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गुरुवार, 15 अगस्त 2013

हम कर सकते हैं !


 
15/08/2013 को कल्पतरु में !
विपक्ष के संभावित प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नेता ने हाल ही में एक बड़ी रैली में आह्वान किया है कि ‘यस वी कैन’ यानी ‘हम कर सकते हैं’। इस नारे पर पूरा देश झूम गया है। ऐसा नहीं है कि यह नारा उन नेता ने इजाद किया हो,पर आज वो जो भी कहते हैं,खबर बन जाती है। इसी तरह का आह्वान करके ओबामा ने अमेरिकी चुनाव जीत लिया। उन्होंने चुनाव जीतने के बाद पाकिस्तान के अंदर घुसकर ओसामा को मारकर वाकई करके दिखा दिया । अमेरिकियों को अभी भी उन पर भरोसा है कि उसको मारने के बाद वे उनकी बेरोज़गारी और आर्थिक बदहाली की भी सुध लेंगे। उनका इंतज़ार अभी ज्यादा लंबा नहीं हुआ है पर अब वह नारा अमेरिका के लिए अप्रासंगिक हो गया है।

हमारे देश के लिए यह नारा तो नया है पर इस पर अमल बहुत पहले से हो रहा है। आज़ादी के बाद से ही सत्तारूढ़ दल और उसके नेता जी-जान से देश के लिए करने में जुटे हुए हैं। न जाने कितनी पनडुब्बियाँ,हेलीकॉप्टर,तोपें इस काम में लगाई गईं पर विरोधियों ने इसे घोटाले और स्कैम का नाम दे दिया। सत्ता चलाना आसान काम नहीं है। बेचारों ने खेल,कोयला,पत्थर,ज़मीन यानी जल,थल और नभ हर जगह किया। इसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं बरता गया,बालू और कफन को भी बराबर सम्मान मिला। यह काम इतनी व्यापकता से हुआ कि दफ्तर का हर बाबू,अफसर,चपरासी तक इसमें निपुण हो गया। ऐसे सनातन-काल से चले आ रहे फार्मूले को आज नारा बनाना हास्यास्पद नहीं तो क्या है ?

विपक्ष के लोग तो केवल कहने भर के हैं,उनकी सुनता कोई नहीं है। कुछ समय पहले विपक्ष के ही नेता द्वारा नारा दिया गया था,’सबको देखा बार-बार,हमको परखो एक बार’ और जनता ने उनके नारे को सही मान लिया। वे एक बार के लिए ही आ पाए क्योंकि जनता ने उनकी ही बात पर अमल किया। अब वे उस नारे को फिर कभी दुहरा नहीं पा रहे हैं। यहाँ तक कि अब नारे के साथ उनकी उम्मीदवारी भी हवा हो गई है। यानी आज के नारे के हिसाब से ‘वो नहीं कर सकते’।

यह भी हो सकता है कि ‘हम कर सकते हैं’ का नारा जनता को यह विश्वास दिलाने के लिया दिया गया हो कि जो दूसरे कर सकते हैं,वो भी कर सकते हैं। यह बात इसलिए भी तर्कसंगत लगती है क्योंकि जनता कई सालों से ऐसी ‘करनी’ पसंद करती आ रही है। अपनी रैली में टिकट लगाकर उस नेता ने कार्यकर्ताओं  को यह सन्देश दे दिया है कि उनका भविष्य सुरक्षित है,वे अपने कैरियर को लेकर चिंतित न हों।

‘हम कर सकते हैं’ एक नारे के बजाय सूत्रवाक्य अधिक है। इस देश में सब अपना-अपना काम चुपचाप कर रहे हैं। जनता ने भी जिस दिन इसे नारे की तरह न लेकर अपना सूत्रवाक्य बना लिया,समझिए वह भी कर सकती है। हमारे यहाँ सबसे समझदार नेता ही हैं। अपने काम की हर बात वो बखूबी समझते हैं। इस समझ के मुताबिक ज़रूरी हुआ तो संसद चलती है और ज़रूरी हुआ तो ठप्प हो जाती है। जो भी कानून उनकी राह में रोड़ा बनता है उसे बदल सकते हैं। इस सबके पीछे ‘हम कर सकते हैं’ का ही सूत्रवाक्य काम करता है। अब एक नेता को जज बदलने की बहुत दरकार थी,पर अभी इसमें सफलता नहीं मिली है। वह दिन दूर नहीं जब नेता कानून ही नहीं,जज भी बदल सकेंगे। वही दिन वास्तव में ‘हम कर सकते हैं’ को चरितार्थ करेगा।

1 टिप्पणी:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हम तो कर रहे थे, फिर भी कर रहे हैं।