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गुरुवार, 7 जनवरी 2016

बात और घात

बात शुरू होने वाली थी पर घात हो गई।बात रुक गई पर घात नहीं रुक सकती।अचानक रिश्तों में आई गर्माहट को पाला मार गया ।सरप्राइज का जवाब सरप्राइज।जिसे मास्टरस्ट्रोक समझा जा रहा था,वह हार्ट अटैक निकला।शांति के कबूतर देखते ही बहेलिये निकल आये।बात के बदले लात चलने लगी।लातों के भूत बातों से मान लेते तो परम्परा टूट जाती।इस लिहाज़ से वे शुद्ध परम्परावादी ठहरे।

बात करने से शान्ति की खबर चलती।विकसित होते समाज में शान्ति होना ठीक नहीं।इसीलिए वह पटरी पर नहीं आ पा रही।तलवार की धार पर ही शान्ति टिकती है।शांति में जुड़े हाथ अचानक श्रद्धांजलियों के लिए उठ गए।म्यान में दबे बयान बाहर आ गए हैं।कोई चार टुकड़े करने पर आमादा है तो कोई चाहता है कि मुंहतोड़ जवाब दिया जाए।मुंह से इतनी बार बयान आ चुके हैं कि वह पहले ही टूट चुका है।हर घात के बाद हम वीर रस की कवितायेँ पढ़ने लगते हैं।

जाते हुए साल ने जो उम्मीद बाँधी थी,आते हुए साल ने उसे बिखरा दिया है।उम्मीद बँधी रहती तो बात होती।बात के लिए मेज पर आना होता।मेज पर इतनी जगह होती है कि सबूत रखे जा सकें।बात निकलती तो दूर तक जाती।अब ट्विटर तक जाएगी।बैठकर बात करने की ज़रूरत ही नहीं।मन किया तो चलते-फिरते शांति की चिड़िया उड़ा दी,नहीं तो बयान फोड़ दिया।ऐसी ‘बात’ का कोई विकल्प नहीं।मुंहतोड़ जवाब देना हो या श्रद्धांजलि,इससे सुरक्षित बंकर नहीं है आज।

दोनों तरफ के लोग शान्ति चाहते हैं पर बम और ग्रेनेड कहाँ जाएँ? वे बने हैं तो इसी धरती पर फटेंगे।उन बेचारों की मजबूरी है।उनका यही गुण-धर्म है।वे इसी को अपना धर्म मान रहे हैं।धर्म की अंतिम क्रिया करके ही दम लेंगे।वे बात नहीं करते।पत्थर हो गए हैं।

कई बार बात करने से बात नहीं होती।लात चलाने से भी होती है।मुंहतोड़ जवाब मुंह से ही नहीं लात से भी दिया जाता है।हाथों से श्रद्धांजलियाँ और ट्विटर ही हैंडल नहीं किए जाते,ट्रिगर भी दबाए जाते हैं।लातों से भूत ही नहीं भगाए जाते,कड़े कदम भी उठाए जाते हैं।

1 टिप्पणी:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (08.01.2016) को " क्या हो जीने का लक्ष्य" (चर्चा -2215) पर लिंक की गयी है कृपया पधारे। वहाँ आपका स्वागत है, सादर।