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बुधवार, 13 अगस्त 2014

डिग्री न पूछो मंत्री की !

जिस प्रकार साधु से उसकी जात नहीं पूछी जाती,उसी तरह सामर्थ्यवान से उसकी योग्यता पूछना घोर अज्ञानता है।नाहक ही,कुछ अज्ञानी तत्व मंत्री जी की डिग्री-डिप्लोमा तलाशने में लगे हैं।उन्होंने भी ईंट का जवाब पत्थर से दिया है ।योग्यता के पैमाने का टंटा हमेशा के लिए निपट जाए इसलिए उन्होंने कूढ़मगजों के आगे अपनी विदेशी डिग्री लहरा दी है।उनके विरोधी भी खुर्राट निकले।उन्होंने छानबीन कर पता किया तो मालूम हुआ कि विश्वविद्यालय में मिलने-मिलाने का कार्यक्रम था,जिसमें शामिल होने वालों को सर्टिफिकेट बाँटे गए थे,वे ही अपने देश में आकर डिग्री में बदल गए.कुछ नासपीटे तो यहाँ तक कह रहे हैं कि कार्यक्रम में समोसा खाने के लिए जो कागज दिया गया था,यह वही है. वास्तव में इस बात पर हल्ला होना ही निरर्थक है।
हमारे शास्त्रों के जानकार मूर्ख नहीं थे।उन्होंने व्यक्ति के लिए क्या उचित है और क्या अनुचित;क्या करणीय है और क्या वर्जित;इसकी जगह-जगह खुलकर व्याख्या की है।साथ ही यह भी लिख दिया है ‘समरथ को नहिं दोस गुसाईं ‘,फिर भी अल्पज्ञ अपना माथा पीटने पर आमादा हैं ! ज़रुरत तो इस बात की है कि ऐसे सभी लोग पहले अपने ज्ञान को सम्पूर्ण व अपडेट करें।कागद का लिखा तो फिर भी मेटा जा सकता है पर सामर्थ्यवान के हाथ में लिखी रेख को मिटाने की कल्पना अज्ञानियों के सिवा कौन कर सकता है ?
सबसे बड़ी समस्या सोच की है।बात-बात पर सवाल और बवाल करने वाले पूरी तरह से राष्ट्रीय-स्तर के हैं और उनकी सोच भी उनकी तरह क्षुद्र है।जबकि दूसरी ओर माननीय मंत्री जी की सोच व्यापक और अंतरराष्ट्रीय-स्तर की है।इस तरह योग्यता में विदेशी लेबल लगने का फायदा यह भी है कि उनके समक्ष जो भी समस्याएँ संज्ञान में लाई जाएँ,कम से कम उनका लेवल तो उस स्तर का हो ! रही बात पढाई की,सो उसका पैमाना कार्यशैली से जाना जा सकता है।इसलिए पढ़ने और समझने की असल ज़रूरत उन्हें नहीं,नासमझों को है।
उम्मीद की जाती है कि इस मामले में इंटरनेशनल टच आ जाने के बाद से योग्यता और कार्यकुशलता पर उठ रहे सवाल गौण और दरकिनार हो जायेंगे।उस विदेशी विश्विद्यालय को हमें सम्मानित करना चाहिए,जिसने हमारे देश के नव-निर्माण में अपनी तरह से अमूल्य योगदान दिया।सरकार को भी चाहिए कि हमारे देश में अज्ञानियों की संख्या में वृद्धि हो,उसके पहले ही उस विश्वविद्यालय की कुछ शाखाएं अपने ही देश में खुल जाँय।इसके लिए शिक्षा में एफडीआई लानी पड़े तो भी हमें सहर्ष तैयार रहना चाहिए।
'डेली न्यूज़,जयपुर में 13/08/2014 को प्रकाशित
  

4 टिप्‍पणियां:

Harivansh sharma ने कहा…

पहले बार्टर सिस्टम हुवा करता था। कहते थे "जिसके घर दाने(अनाज) उसके कमले (पागल)भी सयाने। आज जिसके पास अपार धन है। करंसी नोट है। उन्हें डिग्री की क्या आवश्यकता । एक कहावत है "इस हाथ ले उस हाथ दे"
व्यंग उचित मर है। मुबारक।

Yashwant Yash ने कहा…

कल 15/अगस्त/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद !

Kaushal Lal ने कहा…

सुन्दर व्यंग .....

Onkar ने कहा…

सटीक रचना