मंत्री जी सड़क पर सरपट दौड़े जा रहे थे।तीन-चार अधिकारी छाता लिए उनके पीछे-पीछे भाग रहे थे।सूरज सिर पर चमक रहा था पर मंत्री जी की चमक के आगे वह भी पस्त दिखाई दिया।भोलू यह सब देखकर भौंचक था।उसने अपनी ज़िन्दगी में देवताओं को कभी धरती पर उतरते नहीं देखा था।आज यह सब देखकर उसकी आँखें फटी जा रही थीं।उसे लगा कि जीते जी देवता ज़मीन पर आ गए हैं।उसकी आँखें भर आईं।यहाँ तक कि सड़क का तारकोल भी मारे शर्म के पिघला जा रहा था।सड़क के गड्डे गर्व से भरे जा रहे थे।भोलू की समझ में कुछ नहीं आ रहा था।थोड़ी देर बाद जैसे ही उसकी चेतना वापस लौटी,वह सोच में पड़ गया।इतने घाम और ताप में सरकार उसकी ही सुध लेने सड़क पर निकले हैं।इस त्याग के बदले उसका क्या अंजाम होने वाला है,यह सोचकर वह सिहर उठा।
इस सबसे अनजान मंत्री जी ठीक उस कोण पर अपने क़दमों को गति दे रहे थे,जहाँ से कैमरे में केवल वह दिखें,उनका काफिला नहीं।मेरी बात और है।मैं मंत्री जी को भी देख रहा था और उनसे सौ मीटर पीछे चल रहे काफिले को भी।इस नेक आयोजन का हिस्सा बनने के लिए मंत्री जी ने मुझे ही चुना था।मेरी क्षमताओं और अपनी प्रतिभा पर उन्हें पूरा भरोसा था।चलते-चलते वह जैसे ही ठिठके,मैं उनका संकेत समझ गया।मंत्री जी को ज़मीन पर उतरे हुए तीन मिनट से अधिक समय बीत चुका था लेकिन अभी तक उनकी एक भी ‘रील’ नहीं बन पाई थी।ब्रेक लेते ही मैंने झट से अपना माइक उनके आगे कर दिया।वह देशहित में पसीने-पसीने हो चुके थे। ‘बाइट’ देने से पहले वह फुसफुसाए, ‘मीडिया कभी पॉज़िटिव ख़बरें नहीं दिखाता।उसे यह समझना चाहिए कि जनता की सेवा करना कोई हँसी-ठट्ठा नहीं है।पहले केवल काम करना पड़ता था अब काम से ज़्यादा रील बनाना ज़रूरी है।इसकी ‘रीच’ सीधे ‘जेन-जी’ तक पहुँचती है।उसका टारगेट अब रोजगार नहीं रील है।इसलिए हमारी सरकार भी इस पर ज़ोर दे रही है।चलिए, आपको जिस काम के लिए बुलाया गया है उसे संपन्न कीजिए।’
मैंने रिकॉर्डर ऑन कर दिया।सबसे पहले भोलू को फ्रेम से बाहर किया।उसकी कहीं जगह नहीं बन रही थी।लंबे फोकस में मंत्री जी उभर के आ रहे थे।पसीने की मात्रा पर्याप्त नहीं थी इसलिए चेहरे पर इत्र की बूँदे चुचुहा रही थीं।मेरा पहला सवाल यही था, ‘ मंत्री जी, आपको इतनी कड़कती धूप में सड़क पर पैदल क्यों उतरना पड़ा ? जनता बेचैन है।’
मंत्री जी ने चेहरे पर उतर आई इत्र की बूँदों को पहले रूमाल से पोंछा फिर गंभीर मुद्रा बनाते हुए बोले, ‘ जनता की परेशानी दूर करने के लिए ही मैं हूँ।देश इस समय बड़े संकट से गुजर रहा है।मैंने पैदल चलने की शुरुआत कर दी है।अब जनता का दायित्व है कि वह इस अभियान को आगे बढ़ाए।मैं केवल दिशा दिखा रहा हूँ।देश मज़बूत हाथों में है,उसे कमज़ोर मत होने दें।जो भी सुविधाएँ जनता भोग रही हैं, जल्द से जल्द देशहित में उनका त्याग कर दे।मुझे ही देखिए।यह सड़क पर उतरना भर नहीं है।यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई पुण्य-स्नान के लिए नदी में उतरता है।मैंने जीवन में सिर्फ़ त्याग सीखा है।चुनाव जीतने के बाद क्षेत्र का त्याग करना पर्याप्त नहीं था,सो अब अपना काफिला भी त्याग रहा हूँ।काफिले में पहले चालीस गाड़ियाँ चलती थीं,अब मात्र चार हैं।ये गाड़ियाँ भी मुझे कार्यकर्ताओं ने दे रखी हैं।मेरा कुछ नहीं है।मैंने मंत्रिपद के अलावा सब त्याग दिया है।’
‘ मगर कुछ मंत्री मेट्रो, बस,रिक्शा और साइकिल से चल रहे हैं और आप पैदल ! इसके पीछे क्या कारण हो सकता है?’ मैंने वर्तमान का सबसे ज्वलंत सवाल पूछ लिया।मंत्री जी पहले से तैयार थे।उन्होंने जूते उतारते हुए उत्तर दिया, ‘ मुझे अपनी मिट्टी बड़ी प्यारी है।इसकी असली सुगंध तभी मिलती है जब इसके क़रीब आया जाए।मेट्रो,बस,रिक्शा आदि सामान्य प्रयोग हैं।इनमें फिर भी ऊर्जा क्षय होती है।मैंने अपने श्रम का आश्रय लिया है।हमारा किसान,मज़दूर और युवा आज इसी के भरोसे है।इसलिए मुझे सड़क पर उतरना पड़ा।’
‘लेकिन यह कार्यक्रम कब तक चलेगा ?’ अचानक मेरे मुँह से यह सवाल निकल गया।मंत्री जी फिर भी तैयार थे।कहने लगे, ‘ हमने तो ‘बचत-पर्व’ की शुरुआत की है।यह लंबा चलने वाला है ।इसलिए आगे की जिम्मेदारी जनता की है।जिस प्रकार पहले ‘सफाई-अभियान’ सफल हुआ था यह भी उसी प्रकार होगा।हमें जनता के त्याग पर भरोसा है।वह सब कुछ त्याग देगी पर हमें नहीं।जब तक उसके पास वोट है,हम उसे नहीं छोड़ने वाले।’
‘ जनता के लिए आपका संदेश ?’ मैंने समापन करते हुए पूछा। ‘ मेरा जीवन ही मेरा संदेश है’ कहते हुए मंत्री जी अपने काफिले की ओर लौट गए।इंटरनेट मीडिया में अगले ही पल मंत्री जी वायरल हो गए।जिस भोलू को मैंने फ्रेम से बाहर किया था फिलहाल उसकी कोई ख़बर नहीं है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें