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शनिवार, 15 मार्च 2014

सुराज आ रहा है,कुछ तो गड़बड़ है !



देश भर में इस समय लोकतंत्र की बयार चल रही है।चुनाव को लोकतंत्र का पर्व माना जाता है पर मीडिया इसे रणक्षेत्र,रणभेरी,कुरुक्षेत्र और महाभारत बता रहा है।जनता इस बीच भारी कन्फ्यूज़न में है,कुछ तो गड़बड़ है।नेताओं के मुँह से प्यार के सोते और झरने तथा दिल में टिकट के लड्डू फूट रहे हैं।इमरजेंसी के बहुत दिनों बाद कोई नेता ‘मीसा’ का शिकार हुआ और वह जेल के बजाय कमल की शोभा बढ़ा रहा है,कुछ तो गड़बड़ है।साहब की लहर चल रही है पर नाव भँवर में डगमगा रही है।नाविक मझधार में सहयात्री का लाइफ-बेल्ट छुड़ाकर खुद को बचा रहा है,कुछ तो गड़बड़ है।

चुनावी-चौपाल में चर्चाओं का जोर है।रामराज की प्रतीति हो रही है।लोग प्याज़,टमाटर और पेट्रोल भूलकर चाय पर चर्चा कर रहे हैं।बिजली,पानी सब हवा हो गया है,कुछ तो गड़बड़ है।अपने राज्य के मुखिया का पद छोड़कर दूसरे राज्य की और सारे देश की खबर ली जा रही है।किसी को भेंट में गुलदस्ते के बजाय पत्थर तो किसी को दूसरे दल के सताए और भगाए हुए नेता मिल रहे हैं।अपनी किताब बंद करके दूसरे से हिसाब माँगा जा रहा है,कुछ तो गड़बड़ है।समय कम है और जनता की मुश्किलें ज्यादा,सो चार्टर्ड प्लेन की सवारी करके जनता का भला किया जा रहा है।जनहित में किया गया खर्च सेवा के दायरे में आता है। अनुभवी सेवक इस बात पर कान ही नहीं देते,इसका मतलब उनके कान में ही खराबी है,कुछ तो गड़बड़ है।

चुनावी मौसम में मीडिया से मिलना-जुलना खतरनाक हो रहा है।सामने से जूता उछालने का नुस्खा पुराना पड़ चुका है।अब पीठ पीछे से उजले चेहरे स्याह किये जा रहे हैं।ऐसा करने वालों  को हर तरफ कालिख-पुती शक्लें ही नज़र आती हैं,सो वो भी क्या करें या इसी बहाने कुछ लोग कालिख में भी समाजवाद लाना चाह रहे हैं।सब एक जैसे दिखेंगे,तभी उनका मिशन पूरा होगा,कुछ तो गड़बड़ है।

चुनावी टिकटें जितनी बंट रही हैं,उससे ज्यादा तो कट रही हैं।टिकट कटने से आत्माएं आहत हो  रही हैं।नैतिकता और निष्ठा को थोड़े दिनों के लिए कोने में धर दिया गया है।शरीर की रक्षा पहले ज़रूरी है।जब वही नहीं रहेगा,तो आत्मा कहाँ भटकेगी ? धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे तो उनके लिए महाभारत करनी पड़ी थी और जब किसी का एक ही चिराग हो तो वो क्या कर गुजरेगा,सोचिये ! कुछ तो गड़बड़ है।

अब सुराज की आहट हो चुकी है।सेंसेक्स होली में दीवाली मना रहा है।मंहगाई और भ्रष्टाचार एक्सपायरी डेट में चल रहे हैं।धर्म और जाति के झंडे ऊँचे और ऊँचे हो रहे हैं,कुछ तो गड़बड़ है !


15/03/2014 को 'जनसंदेश टाइम्स' में




 

2 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

चुनाव में उत्कृष्ट और निकृष्ट दोनों ही सामने आ जाते हैं।

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…


ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन संदीप उन्नीकृष्णन अमर रहे - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !