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शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

व्यंग्य की युवा पीढ़ी और चुनौतियाँ !

व्यंग्य से हमारा सीधा सम्बन्ध करीब चार साल से है,जबसे हमने औपचारिक रूप से अख़बारों और पत्रिकाओं में लिखना शुरू किया।यह बिलकुल वैसा नहीं रहा कि अचानक व्यंग्य दिमाग़ में घुसा और हमने उसे कागज में उतारकर धर दिया हो।यानी कि यह ओवरनाइट जैसी कोई उपलब्धि नहीं रही।बचपन से ही घर-परिवार-दोस्तों के बीच टेढ़ी बात करने की आदत रही।व्यक्तिगत जीवन में कई बार मेरे तंज के कारण निजी सम्बन्ध भी प्रभावित हुए।यह हमारे व्यंग्य-लेखन की पृष्ठभूमि हो सकती है पर यह सब व्यंग्य नहीं है,यह भी जानता हूँ।जबसे लिखना शुरू किया है,मुझे अमूमन आनंद मिलता है।व्यंग्य मेरे लिए केवल मनोरंजन जैसा नहीं है।व्यंग्य लिखना शौक भी है और एक कर्तव्य भी।


व्यंग्य को लेकर मेरी शुरूआती समझ यही है कि जब भी कुछ आपको कचोटता है,दुखता है,पिराता है,आप अपने को इस माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं।शालीनपूर्ण विरोध करने के लिए व्यंग्य सबसे बढ़िया ‘टूल’ है।(हथियार नहीं कहूँगा क्योंकि आजकल इसके सन्दर्भ बदल गए हैं।हर आदमी फरसा लिए घूम रहा है )।व्यंग्य लिखने के लिए सबसे ज़रूरी बात लक्ष्य तय करने की है।आपको सबसे पहले यह विचार करना है कि जिस बात को हम कहने जा रहे हैं,वह व्यक्ति-केन्द्रित है या प्रवृत्ति-केन्द्रित।हाँ कई बार व्यक्ति इतना हावी हो जाता है कि वह प्रवृत्ति बन जाता है।इसी से यह बात भी साफ़ हो जाती है कि आप कमजोर पर प्रहार कर रहे हैं या सहजोर पर।हमें याद रखना चाहिए कि कोई भी सत्ता या व्यवस्था दुर्बल नहीं होती।राजनीति में अमूमन कमजोर कोई नहीं होता।कोई कम मजबूत है तो कोई अधिक।सब मिले हुए हैं।हमें रोजाना अधिक विषय भी राजनीति से ही मिलते हैं।अगर आपको लगता है कि व्यंग्य पर क्या लिखा जाए,तो आप चैनल खोलते हैं या अख़बार पलटते हैं।जैसे हवा-हवाई बयानबाजी होती है,वैसे ही आपका विषय भी जल्द हवा हो जाता है।हम उन विषयों को बहुत कम पकड़ पाते हैं,जिन्हें रोजमर्रा की ज़िन्दगी में भोगते हैं।

राजनीतिक विषयों पर लिखने की बाढ़ है।टीवी खोलते ही विषय छलक पड़ते हैं।न्यूज़ चैनलों की बहस में हम एक पक्षकार की तरह न पड़ें बल्कि अपनी अलग दृष्टि रखें।इसके अभाव में हमारी दृष्टि किसी पार्टी-प्रवक्ता या समर्थक की तरह हो जाएगी।जो दिखाया जा रहा है,उसके पीछे की नज़र व्यंग्यकार के पास होनी चाहिए।तभी वह किसी बयान या घटना के सीधे प्रसारण से बच सकता है।


साहित्य में आज सबसे ज्यादा मारामारी है तो व्यंग्य में ही है ।जो नए हैं वो छपना चाहते हैं,जो नामचीन हैं वो कॉन्ट्रैक्ट पे रेगुलर होना चाहते हैं।व्यंग्य लिखकर साहित्य की मुख्य-धारा में कूदना सबसे आसान लगता है।यह प्रसिद्धि का शॉर्टकट बन गया है।नई पीढ़ी इसी में आत्ममुग्ध हैं।हमारे अधिकतर संपादक और आलोचक भी चाहे-अनचाहे इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे हैं।इससे नुकसान उन्हें नहीं जो इस लायक नहीं हैं।उन्हें तो कुछ फायदा ही मिल रहा है,जिसके काबिल वो नहीं हैं,पर नुकसान केवल व्यंग्य का हो रहा है।नई पीढ़ी सीधे-सपाट लिखे संस्मरण को,चुटीली किस्सागोई को,चलताऊ मुहावरेबाजी को ही व्यंग्य समझ रही है।वह केवल शब्दों के साथ खेल को ही व्यंग्य मान रही है।भाषा तो पठनीय हो ही,पर यदि उसमें तंज का हथौड़ा नहीं है तो वह अपने शिकार को तोड़ने में समर्थ नहीं।व्यंग्य आपके डीएनए में होता है।इसे आप स्किल-इंडिया के प्रोग्राम के तहत डेवलप नहीं कर सकते।हाँ,अध्ययन-मनन या गाइडेंस से थोड़ा मेक-अप ज़रूर किया जा सकता है।जिसे कुछ लोग तकनीकी भाषा में व्यंग्य का सौंदर्यशास्त्र कह सकते हैं।


नई पीढ़ी के बारे में अभी यह भी निश्चित नहीं है कि वह वाकई में आई है या नहीं।अभी भी हम हर बात में परसाईं,जोशी,श्रीलाल और त्यागी जी को ही कोट करते हैं।व्यंग्य की बात वहीँ से शुरू और वहीँ पर खत्म हो जाती है।इस लिहाज से तो उनके बाद जो पीढ़ी आई,अभी तक युवा है और उसी में नए-नए लोग जुड़ते जा रहे हैं।पीढ़ियों में विभाजक-रेखा नहीं दिख रही।चालीस साल पहले लिखने वाले अभी लिख रहे हैं और वैसे ही लिख रहे हैं। है।स्तम्भ लेखन से शुरू हुए थे,आज भी केवल स्तम्भ लिख रहे हैं।पीढ़ी कब रिप्लेस होगी,पता नहीं।शायद अगले बीस-तीस सालों तक भी नहीं।ऐसा भी नहीं है कि नई पीढ़ी के पास अच्छे,अनुभवी और आदर्श व्यंग्यकारों का निर्वात हो,टोटा हो।यह नई पीढ़ी की कमजोरी है कि उसके पास अपने पूर्ववर्तियों को जानने,समझने,पढ़ने का समय नहीं है।सबकी अपनी पसंद और राय होती है।मेरी भी है।अब तक जो पढ़ा है,बेझिझक कह सकता हूँ कि ज्ञान चतुर्वेदी,नरेन्द्र कोहली,सुशील सिद्धार्थ,सुभाष चंदर आदि ऐसे लेखक हैं,जिन्हें पढ़कर समकालीन व्यंग्य समझा जा सकता है।इसके अलावा भी और लोग हो सकते हैं,जो हमारी संकुचित दृष्टि से वंचित रह गए हों।

पिछले पाँच-सात सालों में इस पीढ़ी में बहुत से लोग जुड़े हैं।व्यंग्य ऐसी अकेली विधा है,जिसमें हर दिन नया नाम दिखता है,पर उसका व्यंग्य कहीं नहीं दिखता।आज सैकड़ों लोग व्यंग्य लिख रहे हैं पर जिन चंद लोगों से उम्मीदें हैं,उनमें सुरजीत सिंह,अनूपमणि त्रिपाठी,पंकज प्रसून,निर्मल गुप्त,शेफाली पांडेय आदि हैं।इनमें ‘आदि’ में मेरी जबरदस्त सम्भावना है।हालांकि खुद मुझको मुझसे ज्यादा उम्मीद नहीं है।इन गिने-चुने लोगों में बर्बाद होने की उतनी ही गुंजाइश है।यह स्थिति बताती है कि नए समय में व्यंग्य कहाँ जा रहा है।आज हर तीसरा आदमी व्यंग्य लिख रहा है पर यदि तीन व्यंग्यकार खोज निकालने हों तो पसीने छूट जायेंगे।हाँ,हर व्यंग्यकार और आलोचक की अपनी-अपनी टीम है।यह व्यंग्य का नया समय है।मुँहदेखी और गुटबाजी और सम्मान-समारोह इसकी यूएसपी है।नई पीढ़ी पढ़ने-लिखने के बजाय इसमें व्यस्त है।वह अपने समकालीनों को खूब पढ़े,व्यंग्य समझे तब लिखे।मौका मिले तो अपने लिखे को भी एक बार पढ़ ले ।केवल छपने के दम पर आप अधिक समय तक व्यंग्यकार नहीं बने रह सकते।यह हमारे-आपके जीवन-मरण का नहीं वरन व्यंग्य के अस्तित्व का प्रश्न है।इसको इसी दृष्टि से देखें।लेखन बहुत बदल गया है।जो समय के साथ बदल रहे हैं,अभी भी प्रासंगिक हैं।ज्ञान चतुर्वेदी इसके सशक्त उदहारण हैं।


समकालीन आलोचक भी अपनी सही भूमिका नहीं निभा रहे हैं।अधिकतर आलोचक रद्दी-किताबों की भूमिका लिखने में ही अपनी भूमिका देख रहे हैं।उनको हम जैसे लेखकों से भी शिकायत है।हम अच्छा नहीं लिख रहे हैं तो वे क्या आलोचित करें ? पर आज अधिकतर आलोचना या समीक्षा के नाम पर जो भी हो रहा है,दयनीय लगता है।दोस्ताना-आलोचनाएँ और सुपारी-समीक्षाएं हो रही हैं।‘तुम हमें सम्मान दो,हम तुम्हें व्यंग्यकार बना देंगे’ की पैकेज-डील हो रही है।वाहवाही और बधाई देने के लिए उदारमना बनने की होड़ मची हुई है।व्यंग्य का इतिहास लिखना व्यंग्यकारों की जनगणना करने जैसा कर्म बन गया है।यह बाजारवाद का विस्तार है पर इससे व्यंग्य की समझ संकीर्ण हुई है।इतिहास को लिखने की भी एक दृष्टि होती है पर आज वह समदर्शी हो गई है।सबको साधने की कला, व्यंग्य की आधुनिक साधना है।उसे ‘फनलाइनर’ और व्यंग्यकार एक जैसे दिखते हैं।माना कि व्यंग्य के पास भी ‘फ़न’ है,पर वह तो दुष्प्रवृत्तियों को डसता है भाई।


समकालीन व्यंग्यकारों के सामने कई बड़ी चुनौतियाँ हैं पर वे व्यंग्य लिखने को सबसे कम चुनौती-पूर्ण मानते हैं।हमारी चिन्ता उनके प्रति है जो दाएँ हाथ से लिखते हैं।जिनके लिए व्यंग्य-लेखन बाएं हाथ का खेल है,वे तो पहले ही चैम्पियन बन चुके हैं।उनसे कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं है।ये बातें सिर्फ़ उनके लिए हैं जो व्यंग्य से प्रेम करते हैं।हम या आप व्यंग्य के इतिहास में रहें या इतिहास बन जाएँ,यह महत्वपूर्ण नहीं है।महत्वपूर्ण यह है कि व्यंग्य की ‘स्पिरिट’,उसकी मूल भावना जीवित रहनी चाहिए।आज उसी पर संकट है।इसकी सबसे पहली जिम्मेदारी मैं लेता हूँ। क्या हम इस लायक भी हैं ?

1 टिप्पणी:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

आज की ब्लॉग बुलेटिन मोमबत्ती की याद तभी आती है,जब अंधकार होता है मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ...

सादर आभार !