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बुधवार, 13 मार्च 2013

मुआवज़ा चाहिए या लैपटॉप ?

13/03/2013 को जनसंदेश और जनवाणी में !



राजधानी जगह–जगह तोरण द्वारों से पट गई थी।बड़े-बड़े होर्डिंग्स बता रहे थे कि कुछ भी सामान्य नहीं है।पहले तो मुझे शंका हुई कि कहीं यह फागुनी-बयार का असर तो नहीं है पर अखबार में बड़े पन्ने में इश्तहार देखकर समझ में आया कि प्रदेश में नई सरकार एक साल पूरा करने जा रही है ।सरकार ने इस मौके पर ऐतिहासिक कदम उठाते हुए लैपटॉप बांटने का अभियान शुरू किया है।युवा मुख्यमंत्री का उत्साही चेहरा इस पोस्टर में देखते ही बनता था। मेरे मन में आया कि ऐसी अभूतपूर्व उपलब्धि के लिए उनको बधाई दे दूँ,सो मुख्यमंत्री जी के आवास पर गुलदस्ता लेके पहुँच गया।

दरबान ने बिना कुछ पूछे ही सवाल दागा ‘लैपटॉप लेने आए हो कि मुआवजा ? अगर लैपटॉप लेना है तो उसके लिए अपना नंबर लिखवा दो,अभी लाइन लंबी है और अगर मुआवजा लेना है तो लिस्ट हमें दे दो।’ इस तरह के प्रश्न के लिए मैं एकदम से तैयार नहीं था।मैंने अचकचाकर उत्तर दिया,’क्या मतलब? अरे भई ! मैं लैपटॉप लेने या मुआवजे की लिस्ट लेकर नहीं आया हूँ।मैं तो बिना कुछ लिए ही इस सरकार को शुभकामनाएँ देने आया हूँ।’दरबान ने मुझे ऊपर से नीचे तक निहारा और कहा,’फ़िलहाल मुख्यमंत्री जी लैपटॉप और मुआवजे का ही वितरण कर रहे हैं,बहुत व्यस्त हैं।’मैंने अपना परिचय दरबान को दिया तो उसने झट-से कहा,’पहले क्यों नहीं बताया ? वितरण-समारोह की प्रक्रिया पत्रकारों के बिना थोड़ी पूरी होगी।आप बेधड़क जाइये।’

बड़े-से हॉल में दाखिल हुआ तो अंदर जश्न-सा माहौल था।मुख्यमंत्री ने हाथ में कई लिस्टें थाम रखी थीं।मैं उन्हें गुलदस्ता सौंपने ही जा रहा था कि एक अति-सक्रिय कार्यकर्त्ता ने सुरक्षा-कारणों  का हवाला देकर उसे हथिया लिया । मैंने उन्हें मौखिक रूप से ही एक-वर्षीय शुभकामनाएँ दीं ।उनका संकेत पाकर मैं पास वाली सीट पर ही बैठ गया । अपने गुलदस्ते के साथ हुई घटना से आहत हुए बिना मैंने सहज होकर मुख्यमंत्री जी से पूछा,’आप इस एक साल को किस तरह से देखते हैं ?’

मुख्यमंत्री जी ने उत्तर दिया,’यह बहुत ही गंभीर प्रश्न है।हम इस साल के बजाय आगे की ओर देख रहे हैं । इसके बारे में भुक्त-भोगी जनता ही बेहतर उत्तर दे सकती है ।इतने कम समय में ही हमने बड़े-बड़े अनुभव पा लिये हैं । कुम्भ-हादसे की जिम्मेदारी लेते हुए मंत्री से हमने इस्तीफ़ा लिया फ़िर वापस करके अपने आप दामन भी साफ़ कर लिया। पीडितों को मुआवजों के चेक देकर खून के धब्बे बड़ी आसानी से धो लिए।सबसे बड़ी उपलब्धि तो हमें तब मिली जब हत्यारोपी होने पर अपने प्रिय मंत्री को कुर्बान कर दिया ।उसने अपने पद के जाने और ट्रांसफर-पोस्टिंग में मिलने वाले भत्ते के नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा तक नहीं माँगा ।उसे अपने संसाधनों पर पूरा भरोसा है। पीडितों के लिए हमने मुआवजा देने के लिए हाथ खुला छोड़ दिया है ताकि भविष्य में हमें कोई पीड़ा न हो।विपक्षी दल जहाँ झूठ-मूठ का लॉलीपॉप दे रहे हैं,वहीँ हम बेरोज़गारी-भत्ते के बाद लैपटॉप बांट रहे हैं । इससे शिक्षित युवा बेरोजगार नहीं होगा,उसका भी ‘टाइम-पास’ हो जायेगा।’

हमारी बातचीत बीच में ही रुक गई ।एक कार्यकर्त्ता मुआवजे की लेटेस्ट-लिस्ट लेकर हाज़िर था और मुख्यमंत्री उसे अपने हाथ में लेकर पढ़ने लगे ।उन्होंने अपने सचिव को आदेश दिया कि लगे हाथों एक-साला उपलब्धि में इसे भी नत्थी कर दिया जाय !

DLA में १८/०३/२०१३ को

2 टिप्‍पणियां:

दिनेश पारीक ने कहा…

सादर जन सधारण सुचना
साहित्य के नाम की लड़ाई (क्या आप हमारे साथ हैं )साहित्य के नाम की लड़ाई (क्या आप हमारे साथ हैं )

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

अच्छा व्यंग्य!