रविवार, 21 अक्टूबर 2018

नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ !

बहुत पहले सुना था कि नाम में क्या रखा है पर पिछले दिनों अनुभव किया कि नाम में ही सब रखा है।वो दिन हवा हुए जब काम बड़ा करने से नाम बड़ा होता था।अब नाम बड़ा हो तो काम अपने आप बड़ा हो जाता है।काम जब ‘फ़ेल’ होने लगे तो नाम की महिमा से चुनाव की नाव भी पार लग जाती है।छोटे और मझोले क़िस्म के नाम का तो ‘मीटू’ भी नहीं होता।नाम बड़ा हो तो इस्तीफ़ा भी हो जाता है।नाम गद्दी दिलाता है तो उतार भी देता है।‘अबकी बार’ पर सवार सरकार भी इस बार सकते में है।नाम बचाएगा या डुबोएगा,यह बात काम भी नहीं जानता।

सियासत हो या साहित्य सब जगह नाम ही उबारता है।हिट लेखक की पिटी हुई किताब नाम के सहारे दस संस्करण निकाल लेती है।दो-चार अकादमी-सम्मान भी धर लेती है।सियासत में इसका फ़ायदा जनता और सरकार दोनों को अलग-अलग ढंग से होता है।‘हारे को हरिनाम’ का पाठ जनता के दिमाग़ में बहुत पहले से बैठा हुआ है।कोई बड़ी समस्या जब उसे दबोचती है,वह सरकार का मुँह नहीं देखती,नाम सुमिरन करने लगती है।सरकार भी जब काम कर करके थक जाती है तो यही करती है।नाम के इस ‘आतंक’ को तुलसीदास बाबा ने हमसे पहले देख लिया था।शायद इसीलिए उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि कलियुग में नाम के अलावा और कोई उपाय विशेष नहीं है।हम एक-दो दिशाओं में ही नाम के प्रभाव को समझ पा रहे हैं,उन्होंने दसों दिशाओं में इसे महसूसा था।आज के दिन के लिए ही उन्होंने कहा था;‘नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ’।इस बात को जनता के साथ-साथ हमारी सरकार ने भी आत्मसात कर लिया है।अब काम नहीं नाम संकटमोचक है।

जो लोग रोज़ पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों पर रुपए की तरह बल्लियों उछल रहे हैं,उन्हें इनका नाम बदलकर सरकार को सहयोग करना चाहिए।सरकार अपनी तरफ़ से अकेले कितना करे ? ‘मँहगाई’ पहले ही ‘अच्छे दिन’ का भेष धर चुकी है और ‘विकास’ को और फैलने की जगह नहीं मिल रही।वह अब तभी बढ़ेगा,जब सरकार बढ़ेगी और दो हज़ार उन्नीस से आगे जाएगी।नाम के इस बढ़ते प्रभाव से ‘नामधारी’ भी गदगद हैं।उन्हें लगता है कि जब नाम से ही सरकार बननी है तो उनका हक़ सबसे पहले बनता है।नाम ज़िंदा रहता है तो दावा भी मज़बूत होता है।चुनाव में भी टिकट काम नहीं नाम देखकर दिया जाता है।इसकी पीड़ा उनसे पूछो,जिनके नाम आख़िरी सूची से कट जाते हैं।

हम नाम के इस प्रभाव को परख ही रहे थे कि तभी काम याद आ गया।वह सचमुच हमारे सामने खड़ा था।बिलकुल निहत्था।कहने लगा-‘एक तुम्हीं हो जो हमें याद कर लेते हो।बताइए क्या काम है ?’ हम मन ही मन सोचने लगे कि इतनी जल्दी तो नाम लेने पर भगवान भी नहीं आते,काम कैसे आ गया ! पर हमने उससे यह बात नहीं कही।बुरा मान सकता था।काम के कटे हाथ को देखकर पिछले पाँच साल में पहली बार आत्म-संतुष्टि हुई।प्रत्यक्षतः हमने अपने मनोभाव को उस पर प्रकट नहीं होने दिया।हमदर्दी जताते हुए पहला सवाल यही किया कि उसके हाथ कौन ले गया।अब वह काम कैसे करेगा।

काम ने बेहद उदासीन होते हुए कहा-‘जबसे नाम का शोर मचा है,हम बेरोज़गार हो गए हैं।अभी-अभी इस्तीफ़ा देकर आए हैं।नाम ने हमें बहुत चोट पहुँचाई है।जिसके पास काम नहीं,वो सोशल मीडिया में बड़ा-सा नाम लेकर रम जाता है।हमारी सालों की कमाई मिनटों में ‘मीटू’ हो गई।चालीस साल का नाम ख़राब हो गया।हमने सुना था कि ‘काम बोलता है’ पर यहाँ तो ‘काम’ बेरोज़गार भी बना देता है।यह सब हमारे नाम का किया-धरा है।उसी की चपेट में आकर हम चौपट हुए हैं।’

काम को पहली बार पटरी से उतरा देखकर हम ख़ुश थे।इतने दिनों से पत्थरबाज़ी हो रही थी पर ‘हाथ’ ख़ाली था।अब जाकर एक क़ायदे का निशाना लगा था।उसके दुःख को हवा देते हुए हमने गहरे घाव पर सहानुभूति की पुल्टिस बाँधी-‘तुम निराश मत हो।अपने पर भरोसा रखो।कोई तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।रही नाम की बात, सही मौक़ा पाकर बदल लो।वैसे भी नाम में क्या रखा है ! यह तो शेक्सपियर ही कह गए हैं।जब नाम बदलने से घर सदन सकता है तो तुम्हारा नेक ‘काम’ इनाम में क्यों नहीं तब्दील हो सकता ! जब हर साल जलकर भी रावण दशानन बना रहता है,तुम्हारे तो फिर भी दो हाथ कटे हैं।अगले चुनाव तक उग आएँगे।और एक ज़रूरी बात,इतने घुप्प अंधेरे में किसको तुम्हारा ‘काम’ कब तक याद रहेगा ? थोड़े दिनों में ही सारे ‘मीटू’ स्वीटू हो लेंगे।बस दल या दिल बदल लो,यह बुरा वक़्त भी बीत जाएगा।’

हमारी बातें सुनकर घोर अंधेरे में भी काम की आँखों में चमक आ गई।‘नाम गुम जाएगा,चेहरा ये बदल जाएगा’ गुनगुनाते हुए वह अपने नाम की रक्षा के लिए आगे बढ़ गया।हम इस बीच एक नया पत्थर तलाशने लगे।

संतोष त्रिवेदी

रविवार, 30 सितंबर 2018

राफेल भाई और बोफोर्स बहन से एक्सलूसिव बातचीत !

राफ़ेल को लेकर इधर पूरे देश में रार मची हुई थी,उधर ख़ुद राफ़ेल भाई की हालत ख़राब थी।अचानक उसकी उड़ान पर लगाम लग गई।दिन में उसे नेता मारते,रात मेंप्राइम-टाइमराफ़ेल को लगने लगा कि इंडिया पहुँचने से पहले जब उसका यह हाल है ,जब वहाँ पधारेगा तो क्या होगा ? हिंदुस्तान के लोग उसे स्वीकारेंगे भी या नहीं ? इसी उधेड़बुन में वह वह फँसा हुआ था।कुछ सूझ नहीं रहा था,तभी एक पहुँचे हुए संकटमोचक ने सलाह दी कि वह बोफ़ोर्स बहन से मिल ले।उसे लड़ाई में दगने से ज़्यादा चुनाव में चलने का लम्बा अनुभव है।राफ़ेल भाई को यह बात जँच गई और वह बोफ़ोर्स बहन से मिलने उसके ठिकाने पर पहुँच गया।दोनों के बीच अज्ञात क्षेत्र में हुई वह बातचीत हमारे संवाददाता चौपट चौरसिया के हाथ लग गई।बिना किसी काट-छाँट के उसे यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि सब अपने-अपने हिसाब से काट-छाँट कर लें:

राफ़ेल : बोफ़ोर्स बहन ! बड़ी उम्मीद से तुम्हारे पास उड़कर आया हूँ।सीमाओं की रक्षा करने का दायित्व भले मेरा हो पर इस वक़्त मुझे स्वयं रक्षा की ज़रूरत है।और हाँ,हमारी यह मुलाक़ात गुप्त रहनी चाहिए,नहीं तोप्राइम-टाइमका एक और अटैक मुझे झेलना पड़ेगा।लोग भरे बैठे हैं।

बोफ़ोर्स: अरे नहीं राफ़ेल भाई ! तुम कुछ ज़्यादा ही सेंटिया रहे हो।लड़ाकू लोग दिल से नहीं दिमाग़ से काम करते हैं।वे विरोधियों की नहीं सुनते बल्कि उन्हें सबक़ सिखाते हैं।जबसे तुम्हारे आने की गड़गड़ाहट सुनी है,मैं बेहद ख़ुश हूँ।बहुत दिनों बाद लगा कि और भी कोई है जो हमारी टक्कर का है।वैसे तो हम हमेशा दुश्मन को निशाने पर लेते रहे हैं पर यहाँ तो हमीं निशाने पर गए थे।फिर भी देखिए,इतनी चर्चा और ख़र्चा के बाद हम अभी तक स्लिम और फ़िट बने हुए हैं।तुम अपनी चर्चा से नाहक परेशान हो।यह तो सफलता की पहली निशानी है।लड़ाई के मैदान में तुम्हारा स्वागत है।

राफ़ेल : बहन ! मेरी ज़िंदगी में पहली बार ऐसा हो रहा है,जब हम बिना उड़ेहिटहो रहे हैं।सोच रहा हूँ कि कहीं उड़ने के पहले ही मेरे पंख कट जाएँ ! यहाँ तक कि हमारे अपने देश में उबाल आया हुआ है।मैदान से ज़्यादा मीडिया में मार-काट मची है।मेरे जाने से पहले ही वह युद्धक्षेत्र बन गया है।बहना,तुमने तो ऐसी मार ख़ूब झेली है।कुछ अपने अनुभव हमें भी बताओ जिससे हमको सुकून मिल सके।

बोफ़ोर्स :हा हा हा।सुकून तो तुम्हें भरपूर मिलेगा।हम दोनों लड़ाकू प्रजाति के हैं।यह साफ़ तौर पर हमारी सफलता है कि लड़ाई के मैदान में शामिल होने से पहले ही लोग हमको लेकर आपस में लड़ने लगते हैं।मेरा क़िस्सा तो अजीब ही है।एक मंत्रीजी तो केवल इधर से उधर चिट्ठी ले जाने पर खेत रहे।चुनाव से पहले जो नेताजी जेब में हमारे नाम की पर्ची लेकर घूमते थे,उन्हें सत्ता-सुख की प्राप्ति हुई,भले ही देशवासियों को पर्ची में लिखे नाम को देखने का सुख कभी नहीं मिला।विरोधियों द्वारा हमारे नाम का बार-बार मंत्रोच्चार करने से असमय ही एक युवा नेता ऐतिहासिक बहुमत से अल्पमत में गया पर मजाल कि हमारे हितैषियों का बाल भी बाँका हुआ हो।हमने सबकी रक्षा की।पिछले तीस सालों से मैं हिंदुस्तान की सियासत संभाल रही हूँ।हमसे मार खाने वाले दुश्मन देश तो घबराते ही हैं,हमें अपनाने वाले हमारे ज़िक्र भर से काँपते हैं।ऐसा सौभाग्य कहीं और नहीं मिलेगा।इसलिए तुम बेखटके जाओ।उड़ो और दूसरों को उड़ाओ।

राफ़ेल : मेरी घबराहट का कारण कुछ और है।कहा जा रहा है कि मेरे सौदे में कुछ लोगों ने खाने-पीने के बाद डकार भी नहीं ली।यह बात विरोधियों को हज़म नहीं हो रही है।इसी पर सारा बवाल मचा हुआ है।जिन्हें खाने को नहीं मिला,उनका हाज़मा तो ख़राब होगा ही।सबके पेट भरने का इंतज़ाम मैं अकेले कैसे कर सकता हूँ ! हमने तो सुना है वहाँ नाले से भी गैस बनती है।सरकार को चाहिए कि इसका ठेका अपने विरोधियों को दे दे।उनके मुँह में भी ढक्कन लग जाएगा।तुम क्या सोचती हो इस बारे में बहन ?

बोफ़ोर्स : मैं तो बिंदास हूँ।शुरू-शुरू में मुझे भी झटका लगा था पर अब सब नॉर्मल लगता है।धीरे-धीरे तुम भी अभ्यस्त हो जाओगे।रही बात खाने-पीने की,तो इस मामले में भारतीय ज़्यादा चूज़ी नहीं हैं।जहाँ भी मिलता है,जो भी मिलता है,खा लेते हैं।हम किसी के पेट भरने का निमित्त बनें,यह हमारे लिए गौरव की बात है।हम दगते हैं,दग़ा नहीं देते।हम ख़ास मिशन के लिए बने हैं,‘कमीशनतो हम हथियारों का प्राण-तत्व है।ये हो तो हम कहीं -जा नहीं सकते।विकास के असली सारथी हम हथियार हैं।इसीलिए सभी विकसित देश हथियार संपन्न हैं।वास्तव में शांतिकाल विकास-विरोधी होता है।लड़ाई रोज़गार का प्रमुख साधन है और हमारे तुम्हारे रहते इसमें किसी प्रकार की कमी नहीं आएगी।माहौल पूरी तरह से तुम्हारे पक्ष में है।जितना तुम परअटैकहोगा,उतना ही अटैक करने की तुम्हारी क्षमता बढ़ेगी।

इस बातचीत के बाद से ही राफ़ेल की लोकेशन नामालूम है।ख़बर है कि मीडिया जल्द ही इस परसर्जिकल स्ट्राइककरने वाली है।

संतोष त्रिवेदी





शांतिप्रेमी का दुनिया के नाम ख़त

  प्यारे विश्व नागरिको   मैं दुनिया का सबसे बड़ा शांतिदूत बोल रहा हूँ।तुम सबकी ख़ैर चाहता हूँ इसलिए कुछ कहने आया हूँ ।...