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सोमवार, 30 सितंबर 2013

आधुनिक समय की क्रांति !

नईदुनिया में ३०/०९/२०१३ को


वे आराम से चादर तानकर सोये हुए थे।अचानक उन्हें लगा कि देश और संविधान ख़तरे में है सो वे क्रांति की अगुवाई के लिए उठ खड़े हुए।सार्वजनिक रूप से लोग उनके गायब होने की चर्चा लगातार करते रहते थे पर अब पता चला है कि दरअसल वे क्रांति करने के लिए हिम्मत जुटाने में लगे थे ।जैसे ही दागियों को बचाने वाला अध्यादेश संकट में फंसता दिखा,उनको क्रान्ति का आइडिया मिल गया।वे उस अध्यादेश को ढूँढते हुए प्रेस-कांफ्रेंस की ओर भागे।वहाँ अध्यादेश का गुणगान करने में लगे अपने प्रवक्ता से माइक लिया और एकदम से फट पड़े।उनके इस तरह सक्रिय होने से हर तरफ हल्ला मच गया।उन्होंने उस अध्यादेश को बकवास और उसे लाने वालों को नानसेंसघोषित कर दिया।वे इतने मूड में थे कि अगर बेचारा अध्यादेश उस वक्त मिल जाता तो उसकी चिन्दी-चिन्दी उड़ा देते ।बहरहाल,यह कमी उन्होंने सरकार के बचे-खुचे कपड़ों को तार-तार कर पूरी कर ली।इस तरह की हाइटेक क्रांति का बिगुल बजाकर वे उठ लिए ।

इस बीच मीडिया उनके दुर्लभ बोल रिकॉर्ड कर चुका था।बस,उनकी क्रान्ति यहीं तक थी।इसके आगे का काम सरकार और उनके सलाहकारों का है।वे फ़िर से अंतर्ध्यान हो गए हैं और उनकी सरकार किसी कोने-अतरे में अपना मुँह छिपाने का जतन करने में लगी है।

उनको पता है कि क्रांति कैसे की जाती है।जमाना बदल रहा है सो नए जमाने की क्रांति भी नए टाइप की होनी चाहिए।पहले कभी भले ही कठिन संघर्ष के साथ क्रांति की शुरुआत होती रही हो, लंबा समय लगता रहा हो,पर अब हाईटेक ज़माने में क्रांति भी हाईटेक हो गई है।जब भी अहसास हो कि बहुत दिन से क्रांति नहीं हुई,बस हो जाती है।इस मामले में उनका सीधा और शॉर्टकट फंडा है,’ आओ,फाड़ो और चले जाओ।उत्तम प्रदेश के पिछले चुनावों में उन्होंने मंच से ही विरोधी पार्टी का घोषणा-पत्र बड़े जोशीले तरीके से फाड़ा था।बाद में पता चला कि मतदाताओं ने वोटों से लबालब उनका बैलट-बॉक्स ही गुल कर दिया।उस कागजी-क्रांति से वे लगातार प्रेरित होते रहते हैं ।

देश में जब-जब जनता सड़कों पर निकली है,वे किसी खोह में बैठकर इस बात का शोध करने में लग जाते हैं कि कब और किस तरह सबके सामने आया जाए।जब दुखी जनता का दर्द उनसे नहीं देखा जाता तो कैमरों के उजाले में सहसा प्रकट होते हैं,कागज फाड़ते हैं और चल देते हैं।जब इसी तरह से क्रांति आ सकती है तो इसके लिए लम्बे आन्दोलन करना वाकई मूर्खता है ।

इस अचानक हुई क्रांति से सभी दागी हतप्रभ हैं।उनके साथ सबकी सहानुभूति है।उनमें कोई चारा खाए बैठा है तो किसी ने खदान गटकी हुई है ।कोई कोयला हजम किए हुए है तो कोई फाइलें खा गया है।राजनीति में इसी तरह का खाना है,वे तो बस किसी तरह जीवन-निर्वाह कर रहे हैं।ऐसी जनसेवा बेखटके हो सके ,इसके लिए जल्द से जल्द कदम उठाने ज़रूरी हैं ,पर अध्यादेश को फाड़कर क्रांति करने की उनकी ललक से दागी बेहद दुखी हैं।उनको लगता है कि वे अब जनसेवा कैसे कर सकेंगे ?

बुधवार, 25 सितंबर 2013

लो फ़िर आ गए हम !

जनवाणी में २५/०९/२०१३ को !

 

नुक्कड़ की तरफ बहुत दिनों बाद जाना हुआ तो वहां की बदली रंगत देखकर हम चौंक गए। फिज़ा काफ़ी बदली-बदली नज़र आ रही थी। ऐसा लग रहा था कि पतझड़ के बाद वसंत आया हो ! सारी दुकानों में बदलाव की बयार थी और खूब चटख रंगों से दीवारें पुत रही थीं।  सभी की नाम-पट्टिकाओं में फेरबदल किया जा रहा था । सबसे ज़्यादा बदलाव दो दुकानों में था,क्योंकि वे सबसे बड़ी हैं और अधिकतम ग्राहकों को आकर्षित भी करती है। जहाँ एक दुकान के बोर्ड से नए मैनेजर के आने का संकेत मिल रहा था,वहीँ दूसरी दुकान ने अपने बुजुर्ग मैनेजर को हटा दिया था। उस पर आरोप था कि अब उसके पास माल बेचने का नुस्खा नहीं रहा। दोनों दुकानों के अन्दर ख़ास तबदीली तो नहीं दिख रही थी पर बाहर काफी रौनक थी। जिस दुकान के मैनेजर बदल गए थे,हम सबसे पहले वहीँ गए।

नए मैनेजर अभी-अभी वीडियो कांफ्रेंस करके आए थे। वे कई फाइलों को उलट-पुलट के देख  रहे थे। कइयों पर काफ़ी गर्द जमीं हुई थी और वे बहुत चिंता-मग्न लग रहे थे। हमने उनके पास पहुंचकर इस बदलाव का रहस्य जानना चाहा। वे बोले,’अगले ही साल इस इलाके का टेंडर उठना है और हमारी समस्या है कि इसमें बोली लगाने वाले कई लोग हैं।हमारे लोगों ने तो टेंडर-प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही नई फाइल को गोदी में उठा रखा है.... तो इसमें समस्या क्या है ?’ हमने बीच में ही बात काट दी। वे एकदम से बिफर पड़े,इस फाइल पर लगे भगवे कवर से हमारे कई साझीदारों का हाज़मा बिगड़ जाता है वहीँ दूसरी फ़ाइल बार-बार दाँव पर लगना चाहती है। वह बहुत पुरानी और परखी हुई है,रथ पर भी घूम चुकी है । कुछ और फाइलें हैं जो अभी दबी पड़ी हैं पर उनके भी ऊपर आने का अंदेशा है।  हमें टेंडर मिलने का अभी पुख्ता भरोसा नहीं है,फिर भी इतनी भारी संख्या में फाइलों के आने से हमारी दुकान के भरभराकर गिर जाने का खतरा बन गया था,तभी हमने एक खुल्लम-खुल्ला सर्कुलर जारी कर दिया है ताकि स्थिति स्पष्ट हो जाय ! इसमेंहालाँकि अंदेशा है कि  ऐसा करने पर बाकी फाइलें फट सकती हैं । पर हम भी मजबूर हैं और इसी को असली और मज़बूत फ़ाइल मान रहे हैं।

तब तक हमने देखा कि पहली दुकान के आगे अचानक चहल-पहल बढ़ चुकी थी। हम उधर की ओर ही चल दिए। दुकान के मैनेजर ने पास में रखी एक कोरी फाइल निकाली और सभी कर्मचारियों को हिदायत देनी शुरू कर दी। वे बोले,’इस फाइल को अच्छी तरह से तैयार किया जाए ताकि अगले साल का टेंडर फ़िर हमें ही मिले। इसके लिए जीतने भी लंबित आदेश हों,उन पर आखिरी नोट लिखकर अमल किया जाय। इस फाइल को सजाने के लिए आतंकवाद,बलात्कार और भ्रष्टाचार की पुरानी फाइलें त्वरित गति से निपटाई जांय। फांसी वाली फाइल तो इसमें नत्थी कर ही दीजिए,लोकपाल का झुनझुना और मंहगाई का सिलेंडर इसकी मुख्य नोटिंग में होना चाहिए। हमारे देखते-ही देखते कई लोग अचानक सक्रिय हो गए। थोड़ी ही देर में ही यह नई फाइल "भारत-निर्माण ' के लेबल के साथ दुकान के काउंटर में रख दी गई। इसके ऊपर-नीचे दूसरी फाइलों का कोई पेंच ही नहीं था,इसलिए इस दुकान का मैनेजर इस बारे में निश्चिन्त दिखा !

थोड़ी देर में बड़ा-सा झोला लादे एक कारिन्दा आया। उसने एक-एक कर कई चीज़ें झोले से निकाली और फाइल पर रखने लगा। हमने इसका कारण पूछा तो रहस्यमयी मुस्कान के साथ उसने बताया कि आने वाले टेंडर को पाने के लिए इस थैले से निकली यह पूजा-पाठ की सामग्री है। अगर यह भेंट ठीक-ठाक हो गई तो दुकान का काम चल निकलेगा। इस पूजा में हम अपने घर से कुछ नहीं लगाते,बल्कि वापसी में सूद समेत वापस ले लेते हैं। इसका खर्च आम ग्राहक ही भुगतता है। इस तरह हम उसी के पैसे को उसे देकर वापस ले लेते हैं। इस काम में हमारी दुकान को विगत साठ सालों का अनुभव है। इसलिए टेंडर पाने के हम स्वाभाविक दावेदार हैं। इसके बाद तो हमसे आगे की दुकानों की भावी योजनाएं सुनने की हिम्मत नहीं बची और हम घर लौट आए।  


जनसंदेश टाइम्स में २५/०९/२०१३ को !
 

बुधवार, 18 सितंबर 2013

जंगल में आया शेर !


 

देश में जंगल-राज की खबरें बहुत पहले से आ रही थीं,पर इसके कोई पुख्ता सबूत नहीं थे।इधर कुछ लोगों के यह ऐलान करने के बाद कि जंगल में शेर आ गया है,जंगल-राज वाली बात पर मुहर लग गई है।इसके लिए सियार और लोमड़ी ने प्रचार-मंत्री का जिम्मा बखूबी संभाल लिया है।अब जब जंगल है तो शेर तो रहेगा ही और वही राज भी करेगा।इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि इस जंगल में शेर पैदा नहीं होते बल्कि बनाये जाते हैं।शेर के अलावा जंगल के सारे प्राणी निरीह होते हैं।उसकी धमक ही ऐसी होती है कि दूसरे पशु अपने जीवन-निर्वाह के बजाय अपनी जीवन-रक्षा में ही लगे रहते हैं।इस तरह जंगल में गजब की शांति रहती है।हाथी,तेंदुआ और बाघ उसे चुनौती देने की हिम्मत नहीं रखते,फ़िर हिरन,खरगोश और बन्दर किस खेत की मूली हैं ?जंगल की सत्ता इसीलिए शेर के अनुकूल रहती है।

हमारे देश में बाघों की गिनती में सब लगे रहते हैं पर शेरों की गिनती कोई नहीं करता।इसका सीधा मतलब यही है कि एक समय में एक ही शेर होता है,उसकी गिनती करने से वो नहीं बढ़ेगा।वअपने आप नहीं पैदा होता,उसे गाजे-बाजे के साथ जंगल में उतरना होता है।ऐसा नहीं है कि शेर अभी ही  आया है।इसके पहले वाला तो बब्बर शेर था,पर अब ज़्यादा बुजुर्ग हो गया है।उससे अब शिकार भी नहीं किया जाता।उसने अपने पंजों को उतरती खाल के साथ छुपा लिया है,इसलिए ऐसा शेर किस काम का ?यह वाला तो अच्छी नस्ल का है और गिर के वन से लाया गया है।यह ज़ोर से गरजता भी है और अपनी गुफ़ा में हड्डियाँ भी टाँगे रहता है जिससे कोई बाघ या तेंदुआ शेर बनने की कोशिश न करे।जंगल के बाकी पशु तो शेर की एक गर्जना पर ही लोटने लगते हैं,उन्हें किसी किस्म की घास डालने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती।

जब से नए शेर ने जंगल का काम-काज संभाला है,रोज़ नई दहाड़ सुनाई देती है।इससे कमजोर पशुओं को लगता है कि वह उन्हें भालुओं और पड़ोसी जंगल के हिंसक पशुओं से बचा लेगा।उन्हें यह शेर बहुत वैरायटी वाला लगता है।पुराने वाले शेर को कोई घास भी डालने को तैयार नहीं क्योंकि उन्हें पता है कि घास खाने वाला शेर नहीं हो सकता।उधर भेड़िये और शिकारी कुत्ते शेर की आमद से थोड़ा हलकान हो गए हैं,आसमान में गिद्ध भी बेचैन हैं।ये सभी अब तक जंगल के पशुओं को नोचकर खा रहे थे और अपने भविष्य के प्रति निश्चिन्त थे। दूसरी ओर निरीह पशु सोच रहे हैं कि उनको तो हर हाल में नुचना ही है तो शेर का शिकार बनने में क्या हर्ज़ है ?
 
'जनवाणी' में १८/०९/२०१३ को

 

 

तीन तरह के सपने और आम आदमी !

18/09/2013 को जनसंदेश में



कोई कुछ भी कहता हो,देश में अभी सपने मरे नहीं हैं। परेशानियों की बातें करने वाले तो हमेशा रोते ही रहते हैं पर अभी भी बहुत कुछ बचा हुआ है,जिससे लगता है कि देश में समस्याओं की बातें करने वाले नादान हैं। इस समय कम से कम तीन लोग ऐसे हैं जो सपनों की बातें कर रहे हैं । इन स्वप्नदृष्टाओं के अलावा बचे हुए लोग इनकी चर्चा में लगे हुए हैं। सपनों के बारे में सोचने की आम आदमी की न तो हैसियत है और न हिम्मत। यह अलग बात है कि इनके सपनों के बारे में सारी खबरें सबसे पहले उसी के पास आती हैं। इन तीनों टाइप के सपनों में ही आम आदमी इत्ता व्यस्त है कि उसे अपने सपने की सुध ही नहीं । यही कमाल है,तीन तरह के सपनों की फिलासफी का।

प्रधानमंत्री-पद के उम्मीदवार नकली लालकिले पर चढ़कर भाषण देते हैं कि सपने नहीं देखना चाहिए क्योंकि इससे आदमी बर्बाद हो जाता है। देश का आम आदमी तो इस थ्योरी पर बहुत पहले से यकीन किए बैठा है,इसलिए उसके पास कोई सपना पेंडिंग है भी नहीं। वह तो बस दूसरों के सपनों को पूरा करने में भिड़ा हुआ है । नेता जी ने इस थ्योरी से ही सीख लेकर सपने देखने के बजाय उस पर अमल करना शुरू कर दिया है ,पर जनता के लिए सन्देश है कि वह सपने देखना बंद करे नहीं तो बर्बाद हो जायेगी। यह बात अगर जिसे समझ न आए,वही कुसूरवार है।

सपनों के बारे में दूसरी बात उस युवराज ने कही है,जिसको लेकर कई लोग सपने पाले बैठे हैं। उन्होंने तो यह कह दिया है कि वे अपने सपनों को कुर्बान करने के लिए तैयार हैं । वे यह सब आम आदमी के हित में ही करेंगे। इससे यह तो स्पष्ट हो गया कि उनके पास सपने हैं और उन्हें कुर्बान करने की हैसियत भी वे रखते हैं। आम आदमी सपनों को खाक कुर्बान करेगा। वह तो देखने तक की हैसियत में नहीं रह गया है। अब यह उसे सोचना है कि यह क़ुरबानी उसे कित्ती सस्ती पड़ती है ?

तीसरे टाइप का सपना सबसे दिलचस्प है। यह सदाबहार है। यह लगातार इतनी बार देखा गया है कि अब हवा में ही घुल गया है। पर इसे देखने वाली बुजुर्ग आँखें उसे जमीन पर लाने को आतुर हैं। उनके आत्मीय जनों ने बहुतेरा समझाया कि अब हवा का रुख दूसरी ओर है,पर वे बाल-हठ की तर्ज पर ‘लाल-हठ’ पकड़े हुए हैं। जहाँ दो लोग सपनों से दूर भागने की बात कर रहे हैं,वे देखने पर आमादा हैं। उन्हें लगता है कि जब उन दोनों का कोई सपना ही नहीं है,तो फ़िर वे ही बचते हैं। इन तीनों के बीच आम आदमी यह सोच रहा है कि इनके सपनों में वह कहाँ पर है ? 

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

सपनों का पूरा होना !

हरिभूमि में १७/०९/२०१३ को
Welcome To National Duniya: Daily Hindi News Paper
१७/०९/२०१३ को 'नेशनल दुनिया' में !

 

 
आखिरकार उन्होंने लाल किले से चढ़कर भाषण दे ही दिया। ऐसा करके उन्होंने साबित कर दिया कि सपने देखना नहीं चाहिए,जितनी जल्दी हो ,उन पर अमल कर अपनी मुराद पूरी कर लेनी चाहिए । समय भी बड़ा कठिन है,पता नहीं, कब कौन किसको गच्चा दे जाए ? थोड़े दिनों पहले ही उनको यह आभास हो गया था कि सपने देखने से आदमी बर्बाद हो जाता है। उनका यह कहना अकारण भी नहीं था। यह उन्होंने लम्बे अनुभव से सीखा है। वे अपने अग्रज के सपने देखने और उनका हश्र बखूबी समझ चुके हैं,इसलिए कोई जोखिम  नहीं उठाना चाहते थे। यह सपने देखने का नहीं पूरा करने का समय था,इसलिए उनके अनुयायी जी-जान से इस काम में जुट गए हैं।

सपनों में ताजमहल बनाने की कोशिशें कई लोगों ने की हैं और कुछ लोगों ने उसे मूर्त रूप भी दिया है। लाल किले पर चढ़कर झंडा फहराने का सपना भी आज़ादी के बाद से लगातार देखा जा रहा है,पर उसे मूर्त रूप देने की कोशिश किसी ने नहीं की। चूँकि वे सबसे अलग दिखने वाली पार्टी के नेता हैं और फेंकने के काम में महारत हासिल कर चुके हैं ,इसलिए यह उनके ही बूते की बात थी कि लाल किले पर चढ़कर बोलने की कल्पना को साकार कर दिया जाए। खबर है कि देश का कारपोरेट उनके साथ है,इसीलिए उनके इस काम में कोई मुश्किल भी नहीं आई ।

वैसे तो उनका रथ समय से काफ़ी पहले दिल्ली की ओर कूच कर चुका है पर उनकी पार्टी के ही कुछ लोगों की मंशा ठीक नहीं है। बार-बार लग रही अड़ंगेबाजी से तंग आकर असली लाल किला पहुँचने से पहले ही बीच रास्ते में उनके भक्तों ने एकठो लाल किला बनवा दिया । वे उस पर चढ़कर अपने अंदरूनी और बाहरी विरोधियों को संकेत देना चाहते थे कि वे केवल फेंकते ही नहीं, ’फेकलाल किले पर चढ़ भी सकते हैं। उनके इस कदम की भनक उनके अग्रज को भी नहीं लगी । अब वे बैठे माथा पीट रहे हैं कि मुआ,यह आइडिया उनके दिमाग में क्यों नहीं आया ? उनके तो नाम में भी लाल लगा है ।

बहरहाल,वे भी अब लाल किले से बोलने वाले नेता बन गए हैं। कुछ लोगों को लगता है कि वह तो नकली था,सो उससे क्या ?जो असली लाल किले से बोलते हैं,उन्होंने कौन-सी क्रांति ला दी ? लाल किले पर चढ़कर बोलने से किसी की आत्मा पर किसी प्रकार का दबाव नहीं बनता और न ही बोले हुए को पूरा करने का दायित्व होता है। जब बोलने का हश्र दोनों जगह एक जैसा ही होना है तो क्या फर्क पड़ता है असली और नकली लाल किले में ?इसलिए वे तो बोलकर ही खुश हैं।

उनके कुछ सलाहकारों ने सलाह दी है कि जब तक दिल्ली दूर है,गाँधीनगर को ही दिल्ली का नाम दे दिया जाय। इसके साथ ही वे सामने वाली गली का नाम 'रेसकोर्स रोड' रख कर तथा अपने आवास पर प्रधानमंत्रीकी नामपट्टिका लगाकर सपनों के पूरे होने का अहसास कर सकते हैं।

 

 

बुधवार, 11 सितंबर 2013

सावधान ,आगे चुनाव हैं !

Welcome To Jansandesh  Times: Daily Hindi News Paper
जनसंदेश में ११/०९/२०१३ को !

जनवाणी में ११/०९/२०१३ को

 

उसे बहुत उम्मीद थी। पिछले काफ़ी समय से वह इस इंतज़ार में था कि बस,थोड़े दिनों की बात है,उसकी सारी परेशानियाँ दूर हो जाएँगी। मंहगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ कई आंदोलनों में वह ख़ूब सक्रिय रहा। अख़बारों में रोजाना बलात्कार की खबरें उसे परेशान कर देती थीं। बहुत दिनों से उसके अंदर सरकार, व्यवस्था और राजनीति के प्रति एक ज्वालामुखी धधक रहा था। एक उम्मीद बची थी कि चुनाव में वह अपने मन की करेगा और सारी व्यवस्था को बदल कर रख देगा। इस सबसे लड़ने के लिए उसने बकायदा तख्तियाँ और बैनर बनवा लिए थे। इनमें मंहगाई,भ्रष्टाचार और बलात्कार के खिलाफ कड़े सन्देश थे। इन्हीं को लेकर वह कई बार जंतर-मंतर,इंडिया गेट और हज़रतगंज चौराहे पर लहरा चुका था,पर आज यही सब उसे बेकार लग रहे थे ।

जो अखबार लम्बे समय से मंहगाई और भ्रष्टाचार की खबरों में डूबे थे,आज अचानक खून से लाल हो गए । पहले तो वह समझ ही नहीं पाया कि यह सब कैसे और क्यों हुआ,पर जिस राजनीति को वह बदलने की सोच रहा था,उसी ने उसकी आँखें खोल दीं। अख़बारों में सभी दलों के नेता अमन-चैन की पुरजोर अपील करने लगे। सरकार ने बयान जारी कर दिया कि यह सब विरोधियों की साज़िश है। विरोधियों ने बताया कि सरकार यही सब करना चाहती है,उसे बने रहने का कोई हक नहीं है। पहले उसने सरकार के बयान पर गौर किया। वह लगने लगा कि असली सत्ता विपक्ष के हाथ में है क्योंकि सरकार भी कह रही है कि उसने कुछ नहीं किया,सब विपक्ष ने किया है। उसको इस बात का जवाब नहीं मिला कि फ़िर सरकार बनी ही क्यों ?

उसे सरकार से तो उम्मीद थी ही नहीं,सो उसने अब विपक्ष के कहे पर ध्यान दिया । उसे लगा कि जो लोग धर्म-कर्म को मानते हैं,अभी-अभी चौरासी कोस की परिक्रमा करके निपटे हैं,ज़रूर ठीक बोल रहे होंगे। उनके बयानों में मरने वालों के लिए संवेदनाएं होंगी,मलहम होगा,पर वे तो सरकार के जाने के बहाने ढूँढ रहे हैं। इस मार-काट से कोई दुखी नहीं है। सब अपनी-अपनी सम्भावनाएं टटोल रहे हैं,गिनतियाँ हो रही हैं। मार-काट के खिलाफ ज्ञापन देते हुए अख़बारों में मुस्कुराती हुई फोटो छप रही हैं। टीवी चैनलों पर सभी पाक-साफ़ दिख रहे हैं,गोया किसी दूसरे ग्रह से आए लोगों ने यह माहौल पैदा किया हो ! यह सब देख-सुनकर उसका मन खिन्न हो उठा।

वह अब तक जिस चुनाव का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था,उससे डर लगने लगा। उसने पास पड़ी तख्तियों और बैनरों को समेट लिया। वह मंहगाई,भ्रष्टाचार और बलात्कार को भूल चुका था। अब ये कोई समस्या नहीं रह गई थी। जब सबके धर्म ख़तरे में हों,तो वह भी कैसे बच सकता था ?उसने जान लिया था कि वह एक कठपुतली मात्र है। उसके बनाये मुद्दे हवा हो चुके थे,राजनीति जीत गई थी । सभी नेता चुनावों से पहले ऐसी हवा पाकर फूले नहीं समा रहे थे।  जहाँ रहनुमाओं को चुनाव का बेसब्री से इंतज़ार था वहीँ उसे चुनाव बीत जाने का !  

 

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

अंकल सैम का अमन-चैन !

06/09/2013 को 'नई दुनिया' को !



अंकल सैम एक बार फ़िर से दुनिया में शांति स्थापित करने पर आमादा हैं। बहुत दिनों से उन्हें इस तरह के काम का इंतज़ार था,पर लोग उन्हें मौका ही नहीं दे रहे थे। वे शांति-स्थापना के लिए इतने प्रतिबद्ध हैं कि बिना किसी के गुहार लगाये ही उसकी कामना पूरी कर देते हैं। इसका उन्हें काफ़ी लम्बा अनुभव है। अभी हाल ही में अफगानिस्तान,ईराक आदि देशों में वे उजाड़ खंडहरों जैसी शांति स्थापित कर चुके हैं। अपने देश का वर्तमान और भविष्य सुधारने के लिए उन्होंने पुरानी सभ्यताओं को अतीत का हिस्सा बना दिया। कहीं से कोई प्रतिरोध नहीं हुआ,इसलिए अंकल सैम निश्चिन्त हो गए कि चौतरफ़ा शांति छा गई। अब कुछ सिरफिरों ने सीरिया में सिर उठाया है तो अंकल सैम कैसे चुप बैठ सकते हैं ?

अंकल सैम कोई सामान्य बुद्धि वाले व्यक्ति नहीं हैं। वे अपने सब निर्णय नाप-तौल कर लेते हैं। दुनिया के दूसरे हिस्सों में भले ही आर्तनाद हो रहा हो,पर वे अपनी आत्मा की आवाज़ पर ही सक्रिय होते हैं। उनके पास मित्रों की कमी नहीं है क्योंकि वे डॉलर वाले मुल्क के नेता हैं। उनकी मुद्रा के आगे रूपया पानी और दिरहम तेल भरता है। इसलिए उनके मुख से निकली हर बात पर दर्जनों गरदनें सहमति में सिर हिलाती हैं। वे अपना भला और दूसरे का बुरा अच्छी तरह समझते हैं। यही वजह है कि इस ग्लोबल दुनिया के वे अकेले थानेदार हैं। वे बिना रपट लिखवाये फैसला देते हैं और रपट लिखवाने पर गहरी नींद में चले जाते हैं।

अंकल की मिसाइलें इतनी ताकतवर हैं कि हमारे जैसे देश के लोगों को तो छोड़िये,बाज़ार तक सहम जाते हैं। उन्होंने केवल अपने मित्र के साथ मिसाइल का परीक्षण भर किया कि हमारे दलाल-पथ में सन्नाटा छा गया और रुपया टके के भाव हो गया। सोचिये,जब ऐसी शक्तिशाली मिसाइल वास्तविक रूप से छोड़ी जायेगी तो उसकी मार कहाँ-कहाँ असर करेगी ? दिखने में तो उनकी मिसाइलें दुश्मनों के खेमे पर चलती हैं पर उनकी मारक-क्षमता से कई देशों की अर्थ-व्यवस्थाएं ज़मीदोज़ हो जाती हैं। कहावत है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है,पर यहाँ बिना कुछ खोये सब पाना निश्चित है। यह बात वे अपनी जनता को हर बार समझा देते हैं।

अब जब सभी मित्र देशों की सहमतियाँ मिल गई हैं,समर्थन के रुक्के अंकल सैम की जेब में आ गए हैं,किसी भी क्षण वे शांति-बहाली के लिए अपने मिसाइल की बटन दबा सकते हैं। अंकल सैम दुनिया के एकमात्र ऐसे उदाहरण हैं जो स्वयं शिकायत का संज्ञान लेते हैं और स्वयं जांचकर फैसला भी सुना देते हैं। बाकी दुनिया श्रद्धा-भाव से उनके प्रवचन सुनती है और अमल भी करती है। अंकल सैम ने अपने यहाँ आतंकवाद तो खत्म किया ही और कई देशों को भी उपकृत किया। उनकी इस परोपकारी भावना से प्रभावित होकर हमने भी दो-तीन बार चिट्ठियां भेजीं,पर हमें प्रसाद की जगह ‘गोली’ दी गई। उसी गोली को हम पानी के साथ लगातार गटक रहे हैं।

फ़िलहाल,सीरिया में शांति बरसने वाली है। वहाँ के बच्चे-बूढ़े तो अभी से इसका अहसास करने लगे हैं। हमारे बाज़ार ने पसरकर इसका संकेत दे दिया है,जल्द ही समूची दुनिया अंकल के अमन की जद में होगी।

 

बुधवार, 4 सितंबर 2013

बाबा बैकुंठ में हलकान हैं !


४/९/२०१३ को जनसंदेश में

 ४/९/२०१३ को जनवाणी में

बाबाजी बहुत दुखी हैं।वे दूसरों को दिन-रात सुख का प्रसाद बाँटने में लगे हुए थे,अपनी चिंता कभी की ही नहीं ।’माँ-बेटे’ ने इस बात का फायदा उठाकर उन्हें घोर कष्ट दे दिया।बाबा दूसरों के आर्तनाद सुनने के आदी हो चुके थे, कभी सोचा भी नहीं कि स्वयं को आर्तनाद करना पड़ेगा।वर्षों से भक्ति में चुँधियाये हुए  भक्तों और सेवकों के वे तारणहार बने हुए थे।कभी उनकी नाव भी भंवर में फंसेगी,सोचा न था।बाबा  बड़ी मेहनत से नाच-गाकर लोगों को पवित्र कर रहे थे पर कारागार जाकर खुद अपवित्र हो गए।दूसरे बाबा लोग और नेता इस साज़िश को समझ गए हैं।नेताओं के हिसाब से कोई तभी अपराधी है जब यह पता चले कि उसका धर्म क्या है ?वे तो धर्म के हिसाब से ही आतंकवादी और बलात्कारी की पहचान कर लेते हैं।हमारे रहनुमाओं में इतनी दिव्य-दृष्टि आ चुकी है।फ़िलहाल भक्तों की ‘किरपा’ से बाबा भुगत रहे हैं।

बाबा अपने भक्तों को यकीन दिलाते थे कि जो कुछ होता है,उनकी मर्जी से ही ।भक्त भी यही माने बैठे थे।बाबा और भक्त के बीच से भगवान भी गुम हो गये ।बाबा ने अपने बड़े-बड़े चित्र वाले कलेंडरों और पत्रिकाओं से यह साबित कर दिया कि वही भगवान हैं।अब जब ऐसा सम्मोहन तारी हो जाए तो भक्त या सेवक को कुछ सोचने या करने की ज़रूरत नहीं रह जाती।भगवान के बदले सारा काम बाबा  ही करते थे पर तभी बाबा के खिलाफ साज़िश शुरू हो गई।गोया साजिशें भगवान से भी बढ़कर काम करने लगीं।

बाबा तन-मन-धन से भक्तों के प्रति समर्पित थे और ऐसा ही समर्पण वे उनसे चाहते थे,पर एक भक्त ने उन्हें ‘आत्म-समर्पण’ करने को मजबूर कर दिया।सैंकड़ों पुलिस वाले बाबा के आश्रम में उनकी आरती उतारने को उतावले थे,पर बाबा दर्शन देने को ही नहीं तैयार थे।पुलिसवाले नासमझ थे क्योंकि वे बाबा के अंतर्ध्यान होने की कला से अनजान थे।जब बाबा इस ध्यान में होते हैं,उन्हें केवल अपने अस्तित्व की चिंता होती है।आखिरकार जब चौतरफ़ा शंख-ध्वनि हुई तो बाबा का दिल पसीजा और जन-कल्याण के लिए वे प्रकट हुए।बाबा इतने पवित्र शरीरधारी हैं कि कारागार के नाम से ही थरथराने लगे।इधर बाबा के कारागार में आने से अन्य कैदी अपने मोक्ष के प्रति आश्वस्त हो गए हैं ।उनको लगता है कि जल्द ही बाबा उन्हें प्रवचन देकर कृतार्थ करेंगे क्योंकि अब वे सब एक ही बिरादरी के हैं।पर दूसरों को बैकुंठ भेजने वाले बाबा को अब बैकुंठ नहीं सुहा रहा है।

कृष्ण-कन्हैया के बाद कारागार के दर्शन करने वाले बाबा दूसरे भगवान बन गए हैं ।जहाँ कृष्ण के कारागार में पैदा होने पर सब कुछ पवित्र हो गया था,वहीँ बाबा के वहाँ जाने पर वे खुद अपवित्र हो गए।अब ऐसे अपवित्र हुए भगवान को कौन पवित्र कर सकता है,यही सोचकर बाबा हलकान हैं।

 

सोमवार, 2 सितंबर 2013

वह सुबह कभी तो आएगी !


२/९/२०१३ को हरिभूमि में
 
रुपये के रोज़ रसातल में जाने की और सोने के सातवें आसमान में पहुँचने की खबरों से हमारी बेचैनी बढ़ रही है। हमें लगता है कि इसका कारण हमारे दिल का कमज़ोर होना ही है। अभी तक इस बात की कोई खबर नहीं मिली कि इन खबरों से सरकार की तबियत खराब है। इस रोजाना की उठापटक से दूर सरकार के सभी सलाहकार बंकरों में सुरक्षित बैठे हुए हैं। वे सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर अभी भी निश्चिन्त हैं। जनता भी सरकार की मुस्तैदी की कायल हो चुकी है। उसे लगता है कि उसकी सरकार सब संभाल लेगी। सँभालने वाले समझ रहे हैं कि रुपया,सेंसेक्स और सोने के भाव अपने आप ठिकाने पर आ जायेंगे ,ये केवल ‘दिनन का फेर’ है। सारी गलती अख़बारों की है जो विकास की खबरों के बजाय गिरते हुए रूपये के पीछे पड़े हैं। डॉलर की गुगली से रुपया बार-बार बीट हो रहा है पर उसके उद्धारक पवेलियन में बैठे इस बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि वह कम से कम शतक लगा ले तो फील्ड पर आयें। इसलिए हम जैसे कमज़ोर दिल वाले दर्शकों का भले ही रोज़ कलेजा बैठ रहा हो,देश के कप्तान को लगता है कि वे बिना कुछ कहे और किए ही बाजी जीत लेंगे।

देश में रूपये की हालात पर बेजा चिंता जताई जा रही है। ऐसे रूपये का गिरना तो स्वाभाविक ही है जिस पर गाँधी बाबा की पुरानी फोटो लगी हुई है। वे देश के जननेताओं के मानस से कब के उतर चुके हैं,अब अगर नोटों से भी जितनी जल्दी उतर जांय,ठीक रहेगा। आज़ादी के बाद उनके बताये अनुसार देश चलता तो ठीक से खड़ा भी नहीं हो पाता । इस सचाई को हमारे कर्णधारों ने जल्द पहचान लिया और उनके विचारों को खूँटी पर टाँगकर उनकी फोटो को अपना लिया। इसीलिए हर सरकारी दफ्तर में गाँधी जी निगहबानी करते मिलते हैं। अब उन्हीं की आँखों के सामने उनके अनुयायी नए भारत का निर्माण करने में जुटे हैं। जाहिर है यह एक कठिन प्रक्रिया है,पर वे गिरकर भी इसका निर्वाह करने में तत्पर हैं।

अगर रुपया गिर रहा है तो सोना छलाँग लगा रहा है। इन दोनों बातों से आम आदमी खुश और बेफिक्र है। रुपया तो उसके हाथ में पहले से ही नहीं रहा,तो उसके गिरने और बने रहने से उसे कोई अंतर नहीं पड़ता और रही बात सोने की तो वह इसकी भरपाई ख़ूब नींद लेकर कर लेता है। सोना हाथ में होने पर उसको खटका बना रहता है ,इसलिए अच्छा है कि सोना सातवें आसमान में ही रहे। इस रहस्य को हमारी सरकार भी जान गई  है। हो सकता है,इसी वज़ह से उसने ‘खाद्य-सुरक्षा’ की चादर ओढ़ ली हो और सोने की खोज में सातवें आसमान में हो। अब वह रूपये को तभी तो संभाल पायेगी,जब सोने से फुरसत पायेगी ।

देश को यकीन हो न हो,पर सरकार निश्चिन्त है कि किसी सुबह अख़बारों में वह खुशहाली की खबर पढ़ लेगी। सबकुछ अपने आप ठीक हो जायेगा। चिंतित लोग केवल उस सुबह का इंतज़ार करें !