पृष्ठ

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

हल्ला देशहित में ज़रूरी !

हल्ले के शोर में कई धतकरम धड़ल्ले से निपट जाते हैं।इसके लिए अब सड़कों पर उतरने की ज़रूरत नहीं पड़ती।पड़ोसी देश जब हमारे यहाँ मुंबई या पठानकोट करता है,टीवी स्टूडियों में हल्ले का आतंक छा जाता है।क्रिकेट वाला हल्ला सबसे ज़ोरदार होता है।हाल ही में जब चैनलों में क्रिकेट को लेकर विराट हल्लाहो रहा था,तब कुछ लोग कुर्सी पर टकटकी लगाए हुए थे।घोड़े की टांग टूट चुकी थी पर कुर्सी सलामत थी।उनका लक्ष्य घोड़ा नहीं कुर्सी है।घोड़ा तो गड्ढे में गिर सकता है पर कुर्सी पर गिरकर ही बैठा जा सकता है।इसलिए वे गिर गए।

आड़े वक्त में क्रिकेट ने साथ दिया।ऐसे हल्ले के बीच घोड़े और लोकतंत्र की टांग कितनी देर टिकती ! सो,दोनों निपट गईं।कुछ ने हल्ला मचाया कि लोकतंत्र की हत्या हुई है।कुछ यह भी मान रहे हैं कि इससे पहले कई बार लोकतंत्र की हत्या हो चुकी है।ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हम बार-बार मरे को मार रहे हैं ?

सच तो यह है कि लोकतंत्र अमरौती खाकर आया है।यह बार-बार मरता है,फिर भी मरने के लिए कुछ बचा रहता है।इसे ही लोकतंत्र की खूबी कहते हैं।जिन्हें लगता है कि लोकतंत्र की हत्या हुई है,वे भी हल्ला मचा रहे हैं।जो लोग आज लोकतंत्र को सुरक्षित बचाने का दावा कर रहे हैं,वे पहले कई बार उसकी हत्या होना स्वीकार कर चुके हैं।ऐसा चमत्कार हमारे देश में ही हो सकता है।
हल्ले ने और कई समस्याओं को निपटाया है।किसी ने इसके जरियेदेशद्रोहीजेएनयू को तो किसी ने गर्दन पर छुरी धरकर भारत माताको।कुछ का मानना है कि क्रिकेट के इस हल्ले से लाहौर भी निपट गया।वहाँ हुए आतंकी हमले पर बुद्धिजीवियों को हल्ला करने का मौक़ा ही नहीं मिला।समाचार चैनलों पर तब भांगड़ा की बजाय रुदनोत्सव होता।

असल हल्ला समाजवादी होता है।हल्ला-बोलकर ही सत्ता हथियायी जा सकती है।इसमें लाठी-डंडे से लैस होकर लोक और तन्त्र को ठोंका जाता है।कुछ चीजें ठुककर ही सही रास्ते पर आती हैं।थानों में इसीलिए इसका जमकर अभ्यास होता है।समाजवाद एक परिवार हो जाता है पर इस पर कोई हल्ला नहीं होता।

कुछ लोग कश्मीर में बन रही राष्ट्रवादी सरकार को भी भारत माता की जयसे निपटाना चाहते हैं।उनके अनुसार सरकार बनाने वाले अगर पहले ऐसा जयकारा लगा दें तभी देशभक्त माने जायेंगे।ठीक वैसे ही जैसे हर बार संविधान की शपथ लेकर सांसद या मंत्री बनने वाले संविधान-पालन का आदर्श प्रस्तुत करते हैं ।सड़क पर होने वाला हल्ला अब संसद तक पहुँच चुका है।वहाँ काम में हल्ला नहीं हल्ले में काम होता है।वह घर के ड्राइंग रूम से लेकर सड़क और संसद तक पसर चुका है।पहले जय श्रीरामका हल्ला था,अब भारत माता की जयका है।बड़ी बात यह कि हर हल्ला देशहित में है।



कोई टिप्पणी नहीं: