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गुरुवार, 1 अगस्त 2013

देश-सेवा के लिए टेंडर !

2/8/2013 को हरिभूमि में !
कल्पतरु एक्सप्रेस में 01/08/2013  को

जनवाणी की रविवाणी  में ०४/०८/२०१३ को Photo: जनवाणी में आज की रविवाणी .....सूचना दी निर्मल गुप्त जी ने।


देश-सेवा को ठेके पर देने का आयोजन चल रहा था। हाईकमान जी इस नाते बहुत व्यस्त थे फ़िर भी  वे चौकन्ने और सक्रिय दिख रहे थे। अपने मातहतों से वे पल-पल का अपडेट ले रहे थे। ऐसा आयोजन पाँच या छः साल में एक बार आता है इसलिए गहमागहमी ज़्यादा थी। यह आयोजन कई लोगों की मुरादें पूरी करने वाला होता है। हाईकमान ने किसी भी अव्यवस्था से बचने के लिए काफ़ी-कुछ पहले से ही तय कर रखा था पर ठेके का अंतिम सूचीपत्र यहीं तैयार होना था। सबको अपना-अपना वज़न साबित करने का बराबर मौका मिल सके,इसके लिए विशेष व्यवस्था की गई थी। इसका फौरी फायदा यह था कि हर बन्दा अपना वजन बेझिझक दिखा सके। सारा आयोजन हाईकमान जी के विशेष कक्ष में नियत समय पर शुरू हुआ।

विशेष कक्ष के बाहर एक बड़ा-सा तम्बू लगा था,जिसके नीचे सारे संभावित जनसेवक इकठ्ठा थे। हाईकमान के भरोसेमंद लोग उनसे दसबंद-जैसा कुछ लेकर कक्ष में जाने की पात्रता प्रदान कर रहे थे। अंदर हाईकमान जी के अलावा दो सहयोगी भी थे,जो इस चयन-प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने में सहयोग दे रहे थे। साक्षात्कार की शुरुआत एक मोटे जनसेवक से हुई। उनकी आँखों से देश-सेवा की ललक टपककर बाहर आने को आतुर थी। हाईकमान जी ने सहयोगी से उनकी समर्पण-भावना का मूल्यांकन जानना चाहा। सहयोगी ने निवेदन किया,’ये हमारे बड़े पुराने कार्यकर्त्ता हैं। पिछली बार के चुनाव में इन्होंने पार्टी के सेवकों पर पचास करोड़ खर्च कर दिए थे। अब जब इनके ही हाथों देश-सेवा करने की बात है,सौ करोड़ तो आराम से निछावर कर देंगे। ’हाईकमान जी ने उनको ऊपर से नीचे तक निहारा। जब उनको लगा कि वाकई उनकी देह देश-सेवा का बोझ उठा लेगी तो सवाल किया कि वे कितना गिर सकते हैं ?संभावित जनसेवक ने पूरी सहजता से उत्तर दिया,’जितना आप कयास लगा सकते हैं उससे भी दो इंच ज़्यादा । ’ ‘पर आप यह सब कैसे करेंगे ? हाईकमान जी ने शंकित नजरों से उनकी ओर देखते हुए पूछा।

अब संभावित जनसेवक खुलकर बोलने लगे। उन्हें हर हाल में देश-सेवा करनी थी । यह मौका गंवाने का जोखिम वे नहीं उठा सकते थे। उन्होंने अपनी बात को साफ़ किया,’ मैं गिरने –गिराने के खेल का माहिर खिलाड़ी हूँ। बचपन में कबड्डी खेलते हुए मैंने कई बार साथियों को टंगड़ी मारकर गिराया था । थोड़ा समझदार होने पर सड़कों की ठेकेदारी पाने के लिए विरोधियों को गिराया। कोतवाल से मिलकर कई दुश्मनों को एनकाउंटर में गिराया। दरअसल ,मैं पैदाइशी गिरा हुआ हूँ। जब से सुना है कि रुपया बहुत गिर गया है तो उसे उठाने को बेचैन हूँ। इस काम के के लिए मुझ गिरे हुए से ज़्यादा उपयुक्त कौन होगा ?’ हाईकमान जी होने वाले जनसेवक को पहचान चुके थे। उन्होंने सुझाया ,’ आप अभी से सरकार में शामिल होकर देश-सेवा शुरू कर सकते हैं। हमें इस समय रूपये को उठाने वाले की बड़ी दरकार है। इसके लिए आप दो सौ करोड़ के अनुदान का और शाम को होने वाले शपथ-ग्रहण के लिए नए सूट का इंतजाम कर लें। ’

चयनित जनसेवक ने हाईकमान जी को साष्टांग प्रणाम कर अपने गिरने का ताज़ा सबूत दिया और वे देश-सेवा का अवसर पा खुशी-खुशी कक्ष से बाहर आ गए।

इस बीच सहयोगी ने अगले जनसेवक को कक्ष में बुला लिया और बाकी अपनी बारी का इंतज़ार करने लगे।

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