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बुधवार, 28 अगस्त 2013

आओ,सब मिलकर खाते हैं !

28/08/2013 को जनवाणी में

 
 
खाना हर आदमी की ज़रूरत है ,इसे आखिरकार सरकार ने समझ लिया है इसीलिए उसने सबके खाने के लिए ‘खाद्य-सुरक्षा कानून ’पास होने को प्राथमिकता दी है।जल्द ही देश के सारे लोग खाते-पीते वर्ग में शुमार होने लगेंगे।वैसे यह योजना केवल गरीबों के लिए है क्योंकि सरकार को भी पता है कि बाकी लोग ख़ूब खा रहे हैं।ऐसे में समाज का कोई तबका खाने से वंचित रह जाय,यह जनता की सेवा के लिए मरी जा रही सरकार को कैसे सहन होता ?अपने नौ साल के कार्यकाल में पहली बार सरकार ने समाजवाद पर अमल किया है।अब सब मिलकर खायेंगे।
हमारे देश का विपक्ष किसी गैर-दुनिया में रहता है।उसे हर मुद्दे पर नाक-भौं सिकोड़ने की आदत हो गई है।उसे इस बात पर आपत्ति है कि यह ‘खाद्य-सुरक्षा’ नहीं बल्कि ‘वोट-सुरक्षा’ है।अब उसे कौन समझाए कि सरकार कोई भी काम बिना वोट के क्यों करेगी ? उसने कोई भंडारा थोड़ी ना खोल रखा है ! पेट तो सबके पास है,चाहे सरकार हो,नेता हो,पार्टी हो या आम आदमी।यह सरकार ज़्यादा समझदार है।वह पहले वोट खाएगी फ़िर और कुछ।विपक्ष चाह रहा है कि सरकार भूखी रहे ताकि उसका हिस्सा वो खा सके।सरकार अब इतनी अनुभवी तो हो चुकी है कि उसे यह काम स्वयं करना है।जनता को भी उसकी काबिलियत पर अब शक नहीं रहा।वह खाना ही नहीं कंकड-पत्थर,कोयला सब पचा सकती है।ऐसे हाजमे वाले की ही देश को ज़रूरत है।
हमारे देश में आज़ादी के बाद से सब खा रहे हैं।जहाँ नेता,माफिया,डीलर,अफ़सर,बाबू निर्विकार भाव से अपने पेट भर रहे हैं वहीँ गरीब आदमी लगातार लात खा रहा है।इस बात को सरकार ने गंभीरता से लिया है और इसीलिए यह योजना बनाई है।उसे यह घाटे का सौदा नहीं लगता।सरकार को पता है कि गरीब की थाली का खाना भी उसी का है।वह उसे अपनी जेब में डालने का जतन जानती है।विपक्ष को यही खटका है मगर वह चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा है।सरकार के सहयोगी दल अभी से खाने की सुगंध पाकर पेट पर हाथ फेरने लगे हैं।गरीब आदमी भी दो-जून की रोटी के लिए अभी से सपने देखने लगा है।मगर इसके लिए उसे मतदान-केन्द्र तक आना होगा।आजकल सब कुछ वहीँ से तय होता है।
कुछ विशेषज्ञों को आशंका है कि इतने भूखों के लिए खाने का बजट कहाँ से आयेगा ? यह बिलकुल आधारहीन सवाल है।उन्होंने शायद वर्तमान हालात और मौसम का सही अध्ययन नहीं किया है।अबकी बारिश ख़ूब गिरी है और रुपया उससे भी तेजी से।अभी भी रुपया रोज़ गिर रहा है।सरकार रूपया बटोरकर उसका सदुपयोग करना चाहती है,इससे उसका और गरीबों,दोनों का भला होगा।आगे चुनावी-मौसम है,उसमें वोटों की बारिश की भरपूर सम्भावना है।सरकार मूर्ख नहीं है।वह सबको खिलाकर मुँह बंद करना चाहती है।भरे पेट मुँह खुलेगा ही नहीं।जब सत्ता-पक्ष और विपक्ष मिलकर अपने दाग और हिसाब साफ़ कर सकते हैं,तो मिलकर खा क्यों नहीं सकते ?हम तो यही आह्वान करते हैं कि आओ,अब हम सब मिलकर खाएं ! 

1 टिप्पणी:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सब खायें, सब संतुष्ट रहें।