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गुरुवार, 2 जुलाई 2015

तुमने यह विष कहाँ पाया !

नेता नाग होते हैं।वे कभी भी डस सकते हैं।यह तजुर्बा बाहुबली से बने एक नेता को हुआ है।उनके अनुसार जो नेता जितना अधिक जहरीला है,उतना बड़ा नाग है ।वे इस लिहाज़ से पिछड़ गए इसीलिए पिछड़े नेता हैं।उनके कहे का बहुत अधिक असर नहीं हुआ।इससे ज़ाहिर होता है कि वाकई उनकी जुबान में जहर की अपर्याप्त मात्रा है।इसकी दूसरी वजह यह भी हो सकती है कि अधिकतर लोगों ने इसे कोई खबर माना ही नहीं।खबर तभी बनती है जब वह लीक से हटकर हो या अचम्भित करती हो।


आम लोगों ने भी इसे सीरियसली नहीं लिया।नेता तो अपने हैं,वे अब कुछ भी सीरियसली नहीं लेते।कुछ लोग बड़े दिनों से इस्तीफ़ा-इस्तीफ़ा चिल्ला रहे थे पर नीति-आयोग की बाँबी से निकलकर फैसला यही हुआ कि इस्तीफे की हमारी कोई नीति नहीं है।किसी को हो न हो,नेता को नाग या साँप कहने से हमें सख्त एतराज़ है।साँप निश्चित समय पर अपनी केंचुल बदलता है पर नेता कभी भी यह हुनर दिखा सकता है।किसी को डसने के लिए नाग को फन का सहारा लेना पड़ता है पर नेता के पास बयान देकर ही जहर निकालने का फन है।नाग आत्म-रक्षा के लिए यह सब करता है जबकि नेता परमार्थ और देश-सेवा के लिए।नाग पास आकर डसता है,नेता ट्वीट करके ही यह काम कर सकता है।

एक और नेता ने अपने तजुर्बे से कुछ नेताओं को जन्तु कहा है।इससे नेताओं में कई तरह की वैराइटी निकल सकती है।हमारे यहाँ नेताओं की तरह जंतुओं की भी भारी रेन्ज है,इसलिए इस खोज से राजनीति विज्ञान पढ़ रहे छात्रों को काफी फायदा होगा।वे साधु से नेता बने हैं इसलिए माना जा सकता है कि कम से कम नेता बनने का विकल्प साधु बनने से कहीं बेहतर है।हो सकता है इसी वजह से साधु और बाबा अपना मुक्ति-मार्ग राजनीति में तलाश रहे हैं।यहाँ राजनीति में रहकर सहज रूप से नीति-मुक्त रहा जा सकता है जबकि साधु-जीवन में नाना प्रकार के माया-मोह से मुक्त होने का उपक्रम करना पड़ता है।

अज्ञेय होते तो आज यह न पूछते,’साँप ! तुम सभ्य तो हुए नहीं,नगर में बसना भी नहीं आया.एक बात पूछूँ –(उत्तर दोगे ?) तब कैसे सीखा डसना-विष कहाँ पाया’.अब इस बात का उत्तर मिल गया है.नेता कोई साधारण आदमी नहीं होता।वह या तो विषधर हो सकता है या कोई और जन्तु,आप बचना चाहें,तो बचकर दिखाएँ !

1 टिप्पणी:

jyoti khare ने कहा…

वाह बेहत उम्दा व्यंग