए।कहने लगे-आप पूर्वाग्रही हैं और परले दरज़े के पाखंडी भी।हम सरकार और सत्ता से दूर रहेंगे तो आपको इनके नजदीक कैसे लायेंगे ?सरकार आम आदमी से जुड़ना चाहती है।वह अकेले कहाँ-कहाँ जाएगी? हम सब संक्रमित होंगे,तो सरकार की सोच का ही विस्तार होगा।आइए,हमसे लिपटकर सहिष्णु हो जाइए !

हमने अपनी असहिष्णु-काया को सम्मानित-शाल से ढकते हुए उनसे हाथ मिलाया।मौका पाते ही उन्होंने एक ज़ोरदार सेल्फी खींच ली और बोले-आज की ब्रेकिंग न्यूज़ मिल गई है !

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

मँहगाई का ‘महागठबंधन’ !

सुनते हैं टमाटर फिर से लाल हो गया है।कुछ लोग इसी पर लाल-पीले हो रहे हैं ।टमाटर का गुणधर्म ही लाल होना है।वह तो केवल अपना धर्म निभा रहा है।वैसे भी देश में महागठबंधनकी सफलता की खबर उस तक पहुँच गई है।वह भी सरकार के खिलाफ प्याज,दाल और तेल के साथ महागठबंधनमें शामिल होना चाहता है।विकास का दौर है तो कोई क्यों पीछे रहे ?टमाटर विकास-यात्रा का नया राही है।
मँहगाई ऐसी-ऐसी जगहों से निकलकर आ रही है कि इसके खिलाफ मोर्चा भी नहीं बन पा रहा है।सरकार को भी इसके लिए कुछ करने की ज़रूरत नहीं पड़ रही।कोई न कोई चीज़ उसे राहत देने के लिए मैदान में आ जाती है।विकास की गाड़ी सरपट दौड़ रही है।बुलेट ट्रेन आने से पहले रेल-किरायों का लेवल भी वहाँ तक आना जरूरी है ।इसीलिए हर दूसरे-तीसरे दिन किराया अपने आप बढ़ लेता है।यात्री को किराए के तौर पर अहसास होना चाहिए कि वह ए सी क्लास में चल रहा है,भले ही कोच स्लीपर का हो।विकास धीरे-धीरे ही पटरी पर आएगा।इसमें समय लगेगा ।साठ साल की पुरानी  मालगाड़ी एकदम से राजधानीकी रफ़्तार नहीं पकड़ सकती।
खाने-पीने की चीज़ें मँहगी हो रही हैं,यह कहना गलत है।हमारी क्रय-शक्ति कितनी बढ़ गई है,इससे यह पता चलता है।विकास फटे-पुराने चीथड़े पहनकर नहीं आता।वह सूटेड-बूटेड होगा,तभी उड़ता हुआ दिखेगा।इसलिए अब विकास की दौड उड़ानमें बदल गई है।हवा में उड़ने के लिए भी तो ईंधन चाहिए।बस,सरकार उसी का जुगाड़ कर रही है।
टमाटर के दाम बढ़ गए हैं तो नूडल्स की तरह देसी सूपका पाउच लाया जा सकता है।इससे प्याज,दाल और टमाटर के महागठबंधनकी चुनौती से निपटा जा सकता है।आखिर सब कुछ सरकार ही तो नहीं करेगी।जनता को कुछ तो छोड़ना होगा।
प्याज,दाल,तेल और टमाटर सब मिले हुए हैं।यह गठबंधन घोर अवसरवादी है।ऐसे समय में जब सरकार विकास को विदेशों से घसीटकर लाने को कृत-संकल्प है,उसकी हौसला-अफजाई करनी चाहिए।इसलिए टमाटर पर लाल होने से पहले यह सोचें कि यह किसकी साजिश है।तेज भागती हुई  सरकार दाल-रोटी पर चिंतन करने लगेगी तो विकास-यात्रा क्या खाक़ होगी?



                

बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

धीरज धरें,दाल-रोटी भी मिलेगी !

सरकार विकास करना चाहती है पर उसके विकास-पथ में सबसे बड़ी बाधा विरोध है।वह इधर काम में जुटती है उधर विरोधी उसे डिस्टर्ब करने लगते हैं।सरकार को मजबूरन बयान देती है। विरोधी इसी ताक में रहते हैं,वे उस बयान को ले उड़ते हैं। इस तरह मासूम बयान को खमियाजा भुगतना पड़ता है। हर चैनल पर उसकी तुड़ाई होती है।वह अपने बचाव में उतर आता है,स्वयं को तोड़-मरोड़कर सबके आगे प्रस्तुत करता है।विरोध को उस पर तनिक दया नहीं आती।आखिरकार बयान विकास के रास्ते में घुस जाता है। वहाँ विरोध की दाल नहीं गलती।

सरकार का रास्ता विकास का है जबकि असहिष्णु लोगों का विरोध का। यह विरोध भी केवल लुटियन जोन तक सीमित है।इसी से पता चलता है कि असहिष्णुता का रास्ता लंबा नहीं है।विकास का रास्ता लंबा है इसीलिए उसे पहुँचने में देरी हो रही है।सरकार विकास के लिए प्रतिबद्ध है।पर इसके लिए जनता को सहिष्णु होना चाहिए। जल, जंगल और जमीन पर सरकार की नजर है। नया विकास-पथ यहीं से होकर गुजरेगा।असहिष्णुता विकास-विरोधी और आभिजात्य-कर्म है।खाए-अघाए लोग ही इस समय 'बोलने का संकट' बता रहे हैं।गरीब, मजदूर और किसान अभी भी सरकार के 'मन की बात' सुन रहे हैं। उन्हें पता है कि कभी न कभी विकास रेडियो के रास्ते कूदकर बाहर आएगा। ऐसी सहिष्णुता से ही पिछले सत्तर सालों से देश चल रहा है।

सरकार को इन्हीं सहिष्णु ताकतों पर भरोसा है।मंहगाई, भ्रष्टाचार और मार-काट की बाधाएं उसकी राह में रोड़ा नहीं बन सकतीं।जो सरकार से सहमत नहीं हैं उनके लिए उसके पास पिछले कई उदाहरण हैं। वह काम से नहीं बयान से ही उन्हें चित्त कर देगी। कहा भी गया है कि 'जहाँ काम आवे सुई, कहा करै तरवारि'।
सरकार का मूल-मन्त्र है सबके प्रति सहिष्णु हो जाओ। इससे सरकार अपना काम करेगी और जनता अपना।दाल मँहगी है तो आलू खाइए। लुटियन जोन में रहने वाले आलू के चिप्स खाकर ही गंभीर विमर्श करते हैं।आप सहिष्णु बनिए।अभी तो' मन की बात 'के दो सौ छप्पन एपीसोड आने बाकी हैं। रास्ता लंबा है पर तय ज़रूर होगा। तब तक आँख-कान को आराम दीजिए,गाजर-मूली का स्टॉक करिए।सरकार विकास और बिहार से फुरसत पा ले,जादू-टोना सीख ले, फिर आपको दाल-रोटी भी खिला देगी।

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

वादें यूँ होते हैं हवा !

उन पर हवाबाजी करने का इलज़ाम लगा है।पर यह कोई छोटा-मोटा करतब नहीं है।हवा में रहकर गुलाटी मारना बडे ख़तरे का काम होता है।यहाँ तो ज़मीन से ही हवाबाजी का कमाल किया जा रहा है।वादे करना जितना आसान होता है,उनमें हवा भरना उतना ही मुश्किल।काफ़ी पड़ताल के बाद यह बात साबित हो पाई है कि साठ साल के वादों में जितनी हवा नहीं थी,साल भर में उससे ज़्यादा भर दी गई है।अब हवा पर तो किसी का नियंत्रण नहीं है वर्ना इसकी सप्लाई बंद की जा सकती थी।वादों में हवा है या हवा में वादे,इससे वादों की बुनियादी स्थिति में फर्क नहीं पड़ता।
अब जब आरोप लग चुका है तो ज़ाहिर है यह हवा में तो नहीं होगा।मगर इसके लिए एक अदद दूरबीन की नहीं सूक्ष्मदर्शी की ज़रूरत होती है।दूर से हवा का अनुमान लगाना कठिन होता है।हवा का अहसास पास आकर ही होता है।जब वह बगल से गुजरती है तो पता चलता है कि वह मलयानिल है या लू का थपेड़ा ! पहाड़ की हवा जहाँ दिल को सुकून देती है,वहीँ मैदानी हवा  तन सोख लेती है।वादों में भरने वाली हवा गरम होती है इसीलिए झम्म से उड़ जाती है।ऐसी वादे-हवा को देखने के लिए ही दूरबीन निकालनी पड़ती है।
हवाबाजी करना बच्चों का खेल नहीं है।इसके लिए सतत अभ्यास की ज़रूरत होती है।वादों में हवा भरने के लिए उसे बाहर से भी आयात किया जाता है।इसके लिए बार-बार हवाई यात्रायें करनी पड़ती हैं।विदेशों में जाकर पम्प करना पड़ता है,तब कहीं जाकर विकास का गुब्बारा फूलता है।जिनके पास न काम बचा है,न हवा,वे वादे भी करें तो किस भरोसे ? बिना हवा के काम तो क्या वादे भी नहीं उडाये जा सकते।इसलिए हवा भी उन्हीं की है,जिनके पास वादे करने के करतब हैं।

वादों को हवा का साथ बहुत रास आता है।वे स्वयं जल्द से जल्द उड़ना चाहते हैं ताकि नए वादे के लिए स्पेस पैदा हो सके।शायद इसीलिए आजकल वादे हवा के संग ‘स्पेस’ में अधिक घूम रहे हैं।जिन्हें हवाबाजी का ज़्यादा शौक हैं,वे ‘स्पेस’ में ‘मास्क’ लगाकर जाएँ क्योंकि वहाँ की हवा में ऑक्सीजन नहीं होता।

बुधवार, 12 अगस्त 2015

फाइलों का निपट जाना!

अब कोई भी खबर हैरान नहीं करती पर इधर एक दिलचस्प खबर आई है।उत्तम प्रदेश के सचिवालय की कुछ फाइलों को दो कुत्तों ने कुतर दिया।हैरानी वाली बात यह है कि इसके लिए किसी कुत्ते को न टेंडर दिया गया और न ही वह इसकी पात्रता रखता था।फ़िर भी यह अनहोनी हो गई।जाँच के आर्डर दे दिए गए हैं कि इतनी पुख्ता व्यवस्था होने के बावजूद कुत्ते आखिर फाइलों तक कैसे पहुँचे और उन्होंने किस नीयत से उन्हें कुतरा ?

इस वाकये की जाँच मुस्तैदी से होगी और होनी भी चाहिए।आखिर कुत्तों ने आदमी के काम में दखल दिया है।पुलिस ‘अमानत में खयानत’ के आरोप में कुत्तों को अदालत में घसीट सकती है।नगर निगम को सतर्क कर दिया गया है कि वह साफ़-सफ़ाई जैसे रूटीन कार्यों को छोड़कर इस आपदा में प्रशासन का सहयोग करे।हमें राज्य की पुलिस-व्यवस्था पर पूरा भरोसा है.गुम हुई भैंसों की तरह ये कुत्ते भी जल्द बरामद कर लिए जायेंगे।

यहाँ मुख्य बात यह है कि आखिर कुत्तों को फाइलें चबाने की सूझी ही क्यों ? यह काम अमूमन चूहे करते रहे हैं या ऑफिस का पुराना बाबू।चूहे या कुत्तों द्वारा फाइलें निपटाने का तरीका बिलकुल अलग है।वे अक्सर उन्हीं फाइलों को कुतरते हैं,जिनकी उपयोगिता खत्म-सी हो जाती है।जिनके न रहने से कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है पर टेबल पर पड़ी रहने से कभी भी विस्फोटित हो सकती हैं।इसलिए उनका कुतरा जाना ही उनकी नियति है।बाबू किसी भी फाइल को यूँ ही नहीं निपटाता।उसके बनने और चलने का सारा व्यय जोड़ता है,पूरी तरह दुहता है और आगे के लिए बढ़ा देता है।यदि फ़ाइल गैर-दुधारू हुई तो उसे अन्ना(छुट्टा)छोड़ देता है।वह अपने-आप ही धूल-धूसरित होकर निपट लेती है।

सवाल फ़िर भी यही है कि कुत्तों ने ऐसा क्यों किया ? हो सकता है उन्होंने बड़ी बारीकी से सचिवालय की गतिविधियों का अध्ययन किया हो।यह भी हो सकता है कि वे इस बात का रहस्य जान गए हों कि दफ्तर में घुसा दुबला-पतला आदमी बाहर निकलकर अचानक इत्ता मोटा-ताजा कैसे हो जाता है ! इसलिए महज एक प्रयोग करने के लिए यह कदम उठाया हो.जानने वाले बताते हैं कि कुछ आदमियों ने कुत्तों के भौंकने की आवाजें सुनी थीं.कुत्तों से यहीं गडबड हो गई.ऐसे काम परम शान्ति के क्षणों में किए जाते हैं.जाँच का मुख्य विषय यही होना चाहिए।

रही बात फाइलों के कुतरे जाने की,उनको तो हर हाल में निर्वाण की गति को प्राप्त होना ही है ।

 

गुरुवार, 2 जुलाई 2015

तुमने यह विष कहाँ पाया !

नेता नाग होते हैं।वे कभी भी डस सकते हैं।यह तजुर्बा बाहुबली से बने एक नेता को हुआ है।उनके अनुसार जो नेता जितना अधिक जहरीला है,उतना बड़ा नाग है ।वे इस लिहाज़ से पिछड़ गए इसीलिए पिछड़े नेता हैं।उनके कहे का बहुत अधिक असर नहीं हुआ।इससे ज़ाहिर होता है कि वाकई उनकी जुबान में जहर की अपर्याप्त मात्रा है।इसकी दूसरी वजह यह भी हो सकती है कि अधिकतर लोगों ने इसे कोई खबर माना ही नहीं।खबर तभी बनती है जब वह लीक से हटकर हो या अचम्भित करती हो।


आम लोगों ने भी इसे सीरियसली नहीं लिया।नेता तो अपने हैं,वे अब कुछ भी सीरियसली नहीं लेते।कुछ लोग बड़े दिनों से इस्तीफ़ा-इस्तीफ़ा चिल्ला रहे थे पर नीति-आयोग की बाँबी से निकलकर फैसला यही हुआ कि इस्तीफे की हमारी कोई नीति नहीं है।किसी को हो न हो,नेता को नाग या साँप कहने से हमें सख्त एतराज़ है।साँप निश्चित समय पर अपनी केंचुल बदलता है पर नेता कभी भी यह हुनर दिखा सकता है।किसी को डसने के लिए नाग को फन का सहारा लेना पड़ता है पर नेता के पास बयान देकर ही जहर निकालने का फन है।नाग आत्म-रक्षा के लिए यह सब करता है जबकि नेता परमार्थ और देश-सेवा के लिए।नाग पास आकर डसता है,नेता ट्वीट करके ही यह काम कर सकता है।

एक और नेता ने अपने तजुर्बे से कुछ नेताओं को जन्तु कहा है।इससे नेताओं में कई तरह की वैराइटी निकल सकती है।हमारे यहाँ नेताओं की तरह जंतुओं की भी भारी रेन्ज है,इसलिए इस खोज से राजनीति विज्ञान पढ़ रहे छात्रों को काफी फायदा होगा।वे साधु से नेता बने हैं इसलिए माना जा सकता है कि कम से कम नेता बनने का विकल्प साधु बनने से कहीं बेहतर है।हो सकता है इसी वजह से साधु और बाबा अपना मुक्ति-मार्ग राजनीति में तलाश रहे हैं।यहाँ राजनीति में रहकर सहज रूप से नीति-मुक्त रहा जा सकता है जबकि साधु-जीवन में नाना प्रकार के माया-मोह से मुक्त होने का उपक्रम करना पड़ता है।

अज्ञेय होते तो आज यह न पूछते,’साँप ! तुम सभ्य तो हुए नहीं,नगर में बसना भी नहीं आया.एक बात पूछूँ –(उत्तर दोगे ?) तब कैसे सीखा डसना-विष कहाँ पाया’.अब इस बात का उत्तर मिल गया है.नेता कोई साधारण आदमी नहीं होता।वह या तो विषधर हो सकता है या कोई और जन्तु,आप बचना चाहें,तो बचकर दिखाएँ !

बुधवार, 27 मई 2015

बुरे दिन चले गए !


‘अच्छे दिन’ ठीक एक साल पहले आए थे।कुछ लोगों को फ़िर भी भरोसा नहीं हो रहा था।वे दूरबीन लगाये ताकते ही रह गए पर उन्हें ‘वे दिन’ दिखाई न दिए।इस बीच साल पूरा हुआ और उसका ज़श्न शुरू हो गया।देश में चौतरफ़ा मच रहे जलसे की मार से ‘बुरे दिन’ बड़े आहत हुए।वे अचानक उठे और चले गए।अच्छे दिनों की आमद को नकारने वाले एकदम से सन्न रह गए हैं।अब तो सरेआम यह प्रमाणित हो चुका है कि ‘अच्छे दिन’ हमारे साथ हैं क्योंकि ‘बुरे दिन’ हैं नहीं।दोनों एक साथ रह भी तो नहीं सकते !
‘अच्छे दिन’ और बुरे दिन’ का फंडा एकदम सीधा है।जो लोग यह मानने को तैयार नहीं हो रहे थे कि अच्छे दिन आ गए हैं,उनका मुँह इस बात से बंद हो गया है कि बुरे दिन चले गए हैं।इस बात की तस्दीक सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कर दी है।’अच्छे दिनों’ की आवक के लिए विदेशों में ‘दुःख भरे दिन बीते रे भइया’ का कोरस-गान भी किया गया।और देखिए,ठीक एक साल बाद पके आम की तरह ‘अच्छे दिन’ हमारे सामने टपक पड़े।
कहा तो यह भी जा रहा है कि ‘बुरे दिन’ भयभीत होकर भागे हैं।जैसे कृष्ण ने मथुरा जाकर कंस का विनाश किया था,वैसे ही मथुरा में ‘बुरे दिनों’ का खात्मा हुआ है।कुछ लोग इसे महज ऐलान मान रहे हैं पर सच्ची बात तो यह है कि जब ऐलान करके ‘अच्छे दिन’ आ सकते हैं,तो ‘बुरे दिन’ जा क्यों नहीं सकते ?
  जिस तरह ‘काला धन’ जुमला बनकर गायब हो गया,ठीक उसी तरह विरोधियों द्वारा लगायी जा रही  ‘अच्छे दिनों’ की रट भी हमेशा के लिए दफ़न हो गई है।सरकार ने यह भी साफ़ कर दिया है कि ‘अच्छे दिनों’ की गारंटी सबके लिए नहीं थी,हाँ,उसके मुताबिक ‘बुरे दिन’ ज़रूर कुछ के आए हैं और इस प्रक्रिया को वह और विस्तार देगी।

‘बुरे दिनों’ के चले जाने का सरकार का दावा इसलिए भी मजबूत जान पड़ता है क्योंकि उसने बताया है कि जित्ते रूपये में पहले कफ़न नहीं मिलता था,उसने बीमा करा दिया है।लोग बेफिक्र होकर मर तो सकेंगे !

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

यही हैं असल खिलाड़ी !

यह तो बड़ा गजब हुआ जी ! लोगों ने जिन्हें नाकारा समझ लिया था ,वे तो करोड़ों के निकले।उन्होंने बाज़ार में लगी अपनी कीमत से साबित कर दिया है कि वे कितने काम के हैं ! खेल के असली युवराज वही हैं।क्रिकेट में आज रन बनाने का स्तर धन बनाने से लगता है।आप कितने भी रन बनाते हों,पर आपकी रेटिंग ‘बोली’ से ही लगेगी।यहाँ पारियों में शून्य बनाने का रिकॉर्ड भले न देखा जाता हो,पर बोली की राशि में कितने शून्य हैं,मायने रखता है।खिलाड़ी का स्टेमिना इसी पर आँका जाता है।बदले में वह अपने खेल से अपनी टीम को कितने शून्य समर्पित करता है,यह बाद की बात है।

खेल की तरह राजनीति में भी युवराज हैं।उनके समर्थक उन्हें ‘अनमोल’ कहते हैं।खेल के युवराज को जहाँ कई शून्य चुकाकर अनमोल बनाया गया है ,वहीँ राजनीति वाले युवराज स्वयं अपने खाते में शून्य दर्ज कर रहे हैं।खेल और राजनीति में शून्य इस तरह हावी है कि दर्शक और जनता सिवाय शून्य की ओर ताकने के,कुछ नहीं कर सकती है।एक को बाज़ार अपनी गोद में हिला रहा है और दूसरे को परिवार।दोनों के अपने-अपने दाँव हैं।

खेल को खेल की तरह समझने वाले आखिर में केवल मुँह ताकते रह जाते हैं जब पता चलता है कि उनकी जीत तो पहले से ही फिक्स थी।यही हाल राजनीतिक जीत-हार का होता है।जनता जिसे अपनी जीत समझती है,वह उसका ‘धोखा,जुमला या नसीब निकलता है।

आज बाज़ार का समय है।खरीदने-बिकने वाले ही असल खिलाड़ी हैं।मैदान में खिलाड़ी से ज्यादा मैदान से बाहर बैठे सट्टेबाज खेलते हैं।चुनावी-जीत भी चंदेबाजों और धंधेबाजों की होती है।पर ये सारी धारणाएं गुप्त घोषणा-पत्रों की तरह होती हैं।इनका पता तभी चलता है जब कोई खिलाड़ी ‘हाई-स्कोर’ करके अपनी रेटिंग मजबूत कर लेता है।जनता की रेटिंग हमेशा से रेलवे के तीसरे दर्जे जैसी रही है।लगता है इसी बात को ध्यान में रखकर उसे भी ‘बुलेट ट्रेन’ से अपग्रेड किया जायेगा।

फ़िलहाल,करोड़ों में खेलने वाले अपने खाते दुरुस्त कर रहे हैं और हम जैसे निठल्ले उनके खाते में दर्ज हुए शून्य गिन रहे हैं।सबका अपना-अपना नसीब है।

बुधवार, 7 जनवरी 2015

हम नया विज्ञान बनाएँगे।

जो लोग बार-बार कह रहे थे कि नई सरकार आने पर भी कुछ नहीं बदला,सब वैसे ही है,उनके मुँह पर करारा तमाचा लगा है।कई सालों से एक ही परिवार की सरकार को उखाड़ फेंककर पहले तो इतिहास बनाया गया,फिर बयानों और किताबों के ज़रिये इतिहास को बदला गया।सरकार जब कुछ नया करने की तलाश में थी,धर्म ने उसमें अड़ंगी लगाई तो उसकी भी ‘घरवापसी’ कर दी गई।अब राजनीति ‘अधर्म’ होकर निश्चिन्त हो गई है और उसने धर्म को भी सही ठिकाने पर लगा दिया है।इतना सब होने पर भी विद्वेषियों को चैन नहीं आया और वे ‘अच्छे दिन कब आयेंगे’ का जुमला उछालने से बाज नहीं आ रहे थे।इस पर सरकार को बदलाव के संकेत तो देने ही थे,सो उसने विज्ञान की ओर निहारा।

इतिहास और धर्म के दुरुस्त हो जाने के बाद विज्ञान भी कातर नेत्रों से उसी ओर देख रहा था।आखिर सरकार के लोगों ने ‘जय विज्ञान’ का हुँकारा भरते हुए पुराने ग्रन्थ और पांडुलिपियाँ खोज डालीं।उन्हें पता लगा कि हवाई जहाज का आविष्कार ‘राइट ब्रदर्स’ ने नहीं,हमारे ही किसी बंदे ने किया था।उसकी खोज दुनिया के सामने इसलिए नहीं आ पाई क्योंकि हम भारतीय स्वभाव से बड़े संकोची होते हैं।अब जब दुनिया से न डरने वाली और न झुकने वाली सरकार देश में काबिज हो गई है तो विज्ञान में हुई गड़बड़ियों को भी जल्द सुधारा जायेगा।हो सकता है कि कल को यह भी पता चल जाय कि अमेरिका की खोज कोलम्बस ने नहीं हमारे ही किसी मछुआरे ने की थी।अब यही सब बदलाव तो करने हैं और हो भी रहे हैं।
विज्ञान के अंदर बड़े पैमाने पर बदलाव सम्भावित हैं।गिनीस बुक वालों को फिर से अपना रिकॉर्ड दुरुस्त करने की ज़रूरत है।रामायण काल में हमारे यहाँ पुष्पक विमान था,जिसमें कितने भी लोग बैठ जाएँ, फिर भी एक सीट खाली रहती थी।पत्थरों पर नाम लिखकर समुद्र में तैराना रहा हो या तीर मारकर पाताल से पानी निकालना,ये सारे अजूबे हमारी ही देन है।अब देखिये ना,शून्य की खोज हमने की पर हमारे पल्ले शून्य ही आया।इसको ही बदलना है।

दुनिया को अब यह भी जान लेना चाहिए कि विज्ञान केवल करने या होने की चीज़ नहीं है।उसे किताबों में बदलकर भी हासिल किया जा सकता है।बदलाव हो रहा है पर दिखना भी तो चाहिए।इसलिए बदलाव हो भी रहे हैं।आपको नहीं दिखता है तो अपना चश्मा बदल लें।हम नया इतिहास बना चुके हैं,अब नया विज्ञान बनायेंगे।

शांतिप्रेमी का दुनिया के नाम ख़त

  प्यारे विश्व नागरिको   मैं दुनिया का सबसे बड़ा शांतिदूत बोल रहा हूँ।तुम सबकी ख़ैर चाहता हूँ इसलिए कुछ कहने आया हूँ ।...