पृष्ठ

रविवार, 12 अगस्त 2018

भीख माँगने की आज़ादी !

तमाम बुरी ख़बरों के बीच बड़े दिनों बाद आख़िरकार एक अच्छी ख़बर आई है।देश की राजधानी में भीख माँगना अब अपराध नहीं है।इसके शुरुआती संकेत बड़ी उम्मीद पैदा कर रहे हैं।भीख माँगने वाले अब अपने पात्र रुपयों से ही नहीं सम्मान से भी भर पाएँगे।कोई भी कहीं भीख माँगने बैठ सकता है।हवलदार साहब अब हर ‘हफ़्ता’ उसे परेशान नहीं कर सकते।अगर इस फ़ैसले से उनका हाथ तंग होने लगे तो वह ख़ुद भी चौराहों पर,बाज़ारों में हाथ पसार कर आत्म-निर्भर हो सकते हैं।बशर्ते पकड़े जाने पर उन्हें यह बताना ज़रूरी होगा कि यह विशुद्ध भीख है।इसके सिवा कुछ नहीं।कुछ लोग बक़ायदा प्लान करके सपरिवार भिक्षाटन पर भी जा सकते हैं।इससे देश की अर्थव्यवस्था तो मज़बूत होगी ही,सरकार का सरदर्द भी कम होगा।

इस सेक्टर में अचानक नयी सम्भावनाएँ दिखने लगी हैं।पारंपरिक भिखारी भीख माँगने के नए ‘फ़्रंट’ खोल सकते हैं।वे ‘डिजिटल-भीख’,’पॉलिटिकल-भीख’और ‘इंटरनेशनल भीख’ के ज़रिए देश की तक़दीर बदल सकते हैं।डिजिटल-भीख के ज़रिए जहाँ ऑनलाइन ठगी को वैधता मिलेगी,वहीं ‘इंटरनेशनल-भीख’ बड़े-बड़े क़र्ज़दाताओं और डिफ़ॉल्टरों को कर्जमुक्ति के साथ-साथ संपूर्ण सुरक्षा भी देगी ।सबसे क्रान्तिकारी परिवर्तन तो ‘पॉलिटिकल-भीख’ के ज़रिए आने वाला है।पहले नेताओं को वोट के बदले कुछ वादे देने की ज़हमत करनी पड़ती थी,इस ‘स्कीम’ के लागू हो जाने के बाद अपनी झोली में वोट लेना उनका बुनियादी हक़ होगा।वे इसे अब भीख के रूप में ही स्वीकार करेंगे ताकि आश्वासन चुकाने का भी कोई झंझट न हो।और हाँ,वसूली की आस तो ‘जीवित’ प्राणियों से होती है।मुर्दे किसी भी तरह की देनदारी से बरी होते हैं।भिखारियों के बारे में रहीम जी बहुत पहले कह गए हैं;’रहिमन वे नर मर चुके जो कछु माँगन जाँहि’।माँगते समय नेता बिलकुल ‘नर’ जैसा होता है।ऐसे में ‘पॉलिटिकल-भीख’ सेक्टर में अपनी सम्भावनाएँ तलाश रहे एक घुटे हुए नेता से भेंट हुई।उन्होंने हमें बताया कि भीख माँगने का एक स्टार्ट-अप भी खोल दिया है।इससे भिखारियों की ’मैनपॉवर’ बढ़ जाएगी।नेताजी ने आगे बताया,’हम ज़मीनी स्तर पर तो भीख माँग ही रहे हैं,डिजिटल-भीख को भी प्रोत्साहित करने जा रहे हैं।जो भी हमें डिजिटल-भीख देगा,हम उसे इनाम में  ‘भीखबैक’ देंगे।यानी ठीक ढंग से भीख देने लायक बनाएँगे।यह हमारी ऐसी योजना है जिसमें भीख देने वाला लालच से मुक्त होगा।जनता को भिखारी बनाने का टारगेट हम समय से पहले पूरा करके दिखाएँगे।’

‘तो क्या अब आप संकल्प-पत्र भी नहीं पेश करेंगे ?’ हमने बहुत झिझकते हुए उनकी ओर सवाल फेंका।नेताजी अनुभवी थे।इतने वज़नदार सवाल को हवा में ही लपक लिया।कहने लगे-आज़ादी के सत्तर साल बीत गए हैं।आज तक हमारे मतदाता भाई आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं।हर चुनाव से पहले उन्हें नामुराद वोट के बदले कुछ पाने की तलब मचने लगती है।यह बात न लोकतंत्र के लिए ठीक है न भारतीयता के लिए।हमारे यहाँ पेड़ फल के बदले कुछ नहीं लेते,नदियाँ निःस्वार्थ भाव से जल देती हैं।हम तो फिर भी आदमी ठहरे।पाँच साल तक शांति से क्यूँ नहीं ठहर सकते ? हम संकल्प लेते हैं कि अपने वोटर को चुनावों से पहले अपना मुँह नहीं दिखाएँगे।क्या यह कम त्याग है इस ज़माने में ? उनके कहने के अंदाज़ से हम बिलकुल लाजवाब हो गए।

तभी एक आर्थिक भिखारी न जाने कहाँ से प्रकट हो गए ! कहने लगे,‘देश की आज़ादी सेलिब्रेट करने के लिए लंदन के ठंडे मौसम को छोड़कर यहाँ आया हूँ।देश हमसे और उम्मीद न करे।हमें ज़रूर देश से उम्मीद है।राजधानी में भीख माँगने की आज़ादी हमारी आर्थिक आज़ादी की ओर महत्वपूर्ण क़दम है।हम चाहते हैं कि इसे पूरे देश में लागू किया जाय।इससे सरकार की बेरोज़गारी की एक बड़ी समस्या बैठे-ठाले हल हो सकेगी।पढ़े-लिखों के लिए इस क्षेत्र में कई मौक़े आने वाले हैं।वे अपने इलाक़े की सीमा के पार भी जाकर ‘भीखबारी’ कर सकते हैं।इस कार्रवाई से बेरोज़गारी के कई अड्डे तो तबाह होंगे ही भीख की क्वॉलिटी सुधरेगी सो अलग।सरकार चाहे तो हमें ‘इंटरनेशनल भीख’ का ब्रांड एंबेसडर घोषित कर सकती है।देशी-विदेशी फ़ंड हड़पने का हमें व्यापक अनुभव है।’ हम देश और आज़ादी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के आगे नतमस्तक हो गए।

हमारी यह एक्सक्लूसिव बातचीत साथ बैठे बुज़ुर्ग ने सुन ली।उन्होंने कुछ बोलने की आज़ादी माँगी।हम आज़ादी के फ़ुल मूड में थे,दे दी।बुज़ुर्ग कहने लगे,‘भाई,आज हम सब हर तरह से आज़ाद हैं।जिसे देखो वही ‘हम लेके रहेंगे आज़ादी’ के मिशन में लगा हुआ है।सब अपनी-अपनी आज़ादी चाहते हैं।भीड़ को इंसाफ़ करने की आज़ादी चाहिए,बलात्कारी को पशु से भी अपनी हवस पूरी करने की आज़ादी हो।सड़कों पर पूजा-पाठ और हुड़दंग करने की आज़ादी हो।भ्रष्ट आचरण को देश-भक्ति समझने की आज़ादी हो।जब इतनी सारी आज़ादियाँ हमारे इर्द-गिर्द नाच रही हों,ऐसे में भीख माँगने की आज़ादी मिलना कम बड़ी उपलब्धि नहीं है।’

इतना कहकर बुज़ुर्ग अंतर्धान हो गए।शायद मारे ख़ुशी के वे अपना चश्मा ले जाना भूल गए।तभी से हम उनको ढूँढ़ रहे हैं ताकि वे आज़ादी के जश्न को अपने चश्मे से भलीभाँति देख सकें।

संतोष त्रिवेदी

8 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

भीख मजबूरी नहीं है भीख जरुरी है। बहुत खूब।

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

शुक्रिया भाई।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, डॉ॰ विक्रम साराभाई को ब्लॉग बुलेटिन का सलाम “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

आमीन।

Jyoti Dehliwal ने कहा…

बहुत सटिक व्यंग

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

शुक्रिया।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

एक चीज और अच्छी हो गयी, अब भीख की कला सिखाने वाले संस्थानों को लुकना-छिपना नहीं पडेगा ! हो सकता है, आने वाले समय में वहाँ के फॉर्म लेने के लिए भी लोग चढ़ावा चढ़ाने लगें। राजनीती की तरह भीखनीति में भी अनपढ़ों के लिए रोजगार की संभावनाएं बढ़ जाएंगी !!

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

😉