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बुधवार, 20 मार्च 2013

मुड़-मुड़ के ना देख !

२१/०३/२०१३ को 'नैशनल दुनिया' में !

हम सरकार के ताज़ा कानून से सख्त नाराज़ हैं।उसने हम प्रेमियों से भरे-फागुन बदला लिया है।अब यह भी कोई बात हुई कि जो हमें खूबसूरत लगे उसे भर नज़र देख भी न सकें ! हम जैसे सीधे-सादे और निर्मल-जनों लिए यह कानून बहुत बड़ी आफत है।इसमें किसी की सुंदरता को हमें प्रशंसित करने से भी रोका जा रहा है।सरकार छेड़खानी और  अमानवीय-कृत्य करने वालों पर तो लगाम लगा नहीं पा रही है।उसे सबसे सॉफ्ट-टारगेट हम जैसे अहिंसक,शांति-प्रेमी और मूक-दीवाने ही मिले हैं।

अब अगर हमने किसी को मुड़-मुड़ कर देख लिया तो हमारा गंतव्य अचानक जेल की तरफ़ मुड़ जायेगा।इससे बचने के लिए यदि हम छुप-छुपकर देखते हैं तो उसकी निजता-हनन के चक्कर में अंदर चले जायेंगे या कोई हमें आतंकवादी समझकर पुलिस के हवाले कर देगा।यदि किसी तरह हिम्मत करके हम सामने आ भी गए और उसे सामने से घूरा तो कहीं ज़्यादा तेजी से हवालात की तरफ़ भागेंगे।यही नहीं अगर गलती से हमारी काया का स्पर्श हो गया तो और मारे गए।इस तरह हमारे लिए यह बहुत तकनीकी मसला भी बन गया है।ऐसी कोई तकनीक नहीं छोड़ी गई है जिसके सहारे हम लहालोट हो सकें।

सबसे बड़ी परेशानी हमें इस बात को लेकर है कि अब साहित्य-रचना भी मुश्किल हो जायेगी।खूबसूरती को परवान चढ़ाने वाले नगमों से सभी ग्रन्थ भरे पड़े हैं।यह सब बड़े अनुभव और शोध के बाद लिखा गया है।हमारी शेरो-शायरी विधा तो इस तरह के क़दमों से विलुप्त ही हो जायेगी।कानून बनाने वालों को यह नहीं समझ आता कि रोमांटिक शायरी केवल टेबल पर बैठकर नहीं लिखी जा सकती है।कई फ़िल्मी-मुखड़े जो अभी तक हम गुनगुना रहे हैं,उनका क्या होगा ?सोचिये ‘मुड़- मुड़ के न देख , मुड़- मुड़ के ‘ गाने को सुनते हुए हम बड़े हुए और सुनने वालों को कभी शिकायत भी न हुई।इसको सुनते हुए भी हम यही समझते रहे कि कहने वाले का इरादा हमें  मुड़कर देखने से मना करने का नहीं है।हम इसे महज़ आपसी ठिठोली ही समझते रहे और अब यह अच्छा-खासा जुर्म बन गया है।

हम सरकार की परेशानी समझ सकते हैं।वह हर बात में सहमति चाहती है।इसलिए यह कहा जा रहा है कि अगर कुछ भी सहमति से हो तो कोई जुर्म नहीं है।इसके लिए हम कलम और कागज़ साथ रखेंगे और जिसको देखना होगा उसकी अनुमति मांगेंगे कि यदि देखने से उसे कोई एतराज़ न हो तो हम अपनी सौंदर्य-प्यास बुझा लें।साथ में हम यह भी लिख सकते हैं कि हम कोई पेशेवर-घूरक नहीं हैं,इसी बहाने थोड़ी-बहुत शायरी कर लेंगे।यदि सहमति मिलती है तो हम चाहेंगे कि वह लिखित में हो क्योंकि पता नहीं कब उसका मूड बिगड़ जाए और हमें लेने के देने पड़ें । यह भी हो सकता है कि शायर जानकर वो हमें सहमति दे दे पर यदि हमारा लिखित आवेदन उसे नागवार लगा तो फ़िर पुलिस वाले हमें शायरी सुनायेंगे ।

सरकार के द्वारा लाये गए सभी प्रावधानों को हमने गौर से समझ लिया है और इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि शायरी या रचनात्मकता हमें बचा पाने में सक्षम नहीं हो सकती।किसी की खूबसूरती पर पूछकर लिखने से वो मौलिकता और वो भाव नहीं आ सकते जो छुप-छुपकर देखने और चाहने के अनुभव से आते हैं।इसलिए देखना और सोचना बन्द क्योंकि हम जेल में बंद होना फ़िलहाल अफ़ोर्ड नहीं कर सकते।ऐसे में फागुन जितनी जल्दी जाए अच्छा है।
 
२०/०३/२०१३ को जनवाणी में


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