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गुरुवार, 7 अगस्त 2014

रूठे हुओं का मिलना !


रूठे हुओं का मिल जाना हमेशा सुखद होता है।जब सार्वजनिक जीवन में हम अपने मित्र या प्रियजन से किसी छोटी या बड़ी बात पर नाराज हो जाते हैं तो कई बार इस तरह का आपसी खिंचाव बहुत लम्बा हो जाता है।जितनी गाढ़ी दोस्ती होती है,उतनी ही गहरी दुश्मनी होने का अंदेशा हमेशा बना रहता है।सामान्य समझ वाले लोग जल्द अपनी गलतफहमी को दूर कर लेते हैं पर अधिक समझदार लोग रिश्तों से ज्यादा अपनी प्रतिष्ठा को तरजीह देते हैं।इससे समाज को सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि कई तरह की रहस्य-कथाएं उजागर हो जाती हैं।कुछ जलकुक्कड़ इसी ताक में रहते हैं।उन्हें केवल हल्का-सा सूत्र मिलने की देरी होती है,फिर तो इस पर चटखारे लगाकर गल्प-कथाओं का एक लम्बा दौर चल पड़ता है।

इससे इतर राजनीति में जब कभी दो कट्टर विरोधी या बहुत दिनों के बिछुड़े आपस में मिलते हैं तो वह क्षण ऐतिहासिक मिलन के माफ़िक होता है।कितनी भी गाढ़ी दुश्मनी हो,पर जनहित के आगे सारे गिले-शिकवे घुटने टेक देते हैं।दोनों पक्ष जनता के व्यापक हितों को देखते हुए अपने पिछले वक्तव्यों को खारिज़ करके  जनहित के लिए नया मसौदा बनाते हैं,भले ही कुछ लोग इसे सौदा कहकर दुष्प्रचारित करते हों।ख़ास बात है कि इस मिलन में केवल दो लोगों का ही मेल नहीं होता,धुर-विरोधी विचार और मान्यताएं भी धूल-धूसरित हो जाती हैं और बदले में सामने होती है,सुरक्षित भविष्य की गारंटी।ऐसा दुर्लभ उदाहरण अभी कुछ दिनों पहले सुशासन लाने वालों और जंगलराज चलाने वालों के बीच देखने को मिला है।अब वे औरों को भी इसी राह पर चलने को प्रेरित करने में जुटे हैं जिसके स्पष्ट संकेत उत्तम प्रदेश से मिलने शुरू हो चुके हैं।

ताज़ा खबर है कि अपने हनुमान जैसे भक्त से रूठे हुए नेताजी पिघल गए हैं और बड़े लम्बे अन्तराल के बाद एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उनसे गले मिले हैं।ज़ाहिर सी बात है कि इस मुलाक़ात से पहले दोनों ने अपनी हार्ड-डिस्क की मेमोरी से सब कुछ डिलीट कर दिया होगा।हालाँकि कोई भी इस डिस्क को कभी फार्मेट नहीं करता,पता नहीं कब पिछली सीडी या बयान जनहित में ‘रिसाइकल बिन’ से लौटकर साइकल पर सरपट दौड़ने लगे।कहने वालों का तो कहना है कि आने वाले रक्षाबंधन तक नेताजी और बहिन जी भी रक्षासूत्र में बंध जायेंगे और यह सब काम जनता की बेहद माँग और समय की ज़रूरत पर होगा।

बिछुड़े और रूठे हुओं का मिलना सदैव उन्नति और समृद्धि का प्रतीक रहा है।जहाँ सद्भाव होता है,विकास की बयार अपने आप बहने लगती है।सार्वजनिक जीवन में ऐसी घटनाएँ कभी भी घट सकती हैं पर राजनीति में चुनावों के आगे या पीछे इनकी आवृत्ति अचानक बढ़ जाती है।फ़िलहाल,चुनाव दूर हैं पर दूरदर्शी वही है जो समय से दो कदम आगे चले।इसलिए आने वाले समय में ‘दो कदम तुम भी चलो,दो कदम हम भी चले’ टाइप के तराने हवा में गूँजने की खूब गुंजाइश है।इन्हें सुनकर समझ जाइएगा कि आपके हित के लिए बेचारे नेताओं ने अपनी कटुता खूँटी पर टाँग दी है।यह कम बड़ा त्याग है ?
प्रजातंत्र लाइव में 07/08/2014 को !

1 टिप्पणी:

Satish Saxena ने कहा…

सुखद राजनीति, दुखद राजनीति