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मंगलवार, 20 अगस्त 2013

असली गिरावट यहाँ है !


हिंदुस्तान में २०/०८/२०१३ को

जब हर जगह उनके गिरने की खबर गर्म थी,शेयर बाज़ार और रूपये ने औंधे मुँह गिरकर उनकी लाज बचा ली। आम आदमी के लिए तीन सौ पैंसठ दिन ‘ब्लैक-डे‘ होता है पर बाज़ार ने उनके लिए एक दिन ‘ब्लैक फ्राइडे’ मना लिया तो हंगामा मच गया। देश में जिस समय लाल-किले में दिए प्रधानमंत्री के भाषण पर बहस होनी चाहिए थी ,वहाँ दलाल-पथ के भालू ने कब्ज़ा कर लिया। सारे विशेषज्ञ देश और दामाद को छोड़कर बाज़ार को बचाने में व्यस्त हो गए। उन्होंने अचानक आई इस गिरावट से राहत की साँस ली और वे फिर से गिरने की तैयारी में जुट गए।
एक तरफ जहाँ टमाटर और प्याज अपनी ऊँचाई के पिछले रिकॉर्ड सुधार रहे हैं,वहीँ रुपया सतह से भी नीचे जाने पर आमादा है। अख़बारों में इस बात की खबरें आ रही हैं कि निवेशकों का लाखों-करोड़ रुपया डूब गया। भोला-भाला आम आदमी इस खबर पर यकीन कर लेता है। वह भरी बारिश में नदी,नाले,गड्ढे में डूबे हुए रूपये को खोजता है पर खाली हाथ लौटता है। उसे तो तब धक्का लगता है जब पता चलता है कि इस खोजबीन में उसके टेंट में बंधा पाँच रूपये का नोट भी कहीं खिसक गया। रूपये को उठाना सबको आता भी नहीं,यह काम बड़ी कुशलता से किया जाता है।
आम आदमी भले अपना पाँच रुपया नहीं सँभाल पाता हो,पर उनको अपनी गठरी बचाने का पूरा अनुभव है। शेयर बाज़ार के विमुख होते ही वह सोने की शरण में चले जाते हैं। उन्हें गिरते हुए रूपये को सोने और डॉलर में तब्दील करने की कला खूब आती है। इसीलिए उनका हमेशा से यही मानना है कि रुपया उसी के पास होना चाहिए जो उसे सँभाल सके। यह भी हो सकता है कि इसी बात को आम आदमी को समझाने के लिए रुपया गिर रहा हो ! आखिर उबारना तो उनको ही है और उठाना भी। अगर भूलचूक से या सरकारी सब्सिडी या डायरेक्ट-कैश के ज़रिये रुपया किसी तरह आम आदमी के खीसे में पहुँच भी गया तो उसे भी ‘वो’ अपने बोरे में भर लेते हैं।
ऐसा नहीं है कि सब जगह गिरावट का ही बोलबाला है। इस बात को वे समझते हैं; तभी सब्जी,दाल और पेट्रोल-डीजल को हिदायत है कि वे बराबर बढ़ते रहें। गिरने के लिए देश में चरित्र ,ईमान और नैतिकता की कोई कमी नहीं है। उन्होंने उसे बाज़ार की गिरावट के बराबर कर दिया है। रुपया इसीलिए नहीं उठ पा रहा है क्योंकि उसने ईमान से होड़ ले रखी है। वे इस बात का ज़रूर ख्याल रख रहे हैं कि इस मुकाबले में उनका ईमान रूपये से पीछे न रह जाए। आने वाले समय में यदि रुपया और गिरता है तो उसकी चिंता न करें बल्कि यह सोचें कि इसके लिए बेचारे ईमान को कितना गिरना पड़ा होगा !
 

 जागरण आई नेक्स्ट में २०/०८/२०१३ को !

1 टिप्पणी:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सब चीजें गिर कर जब नीचे ही पहुँच रही हैं तो सोचते हैं कि नीचे ही बैठ जाते हैं, वहीं सब आ जायेंगी।