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बुधवार, 18 मार्च 2015

यू-टर्न का मौसम !

अभी तक मौसम को देखकर नेता ही रंग बदलते रहे हैं पर अब इधर मौसम ने भी पलटवार कर दिया है।वसंत ऋतु में ओलों के साथ जमकर बारिश हो रही है।उसने भी नेताओं की तरह यू-टर्न ले लिया है।नेताओं के ‘अच्छे दिन’ यदि जुमले में बदल सकते हैं और 'इंसान का इंसान से भाईचारा’ गहरी साजिश में कन्वर्ट हो सकता है तो गुनगुनाहट भरे इस मौसम में ओले क्यों नहीं बरस सकते ?नेता जहाँ अपनी सेहत सुधारने के लिए योगासन कर रहे हैं,वहीँ यह मौसम  किसानों को शीर्षासन करा रहा है ।इसमें भी ख़ास बात यह है कि यह इलज़ाम किसी नेता के सर नहीं रहा।

अपने ‘नसीब’ को जनता अभी ठीक से कैश भी नहीं कर पाई थी कि उसके मुकद्दर ने अचानक पलटा खाया है।कुछ समय पहले पेट्रोल-डीज़ल पानी के भाव हो गया था,अब वही पानी आफ़त बनकर उसकी फसलों पर टूट पड़ा है।यह कुछ नहीं बस बेचारे ’नसीब’ का यू-टर्न भर है जो अब ‘बदनसीब’ बन चुका है।इसके लिए कोई दोषी है तो सिर्फ ऊपरवाला।हमारे नेता तो अपना काम पारंपरिक ढंग से पिछले सड़सठ सालों से बखूबी कर ही कर रहे हैं।यह तो मौसम है,जो पलटकर बेईमान हुआ जा रहा है,जबकि पलटी मारने पर अभी तक नेताओं का ही एकाधिकार रहा है।

किसानों की फ़सल बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से चौपट हो गई है पर यह देश के लिए चिंता की बात नहीं है।उसकी खाल इतनी सूख चुकी है कि अब उसमें सर्दी-गर्मी-बारिश का कोई असर नहीं होता।दूसरी तरफ नेताओं की अपनी फसल पर कभी कोई गाज भी नहीं गिरती।वे आपदा-प्रूफ होते हैं।ऐसी घटनाएँ उनके लिए ‘अवसर’ की तरह होती हैं।अगर कभी उन पर किसी आफत की आशंका हुई भी तो वे उससे बचने के लिए ज़रूरी अनुलोम-विलोम कर लेते हैं।प्रकृति उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है क्योंकि वे प्राकृतिक-चिकित्सा करवाने में माहिर होते हैं।किसान नादान है।उसे एकदम से पलटना नहीं आता।कभी उसने यू-टर्न लिया भी तो उसकी किस्मत में ऐसा सिक्का है,जो दोनों तरफ से यक-सा होता है।उसके लिए नेता और भगवान सिक्के के ऐसे पहलू हैं,जिनके गुणधर्म समान हैं।अबकी बार राजनीति और मौसम ने कम से कम यही संकेत दिया है।

पिछले कुछ समय से देश की राजनीति बदल रही है।हमें भी मौसम के बदल जाने के लिए तैयार रहना चाहिए।शांतिकाल में हथगोले और बेमौसम के ओले अब हमारी दिनचर्या में शामिल हो चुके हैं।मौसम और राजनीति की इस जुगलबंदी ने जहाँ नेताओं को फुल-प्रूफ़ बना दिया है,वहीँ किसान अभी भी 'फूल' बना हुआ है। उसकी पहचान के लिए अभी भी एक अदद ‘आधार’ की ज़रूरत है।वह जिस आधार पर खड़ा है,उसकी ज़मीन बहुत कमजोर है।इसलिए उसके बचने के लिए कई तरह के ‘बिल’ तलाशे जा रहे हैं।कोशिश की जा रही है कि किसान जमींदोज़ होने से पहले सुरक्षित ‘बिल’ में घुस जाय।खुले में रहना न उसकी और ना ही नेताओं की सेहत के लिए ठीक है।आजकल जो भी हो रहा है,उसमें  जनता की 'किस्मत' का दोष है,राजनीति और मौसम तो अपनी प्रकृति के अनुरूप ही कार्य कर रहे हैं।

2 टिप्‍पणियां:

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 19 - 03 - 2015 को चर्चा मंच की चर्चा - 1922 में दिया जाएगा
धन्यवाद

sunita agarwal ने कहा…

umda kataksh